31-01-2026 (Important News Clippings)

Afeias
31 Jan 2026
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Date: 31-01-26

Expectations vs Reality: Our Cities

ET Editorial

Well, what do you know — there’s one line in this year’s Economic Survey that has read our collective mind: our cities are ‘aspirational but exhausting’ — magnets for opportunity and ambition, yet booby-trapped by pollution, overcrowding and a pace that quietly erodes everyday life. Beyond governance and financial fixes, the survey goes beyond the usual data points surveyors so love — civic norms, shared responsibility and respect for public spaces. These intangibles explain why public behaviour can seem unruly in one setting, yet surprisingly disciplined in another: orderly queues on Mumbai’s BEST buses, or calm commuters on the Delhi metro (see column below).

The challenge, of course, is bridging the gap in these national ‘expectations vs reality’ meme of our cities. You may cheer the India-EU FTA for cheaper Maybachs and Lamborghinis, but where will they go? On cratered roads that double as experimental water bodies each monsoon? Through traffic that treats lane markings as abstract art? We build flyovers to escape congestion that earlier flyovers promised to fix, inaugurate metro lines while last-mile travel remains an endurance test, and launch smart cities where the smartest survival skill is patience.

The survey’s subtext is clear: India faces an infra and coordination deficit. We cannot build new cities from scratch, retrofitting old ones is Herculean, and a commons-first mindset cannot be legislated. Aspirations and economic heft alone will not sustain urban life. Until governance, social norms and design work in harmony, our cities will remain wonderful in theory and exhausting arenas in practice. Ambition has arrived. But with civility and predictability still under construction, we await conversion to reality.


Date: 31-01-26

Stay the course

Equity rules may need modifications, but they are essential

Editorial

On Thursday, the Supreme Court of India stayed the University Grants Commission (UGC)’s Promotion of Equity in Higher Education Institutions rules, calling them “too sweeping”. Notified in January, the rules sought to address all forms of discrimination, in particular caste-based, on campuses after years of activism, litigation and tragic suicides such as Rohith Vemula that shocked the nation’s conscience. The Court had mandated the UGC to draw up these rules. The 2012 UGC framework on this issue had been almost completely ignored by HEIs. Caste and caste-based discrimination is a persisting reality and addressing it should be a political, social and educational priority. Many students have faced it, leaving lifelong scars, and sometimes ruining lives. UGC figures show that the number of such complaints in HEIs has more than doubled in the last five years. The draft rules were made public last year for discussion and the rules have been notified with changes. There is a case that the new rules are a dilution of the 2012 framework that identified many more and pressing forms of discrimination, and had separate sections that dealt with problems faced by SC/ST students such as not fulfilling reservation norms. But what is different is that the new rules seek to implement the setting up of equal opportunity centres, equity committees, equity helplines and squads, and time bound complaint resolution through better monitoring, oversight and representation in the inquiry committees. An HEI’s non-compliance with these rules can invite UGC action, potentially bolstering compliance.

Campuses in parts of northern India have seen protests against the new rules on two counts. The rules define caste-based discrimination as only those against SC/STs and OBCs, and there is no provision for action against false complaints. At one level, the former may seem unfair to general category students who appear to have been denied recourse. Though it is self-evident that caste-based discrimination is almost exclusively against lower castes, the Court could consider leaving out the explicit definition. This may mar the political signalling in the context of what led to the original Court directive but could be considered so as to achieve the overall goal of the new rules. Also, the draft rules of 2025 offered provisions for addressing false complaints. Putting them back in could have a chilling effect on complainants from marginalised sections. But a solution could ensure that only complaints proven to be motivated to frame someone were actionable, not all complaints that were merely unable to prove discrimination.


