04-04-2026 (Important News Clippings)

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04 Apr 2026
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Date: 04-04-26

​Lessons unlearned

Steps to manage crowds must be taught to organisers, police personnel

Editorial

Another stampede and another probe. India seems to have learned little about crowd management despite a series of stampedes in recent months. At the Sheetla Mata temple in Bihar’s Nalanda district on Tuesday, nine persons died, eight of them women, and a dozen were injured. On the occasion of the last Monday of the month of Chaitra, more than 10,000 people came to the temple, which typically sees only a few hundred devotees. Police say they had no forewarning of a large gathering, though many view their absence as a consequence of the bandobust requirements for the Nalanda University convocation, which was attended by the President of India that day. Priests had allegedly taken money for the special darshan and allowed the bribe givers through the exit, which became clogged. The entrance was practically blocked as people tried to get in. One death from a likely fall was enough to trigger panic. What happened was clearly avoidable, as are all stampedes that routinely occur in India. For instance, too many people trying to enter a packed stadium is a well-studied disaster scenario and lessons have been learned from it in many countries. However, the RCB victory celebration in Bengaluru, in June 2025, led to an avoidable buildup of the crowd in the city, which was then led into the already full stadium.

Crowd science and crowd management are well-defined subjects in academia in the developed world. While crowd science deals largely with planned gatherings, there is a whole body of literature on unplanned, spontaneous gatherings, which are often marked by emotionally charged crowds, such as celebrity sightings and religious events. The latter is typical in India and is driven by digital communities. Crowd management combines quantitative techniques with qualitative methods and theories. For instance, the science stipulates that if there are more than five people per square metre, movement will be constrained, requiring intervention. Qualitative methods, for example, include ruses such as installing mirrors to make people see themselves, reinforcing individual identity, which can be lost and lead to irrational, panic-stricken behaviour. Contrary to popular impression, expressive crowds gathering for religious reasons are open to leadership and guidance. In India, the police learn crowd control on the field and through experience shared by veterans, who discuss using mobile loudspeakers to calm crowds and maintain order through clear instructions. Crowd control and management must become subjects of serious academic study so that measures to prevent accidents are commonly known and implemented across India.


Date: 04-04-26

ईरान युद्ध के चलते सरकार सुपर एक्टिव मोड में है

संपादकीय

राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों पर सबसे बड़ी नीति-निर्धारक इकाई प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (सीसीएस) की विगत दस दिनों में दो बार बैठक देश में ईरान युद्ध से पैदा हुए बहुआयामी दुष्प्रभावों और आसन्न संकट की भयावहता बताती है। बैठकों में इस संकट से लड़ने के लिए की जा रही तैयारियों का जायजा यह भी इंगित करता है कि सरकार हाई एक्शन मोड में है। परिवहन संकट से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं खासकर – सब्जी और फल की महंगाई, उद्योगों पर ऊर्जा लागत बढ़ना, एलपीजी, सीएनजी, पीएनजी और पेट्रो-केमिकल्स की किल्लत, बेरोजगारी, निर्यात रोकने से उद्योगों पर असर, खाद की दिक्कत, हीलियम और सल्फर न मिलने से सेमीकंडक्टर और आईटी उद्योगों में छंटनी भारत जैसे एक विकासशील देश के लिए असाधारण स्थिति है। प्रधानमंत्री ने अधिकारियों की सात टीमें बना कर उनका फीडबैक और आगे की तैयारियों का जायजा लिया। ट्रम्प के सम्बोधन में दो-तीन हफ्ते में युद्ध के समापन की बात कही गई थी, लेकिन अभी तक हुई क्षति ने ही दुनिया को हिला दिया है। विश्लेषक मानते हैं कि युद्ध से पहले ही 600 अरब डॉलर का नुकसान हो चुका है, लेकिन अगर यह कुछ हफ्ते और चला तो यह आंकड़ा छ गुना बढ़कर 3.5 ट्रिलियन तक पहुंचा जाएगा, यानी वैश्विक जीडीपी का 3.4 प्रतिशत।


