मानव पूंजी के बिना अधूरी विकास यात्रा

Afeias
29 Aug 2026
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हम सामान्यतः यह मानते हैं कि आगामी दशकों में भारत की सकल घरेलू उत्पाद विकास वृद्धि 7-8% रहेगी, जिससे हम उच्च मध्य आय वर्ग वाली श्रेणी में फिर उच्च आय वाले देशों में शामिल हो जाएंगे। नए एक्सप्रेस वे, छोटे शहरों में हवाई अड्डे, विश्व स्तरीय डिजिटल ढांचा, ये सारी चीजें जितनी प्रभावशाली लगती हैं, उतनी हैं नहीं, क्योंकि हमने विकास के सबसे महत्वपूर्ण कारक मानवपूंजी पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया है।

परंपरागत अर्थशास्त्रियों ने आर्थिक वृद्धि को अधिक श्रमिकों, अधिक भूमि और अधिक मशीनों को जोड़ने की यांत्रिक प्रक्रिया के रूप में देखा। लेकिन यदि हम अपने देश में ट्रकों या कंम्प्यूटरों की संख्या बढ़ाते हैं, तो सक्षम कामगारों की संख्या भी बढ़ानी होगी।

वर्ष 1992 में अर्थशास्त्री ग्रेगरी मैनकिव, डेविड रोमर और डेविड वील ने मानव पूंजी यानि शिक्षा, स्वास्थ्य और विशिष्ट कौशल के सामूहिक मिश्रण को उत्पादन के स्वतंत्र कारक के रूप में अलग किया। पुरानें मॉडलों में भौतिक पूँजी में किसी अन्य की तुलना में चार गुना निवेश करने पर दोगुना ही समृद्धि होती थी। लेकिन यदि भौतिक के साथ मानव पूँजी में निवेश किया जाए, तो यह चक्रवृद्धि परिणाम देता है यानि 16 गुना। विकास सिद्धांतकार राबर्ट लुकास और पॉल रोमर ने दिखाया कि मानव पूँजी के पास एक अनूठा आर्थिक लाभ है, क्योंकि यह घटते रिटर्न के नियम से प्रभावित नहीं होती।

पूर्वी एशियाई देशों में मानव पूंजी विकास का खाका –

यह सिर्फ शैक्षणिक अवधारणा से बढ़कर 20वीं सदी के सबसे बड़े आर्थिक चमत्कारों की सच्चाई है –

  • 1953 में दक्षिण कोरिया, जो युद्ध ग्रस्त राज्य था, साक्षरता 20% , न तेल, न खनिज, न ही अन्य उल्लेखीय भौतिक संपत्ति। उसने हल्के विनिर्माण को बढावा देने के लिए 1960 में निरक्षरता समाप्त की, 1970 में व्यवसायिक तकनीकि स्कूलों का विस्तार किया और 1980 में विश्वविद्यालयों को विज्ञान और प्रौद्योगिकी संसाधनों से भर दिया। आज यह एक वैश्विक नवाचार की शक्ति के रूप में खड़ा है।
  • 1965 में जब सिंगापुर को स्वतंत्रता मिली, तो वहाँ जल आपूर्ति की व्यवस्था तक नहीं थी। वहाँ मानव पूंजी को एक मात्र संसाधन मानते हुए उन्हें विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सटीक तकनीकी आवश्यकताओं के साथ तालमेल वाला बनाया गया। इसके बाद भी सतत राज्य वित्त-पोषित वयस्क पुनः प्रशिक्षण की शुरूआत की।
  • चीन ने भी खुली अर्थव्यवस्था से पहले ही व्यापक बुनियादी साक्षरता और ग्रामीण स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित की। इससे वैश्विक आपूर्ति श्रंखलाओं को वहाँ श्रम के साथ एक अत्यधिक अनुशासित, साक्षर कार्यबल मिला। आज चीन प्रत्येक वर्ष 1 करोड़ से अधिक छात्रों को स्नातक करा रहा है, जिसमें भारी संख्या में इंजीनियर होते है।

मानव पूंजी विकास में भारत का विरोधाभास –

हमारे देश में माध्यमिक की जगह उच्च शिक्षा को अधिक महत्ता दी गई। इससे वैश्विक क्षमता केंद्रों को शक्ति देने वाले इंजीनियरों की आपूर्ति तो हो जाती है, लेकिन 1.4 अरब की जनसंख्या वाला देश कुछ टेक पेशेवरों के सहारे उच्च-मध्य-आय वाले देशों का दर्जा नहीं प्राप्त कर सकता। वस्तुतः भौतिक संरचना की जगह शिक्षा व स्वास्थ्य में निवेश की आवश्यकता है।

  • सार्वजनिक वित्तपोषण को आक्रामक रूप से शुरूआती सालों में बच्चों के स्वास्थ्य व शिक्षा पर केंद्रित करना होगा।
  • व्यवसायिक चक्र को सीधे स्कूल शिक्षा से एकीकृत करना होगा, जिससे शिक्षा का पैमाना रोजगार योग्यता पर स्थानांतरित हो।
  • राज्य को उद्योगों और प्रशिक्षण केंद्रों के बीच गहरी संस्थागत साझेदारी बनानी चाहिए, पाठ्यक्रम को अद्यतन करते हुए।

क्या उपरोक्त विचारों को हम परिणाम और जवाबदेही के साथ लागू करने के लिए पर्याप्त रूप से गंभीर हैं ?

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