
29-03-2025 (Important News Clippings)
To Download Click Here.
Date: 29-03-25
Poetic Justice
SC speaks clearly & eloquently for free speech
TOI Editorial
That the Supreme Court quashed the case against Congress MP Imran Pratapgarhi isn’t a surprise. That the case had to reach SC was the real shock. As the top court said, “Seventy-five years into our republic, we can’t be seen to be so shaky on our fundamentals that…any form of art…stand-up comedy, can be alleged to lead to animosity.” Gujarat police had accused Pratapgarhi of promoting religious enmity, harming national integration, outraging religious feelings…etc etc. His ‘crime’? Posting a poem by Faiz. Incredibly, Gujarat HC ruled for the cops. Never mind that over the decades SC has consistently expanded the scope of freedom of expression as part of Articles 19 and 21, and repeatedly ruled that creative expression is not a crime.
Cops and all HCs must note five points SC made. First, standards of free speech can’t be decided by those “who always perceive criticism as a threat to their power or position”. Second, if you find some speech objectionable, your response should be “counter-speech, not suppression”, or police action. Third, restrictions “cannot overshadow freedoms guaranteed under Article 19(1)”. Fourth, all judges must protect fundamental rights, uphold the Constitution without being influenced by their own views. Finally, SC said, “Art, comedy, satire make life more meaningful.”
Read together, these SC observations are a clear guide to cops, trial courts and HCs on all free speech cases. But that the top court still needs to do this is sad, and a troubling commentary on India. What made Gujarat HC find criminal intent in the posting of a poem about social peace, is a question only the court can answer. But because it didn’t dismiss the case, an MP had to go through the legal grind. For other citizens, the process is even more of a punishment. How long, for example, will the Kunal Kamra and Allahbadia cases drag on?
जमीन से जुड़े दस्तावेजों में सुधार अब जरूरी हैं
संपादकीय
महाराष्ट्र में एक मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा, क्योंकि एक राजनीतिक प्रभुत्व वाले व्यक्ति पर आरोप है कि वह किसी जमीन को हड़प रहा था और विरोध करने पर जमीन मालिक की हत्या करवा दी। कुछ वर्ष पहले बिहार के एक डीजीपी ने अध्ययन में पाया था कि 80% हत्याओं का कारण भू-विवाद है। इस राज्य की 85% आबादी कृषि में लगी है और भू- रिकॉर्ड बाबा आदम के जमाने का है, जिसमें भ्रष्ट सिस्टम ने किसी की जमीन पैसे लेकर किसी और के नाम कर दी है। अगर देश के समतल भू-क्षेत्र के कुल 13 लाख वर्ग किमी (45% ) में 50 हजार वर्ग किमी की मिलकियत को लेकर कोर्ट में मामले हों, अगर एक करोड़ से ज्यादा लोग जमीन विवाद के निपटारे को लेकर अदालतों के चक्कर काट रहे हों और अगर भारत की सालाना जीडीपी का 4% भू-विवादों के चलते निवेश के इंतजार में लटका हो तो गुड गवर्नेस की प्राथमिकता क्या होनी चाहिए? समस्या के मूल में है भूमि रिकार्ड्स में सुधार का अभाव। हाल में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सरकार द्वारा आपात प्रावधानों के तहत किसानों की जमीन का 8 वर्ष पुराना अधिग्रहण खारिज कर दिया। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने भी 64 साल पुराने अधिग्रहण पर किसान के पक्ष में फैसला दिया। उद्योग और शहरीकरण जरूरी है और उसके लिए कृषि भू-भाग ही साधन है। लेकिन इसके लिए अधिग्रहण कानून और भू-दस्तावेज दुरुस्त करना बुनियादी शर्त होनी चाहिए।