Date: 04-04-26

जन विश्वास विधेयक

संपादकीय

लोकसभा के बाद राज्यसभा से भी जन विश्वास संशोधन विधेयक पारित होने से कानून के रूप में उसके अमल का रास्ता साफ हो गया। इसके माध्यम से उस व्यवस्था को विदा देने का जतन किया गया है, जिसमें छोटी-छोटी गलतियों या सामान्य नियम-कानूनों के उल्लंघन पर जेल की सजा का प्रविधान था। अब ऐसा होने पर आर्थिक दंड लगेगा। जन विश्वास विधेयक का मूल उद्देश्य जीवन सुगमता के साथ व्यापार सुगमता को बढ़ावा देना और न्याय व्यवस्था को ज्यादा मानवीय एवं व्यावहारिक बनाना है। इसी कारण प्रधानमंत्री ने इस विधेयक के पारित होने पर यह आशा व्यक्त की कि इसके जरिये भरोसे पर आधारित व्यवस्था का निर्माण होने के साथ आम नागरिक सशक्त बनेंगे। चूंकि इस विधेयक के जरिये 79 केंद्रीय कानूनों के 784 प्रविधानों में संशोधन किए गए हैं और 700 से अधिक छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया है, इसलिए मुकदमों का बोझ हटेगा और न्यायिक तंत्र पर दबाव कम होगा। अब ड्राइविंग लाइसेंस की अवधि खत्म होने पर भी वह 30 दिन तक वैध रहेगा और राष्ट्रीय राजमार्ग पर जाम लगाने पर सजा के स्थान पर जुर्माने का प्रविधान होगा। इसी तरह अन्य अनेक मामलों में ऐसा होगा। इनमें से कई मामले कारोबारियों से भी जुड़े हैं, जैसे पहले ड्रग्स एवं कास्मेटिक नियमों के उल्लंघन पर जेल हो सकती थी, लेकिन अब केवल जुर्माना लगेगा। जो छोटे कारोबारी प्रायः जटिल नियम-कानूनों के अनचाहे उल्लंघन के कारण दंडित होने के दबाव में रहते थे, वे अब भयमुक्त होंगे।

वास्तव में कानून का शासन ऐसा होना चाहिए, जिसमें मामूली गलती या किसी गफलत या अनजाने में की गई भूल सजा का कारण नहीं बननी चाहिए। अब जब जन विश्वास विधेयक से हालात में व्यापक बदलाव की उम्मीद की जा रही है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि इस विधेयक के प्रविधानों से आम जनता को अवगत कराया जाए, ताकि वह अधिकतम लाभ उठा सके और शोषण एवं भ्रष्टाचार से भी बच सके। ध्यान रहे आम लोग सशक्त तब होते हैं, जब वे नियम-कानूनों से भली तरह अवगत होते हैं। जनता को बदले हुए नियम-कानूनों से परिचित कराने का काम सरकार को करना चाहिए। इसी के साथ उसे इसे लेकर सावधान रहना होगा कि छोटे अपराधों में जेल भेजने वाले प्रविधानों की जगह चेतावनी देने और जुर्माना लगाने वाली नई व्यवस्था से समाज में ऐसा कोई संदेश न जाए कि नियम-कानूनों के उल्लंघन पर जुर्माना देकर बचा जा सकता है। यदि जुर्माना देकर नियम-कानूनों को हल्के में लेने की प्रवृत्ति बढ़ी तो इस विधेयक का उद्देश्य ही व्यर्थ हो जाएगा। लोगों को यह समझना आवश्यक है कि अधिकारों के साथ कर्तव्यों के पालन से ही कोई राष्ट्र प्रगति पथ पर तेजी से आगे बढ़ता है।


Date: 04-04-26

सभ्यतागत प्रगति की प्रतिगामी दिशा

अश्विनी कुमार, ( लेखक सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं )

ईरान युद्ध से दुनिया की परेशानी बढ़ गई है। इसे जल्द समाप्त करने के लिए पर्दे के पीछे भी तमाम प्रयास जारी हैं, पर उनसे किसी समाधान की उम्मीद कम ही है। संघर्ष का दायरा खाड़ी क्षेत्र तक फैल गया है। ईरान ने इस क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को भी निशाना बनाया है। ईरान ने होर्मुज जलमार्ग की जिस तरह नाकाबंदी की हुई है, उससे कई अन्य देश भी इस संघर्ष में कूद सकते हैं।

कोई भी युद्ध अपने साथ तबाही लेकर ही आता है तो यह लड़ाई भी कोई अपवाद नहीं। इसमें अब तक हजारों जिंदगियां भेंट चढ़ गई हैं। बड़ी-बड़ी मानव बस्तियां मलबे के ढेर में तब्दील हो गई हैं। अमेरिका और इजरायल ने ईरान की परमाणु आकाक्षांओं के दमन और अपनी आत्मरक्षा को आधार बनाकर यह हमला किया। उन्होंने ईरानी जनता के मानवाधिकारों और स्वतंत्रता के लिए सत्ता परिवर्तन की आवश्यकता भी जताई, पर उनकी छेड़ी इस जंग को न के बराबर नैतिक एवं कानूनी समर्थन मिल सका। वास्तविक अर्थों में तो यह युद्ध ऊर्जा संसाधनों पर कब्जे और अपनी ताकत का वर्चस्व स्थापित करने की एक कवायद भर है। यह इस पहलू को भी पुष्ट करता है कि है 1945 के बाद की अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था वर्चस्ववादी प्रयोग के समक्ष युद्ध रोकने और शांति बनाए रखने में पूरी तरह असमर्थ है। ट्रंप का वेनेजुएला अभियान और उनके द्वारा छेड़ा गया टैरिफ युद्ध उस वैश्विक कानूनी ढांचे के पतन का ही प्रमाण है, जिसका नेतृत्व संयुक्त राष्ट्र चार्टर और जिनेवा सम्मेलनों एवं अन्य संधियों में संहिताबद्ध कानून करते हैं। ईरान पर हमले की न तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से अनुमति ली गई और न ही अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस से अनुमोदन।

