अपनी प्रासंगिकता खोता ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’

Afeias
04 Apr 2026
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पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष से आपूर्ति श्रृंखलाएं बाधित हुई हैं, साथ ही आर्थिक संकट भी उठ खड़ा हुआ है। ऊर्जा की बढ़ती कीमतों ने अंतर्राष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था के साथ ही मुद्रा विनियम दरों को प्रभावित किया है। इस युद्ध के कारण अंतरर्राष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका पर भी प्रश्न खड़ा हुआ है।

संयुक्त राष्ट्र संघ – द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक स्तर पर देशों के बीच सहयोग, संवाद, शांति और भविष्य के युद्धों को रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई थी।

  • प्राथमिक दशकों में इस संस्था ने कई महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई। यह संस्था अंतरर्राष्ट्रीय कानून के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • विश्व खाद्य कार्यक्रम और यूनीसेफ जैसी एजेंसियां विश्व के लाखों लोगों के जीवन को सुरक्षित करने में योगदान दे रही हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ केवल एक संस्था नहीं है, बल्कि मानवता के लिए शांति की आशा का प्रतीक है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की कमियां –

  • संयुक्त राष्ट्र संघ को युद्ध के समय संवाद स्थापित कर कूटनीतिक संमाधान निकालना चाहिए। बढ़ते अविश्वास, हितों के टकराव और शक्ति केंद्रित राजनीति के कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् भी निर्णायक कदम नही उठा पा रही है।
  • संयुक्त राष्ट्र की चेतावनी को अब कोई भी देश नहीं मानता है। एक ओर यूएन शांति व स्थिरता की बात करता है, तो दूसरी ओर उसी के महत्वपूर्ण देश जमीनी स्तर पर मिसाइलें दागते और सैन्य कार्यवाही करते हैं।
  • संयुक्त राष्ट्र बदलते युद्ध पद्धतियों के अनुसार कूटनीतिक संवाद कर पाने में अक्षम रहा है उसके अनुसार खुद को तैयार भी नहीं किया है। इसके कारण इसके प्रति विश्वसनीयता एवं प्रासंगिकता लगभग खत्म हो चुकी है।
  • आज विश्व व्यवस्था बहुध्रुवीय है। पर संयुक्त राष्ट्र की संरचना प्रणाली 1945 के द्विध्रुवीय सिद्धांत के अनुसार ही कार्य कर रही है।

इन कमियों को दूर करने के उपाय –

  • भारत को संयुक्त राष्ट्र की सुधार प्रक्रिया में सक्रिय पहल करनी चाहिए। साथ ही एक संतुलित, समावेशी और न्यायपूर्ण वैश्विक व्यवस्था के निर्माण के लिए भी नेतृत्व करना चाहिए।
  • संयुक्त राष्ट्र की संरचनात्मक प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है। वीटो पॉवर की राजनीति वैश्विक शांति प्रयासों को बार-बार अवरूद्ध करती है। इसमें भी सुधार आवश्यक है।
  • सुरक्षा परिषद् का विस्तार कर उसमें भारत, जापान, जर्मनी एवं ब्राजील को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वैश्विक वास्तविकताओं का सही प्रतिबिंब उभरे।
  • यू.एन. को तेज, पारदर्शी, उत्तरदायी, संतुलित और समावेशी बनाना चाहिए, ताकि वह समयबद्ध कार्यवाही कर सके।

एक शांतिपूर्ण विश्व की आशा बनी रहे, इसके लिए यू.एन. का प्रासंगिक बने रहना अत्यंत आवश्यक है।

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