संघवाद के पक्ष में

Afeias
07 Oct 2026
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ब्रिटेन में बढ़ती क्षेत्रीय अस्मिताओं और स्वतंत्रता की मांग के संदर्भ में संघवाद को एक संभावित समाधान के रूप में देखा जाना चाहिए।

मुख्य बिंदु –

  • ब्रिटेन के सामने चुनौती –

स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड में अधिक स्वायत्तता और स्वतंत्रता की मांगें इस भावना से जुड़ी हैं कि लंदन स्थित वेस्टमिंस्टर उनके हितों के अनुरूप पर्याप्त अधिकार और संसाधन नहीं देता।

  • संघवाद एक विकल्प –

संपादकीय के अनुसार, अलग-अलग स्वतंत्र राष्ट्र बनने के बजाय संघीय व्यवस्था के जरिए क्षेत्रीय पहचान और स्वायत्तता को बनाए रखते हुए एक मजबूत संघ में रहा जा सकता है। अमेरिका का उदाहरण इसके समर्थन में दिया गया है।

  •  लोकतंत्र से अलग प्रकृति –

दुनिया में लोकतांत्रिक देशों की संख्या की तुलना में संघीय देशों की संख्या काफी कम है। इसका कारण यह है कि चुनाव कराना अपेक्षाकृत आसान है। लेकिन केंद्र से सत्ता और राजस्व का एक हिस्सा राज्यों/क्षेत्रों को सौंपना राजनीतिक रूप से अधिक कठिन होता है।

  • स्विट्जरलैंड और अमेरिका का मॉडल –

स्विट्जरलैंड में कैंटॉन्स और कम्यून्स को व्यापक अधिकार प्राप्त हैं तथा केंद्र की भूमिका अपेक्षाकृत सीमित है। अमेरिका में जनसंख्या या आकार में अंतर के बावजूद प्रत्येक राज्य को सीनेट में दो सीटें मिलती हैं। इससे छोटे और बड़े राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन बनाने का प्रयास होता है।

  • अन्य संघीय मॉडल –

संपादकीय बेल्जियम का उदाहरण देता है। इसने विभिन्न भाषाई और क्षेत्रीय पहचानों को समायोजित करने के लिए केंद्रीकृत व्यवस्था से संघीय व्यवस्था की ओर कदम बढ़ाया है। स्पेन में भी क्षेत्रीय स्वायत्तता है, हालाँकि संप्रभुता केंद्र के पास मजबूत रूप से बनी रहती है।

  • संघवाद का मूल महत्व –

संघवाद केवल प्रशासनिक शक्तियों को राज्यों को देने तक सीमित नहीं है। इससे राज्यों/क्षेत्रों को कानून बनाने और अपनी स्थानीय प्राथमिकताओं के अनुसार शासन करने अधिकार भी मिलता है। इससे केंद्र द्वारा ऊपर से थोपे गए कानूनों के बजाय स्थानीय परिस्थितियों और मूल्यों के अनुरूप नीतियां बनाई जा सकती हैं।

  • भारत के लिए महत्व –

भारत स्वयं एक संघीय व्यवस्था वाला देश है, जहाँ केंद्र और राज्यों के बीच विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियों का विभाजन है। भारत का अनुभव दिखाता है कि विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को एक संवैधानिक ढाँचे के भीतर समायोजित किया जा सकता है।

  • ब्रिटेन का ‘डिवॉल्यूशन’ मॉडल –

1990 के दशक के उत्तरार्ध से ब्रिटेन ने स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड को कुछ क्षेत्रों; जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और कृषि में अधिकार दिए हैं। जबकि रक्षा, विदेश नीति और आव्रजन जैसे विषय वेस्टमिंस्टर के पास हैं। ब्रिटेन इस प्रक्रिया को और आगे बढ़ा सकता है।

केंद्रीय विचार यह है कि क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय एकता हमेशा एक-दूसरे की विरोधी नहीं होतीं। संघवाद क्षेत्रीय स्वायत्तता और व्यापक राजनीतिक एकता के बीच संस्थागत संतुलन बनाने का एक तरीका हो सकता है। इसलिए ब्रिटेन जैसी बहु-पहचान वाली राजनीतिक व्यवस्था में अधिक विकेंद्रीकरण अलगाववादी मांगों के लिए एक संभावित संवैधानिक विकल्प हो सकता है।

‘द टाइम्स ऑफ इंडिया‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 15/09/26