ईरानी नेताओं की हत्या और ईरान के भीतर नागरिक ठिकानों पर सैन्य हमलों का दायरा भी कई मौलिक सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है। ईरान पर हमले के लिए इजरायल और अमेरिका वहां सत्ता परिवर्तन की जो दलील देते आए हैं, वह भी अंतरराष्ट्रीय कानून के उन बुनियादी सिद्धांतों के खिलाफ हैं, जो राष्ट्रों की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की अक्षुण्णता पर आधारित हैं। इस मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश हार्डी डिलार्ड ने 1975 में ‘पश्चिमी सहारा’ मामले में एक महत्वपूर्ण अवलोकन प्रस्तुत किया था, जिसका मर्म यह था कि “जनता ही क्षेत्र की नियति तय करती है, न कि क्षेत्र जनता की नियति।’ यह टिप्पणी ईरान के मामले में भी सटीक बैठती है। ईरान में सत्ताधीशों के अत्याचार की कतिपय पैमानों पर निंदा संभव है, पर इसके बावजूद किसी संप्रभु राष्ट्र के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए ‘सत्ता परिवर्तन’ के संदिग्ध तर्क की वैधता को स्वीकारने का यही अर्थ होगा कि हम संयुक्त राष्ट्र चार्टर का पूरा खाका ही पलट दें।

हाल में यूक्रेन, गाजा, वेनेजुएला और ईरान में चल रहे टकराव के अलावा अमेरिका द्वारा टैरिफ युद्ध छेड़ने जैसी पहल ने हमें शक्ति की वास्तविकता एवं उसके स्वरूप संबंधी दर्शन पर मंथन की दिशा में उन्मुख किया है। इस क्रम में वैश्विक मंच पर विराजमान राजनीतिक नेतृत्व का मानवीय मुश्किलों के प्रति उदासीन रवैया यही संकेत करता है कि सभ्यतागत मोर्चे पर हुई प्रगति की दिशा प्रतिगामी हो चली है। एक ऐसे विश्व को जिसे शक्ति के उपयोग को लेकर स्वयं को और अधिक सभ्य बनाने की आकांक्षा रखनी चाहिए, वहां यह उलट दिशा में जाता दिख रहा है। याद रहे बमबारी से कभी शांति संभव नहीं। इतिहास भी हमें यही सिखाता है कि युद्ध स्वयं समस्या है, समाधान नहीं और किसी भी प्रकार का अन्याय या दमन अपने भीतर ही क्रांति के सूत्र समाहित किए होता है। जब तक दुनिया युद्ध की अमानवीय प्रकृति और विनाशलीला से मुक्त नहीं हो जाती, तब तक मानवीय विश्व व्यवस्था की स्थापना कपोल कल्पना ही रहेगी।

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा शांति की दिशा में आगे बढ़ने और तनाव घटाने के लिए बार-बार किया गया आह्वान वस्तुत: सशस्त्र संघर्षों के प्रति स्पष्ट अस्वीकृति और विवादों के मध्यस्थतापूर्ण समाधान की तात्कालिकता का ही संकेत देता है। यह राष्ट्रों के बीच शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देने और संघर्ष समाधान के माध्यम के रूप में युद्ध से परहेज करने की भारत की नीति के अनुरूप है। इस बारीक दृष्टिकोण का एक आवश्यक पहलू यह होगा कि सत्ता के साम्राज्यवादी प्रयोग के विरुद्ध प्रभावी सुरक्षा कवच के रूप में अपेक्षाकृत कड़ी अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था का पालन सुनिश्चित किया जाए। यह उन लोगों की ओर से अंतरराष्ट्रीय कानूनों के निहितार्थों एवं प्रक्रियाओं के प्रति एक बाध्यकारी प्रतिबद्धता पर आधारित हो, जिनके पास वैश्विक न्याय को बनाए रखने की शक्ति है। यह भी सुनिश्चित किया जाए कि यह व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय कानून की कसौटी एवं नैतिकता के मानदंडों पर पूरी तरह खरी उतरे। इस महत्वपूर्ण मोड़ पर भारत की भूमिका अपनी प्राचीन दार्शनिक विचारधारा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और नेहरूवादी अंतरराष्ट्रीयवाद में निहित अपनी विदेश नीति की सर्वोत्तम परंपराओं के अनुरूप एक शांतिदूत की होनी चाहिए।