Date: 31-01-26

आर्थिक सर्वे ने कमजोरियां सुधारने पर जोर दिया है

संपादकीय

आर्थिक सर्वेक्षण ने जीडीपी विकास दर के बेहतर संकेत के साथ ही उन कमजोरियों को भी बेबाकी से बताया है, जो भविष्य में देश की इकोनॉमी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती हैं। कृषि और मैन्युफैक्चरिंग में उत्पादन के साथ ही उत्पादकता (कम लागत में ज्यादा उत्पादन बढ़ाने, सब्सिडी और एमएसपी की बैसाखी की जगह इनपुट लागत घटाने और खेती को लाभप्रद बनाने पर बल दिया गया है। एफडीआई और एफआईआई यानी विदेश से आने वाला व्यक्तिगत और संस्थागत निवेश कम होने पर चिंता के साथ सर्वे ने घरेलू निवेश के ढांचे को और मजबूत कर आने वाले दिनों में आत्मनिर्भरता के प्रयासों को बेहतर माना है। यह मानने हुए कि भारत एआई की दौड़ में दुनिया के बड़े देशों से पिछड़ गया है, सर्वे ने सलाह दी है कि एलएलएम और हाई-एंड एआई मॉडल्स की जगह हमें एप्लीकेशन-आधारित छोटे-छोटे चिप्स की दिशा में बढ़ना चाहिए। इससे कृषि से लेकर शिक्षा और मैन्युफैक्चरिंग से लेकर प्रशासन तक में लाभ मिल सकता है। ट्रम्प के टैरिफ के मद्देनजर सर्वे का मानना है कि जीएसटी में सुधार, सख्त क्वालिटी कंट्रोल नियमों में ढील, दर्जनों कानूनी प्रक्रियाओं को लचीला बनाने की सरकारी नीति के मद्देनजर आने वाले दो वर्षों में परिवार और उद्यमों के स्तर पर ढेर सारे समायोजन करने पड़ेंगे। लेकिन परिणाम सकारात्मक हों


Date: 31-01-26

प्रोजेक्ट्स में अब देरी नहीं होती प्रगति मॉडल ने बदला शासन

सुधांश पंत, ( सचिव, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार )

सार्वजनिक चर्चाओं में, नई योजनाओं की शुरुआत या बजट की राशि बढ़ाना शासन में सुधार का प्रमाण माना जाता है। 50वीं सकारात्मक शासन और समयबद्ध क्रियान्वयन (‘प्रगति’) बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सरकार के अगले चरण की भावना को तीन शब्दों- ‘सुधार, प्रदर्शन और रूपांतरण’ के रूप में व्यक्त किया।

सुधार से व्यवस्था सरल होनी चाहिए, प्रदर्शन का आकलन जमीन पर मिलने वाली सेवाओं के आधार पर होना चाहिए। रूपांतरण को लोगों के जीवन पर पड़ने वाले वास्तविक असर के आधार पर मापा जाना चाहिए। यह पिछले दस साल में भारतीय शासन में आए गहरे बदलाव को दर्शाता है ‘प्रगति’ एक ऐसा मंच है, जिसने सरकारी परियोजनाओं को लागू करने की संस्कृति को बदला है।

सरकार में हर देरी की कीमत लोगों को ही चुकानी पड़ती है। एक अधूरा बना पुल परियोजना चार्ट में केवल एक लाइन नहीं है, यह उस छात्र की कहानी है, जिसे कॉलेज पहुंचने में ज्यादा समय लगता है। यह उस मरीज की तकलीफ है, जिसे विशेष इलाज के लिए बार-बार दूर जाना पड़ता है, क्योंकि अस्पताल बनाने का काम पूरा नहीं हुआ।

दशकों तक भारत में बहुत-सी सरकारी परियोजनाएं सिर्फ फइलों में ही अटकी रहीं। इसका मुख्य कारण समन्वय की विफलता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व के तहत, प्रगति की शुरुआत 2015 में की गई। दरअसल लंबे समय से परियोजनाओं को लागू करने में देरी, अलगाव और जवाबदेही की कमी से देश जूझ रहा था। पुल आधे-अधूरे बनकर रह जाते थे, हवाई अड्डे सिर्फ कागजों पर योजना में अटक जाते थे, बिजली के प्लांट कोर्ट-कचहरी में फंस जाते थे और केंद्र सरकार व राज्य सरकारों के बीच समन्वय की समस्या सालों तक हल नहीं होती थी।

इन कारणों से लाखों, करोड़ों की परियोजनाएं फंसी रह जाती थीं। लेकिन ‘प्रगति’ की 10 सालों की महत्वपूर्ण उपलब्धियां स्पष्ट हैं। इसके सुव्यवस्थित मॉनिटरिंग सिस्टम में अब तक 85 लाख करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाएं शामिल की गई हैं। 382 परियोजनाओं में चिह्नित की गई 3, 187 प्रमुख समस्याओं में से 2,958 (93 प्रतिशत) से अधिक का समाधान किया जा चुका है। हल हुई समस्याएं पूरे हो चुके पुलों, चालू हो चुके बिजली प्लांट, शुरू हो चुके अस्पतालों, बनकर तैयार हुए राजमार्गों और जुड़ चुके रेलवे लिंकों में दिखाई देती हैं।

