एमएसएमई के जटिल विनियमन के सुधार हेतु कुछ सुझाव

Afeias
27 Dec 2025
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भारत लंबे समय से विश्व की सबसे तेज गति से वृद्धि करने वाली अर्थव्यवस्था बना हुआ है। फिर भी बहुत से विशेषज्ञ यह मानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था अभी भी अपनी क्षमताओं से कम प्रदर्शन कर रही है। इसका एक कारण बहुत ज्यादा नियमन एवं अनुपालन भी है।

एमएसएमई के लिए चुनौतियाँ –

“भारत में एमएसएमई विनिर्माण के लिए अनुपालनों की पड़ताल” शीर्षक की एक रिपोर्ट की कुछ बातें –

  • किसी सक्रिय एमएसएमई को साल भर में अनुपालन की करीब 1456 कसौटियों पर खरा उतरना पड़ता है। इनमें 998 कासौटियाँ बहुत कड़ी होती हैं।
  • 70 से अधिक अनुमतियाँ लेनी होती हैं, 48 वैधानिक रजिस्टर बनाने होते है तथा 59 प्रकार के विभिन्न निरीक्षणों की तैयारी करनी होती है।
  • 2024-25 में 9321 नियामकीय संशोधन हुए। देश के सक्रिय 6.5 करोड़ एमएसएमई को इन बदलावों का सामना करना होता है, जिससे एक इकाई पर साल भर में 13-17 लाख रुपये का बोझ बढ़ता है।
  • सकल घरेलू उत्पाद में 30% की हिस्सेदारी रखने वाले ये उद्यम रोजगार सृजन के बड़े माध्यम हैं।

नियमन की इन प्रतिकूलताओं के मध्य रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने स्वयं की आंतरिक समीक्षा और नियामकीय सुव्यवस्था के परिणामस्वरूप नियामकीय दायरे को 97% घटा दिया है।

एमएसएमई के लिए गौबा समिति की कुछ सिफारिशें –

  • यह समिति लाइसेंस, परमिट, निरीक्षण प्रणालियों और अनुपालन बोझ जैसे गैर-वित्तीय नियमन संबंधी सुधारों पर केंद्रित है। इसने विश्वास आधारित एवं पारदर्शिता को प्रोत्साहन देने वाली नियामकीय प्रणाली का विचार सुझाया है।
  • नियमन के मोर्चे पर सुधार आर्थिक प्रदर्शन को सुधारने का आधार बनते हैं। इससे समय व संसाधन भी बचते हैं। नियमों में स्थायित्व और पूर्वानुमानों को लेकर बेहतर परिदृश्य तैयार करना चाहिए। यह सेमीकंडक्टर और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। सुगम नियमन से आर्थिक गतिविधियों को संगठित एवं औपचारिक बनाने को भी प्रोत्साहन मिलता है।
  • इस समिति की रिपोर्ट में आर्थिक स्वतंत्रता को बहुत महत्व दिया गया है। इसके अनुसार लाइसेंस और अनुमतियाँ संवेदनशील क्षेत्रों तक ही सीमित होनी चाहिए। जैसे कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरणीय जोखिम और सार्वजनिक स्वास्थ्य के समक्ष संकट जैसे मामले ही नियमन के दायरे में आने चाहिए। लाइसेंस स्थाई प्रकृति का होना चाहिए अगर जरूरत हो तो।
  • यह समिति निरीक्षण-राज को भी समाप्त करना चाहती है। इसमें निरीक्षण को थर्ड पार्टी या तकनीकी द्वारा कराने की बात कही गई है। इससे हितों के टकराव के मामले भी घटेंगे।
  • नियमन वर्ष में एक या दो बार नियमित अंतराल पर होना चाहिए। नियमन में समीक्षा व सुझाव की भी गुंजाइश हो। नियम को मूर्त रूप देने से पहले नियामक प्रभाव मूल्यांकन आवश्यक है। नियमों की चरणबद्ध समीक्षा हो, जिससे नियमों का दोहराव न हो।
  • अनावश्यक व अनुचित दण्डों, जैसे – फाइलिंग में देरी या लिपिकीय गलतिओं के लिए राहत देनी चाहिए।
  • एमएसएमई के लिए 486 ऐसी धाराएं हैं, जिनमें कारावास तक की सजा हो सकती है। यह एक प्रतिस्पर्धी व्यवस्था की तुलना में कहीं ज्यादा है।

यदि समिति की सिफारिशों को लागु किया जा सका, तो इससे भारतीय अर्थव्यवस्था नियंत्रण आधारित ढांचे से सिद्धांत केंद्रित व्यवस्था में बदलेगी। यह सुगम और नवाचार हितैषी भी होगी।

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