युद्ध की परिस्थितियां निरंतर नए मोड़ ले रही हैं। ऐसे में राष्ट्रीय हितों की रक्षा का प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है। चूंकि वर्तमान सरकार का यह नैतिक दायित्व है कि इन हितों को सर्वोत्तम रूप से कैसे सुरक्षित किया जाए, इसलिए उसके निर्णय और विवेक का सम्मान किया जाना चाहिए। नि:संदेह लोकतांत्रिक व्यवस्था में विदेश और रक्षा नीतियां भी बहस के दायरे से परे नहीं हैं, लेकिन सार्वजनिक विमर्श में यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि वर्तमान सरकार ही घरेलू लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु राष्ट्रीय शक्ति के कारकों का प्रभावी उपयोग करने में सर्वाधिक सक्षम है। ऐसी स्थिति में नेतृत्व और विदेश नीति प्रतिष्ठान पर दुर्भावना का आरोप लगाना न तो नीति-संगत है और न ही विवेकपूर्ण। स्मरण रहे कि कटुतापूर्ण आरोपों की तुलना में संयमित शैली में व्यक्त की गई असहमति कहीं अधिक प्रभावशाली होती है।


Date: 04-04-26

लैंगिक समानता को बल देने वाली पहल

ऋतु सारस्वत, ( लेखिका समाजशास्त्री हैं )

गर्मियां शुरू हो चुकी हैं और इसी के साथ जल संकट के दिन आने वाले है। ऐसे ही माहौल में बीते दिनों विश्व जल दिवस मनाया गया। 1993 से संयुक्त राष्ट्र द्वारा मनाया जा रहा यह दिवस जल को जीवन, विकास और मानव अधिकार के रूप में स्थापित करने के वैश्विक प्रयासों का प्रतीक है, किंतु इस औपचारिकता के पीछे एक कठोर सच्चाई आज भी यथावत है। यह सच्चाई केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देती है। फिजी के एक तटीय गांव में रहने वाली छह वर्षीय लैसानी घर के पास पानी के टैंक से वर्षा जल एकत्र करती है। वह प्लास्टिक की बोतलों में पानी भरकर घर लाती है, जहां पीने से पहले उसे उबाला जाता है। उसके परिवार के लिए वर्षा जल ही सुरक्षित पानी का मुख्य स्रोत है। इसे उपयोग योग्य बनाए रखना उनके दैनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा है। यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं, बल्कि तथ्य बताते हैं कि विश्व में लगभग 1.8 अरब लोगों के घरों में पेयजल उपलब्ध नहीं है। हर तीन में से दो परिवारों में पानी लाने की जिम्मेदारी मुख्यतः महिलाओं और लड़कियों पर होती है। पानी लाने और उसके प्रबंधन में खपने वाला समय अक्सर लड़कियों की शिक्षा में बाधा, स्वास्थ्य जोखिमों में वृद्धि और सीमित अवसरों का कारण बनता है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार वैश्विक स्तर पर महिलाएं और लड़कियां प्रतिदिन लगभग 25 करोड़ घंटे पानी एकत्र करने में व्यतीत करती हैं। यह केवल समय का आंकड़ा नहीं, बल्कि वे असंख्य अवसर हैं, जो शिक्षा, कौशल विकास, मनोरंजन या आय अर्जित करने वाली गतिविधियों में परिवर्तित हो सकते थे। आंकड़े यह भी दर्शाते हैं कि 15 वर्ष से कम आयु की लड़कियों (7 प्रतिशत) के पानी लाने की संभावना समान आयु के लड़कों (4 प्रतिशत) की तुलना में अधिक है। यह लैंगिक असमानता को उजागर करता है।

यूएन वर्ल्ड वाटर डेवलपमेंट रिपोर्ट 2026 यह रेखांकित करती है कि जल संकट केवल संसाधनों की उपलब्धता का प्रश्न नहीं, बल्कि समान अधिकारों और अवसरों से जुड़ा हुआ एक गहरा सामाजिक प्रश्न है। घरों में सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता के अभाव का सबसे अधिक भार महिलाओं और लड़कियों पर पड़ता है, जो अधिकांश परिवारों में पानी लाने की प्राथमिक जिम्मेदारी निभाती हैं। जब सुरक्षित जल घर के निकट उपलब्ध होता है, तो लड़कियों के स्कूल में बने रहने की संभावना बढ़ती है और महिलाओं को आर्थिक एवं सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए समय मिलता है। शहरी झुग्गी बस्तियों और ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालयों तथा मासिक धर्म स्वच्छता के लिए पर्याप्त जल का अभाव न केवल शारीरिक असुविधा का कारण बनता है, बल्कि महिलाओं और किशोरियों के लिए शर्मिंदगी, असुरक्षा और सामाजिक बहिष्करण की स्थिति भी उत्पन्न करता है। विडंबना यह है कि 50 से कम ही देशों में ऐसी नीतियां हैं, जो ग्रामीण स्वच्छता और जल संसाधन प्रबंधन में महिलाओं की भागीदारी का स्पष्ट उल्लेख करती हैं।

