देश को प्रवासन नीति की सख्त जरूरत
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तेजी से बदलते विश्व के साथ प्रवासन एक सामान्य सी बात हो गई है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था ‘इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन’ प्रवासन को अपने निवास से दूर किसी नए स्थान पर बसने, अंतरराष्ट्रीय सीमा के बाहर जाने या किसी राज्य के अंदर ही प्रवास के तौर पर परिभाषित करती है।
कुछ समय पहले इस संस्था की महानिदेशक ने एक लेख में लिखा था कि ‘प्रवासी-विरोधी नेता और कार्यकर्ता अफवाह फैलाते हैं कि उनके देश में अवैध प्रवासियों की विशाल लहर आ रही है। इसका उद्देश्य खास सीमाओं और देशों के विरूद्ध सख्ती बरतना होता है।‘ भारत में भी आज यही स्थिति बनी हुई है। जल्द ही विधानसभा चुनाव वाले पश्चिम बंगाल और असम में प्रवासियों के विरोध की यह प्रवृत्ति दिख रही है।
प्रवासियों के विरोध का एक दूसरा कारण बुनियादी ढांचे की खस्ता हालत और खराब आर्थिक स्थिति से मतदाताओं का ध्यान भटकाना भी होता है। दोनों राज्यों में सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों को मुद्दा बना रखा है। इससे वे आर्थिक और सामाजिक मुद्दे दरकिनार हो गए हैं, जिन पर चर्चा और नीति-निर्माण की जरूरत है।
प्रवासन की सच्चाई पर कुछ बिंदु –
- साल 2011 की जनगणना के अनुसार देश में 45.6 करोड़ प्रवासी थे, यानि जनसंख्या का कुल 38%। 2001 ये 31% थे।
- आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि विदेशों से आने वाले प्रवासियों का हिस्सा 1% था।
- देश में बिहार और उत्तर प्रदेश से होने वाले अंतरराज्जीय प्रवाासन पर सरकार बात क्यों नहीं करती? इन राज्यों की खराब आर्थिक स्थिति के कारण लोग प्रवास करते हैं। इसका दूसरा पहलू यह भी है कि प्रवासी जो धन भेजते हैं, उससे गृहराज्य की आर्थिक स्थिति सुधरती है, और मेजबान राज्य की आर्थिक प्रगति होती है।
- केंद्रीय सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने समय-समय पर होने वाले श्रम बल सर्वेक्षण के आधार पर 2020-21 में प्रवास संबंधी प्रवृत्ति का अध्ययन कराया है। हालांकि, इस दौरान हुए लॉकडाउन से सटीक आंकड़े नहीं मिलते हैं।
- अतः देश में एक ‘राष्ट्रीय श्रमिक प्रवासन नीति’ बनाई जानी चाहिए; ऐसी नीति, जो इनके आर्थिक योगदान पर आधारित आधिकारिक दस्तावेज हो। इससें विदेशी प्रवासियों की सटीक संख्या और उसके प्रभाव को भी अलग किया जाना चाहिए।
‘हिंदुस्तान’ में प्रकाशित राज ऋषि सिंघल के लेख पर आधारित। 27 फरवरी, 2026