समस्या क्यों बन गए हैं बांध

Afeias
24 Sep 2026
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सन् 1880 तक बांध केवल सिंचाई, खाद्य सुरक्षा और जल की पर्याप्‍त उपलब्‍धता की दृष्टि से बनाए जाते थे। बिजली की बढ़ती मांग ने बांधों के स्‍वरूप को विशाल कर दिया है। उदाहरण के लिए ब्रह्मपुत्र नदी पर बनी चीन के 168 खरब डॉलर परियोजना को देखिए। एक समय पर भाखरा बांध भी बहुत बड़ा माना जाता था।

समय के साथ-साथ हिमालय की तीव्र ढलान और विशाल नदी प्रवाह को देखते हुए ऊँचाई पर बड़े-बड़े बांध बनने लगे। 1950 और 60 के दशक में बनने वाले बांधों के लिए जलवायु परिवर्तन कोई चिंता का विषय नहीं था। लेकिन लगातार होने वाले परिवर्तन ने खतरों की प्रकृति बदल दी है।

क्‍या है ये बदलती प्रकृति –

  • ग्‍लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।
  • परमाफ्रोस्‍ट क्षरण से पहाड़ों की ढलान कभी भी अस्थिर हो सकती है।
  • ऐसा होने पर पत्‍थर और बर्फ का मलबा भारी मात्रा में नीचे आ सकता है।

इन सभी खतरों को देखते हुए हिमालय के लिए नई विकास नीति की जरूरत है-

  • जलवायु के परिवर्तन को सहन करने लायक बांध के डिजाइन तैयार किए जाने चाहिए।
  • उपग्रहों, ड्रोन, सिस्मिक सेंसर, जीपीए और एआई आधारित अर्ली वार्निंग सिस्‍टम की मदद से ग्‍लेशियर और उनकी ढलान की निगरानी बढ़ाई जानी चाहिए।
  • पूरे नदी क्षेत्र पर बनने वाले बांध, सुरंग, सड़क और ट्रांसमिशन के बुनियादी ढांचे का अलग-अलग प्रभाव आंकलन करने के बजाय इसे संचयी तौर पर देखा जाना चाहिए।
  • प्रत्‍येक जलविद्युत योजना को केवल उसकी बिजली उत्‍पादन क्षमता से नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी, सामाजिक और आपदा के खतरों से जोड़कर परखा जाना चाहिए।
  • अगर खतरों से जुड़े सुरक्षा साधनों के उपयोग से योजना की लागत बढ़ जाती है, तो उसे छोड़ने में संकोच नहीं किया जाना चाहिए।

कुल-मिलाकर हिमालय का विकास सुरक्षित, धारणीय और जयवायु के साथ लचीलापन रखने वाली जलविद्य़ुत परियोजनाओं के साथ ही किया जाना चाहिए।

(‘द टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित- 02/09/2026)