जहां वैश्विक स्तर पर नीतिगत असंतुलन अब भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है, वहीं भारत ने इस चुनौती का समाधान खोजने की दिशा में उल्लेखनीय पहल की है। जल जीवन मिशन के माध्यम से भारत ने न केवल जल उपलब्धता के प्रश्न को संबोधित किया है, बल्कि जल प्रबंधन में व्याप्त लैंगिक असमानता को भी दूर करने का प्रयास किया है। 2019 में प्रारंभ जल जीवन मिशन, जिसे ‘हर घर जल’ के रूप में भी जाना जाता है, ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक परिवार तक नल से स्वच्छ जल पहुंचाने का एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम है। इसे दिसंबर 2028 तक बढ़ा दिया गया है। मार्च 2026 तक इस मिशन के अंतर्गत लगभग 15.82 करोड़ ग्रामीण परिवारों को उनके घरों में पाइप जल कनेक्शन उपलब्ध कराया जा चुका है, जो कुल ग्रामीण परिवारों का लगभग 81 प्रतिशत से अधिक है। इस तरह जल जीवन मिशन ने लैंगिक समानता की दिशा में एक अभूतपूर्व और अनुकरणीय कार्य किया है।

घर या घर के निकट जल उपलब्ध होने से महिलाओं का समय शिक्षा, आजीविका और अन्य उत्पादक गतिविधियों में लगता है। भारतीय स्टेट बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, ‘जल जीवन मिशन के परिणामस्वरूप लगभग नौ करोड़ महिलाओं को पानी लाने के दैनिक श्रम से मुक्ति मिली है। यह केवल श्रम में कमी नहीं, बल्कि उनके समय और ऊर्जा के पुनर्संयोजन का संकेत है। महिलाओं की कृषि एवं अन्य उत्पादक गतिविधियों में भागीदारी में वृद्धि दर्ज की गई है, जो यह स्पष्ट करती है कि जल तक आसान पहुंच सीधे तौर पर महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण से जुड़ती है। इस मिशन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका लैंगिक दृष्टिकोण है। ग्राम जल एवं स्वच्छता समितियों में 50 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी को अनिवार्य कर सरकार ने महिलाओं को केवल जल उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि जल प्रबंधन की निर्णयकर्ता के रूप में स्थापित किया है।

जल समाधान में महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व को केंद्र में रखा जाना आवश्यक है, ताकि वे केवल उपयोगकर्ता नहीं, बल्कि जल प्रबंधन और नीति निर्माण की प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भागीदार बन सकें। भारत ने जल जीवन मिशन के माध्यम से इस विचार को व्यवहार में रूपांतरित करते हुए एक उदाहरण प्रस्तुत किया है, परंतु यह केवल आरंभ है और इस क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है।


Date: 04-04-26

एआई से बदलाव

संपादकीय

आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के क्षेत्र में एक अग्रणी कंपनी, एंथ्रोपिक ने हाल ही में दो अध्ययन प्रकाशित किए हैं। एक में लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) के उपयोग के पैटर्न का विश्लेषण किया गया है, और दूसरे में श्रम बाजार पर इसके शुरुआती प्रभावों की जांच की गई है। हालांकि विश्लेषण के लिए केवल क्लाउड से प्राप्त डेटा का उपयोग किया गया है, फिर भी ये अध्ययन तकनीक की वर्तमान स्थिति की एक झलक प्रस्तुत करते हैं। एलएलएम का उपयोग उच्च आय वाले देशों में अधिक होता है, और वह भी अपेक्षाकृत सीमित विशिष्ट कार्यों के लिए। हालांकि, दोनों रिपोर्टों का मुख्य निष्कर्ष उपयोग के मामलों में विविधता और परिणामस्वरूप किए गए कार्यों के औसत आर्थिक मूल्य में मामूली गिरावट की ओर इशारा करता है। अध्ययन में पाया गया है कि शुरुआती उपयोगकर्ता कोडिंग जैसे विशिष्ट उच्च-मूल्य वाले उपयोग को प्राथमिकता देते हैं, जबकि बाद में अपनाने वाले उपयोगकर्ता व्यक्तिगत प्रश्नों सहित कार्यों की एक विस्तृत श्रृंखला को अपनाते हैं। इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर इसका उपयोग एकसमान नहीं है, प्रति व्यक्ति उपयोग में 48 फीसदी हिस्सा शीर्ष 20 देशों का है।

