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संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद विस्तार के प्रति भारत का रुख क्या हो?

Afeias
20 Nov 2017
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Date:20-11-17

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संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की स्थायी प्रतिनिधि मिकी हेली के हाल ही के कुछ बयानों से स्पष्ट होता है कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के विस्तार के साथ ही भारत को बिना वीटो के उसका स्थायी सदस्य बनाने के पक्ष में है। वहीं भारतीय सूत्रों का कहना है कि भारत को सुरक्षा परिषद् के अन्य सदस्यों की तरह ही उत्तरदायित्व एवं विशेषाधिकार दिए जाने चाहिए। दूसरे शब्दों में कहें, तो भारत अपनी सदस्यता वीटो के साथ चाहता है। ऐसा रवैया अपनाने से पहले भारत को यह याद रखना चाहिए कि जी-फोर के अन्य देश जापान, ब्राजील एवं जर्मनी ने भी वीटो को कोई मुद्दा न बनाते हुए सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता ग्रहण की है।

विस्तार के मॉडल

सन् 2005 में तत्कालीन संयुक्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान ने सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता को बढ़ाकर 24 करने के लिए ‘इन लार्जर फ्रीडम’ नामक एक रिपोर्ट पेश की थी। इसमें उन्होंने विस्तार के दो मॉडल प्रस्तावित किए थे।

मॉडल ए – उन्होंने छः नए स्थायी सदस्य एवं तीन नए अस्थायी सदस्यों को बढ़ाने की बात कही थी। ये तीन अस्थायी सदस्य प्रमुख क्षेत्रों से चुने जाने थे।

मॉडल बी सदस्यों की एक नई श्रेणी के रूप में 8 नए सदस्य बनाने की बात कही गई, जिनका कार्यकाल चार वर्ष हो। इनके दोबारा चुने जाने का प्रावधान हो। इसके साथ ही एक सीट अस्थायी सदस्य के लिए रखी जाए।

अमेरिका की भूमिका

2010 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा के दौरान उन्होंने सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता में विस्तार की आशा करते हुए भारत को उसमें शामिल किए जाने की बात कही थी। परन्तु संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी शिष्ट मंडल ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की। अतः भारत की स्थायी सदस्यता की बात ज्यों की त्यों रह गई।

दो वर्ष पूर्व संयुक्त राष्ट्र सदस्यों के विचारों के प्रकाशन में यह बात उजागर हुई कि अमेरिका सुरक्षा परिषद् का संक्षिप्त विस्तार चाहता है। वह सदस्यता में विस्तार के साथ वीटो दिए जाने का पक्षधर नहीं है। यू.के. और फ्रांस की तरह अमेरिका ने तब भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन भी नहीं किया था।

अन्य देशों की भूमिका

अभी तक फ्रांस ने भारत को वीटो के साथ स्थायी सदस्यता दिए जाने का सबसे अधिक समर्थन किया है। यू.के. ने जी-फोर देशों का बिना वीटो के समर्थन किया है। भारत के पुराने मित्र रूस ने किसी प्रकार की रुचि  नहीं दिखाई एवं चीन ने कहा कि इस विषय पर बातचीत के लिए अभी समय नहीं आया है।

भविष्य

निकी हेली के वक्तव्यों ने बिना वीटो के भारत की स्थायी सदस्यता का रास्ता खोल दिया है। परन्तु सदस्यों के बीच आए एक मसौदे से यह भी स्पष्ट होता है कि अभी सदस्य देशों में से किसी को भी पन्द्रह वर्ष तक वीटो मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। जी-फोर एवं अमेरिका के बीच एक संधि-बिन्दु भी दिखाई दे रहा है। परन्तु ऐसा भी लग रहा है कि अमेरिका की यह चाल भारतीय-अमेरिकियों का उपयोग करने के लिए चली गई हो।

कुछ भी हो, फिलहाल भारत को अमेरिका के समर्थन के प्रति सकारात्मक रहना चाहिए। और कुछ नहीं, तो बातचीत के रास्ते खुले रहेंगे और हो सकता है कि सुरक्षा परिषद् सुधार में कोई नया रास्ता निकाला जाए।

‘द हिन्दू’ में प्रकाशित टी.पी. श्रीनिवासन् के लेख पर आधारित।

 

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