अदृश्य सेंसर

Afeias
30 Jul 2026
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भारत में सेंसरशिप पर बहस अब लगभग सामान्य हो चुकी है। लेकिन कहानियों को दबाने से सच्चाई नहीं दबती। ‘सतलुज’ जैसी अपारदर्शी रोक लोकतंत्र के लिए बेहद हानिकारक है।

कुछ प्रमुख बिंदु –

  1. भारत में सेंसरशिप का इतिहास –
    • भारत की पहली प्रतिबंधित फिल्म ‘भक्त विदुर’ थी, क्योंकि औपनिवेशिक सरकार को लगा कि उसका मुख्य पात्र महात्मा गांधी जैसा दिखाई देता है।
    • स्वतंत्रता के बाद भी विभिन्न सरकारों ने जब भी माना कि कोई दृश्य या कहानी असंतोष भड़का सकती है, तो फिल्मों में मनमाने ढंग से कट लगाए।
    • ‘किस्सा कुर्सी का’ पर आपातकाल के दौरान लगाया गया प्रतिबंध इसका चर्चित उदाहरण है।
    • इसके अलावा फिल्मों के चुंबन, तलाक या महिला-केंद्रित कथानक जैसे विषयों पर भी समय-समय पर आपत्तियाँ उठाई गईं।
    • पारंपरिक सेंसरशिप में कम-से-कम यह स्पष्ट होता था कि आदेश किसने दिया। लेकिन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सामग्री हटाने के मामलों में अक्सर यह पारदर्शिता नहीं होती।
  1. सतलुजऔर अदृश्य सेंसरशिप –
    • फिल्म ‘सतलुज’ को पहले टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह से रहस्यमय ढंग से हटा दिया गया।
    • बाद में भारत में एक स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म ने “वर्तमान परिस्थितियों” का हवाला देते हुए इसे अचानक अनुपलब्ध कर दिया।
    • यदि नियामक संस्थाएँ और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म बिना किसी औपचारिक आदेश के इस प्रकार निर्णय लेते हैं, तो जवाबदेही समाप्त हो जाती है।
    • कोई यह नहीं बताता कि निर्णय किसने लिया और किस आधार पर लिया।
  1. क्या सेंसरशिप आवश्यक है? –
    • अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि फिल्मों को नियंत्रित करना आवश्यक है, ताकि समाज में तनाव न फैले या लोगों की भावनाएँ न भड़कें।
    • लेकिन एक सदी से अधिक का अनुभव बताता है कि यह आशंका अक्सर अतिरंजित होती है।
    • आज के समय में, जब दर्शक दो घंटे की फिल्म भी बिना मोबाइल देखे पूरी नहीं देख पाते, यह मान लेना कि कोई फिल्म उन्हें तुरंत कट्टर या हिंसक बना देगी, वास्तविकता से अधिक कल्पना प्रतीत होती है।
  1. नागरिकों पर भरोसा –
    • नागरिक कोई निष्क्रिय पात्र नहीं हैं, जिनमें विचार भर दिए जाएँ।
    • फिल्म कोई आदेश नहीं होती, बल्कि सोचने, बहस करने, असहमति जताने या सहमत होने का आमंत्रण होती है।
    • नागरिकों से यह अवसर छीनना केवल कला को ही नुकसान नहीं पहुँचाता, बल्कि जनता को अपरिपक्व मानने जैसा है। यह लोकतंत्र को भी कमजोर करता है।
  1. कठिन विषयों पर खुली चर्चा –
    • समाज की कठिन, संवेदनशील और विवादास्पद कहानियों पर सेंसरशिप पूरी तरह गलत दृष्टिकोण है।
    • ऐसी रचनाएँ समाज को उसकी जटिलताओं, अन्याय और सच्चाइयों से परिचित कराती हैं।
    • इन्हें दबाने के बजाय उनका सामना करना समाज को अधिक परिपक्व और लोकतांत्रिक बनाता है।

जैसा कि प्रसिद्ध लेखक जेम्स बाल्डविन ने कहा था — “सामना की गई हर उस चीज़ को बदला नहीं जा सकता, लेकिन जब तक उसका सामना नहीं किया जाएगा, तब तक उसे बदला भी नहीं जा सकता।”

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े मुख्य बिंदु –

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता — अनुच्छेद 19(1)(a)।
  • उचित प्रतिबंध — अनुच्छेद 19(2)।
  • सेंसरशिप बनाम डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर अपारदर्शी कंटेंट हटाना।
  • लोकतंत्र में असहमति, कला और रचनात्मक अभिव्यक्ति का महत्व।
  • पारदर्शिता, जवाबदेही और विधि के शासन की आवश्यकता।

किसी फिल्म या कहानी को हटाकर वास्तविक समस्याओं को समाप्त नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र की मजबूती कठिन प्रश्नों और असहज सच्चाइयों का सामना करने में है, न कि उन्हें अदृश्य सेंसरशिप के माध्यम से दबाने में।

द टाइम्स ऑफ इंडियामें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 07/07/26