तकनीकी बदलाव को अपनाने में अंतर से श्रम बाजार में असमानता और गहरी हो सकती है, जिससे कौशल-आधारित तकनीकी परिवर्तन के प्रभाव बढ़ जाते हैं। दूसरे अध्ययन में, जो एआई के श्रम बाजार प्रभावों को समझने के लिए एक माप प्रस्तुत करता है, कंप्यूटर प्रोग्रामर, ग्राहक सेवा प्रतिनिधि और वित्तीय विश्लेषक जैसे व्यवसायों को एआई से ‘सबसे अधिक प्रभावित’ व्यवसायों में गिना गया है, क्योंकि उनके कार्य सैद्धांतिक रूप से एलएलएम के साथ संभव हैं। इस प्रकार, कंप्यूटर विज्ञान, वित्त, कानूनी सेवाएं और प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में एलएलएम सैद्धांतिक रूप से अधिकांश कार्यों को संभाल सकता है। लेकिन व्यवहार में, इस क्षमता का केवल एक अंश ही साकार हो रहा है। श्रम बाजार से शुरुआती संकेत उभरने लगे हैं, जो बेरोजगारी में कोई व्यवस्थित वृद्धि नहीं दर्शाते हैं। इसके बजाय, जोखिम वाले व्यवसायों में युवा कामगारों, विशेष रूप से प्रवेश स्तर के पदों पर भर्ती धीमी हो गई है।

क्लाउड के उपयोग में भारत 116 देशों में से 98वें स्थान पर है। उन्नत एआई उपकरणों को अपनाने की समग्र दर कम होने के बावजूद, भारतीय उपयोगकर्ता कोडिंग और कोड डीबगिंग, डिजाइन कार्य, शैक्षणिक सहायता, वेब विकास और साफ्टवेयर विकास के लिए एआई का अत्यधिक उपयोग कर रहे हैं। स्पष्ट रूप से एआई का उपयोग उत्पादकता और रोजगार क्षमता बढ़ाने के साधन के रूप में किया जा रहा है। फिर भी, ‘करके सीखने’ के माध्यम से अधिक लाभ प्राप्त करने वाले अनुभवी उपयोगकर्ता श्रम बाजार में कौशल अंतर को और गहरा कर रहे हैं। यह एक गहरी कमजोरी को भी उजागर करता है। वे क्षेत्र जहां भारतीय कामगार अत्यधिक संख्या में केंद्रित हैं, जिनमें आईटी सेवाएं, बैक-ऑफिस संचालन और नियमित संज्ञानात्मक कार्य शामिल हैं, एआई-संचालित स्वचालन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं। शुरुआती बाजार संकेत पहले से ही दिखाई दे रहे हैं। आईटी शेयरों पर दबाव बढ़ गया है, और विश्लेषक इस संभावना पर विचार करने लगे हैं कि राजस्व का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा उन कार्यों को संभालने से कम हो सकता है जिनके लिए कभी मानव टीमों की आवश्यकता होती थी।

यदि एआई के कारण शुरुआती स्तर की नौकरियां कम हो जाती हैं, तो कौशल संचय का मार्ग ही बाधित हो सकता है। इसलिए, सबसे तात्कालिक प्राथमिकता क्षमता बढ़ाना है। चूंकि एआई कौशल को कई गुना बढ़ा देती है, इसलिए जो कर्मचारी इसे अपने कार्यप्रवाह में प्रभावी ढंग से एकीकृत कर सकते हैं, वे पहले से ही अधिक उत्पादक और अधिक लचीले हैं। इससे न केवल कोडिंग में, बल्कि समस्या-समाधान और एआई प्रणालियों के साथ मिलकर काम करने की क्षमता में भी बड़े पैमाने पर कौशल विकास आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार, शिक्षा और प्रशिक्षण प्रणालियों को तेजी से अनुकूलित होने की आवश्यकता होगी। इस संबंध में केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा विद्यालय स्तर पर एआई और कंप्यूटेशनल थिंकिंग पाठ्यक्रम की शुरुआत एक समयोचित कदम है। एआई से संबंधित पाठ्यक्रमों को विद्यालय और उच्च शिक्षा संस्थानों में समग्र रूप से शामिल किया जाना चाहिए।


