सिर्फ बातों से जंगल नहीं बच सकते

Afeias
27 Apr 2026
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अरावली की वन-संपदा को बचाने के प्रयास पर काफी समय से चर्चा हो रही है। लेकिन इससे संबंद्ध राज्‍यों में इस दिशा में उठाए जा रहे कदम कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। उल्‍टे माइनिंग और विकास के नाम पर पेड़ों की कटाई से लगातार इसे नष्‍ट किया जा रहा है। हाल ही में हरियाणा के कलेसर अभ्‍यारण्‍य में एक हजार से ज्‍यादा खैर के पेड़ों की कटाई हो गई है। इस गैर-कानूनी कटाई की चिंता किसी को नहीं है। दो वन अधिकारियों को चिंता इस बात की है कि इन पेड़ों की चोरी गई लकड़ी की जांच का भार किसे मिलता है।

यह कहानी अकेली हरियाणा की नहीं है। उत्तरप्रदेश के सुहेलवा वन-क्षेत्र से खैर पेड़ों की लकड़ी को अंधाधुंध बेचा गया। इससे बनने वाले कत्‍थे की मांग अरबों डॉलर के पान मसाला उद्योग में है। इस मांग के चलते सुहेलवा को खोखला कर दिया गया है।

ऐसे कई मामले हैं, जो देशभर के वन-क्षेत्रों की एक कड़वी सच्‍चाई है। नौकरशाही की घेराबंदी और अधिकार-क्षेत्र से जोड़कर इन्‍हें एक-दूसरे पर थोपना सिर्फ प्रशासन की दुर्घटनाएं नहीं हैं। ये जानबूझकर बनाए गए तरीके हैं, ताकि ऊपर बैठे अधिकारियों को जवाबदेही से बचाया जा सके।

द इकॉनॉमिक टाइम्‍समें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित- 30/03/2026