विदेश में छात्र गमन को रोकते भारत के प्रयास
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हर साल बड़ी संख्या में भारतीय युवा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, अनुसंधान सुविधाओं और कैरियर के अवसरों की तलाश में विदेश जाते हैं। पर अब उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने वाले भारतीयों की संख्या 2023 में 9 लाख से घटकर 2025 में 6,25,000 रह गई है। जिसका कारण छात्रों के प्रमुख गंतव्यों अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया के आव्रजन नियमों में सख्ती है। वहाँ जाने के लिए वित्तीय लागत बढ़ गई है तथा रोजगार के प्रति निश्चितता भी वैसी नहीं रही है।
सरकार द्वारा युवाओं को विदेश जाने से रोकने के प्रयास –
- ‘स्टडी इन इंडिया’ पहल के तहत 2030 तक प्रतिवर्ष 2 लाख विदेशी छात्रों को आकर्षित करने का लक्ष्य है।
- 19 विदेशी विश्वविद्यालयों को नीतिगत ढाँचे के तहत भारत में ही अंतरर्राष्ट्रीय संस्थानों को संचालित करने की अनुमति दी गई है। इससे भारतीय छात्रों का व्यय तथा रोजगार के प्रति अनिश्चतता कम होगी। साथ ही दूसरे विदेशी छात्र आकर्षित भी होंगे।
- भारत में 2035 तक उच्च शिक्षा नामांकन आज के 53 करोड़ से बढ़कर 70 करोड़ होने की उम्मीद है। जबकि अंतरर्राष्ट्रीय संस्थानों का नामांकन जनसांख्यिकी परिवर्तन के कारण स्थिर बना हुआ है।
भारत में अंतरर्राष्ट्रीय संस्थान बनाने के लिए आगे राह –
- हर साल प्रतिष्ठित संस्थानों में जितनी सीटें होती हैं, उससे ज्यादा छात्र वहाँ प्रवेश पाने की अर्हता रखते हैं, जो कि मांग की अपेक्षा आपूर्ति में कमी को दर्शाता है।
- भारत का जनसांख्यिकी लाभ तकनीकि बदलाव से मिल रहा है। ऐसे में देश को आर्टिफिशियल इंटेलीजेस, सेमीकंडक्टर, जैव और स्वच्छ प्रौद्योगिकी में तेजी से उच्च कौशल विकास करने की आवश्यकता है। इन क्षेत्रों के पारिस्थितकीय व अनुसंधान के लिए विश्वविद्वालयों की केंद्रीय भूमिका होगी।
- विदेशी परिसरों के आकर्षण के लिए क्यूएस वर्ल्ड रैंकिग में और अधिक सुधार की आवश्यकता है।
- भारतीय विश्वविद्वालयों को गुणवत्ता, संकाय क्षमता और शैक्षणिक स्वतंत्रता के मामले में प्रतिस्पर्धी बनाना होगा। साथ ही अनुसंधान तथा प्रयोगशालाओं में निरंतर निवेश करना होगा।
- वैश्विक संस्थानों से सहयोग के लिए नियामकीय ढांचों में लंचीलापन रखना होगा, ताकि उन्हें स्वायत्तता मिले।