टैरिफ वॉर से मुकाबले को तैयार भारत
डा. जयंतीलाल भंडारी, ( लेखक एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट स्टडीज एंड रिसर्च, इंदौर के निदेशक हैं )
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति ने दुनिया में बहुराष्ट्रीय व्यापार समझौतों के समक्ष नई चुनौती पेश कर दी है। इससे पार पाने के लिए द्विपक्षीय व्यापार समझौतों और मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) का जो नया दौर शुरू हुआ है, उसमें भारत सबसे आगे है। भारत की इस नई व्यापार रणनीति में कुछ महत्वपूर्ण बातें दिखाई दे रही हैं। पहली, अब लंबे समय तक व्यापार वार्ता चलाने के बजाय व्यापार वार्ता शीघ्रतापूर्वक पूरी की जाए। दूसरी, व्यापार वार्ता के तहत मुख्य कारोबारी मुद्दों जैसे शुल्क, गैर शुल्क बाधाओं पर शुरुआत में ही प्राथमिकता के साथ मंथन किया जाए। तीसरी, व्यापार वार्ता में भारत के लिए सिरमौर बने हुए सेवा निर्यात के साथ-साथ इलेक्ट्रानिक्स, केमिकल्स और आटोमोटिव सेक्टर को विशेष रूप से शामिल कराने पर ध्यान दिया जाए। इससे वैश्विक वैल्यू चेन में भी भारत की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ती हुई दिखाई देगी, जो अभी सिर्फ 3.3 प्रतिशत है।
हाल में न्यूजीलैंड के प्रधानमंत्री क्रिस्टोफर लक्सन भारत आए थे। उनकी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ बैठक में दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को मजबूत करने, विशेष रूप से व्यापार, कृषि, शिक्षा, सेवा क्षेत्र, ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र से जुड़े कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए। पिछले 10 वर्षों से धीरे-धीरे आगे बढ़ रही भारत-न्यूजीलैंड व्यापार वार्ता को अब महज 60 दिन में पूर्ण करना सुनिश्चित किया गया है। भारत ने अमेरिका से टैरिफ को लेकर वार्ता तेज कर दी है। इसी सिलसिले में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि इस समय भारत दौरे पर हैं।
विगत दिनों प्रधानमंत्री मोदी और यूरोपीय आयोग (ईयू) की प्रेसिडेंट उर्सला वोन लेयेन ने भी दोनों पक्षों के बीच कारोबार एवं आर्थिक सहयोग बढ़ाने के लिए मुक्त व्यापार समझौते को लेकर जारी किंतु-परंतु को पूरी तरह समाप्त कर दिया। दोनों नेताओं ने इस बारे में अपने संबंधित मंत्रालयों को निर्देश दिया कि दोनों पक्षों के हितों के मुताबिक भारत-ईयू व्यापार समझौते पर इस वर्ष के अंत तक मुहर लगाई जाए। इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी और ट्रंप के बीच हुई वार्ता के दौरान भारत-अमेरिकी द्विपक्षीय कारोबार को वर्ष 2030 तक 500 अरब डालर करने का लक्ष्य रखा गया। पिछले माह ब्रिटेन के कारोबार मंत्री जोनाथन रेनाल्ड्स ने भी कहा कि भारत के साथ पांच से छह वर्षों में द्विपक्षीय कारोबार को तीन गुना करना है।
इस समय दुनिया में द्विपक्षीय व्यापार समझौते नए सिरे से दोबारा अहम हो गए हैं। इसे देखते हुए भारत द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं को पूर्ण करने और मुक्त व्यापार समझौतों के क्रियान्वयन के लिए तत्परता से आगे बढ़ रहा है। गत वर्ष इटली में विकसित देशों के संगठन जी-7 के शिखर सम्मेलन में भारत विशेष आमंत्रित देश के रूप में शामिल हुआ था। तब सम्मेलन में शामिल प्रमुख देशों के राष्ट्र प्रमुखों के साथ भारत की द्विपक्षीय व्यापार वार्ताएं हुई थीं। इसी तरह 22वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में मास्को में भारत और रूस के बीच बहुआयामी संबंधों की संपूर्ण शृंखला की समीक्षा के बाद भारत और रूस ने द्विपक्षीय कारोबार को 2030 तक 100 अरब डालर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा।
