पेट्रोलियम गैस से जुड़ी समस्या व उसके समाधान
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ईरान और इजरायल-अमेरिका युद्ध के परिणाम चाहे जो भी हों, पर इस युद्ध ने भारत को अपनी ऊर्जा निर्भरताओं पर नए सिरे से विचार करने का अवसर दिया है। यह आत्मनिर्भरता रक्षा तथा अन्य क्षेत्र से भी अधिक आवश्यक है, क्योंकि ऊर्जा की कमी का एक राजनीतिक प्रभाव भी होता है।
पेट्रोलियम गैस से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य –
- हम तरलीकृत पेट्रोलियम गैस में 60-65% आयात पर निर्भर हैं। इसका ज्यादातर हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है।
- भारतीय परिवारों के मासिक बजट का 7.5 से 10.2% हिस्सा एलपीजी व परिवहन ईधन में व्यय होता है।
पेट्रोलियम गैस समस्या के कारण –
- गैर-जीवाश्म ईंधन से बनने वाली बिजली का हिस्सा जल 50% हो गया है। पर समस्या किसी एक ही ऊर्जा-स्रोत पर केद्रित निर्भरता से है, जो कि नीतिगत प्राथमिकताओ से संबंधित है।
- इस निर्भरता का सीधा संबंध घरेलू खाना पकाने की गैस तथा परिवहन क्षेत्र की गैस से है। 2011 के पहले यह निर्भरता इतनी अधिक नहीं थी।
- जिन रास्तों से गुजरकर गैस हम तक पहुँचती है, वे रास्ते ईरान की सुरक्षा प्राथमिकताओं के अधीन हैं। बहरीन, कतर, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब का अधिकांश तेल यहीं से होकर गुजरता है।
- आईमेक गलियारा (भारत प.एशिया-यूरोप आर्थिक कारिडोर) भी पश्चिम एशिया में व्यापक शांति समझौते के बिना अव्यावहारिक होगा।
- इजरायल व अमेरिका द्वारा ईरान के सुप्रीम नेता को खत्म करने के कारण बातचीत के द्वार भी बंद हो गए हैं।
इस समस्या के समाधान –
- हमें जीवाश्म ईंधन के प्रति नकारात्मक व्यवहार को कुछ वर्षों के लिए कम करना होगा तथा ट्रंप की तरह ज्यादा खनन का सिद्धांत अपनाना होगा। अर्थात अन्वेषण और उत्पादन में निवेश करना होगा।
- जिस तरह वास्कोडिगामा ने केप ऑफ गुड होप होते हुए भारत के लिए समुद्री मार्ग खोजा था, उसी तरह भारत को पश्चिम एशिया से बचते हुए नया मार्ग खोजना होगा, जिससे पेट्रोलियम आयात हो सके।
- प.एशिया का प्रयोग हम कम कीमतों पर पेट्रोलियम भंडार बढ़ाने या जमा करने के लिए कर सकते हैं।
- हमें खाना पकाने के लिए उपयुक्त चूल्हों का प्रयोग करते हुए एथेनाल के प्रयोग में भी तेजी लानी चाहिए।
- हमें आपूर्ति के कुछ ही स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता कम करनी चाहिए, यही हमारा मार्गदर्शक सिद्धांत होना चाहिए।