Date: 04-04-26

नए वैश्विक संतुलन के लिए निर्णायक समय

आर जगन्नाथन, ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता संघर्ष अब वैश्विक भू-राजनीति में गहरी दरारें पैदा कर रहा है। यूरोपीय संघ (ईयू) और जापान ने पश्चिम एशिया में हो रहे इस संघर्ष में शामिल होने से इनकार कर दिया है, खासतौर पर होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री मार्गों की सुरक्षा के मुद्दे पर जहां ईरान ने कुछ देशों के लिए पाबंदी लगा रखी है। ऐसे समय में निश्चित रूप से मध्यम स्तर की शक्तियों के एक नए गठबंधन के निर्माण का अवसर सामने है जिसमें भारत अहम भूमिका निभा सकता है। भारत जैसे देश इस गठबंधन का नेतृत्व करते हुए वैश्विक संस्थाओं में सुधार की दिशा में पहल कर सकते हैं। इनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन जैसी प्रमुख संस्थाएं शामिल हैं।

दूसरी ओर, अमेरिका ने 60 से अधिक वैश्विक संगठनों से खुद को अलग करके स्थिति को और जटिल बना दिया है। वहीं, चीन ‘भले ही ही खुद को मुक्त व्यापार का समर्थक बताता हो लेकिन वह अपने दुर्लभ खनिज संसाधनों के एकाधिकार का इस्तेमाल कर दुनिया पर दबाव बना रहा है और विभिन्न बाजारों में सस्ते सामान की भरमार कर वैश्विक निर्माताओं को नुकसान पहुंचा रहा है।

जहां एक ओर अमेरिका अपने व्यापार घाटे को कम करने के लिए आयात शुल्क (टैरिफ) बढ़ा रहा है (हालांकि अमेरिका के उच्चतम न्यायालय के एक फैसले के कारण इन्हें फिलहाल अस्थायी रूप से रोक दिया गया है), वहीं दूसरी ओर चीन ने 2025 में 1.2 लाख करोड़ डॉलर का अब तक का सबसे बड़ा व्यापार अधिशेष दर्ज किया है। ऐसे में केवल ये दो बड़ी शक्तियां (अमेरिका और चीन) मिलकर भी एक स्थिर और नियम आधारित भविष्य की गारंटी नहीं दे सकतीं। इसी वजह से, मध्यम शक्तियों के एक गठबंधन की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गई है जो पुराने वैश्विक संस्थानों में सुधार की मांग करते हुए एक अधिक न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था बनाने की दिशा में काम कर सके।

इस नए गठबंधन को हम ‘आर7’ नाम दे सकते हैं, जहां ‘आर’ का अर्थ है सुधार और ‘7’ उन सात प्रमुख मध्यम शक्तियों को दर्शाता है जिनकी बदलाव में गहरी दिलचस्पी है। इस आर7 के शुरुआती सदस्य भारत, जर्मनी, जापान इंडोनेशिया, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और कनाडा हो सकते हैं। हालांकि, इसे आगे बढ़ाकर आर10 या आर 12 भी बनाया जा सकता है, जिसमें यूरोप लातिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया की अन्य मध्यम शक्तियों को शामिल किया जा सकता है। यह आर7 समूह लगभग 2.2 अरब लोगों का प्रतिनिधित्व करेगा, जो दुनिया की कुल आबादी के एक-चौथाई से भी अधिक है। अगर यूरोपीय संघ भी औपचारिक रूप से और7+ का हिस्सा बन जाता है तब यह सुधार समर्थक समूह, दुनिया की लगभग 35 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व करेगा।

आर7 का उद्देश्य किसी सीमित समूह का निर्माण करना नहीं है बल्कि वैश्विक और बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार का नेतृत्व करना है। जैसे-जैसे शुरुआती विचार और नीतियां स्पष्ट होंगी, इस समूह में अन्य देशों को भी शामिल किया जा सकता है। शुरुआत में समूह को छोटा रखना इसलिए जरूरी है ताकि सुधारों के लिए एक व्यापक लक्ष्य और स्पष्ट सिद्धांत तय किए जा सकें।

इस गठबंधन के शुरुआती चरण में अमेरिका, चीन और रूस जैसी महाशक्तियों को बाहर रखा जा सकता है जब तक कि वे सुधारवादी एजेंडे के साथ जुड़ने की इच्छा न दिखाएं। यह भी संभव कि ये देश आर7 को कमजोर करने की कोशिश करें और उसके कुछ सदस्यों पर दबाव डालें कि वे इस पहल से बाहर हो जाएं। संयुक्त राष्ट्र के पुराने स्थायी सदस्य, ब्रिटेन और फ्रांस को भी बाद में शामिल किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए उन्हें 1940 के दशक के अंत में बनी संस्थाओं में सुधार करने की प्रतिबद्धता दिखानी होगी। इसका मतलब यह भी होगा कि उन्हें अपने विशेष और अधिक अधिकारों में कटौती करनी पड़ेगी।

