ग्लेशियरों की निगरानी संभव है
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हाल ही में नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर से बनी झील के फटने से बाढ़ आई थी। इसमें अनेक लोगों की मौत हुई है। बहुत से लापता हैं। क्या इसे रोका जा सकता था, या पूर्व अनुमान से हानि को कम किया जा सकता था? कुछ बिन्दु –
- हिमनदों या ग्लेशियरों की तकनीकी-निगरानी संभव है। यहाँ स्विट्जरलैंड के ब्लेटन के उदाहरण से इसे समझा जा सकता है। 2025 में वहॉ अल्पाइन ग्लेशियर के टूटने से भारी तबाही हुई थी। लेकिन एक ही व्यक्ति की मृत्यु हुई, क्योंकि तकनीकी निगरानी के जरिए मिली चेतावनी से गांव को नौ दिन पहले ही खाली करा लिया गया था।
- हिमनदों से जुडी मुख्य समस्या यह है कि दुनिया में ग्रीनलैंड और अंटार्कटिका के बाहर लगभग 2 लाख हिमनद हैं। इन पर मानवीय निगरानी रखना संभव नहीं है। अत: हर ऐसे क्षेत्र के लिए विकसित तकनीक को साथ लेना होगा।
- हिमनदों में होने वाले बहुत मामूली परिवर्तनों को पकड़ने के लिए कनाडा और चीन जैसे देशों ने एआई सिस्टम लगा रखा है। भारीत के सीडैक ने भी सिक्किम के शाखो चो ग्लेशियर के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम तैयार कर लिया है।
तकनीकों का विकास मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए ही किया जाता है। अत: स्मार्ट सेंसर, सैटेलाइट मॉनिटरिंग, एआई निगरानी और समुदाय की निगरानी से आज नेपाल जैसी आपदाओं को टाला जा सकता है।
(‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित-29/08/2026)