नए दौर में भारतीय कृषि
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भारतीय कृषि में पिछले कुछ समय से खूब परिवर्तन हुए हैं। पहले हमारी कृषि व्यवस्था सिर्फ अनाज की कमी और भूख मिटाने तक सीमित थी। पर अब इसे उत्पादन के क्षेत्र तक सीमित न रखकर किसानों की समृद्धि, जोखिम सुरक्षा, पोषण सुरक्षा, हरित तकनीक और ग्रामीण विकास का आधार बना दिया गया है। हरित क्रांति के बाद पहली बार नीतियां फसल उत्पादन के बजाय किसान की वास्तविक आय, टिकाऊ कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती जैसे पहलुओं पर केन्द्रित है।
भारतीय कृषि की उन्नति के लिए किए गए प्रयास –
- प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के माध्यम से अब तक 22 किस्तों के माध्यम से 4.27 लाख करोड़ रुपये सेअधिक की सहायता किसानों तक पहुंचाई गई है।
- सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, कृषि-अवसंरचना, वेयर हाऊस और कोल्ड चेन में निवेश ने उत्पादन, भंडारण और बाजार तक पहुँच को मजबूत किया है।
- दाल, खाद्य तेल और कॉटन के लिए राष्ट्रीय दलहन, तिलहन और कॉटन मिशन शुरु किया गया। इससे उत्पादकता के साथ ही वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा योग्य गुणवत्ता, बेहतर मूल्य और स्थिर आय सुनिश्चित होगी।
- प्राकृतिक खेती मिशन के तहत एक करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए सेंसिटाइज कर इनमें से लगभग 18 लाख किसानों को सक्रिय रूप से प्राकृतिक खेती के लिए तैयार किया जाएगा और चरणबद्ध रूप से करीब 75 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को प्राकृतिक खेती के दायरे में लाया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य मिट्टी की उर्वरता बढ़ाना, रासायनिक लागत घटाना और जलवायु झटकों के सामने फसलों को टिकाऊ और पोषक बनाना भी है।
- पीएम धन धान्य कृषि योजना के तहत लगभग 100 कम उत्पादन वाले जिलों; जहाँ प्रति हेक्टेयर उत्पादन औसत से कम है, 11 विभागों की 36 योजनाऍं जोड़कर उन्हें समग्र पैकेज में प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके तहत सिंचाई, मृदा स्वास्थ्य, बीज, उर्वरक, फसल विविधीकरण, पशुपालन, बागवानी, कृषि उपकरण, कौशल विकास, अवसंरचना और बाजार-जुड़ाव जैसी सुविधाऍं सहजता से उपलब्ध हो रही हैं।
- ‘खेती बचाओ अभियान’ के तहत असंतुलित उर्वरक प्रयोग, भूजल का अत्यधिक दोहन और सीमित फसल चक्र को नियंत्रित किया जा रहा है। इससे किसानों की आय, भोजन की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है। इसके पांच मुख्य उद्देश्य निम्न हैं –
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- किसान मिट्टी के परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का उपयोग करे।
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- डीएपी और यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता कम करे।
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- जैव एवं नैनो उर्वरक को अपनाएं।
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- हरी खाद, जैविक खाद और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा दें।
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- नकली बीज, उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रति सतर्क रहें।
सही मात्रा में उर्वरक प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता अच्छी रहेगी, लागत घटेगी और उत्पादन बढ़ेगा।
- कृषि को विज्ञान, अनुसंधान एवं डिजिटल तकनीक के माध्यम से और लाभकारी बनाने की दृष्टि से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् ने 2014-25 के बीच 3000 बीजों की ऐसी किस्में विकसित की हैं, जो जलवायु परिवर्तन से निपटने में कहीं अधिक सक्षम हैं।
- डिजिटल कृषि मिशन और एग्रीस्टैक के तहत किसान पहचान, फसल प्लाटों का डिजिटलीकरण, ड्रोन आधारित सेवाऍं, कीट-रोग निगरानी तथा मौसम और स्थान विशेष की आवश्यकता केअनुरूप सलाह जैसी व्यवस्था की जा रही है
हमारी नई कृषि यात्रा का सार है-फसल से आगे, किसान के विश्वास और ग्रामीण भारत की समृद्धि की ओर।
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