अमेरिका की बढ़ती संकीर्णता खतरनाक
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हाल ही में ट्रंप प्रशासन ने यूएन फ्रेमवर्क ऑन क्लाइमेट चेंज के साथ-साथ 65 अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों और मंचों से हटने की घोषणा की है। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप पेरिस समझौते से बाहर हो गए थे। इस बार संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी जिन एजेंसियों और एडवाइजरी पैनल से बाहर निकलने की घोषणा की है, उनमें जलवायु और नवीकरणीय ऊर्जा, लैंगिक समानता तथा अल्पसंख्यकों के अधिकार आदि हैं। इस कदम का पूरी दुनिया पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
कुछ बिंदु –
- विश्व स्वास्थ्य संगठन के साथ अमेरिका की प्रतिबद्धता को खत्म करने से मां और बच्चों की मृत्युदर, बीमारी की निगरानी, टीबी, मलेरिया, एचआईवी/एड्स आदि के रोकथाम पर बड़ा असर पड़ सकता है। ये सभी क्षेत्र बाहरी निधि पर निर्भर हैं।
- जलवायु परिवर्तन, मानवाधिकार, श्रम मानक और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए चीन और रूस जैसे शक्तिशाली देशों को अवसर मिल सकता है। इनकी पहल बाकी के लोकतांत्रिक देशों से मेल नहीं खाती है।
- ट्रंप के इन आदेशों में सिर्फ और सिर्फ अमेरिका का स्वार्थ देखा जा रहा है। इस प्रकार का नजरिया अन्य देशों के लिए उदहारण बन सकता है। संकीर्ण राष्ट्रवाद से नई चुनौतियां उभर सकती है। नस्लवाद और जातीय राष्ट्रवाद जैसी भावना बढ़ सकती है।
इतिहास साक्षी है कि इस प्रकार की नीतियों से इंसानी प्रवृत्ति के सबसे बुरे कामों को खुली छूट मिल जाती है। इसके खतरनाक सामाजिक-राजनीतिक परिणाम सामने आ सकते हैं।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 12 जनवरी 2026
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