‘प्रगति’ का डिजाइन – सिद्धांत डिजिटल डेटा प्रबंधन, भू-स्थानिक तकनीक और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को एक ही निर्णय लेने में मदद करने वाले सिस्टम में जोड़ देता है। इसकी वजह से प्रधानमंत्री हर महीने एक प्लेटफॉर्म पर सरकार के सचिवों और राज्यों के मुख्य सचिवों के साथ परियोजनाओं की समीक्षा कर पाते हैं।

सहकारी संघवाद को ‘प्रगति’ ने मजबूत किया है। इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में प्रगति ने लंबे समय से अटकी परियोजनाओं को आगे बढ़ाया है। राजस्थान के बांसवाड़ा में राजस्थान परमाणु ऊर्जा परियोजना, असम में बोगिबील रेल-सह- सड़क पुल- इसकी योजना 1997 में ही बन गई थी, लेकिन खास ध्यान देने के बाद ही इसे पूरा किया जा सका। नवीं मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा लगभग 25 सालों की देरी के बाद 2025 में इसका उद्घाटन किया गया। जम्मू-उधमपुर- श्रीनगर- बारामूला रेल लिंक ऐसे कुछ उदाहरण हैं, जहां प्रोजेक्ट देरी से पूरे हुए। सभी पक्ष ने
मिलकर काम किया जिससे भू-भाग, सुरक्षा, भूमि अधिग्रहण और मंजूरी संबंधी चुनौतियों को पार किया जा सका।

आज के समय में नागरिकों की उम्मीदें सिर्फ बड़े-बड़े वादों तक सीमित नहीं हैं। वे अब असल में काम होने की मांग करती हैं।

ऐसे में ‘प्रगति’ नाम का यह मंच दिखाता है कि शासन में सुधार लाना हमेशा शोर मचाकर ही परिवर्तनकारी नहीं हो सकता। राष्ट्रीय विकास का पूरा एजेंडा प्रधानमंत्री के विजन- ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास में साफ झलकता है।

यह विजन सिर्फ विचारों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसे विकसित भारत @2047 के बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए वास्तविकता बनाकर लागू भी किया जा रहा है। कभी-कभी सबसे ताकतवर बदलाव तब आता है, जब ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जो यह सुनिश्चित करे कि जो फैसले लिए गए हैं, वे सच में जमीन पर लागू हो रहे हैं।


Date: 31-01-26

शहरों की सुधि लें

संपादकीय

यह अच्छा है कि बजट से पहले संसद में पेश आर्थिक सर्वेक्षण में अनेक चुनौतियों की ओर भी ध्यान आकर्षित किया गया। इनमें से एक है शहरों का सही तरह विकास न होना। चूंकि इस पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है, इसलिए उसकी महत्ता भी समझी जानी चाहिए और उस पर गंभीरता से ध्यान भी दिया जाना चाहिए। इससे शायद ही कोई असहमत हो कि शहर महज आवास नहीं हैं। वे एक महत्वपूर्ण आर्थिक अवसंरचना का रूप हैं। इसीलिए उन्हें आर्थिक विकास का इंजन कहा जाता है। हमारे शहर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में योगदान तो बढ़ा रहे हैं, लेकिन वे सुगम नागरिक जीवन के वैसे केंद्र नहीं बन पा रहे हैं, जैसे विश्व के अनेक देशों के शहर हैं। शहरी जीवन समस्याओं से घिर रहा है। वे तनाव, भीड़ और गंदगी का पर्याय बन रहे हैं। ऐसा अनियोजित और बेतरतीब विकास के कारण हो रहा है। एक विडंबना यह भी है कि आधारभूत ढांचे में छिटपुट सुधारों को शहरी विकास का पर्याय मान लिया गया है। इसका परिणाम यह है कि शहरी समस्याएं रह-रहकर सिर उठाती रहती हैं। यह भी देखने में आ रहा है कि कई शहर आर्थिक गतिविधियों के केंद्र बन जाने के बाद भी राजनीतिक रूप से हाशिए पर ही रहते हैं। रही सह कसर नगर निकायों की नाकामी पूरी कर देती है।

