जैव विविधता संरक्षण के लिए समग्र दृष्टिकोण चाहिए
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भारत में वन्यजीव संरक्षण का दृष्टिकोण केवल बाघ, शेर और चीता जैसी प्रतीकात्मक प्रजातियों तक सीमित नहीं होना चाहिए। संरक्षण की प्राथमिकता पूरे पारिस्थितिकी तंत्र, प्राकृतिक आवासों और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व को दी जानी चाहिए। अर्थात वन्यजीव संरक्षण का दृष्टिकोण प्रजाति-केंद्रित होने के बजाय परिदृश्य-केंद्रित होना चाहिए।
जैव विविधता पारिस्थितिक संतुलन, खाद्य सुरक्षा और मानव कल्याण का आधार है। यद्यपि भारत में प्रोजेक्ट टाइगर तथा ग्रेट इंडियन बस्टर्ड संरक्षण कार्यक्रम जैसे प्रयास महत्वपूर्ण हैं, किंतु केवल चुनिंदा प्रजातियों पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है।
कुछ बिंदु –
- प्रजाति-केंद्रित संरक्षण से संकटग्रस्त वन्यजीवों के प्रजनन, संख्या वृद्धि और विलुप्ति रोकने में सहायता मिलती है।
- हालांकि, प्राकृतिक आवासों का विनाश, घासभूमियों का कृषि में रूपांतरण, खनन, बिजली की लाइनें और वन्यजीव गलियारों का विखंडन इसकी प्रभावशीलता सीमित कर रहे हैं।
- ग्रेट इंडियन बस्टर्ड इसका उदाहरण है। केवल बंदी अवस्था में प्रजनन और पक्षियों को जंगल में छोड़ना पर्याप्त नहीं होगा, जब तक कि उनके प्राकृतिक आवास तथा सुरक्षित उड़ान मार्ग संरक्षित न हों। इसी प्रकार, हाथियों के गलियारों का संरक्षण मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने में सहायक हैं।
आगे क्या किया जाना चाहिए –
- जंगलों, घासभूमियों और आर्द्रभूमियों का एकीकृत संरक्षण किया जाना चाहिए।
- विकास परियोजनाओं का वैज्ञानिक पर्यावरणीय आकलन जरूरी है।
- वन्यजीव गलियारों की सुरक्षा और उनके आवास को बनाए रखने के लिए प्रयास होने चाहिए।
- स्थानीय समुदायों की भागीदारी और संरक्षण के लिए प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
- वैज्ञानिक निगरानी एवं प्रभावी क्रियान्वयन होना चाहिए।
प्रजातियों की संख्या के साथ प्रजनन सफलता, आवास की गुणवत्ता, मृत्यु दर और गलियारों की निरंतरता जैसे संकेतकों के आधार पर संरक्षण की सफलता मापी जानी चाहिए।
‘द हिंदू‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 06/10/26