सुधारों की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र परिषद से की जा सकती है। राष्ट्र सुरक्षा | और । इसके लिए जी4 देशों, जर्मनी, जापान, भारत ब्राजील द्वारा दिया गया प्रस्ताव एक महत्त्वपूर्ण आधार हो सकता है, जिसमें सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों की संख्या मौजूदा पांच से बढ़ाकर 11 करने की बात कही गई है।

एक महत्त्वपूर्ण सुधार यह होना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के वीटो अधिकार को समाप्त किया जाए । महत्त्वपूर्ण प्रस्तावों पर मतदान किसी एक देश की शक्ति के बजाय आबादी, आर्थिक आकार और संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में योगदान जैसे मानकों के आधार पर अनुपातिक तरीके से किया जाना चाहिए। इस ही, किसी भी देश पर एकतरफा हमला या आक्रमण चाहे उसके पीछे मानवाधिकार या कोई नैतिक कारण ही क्यों न बताया जाए, उसे नई नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था में अवैध माना जाना चाहिए।

विश्व व्यापार संगठन के संदर्भ में भी नए नियम केवल निष्पक्ष व्यापार तक सीमित नहीं रहने चाहिए बल्कि उनके परिणामों की समय-समय पर समीक्षा भी जरूरी होनी चाहिए। यदि किसी देश को लगातार व्यापार घाटा या अधिशेष का सामना करना पड़ रहा है तो उसे इस असंतुलन को दूर करने के लिए प्रोत्साहित या बाध्य किया जाना चाहिए। दरअसल, व्यापार में हमेशा कुछ देश जीतते हैं और कुछ हारते हैं। ऐसे में, नियमों और नियमित समीक्षा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि इसके परिणाम लंबे समय तक असंतुलित या नुकसान पहुंचाने वाले न बने रहें। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाएं केवल पी5 देशों या अमेरिका और चीन की स्थायी संरक्षक नहीं रहनी चाहिए । यही बात संयुक्त राष्ट्र के शीर्ष पदों और डब्ल्यूटीओ जैसे संगठनों के प्रमुख पदों पर भी लागू होती है कि इन पर सभी देशों को समान अवसर मिलना चाहिए।

नई वैश्विक व्यवस्था के लिए एक चौथा और शायद अधिक विवादास्पद सिद्धांत यह होना चाहिए कि किसी एक तरह के ऐतिहासिक अनुभव या सांस्कृतिक पसंद के आधार पर नैतिक मानदंड थोपने से बचा जाए। उदाहरण के तौर पर लोकतंत्र कुछ देशों के लिए एक साझा मूल्य हो सकता है लेकिन अगर कोई देश लोकतांत्रिक नहीं है तो सिर्फ इसी आधार पर उसे नियम आधारित व्यवस्था का विरोधी नहीं माना जाना चाहिए। हर देश को अपने तरीके से विकसित होने का अधिकार होना चाहिए भले ही व वह रास्ता दूसरे देशों को अल्पकालिक स्तर पर या मध्यम अवधि में स्वीकार्य न हो। इसी तरह, धार्मिक स्वतंत्रता को केवल ईसाई या पैगंबर इब्राहिम की परंपराओं के आधार पर परिभाषित नहीं किया जाना चाहिए । इसे समझने के अन्य तरीके भी हो सकते हैं और इसकी मौजूदगी या अनुपस्थिति को संयुक्त राष्ट्र के किसी सदस्य देश के साथ भेदभाव का आधार नहीं बनाना चाहिए

वैश्विक स्तर पर मध्यम शक्तियां अब तक महाशक्तियों द्वारा बनाए गए पुराने वैश्विक ढांचे के भीतर काम करती रही हैं क्योंकि इसके कारण उनके कुछ हित साधे जा रहे थे (जैसे कनाडा, जापान और यूरोप) लेकिन अब उन्हें बदलाव की अगुआई करने की जरूरत है। भारत को इस परिवर्तन में ‘एक प्रेरक शक्ति की भूमिका निभानी चाहिए। जिस तरह वह कभी गुटनिरपेक्ष आंदोलन का प्रमुख नेतृत्वकर्ता रहा था, उसी तरह अब वैश्विक संस्थाओं में सुधार के इस नए अभियान को भी इसे अपनी प्राथमिकता बनानी चाहिए। वैश्विक स्तर पर मौजूदा अव्यवस्था किसी के लिए भी फायदेमंद नहीं है यहां तक कि उन दो बड़ी महाशक्तियों के लिए भी नहीं जो आज दुनिया पर अपना वर्चस्व रखती हैं।