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार भारतीय शहर अपने राजस्व से सकल घरेलू उत्पाद का 0.6 प्रतिशत से भी कम प्राप्त करते हैं। इसका सीधा अर्थ है कि शहरों को सही तरह संचालित नहीं किया जा रहा है। प्रायः शहरों के आधारभूत ढांचे का निर्माण करते समय इस पर ध्यान ही नहीं दिया जाता कि इससे शहरी जीवन का समुचित तरीके से विकास होगा या नहीं? शहरों में आर्थिक- व्यापारिक गतिविधियों के केंद्र तो बना दिए जाते हैं, लेकिन इस पर कठिनाई से ही ध्यान दिया जाता है कि कामगार कहां रहेंगे या फिर उनका आवागमन कैसे होगा? जब शहर ट्रैफिक जाम, अतिक्रमण, प्रदूषण आदि समस्याओं से घिरते हैं तो उनकी उत्पादकता प्रभावित होने के साथ ही उनमें निवेश की संभावना भी कम होती है। अब जब यह स्पष्ट है कि शहरों में आबादी का दबाव बढ़ते ही जाना हैं, तब फिर उनके संतुलित एवं टिकाऊ विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। अभी ऐसा नहीं हो रहा है, इसलिए शहरों में झुग्गी- बस्तियां बढ़ती जा रही हैं और आवासीय क्षेत्र व्यावसायिक बनते जा रहे हैं। यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि आर्थिक सर्वेक्षण में दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों के लिए जो योजनाएं शुरू करने की जरूरत जताई गई है, उनकी पूर्ति करने के लिए राज्य सरकारें आगे आएं। वे यह समझें कि अपने शहरों का सही तरह विकास करना उनका ही काम है और यह इसलिए किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे ही समृद्धि आएगी।


Date: 31-01-26

ताक पर गरिमा

संपादकीय

यह विडंबना ही है कि भारतीय घुड़सवारी महासंघ (ईएफआइ) ने एक ऐसे व्यक्ति को अहम जिम्मेदारी सौंप कर टीम के साथ जार्डन भेज दिया, जो बलात्कार जैसे गंभीर अपराध का आरोपी है। गौरतलब है कि ‘इंटरनेशनल टेंट पेगिंग फेडरेशन’ (आइटीपीएफ) विश्वकप क्वालीफायर प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए जो भारतीय दल जार्डन गया है, उसमें बलात्कार के आरोपी कर्नल (सेवानिवृत्त) तरसेम सिंह वरैच को प्रबंधक और कोच के रूप में भेजा गया है। स्वाभाविक ही इसे लेकर तीखा विवाद खड़ा हो गया है कि ऐसे अपराध के आरोपी को इस हैसियत कैसे भेजा गया। सवाल है कि वहां भेजने के फैसले से पहले क्या ईएफआइ ने एक बार यह सोचने की जरूरत नहीं समझी कि इसका खिलाड़ियों पर क्या असर पड़ेगा और इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि किस स्तर पर प्रभावित होगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर की एक प्रतियोगिता में भेजे जाने वाले दल में किसी व्यक्ति को शामिल करने से पहले क्या उसके बारे में कोई पड़ताल नहीं की जाती ? अगर ईएफआइ को तरसेम सिंह वरैच पर लगे आरोपों और कानूनी मामले के बारे में जानकारी थी, तो उसे भारतीय दल के साथ भेजने का क्या आधार था ?

मामले की गंभीरता को देखते हुए ही आइटीपीएफ ने ईएफआइ से तुरंत उचित कार्रवाई करने और साथ ही प्रतियोगियों की सुरक्षा तथा खेल की गरिमा कायम रखने के लिए की गई कार्रवाई की जानकारी देने को कहा। हैरानी की बात यह है कि अपराध की गंभीरता और तथ्यों के मद्देनजर ही जो आरोपी व्यक्ति जमानत पर बाहर है, उसे खेल अधिकारियों ने भारतीय दल का प्रतिनिधित्व करने के लिए देश से बाहर जाने की अनुमति भी दे दी। जबकि इससे पहले भी तरसेम को झूठी पहचान बनाकर फायदा उठाने से संबंधित एक अन्य मामले में महासंघ ने 2022-24 तक के लिए निलंबित कर दिया था। क्या इस तरह के फैसले को खेल की गरिमा और देश की छवि को चोट पहुंचाने की कोशिश के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए ? जहां किसी भी खेल में खिलाड़ियों से लेकर कोच या प्रबंधक आदि के दल में चुने जाने के लिए उसकी स्वच्छ छवि को एक शर्त के तौर पर देखा जाना चाहिए, वहां इस पहलू की अनदेखी करने को किस तरह देखा जाएगा !