अमेरिका व सऊदी अरब के मध्य असैन्य परमाणु समझौता
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पश्चिम एशिया में युद्ध जारी है। इसी बीच अमेरिका और सऊदी अरब के बीच असैन्य परमाणु समझौता हो गया है। इस समझौते के तहत अमेरिका अब सऊदी अरब में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों का निर्माण, परमाणु ईंधन आपूर्ति, रिएक्टर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, परमाणु सुरक्षा मानक, वैज्ञानिक इंजीनियर प्रशिक्षण और रेडियोधर्मी कचरा प्रबंधन के लिए काम करेगा।
इस समझौते से जुडे महत्वपूर्ण प्रश्न –
- क्या इस समझौते से पश्चिम एशिया में स्थिरता और युद्ध विराम को बल मिलेगा?
- क्या इससे परमाणु शक्ति बनने को लालायित ईरान में नाराजगी नहीं फैलेगी?
- पश्चिम एशिया के एक देश को परमाणु ऊर्जा संपन्न बनाना और दूसरे को वंचित रखना कितना न्यायपूर्ण और तार्किक है?
- सऊदी अरब के विरोधी देश इजरायल इस समझौते पर कैसी प्रतिक्रिया देगा?
इस समझौते से जुड़े कुछ अन्य बिंदु –
- आज 31 देश परमाणु ऊर्जा पैदा करते हैं और 9 देशों के पास परमाणु बम है। आज देश वैज्ञानिक तरक्की दिखाने के लिए तथा निजी स्वार्थ के लिए भी परमाणु समझौता करते हैं। इससे हमें इस प्रश्न का उत्तर मिलता है कि क्यों तेल ऊर्जा होते हुए भी सउदी अरब परमाणु समझौता कर रहा है।
- छोटे देश भी परमाणु ऊर्जा की सामरिक और रणनीतिक ताकत को समझते हैं।
- यदि अमेरिका सउदी अरब की परमाणु ऊर्जा के लिए मदद नहीं करता है, तो सउदी अरब रूस व चीन की ओर मदद के लिए जाएगा। 2025 में हुए पाकिस्तान व सउदी अरब के रणनीतिक समझौते के कारण वह पाकिस्तान के पास भी मदद के लिए जा सकता है। इसीलिए अमेरिका के साथ-साथ भारत के लिए भी यही अच्छा है कि अमेरिका सउदी अरब की मदद करे।
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