रुपए की गिरावट को कैसे संभाले भारत
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इस संपादकीय का मूल तर्क है कि केवल RBI के मौद्रिक एवं नियामकीय उपायों से रुपये की गिरावट को लंबे समय तक रोका नहीं जा सकता। इसके लिए भारत को ऐसे संरचनात्मक आर्थिक सुधार करने होंगे, जो विदेशी निवेश को आकर्षित करें, और घरेलू पूंजी को देश में निवेश के लिए प्रोत्साहित करें। रुपये की कमजोरी केवल मुद्रा बाजार की समस्या नहीं है, बल्कि यह भारत के व्यापार घाटे, विदेशी पूंजी के बहिर्गमन, निवेश संबंधी चुनौतियों और आर्थिक नीतियों से जुड़ी व्यापक समस्या का संकेत है।
रुपये पर दबाव के प्रमुख कारण –
- विदेशी निवेशकों द्वारा पूंजी की निकासी –
जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालते हैं, तो वे रुपये को डॉलर में बदलते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है, और रुपये पर दबाव पड़ता है।
- व्यापार घाटा और डॉलर की मांग –
भारत को कच्चे तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य वस्तुओं के आयात के लिए डॉलर की आवश्यकता होती है। जब आयात का मूल्य निर्यात से अधिक होता है, तो विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ सकती है।
- भू-राजनीतिक अनिश्चितता –
युद्ध, व्यापारिक तनाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएँ निवेशकों को सुरक्षित परिसंपत्तियों, विशेषकर डॉलर की ओर आकर्षित कर सकती हैं।
- घरेलू पूंजी का विदेशों में निवेश –
भारतीय कंपनियों का विदेशी प्रत्यक्ष निवेश, धनी भारतीयों का विदेशों में परिसंपत्तियाँ खरीदना और विदेशी निवेशकों द्वारा लाभ की निकासी भी पूंजी प्रवाह को प्रभावित कर सकती है।
रुपये को संभालने के लिए आरबीआई के कदम –
- विदेशी मुद्रा बाजार में नियामकीय प्रतिबंध लगाना।
- फॉरवर्ड डॉलर, एक ऐसा समझौता होता है, जिसके तहत भविष्य में किसी निर्धारित तारीख पर पहले से तय विनिमय दर पर विदेशी मुद्रा खरीदी या बेची जाती है। इससे आयातक विनिमय दर के जोखिम से बच सकता है। पर 20% राशि को सुरक्षित रखना आवश्यक होता है। इसका उद्देश्य डॉलर की अग्रिम खरीद को महँगा करना है। इससे आयातकों की लागत बढ़ सकती है।
- बैंकों की विदेशी मुद्रा खुली स्थिति पर सीमा लगाना। इसका उद्देश्य विनिमय दर के जोखिम को सीमित करना है। लेकिन इससे बैंकिंग और मुद्रा बाजार की गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती हैं।
- ब्याज दर में वृद्धि करना।
आरबीआई के हस्तक्षेप की सीमाएँ हैं। मुद्रा बाजार में प्रशासनिक हस्तक्षेप अस्थायी राहत तो दे सकता है, लेकिन वह रुपये की कमजोरी के मूल कारणों को समाप्त नहीं करता। इसलिए मुद्रा बाजार के लक्षणों का उपचार और आर्थिक समस्या के मूल कारणों का समाधान दो अलग-अलग बातें हैं।
- रुपये को बचाने के लिए ब्याज दरें बढ़ानी चाहिए?
ब्याज दर बढ़ने से रुपये को कुछ परिस्थितियों में समर्थन मिल सकता है, क्योंकि इससे घरेलू परिसंपत्तियों पर मिलने वाला प्रतिफल आकर्षक हो सकता है। लेकिन यह प्रभाव निश्चित नहीं है। निवेशक देश की आर्थिक संभावनाओं, जोखिम और भविष्य की विनिमय दर को भी देखते हैं।
ब्याज दर बढ़ाने के विरुद्ध तर्क –
- गृह और वाहन ऋण महँगे हो सकते हैं।
- निजी निवेश एवं उपभोग कमजोर पड़ सकते हैं।
- कंपनियों की उधारी लागत बढ़ सकती है।
- आर्थिक विकास की गति प्रभावित हो सकती है।
सार यह है कि रुपये की रक्षा केवल मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग को दबाकर नहीं की जा सकती। टिकाऊ समाधान भारत की उत्पादन क्षमता, निर्यात प्रतिस्पर्धा, निवेश वातावरण और आर्थिक संस्थानों को मजबूत करने में निहित है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित सुगाता घोष के लेख पर आधारित। 14/10/26