वहीं न्यूयार्क में भारत और अमेरिका के बीच हुई बातचीत में कई व्यापार समझौतों के साथ कोलकाता में एक सेमीकंडक्टर प्लांट लगाने का करार हुआ। कजान में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन का भारत ने द्विपक्षीय वार्ताओं के लिए रणनीतिक लाभ लिया। इसके साथ ही भारत और चीन के बीच पांच साल बाद अहम द्विपक्षीय वार्ता हुई। इसके बाद भारत और चीन के बीच संबंधों का नया अध्याय दिखाई दे रहा है। इसके अलावा भारत कई और व्यापार वार्ताओं को भी तत्परता से आगे बढ़ा रहा है।
गत वर्ष प्रधानमंत्री मोदी ने ब्राजील, नाइजीरिया और गुयाना का पांच दिवसीय दौरा किया था। वहां उन्होंने जी-20 शिखर सम्मेलन से इतर फ्रांस, इटली, ब्राजील, सिंगापुर, इंडोनेशिया, पुर्तगाल, नार्वे और स्पेन समेत कई देशों के नेताओं के साथ वार्ताएं कीं। फिर नाइजीरिया और गुयाना पहुंचकर इन देशों के साथ व्यापार बढ़ाने की सार्थक वार्ताएं कीं। श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके भी अपने सबसे पहले राजकीय विदेशी दौरे पर भारत आए और उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के साथ वार्ता की।
अब दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूती देने तथा पिछले वर्ष की गई व्यापार वार्ताओं को अंतिम रूप देने के लिए पीएम मोदी अप्रैल में श्रीलंका जाएंगे। बीते वर्ष प्रधानमंत्री मोदी ने कुवैत के साथ वार्ता में आइटी, फार्मा, फिनटेक, बुनियादी ढांचे आदि क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जो प्रभावी व्यापार वार्ता की थी, वह शीघ्र ही द्विपक्षीय व्यापार समझौते का रूप ले सकती है। नार्वे, हंगरी, ग्वाटेमाला, पेरू, चिली के साथ भी शीघ्र ही व्यापार समझौते की बातचीत शुरू हो सकती है। इसके साथ-साथ अब भारत ओमान, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, इजरायल, खाड़ी देश परिषद के साथ भी एफटीए को अंतिम रूप देने की डगर पर आगे बढ़ रहा है।
ट्रंप के टैरिफ वार का भारत के निर्यात पर कोई ज्यादा असर नहीं होगा। इससे भारत के कुल निर्यात में तीन से 3.5 प्रतिशत गिरावट आ सकती है। इस कमी की पूर्ति में नए द्विपक्षीय व्यापार समझौते और मुक्त व्यापार समझौते मददगार होंगे। निर्यात की इस कमी को मैन्यूफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र, दोनों से अधिक निर्यात के माध्यम से सरलतापूर्वक पूरा किया जा सकता है।
आपदा के बाद
संपादकीय
थाईलैंड और म्यांमा में शुक्रवार को आए भूकम्प और उससे हुई तबाही ने एक बार फिर दुनिया के सामने इस चुनौती से निपटने के लिए व्यापक स्तर पर ठोस उपाय करने की जरूरत को रेखांकित किया है। म्यांमा में रिक्टर स्केल पर इस भूकम्प की तीव्रता 7.7 मापी गई। अमेरिकी जियोलाजिकल सर्वे के मुताबिक म्यांमा में पहले झटके के बारह मिनट के बाद दूसरा झटका आया, जिसकी तीव्रता 6.4 थी। खबरों के मुताबिक, इस भूकम्प से भारी तबाही हुई है और हजारों लोगों के मरने की आशंका है। वहीं थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में भी कई इलाकों से इमारतों के गिरने, सड़कों में दरारें आने और पुल के धराशायी होने सहित बड़े पैमाने पर नुकसान होने की खबरें आईं। बताया जा रहा है कि बीते एक दशक के दौरान यह पहली बार है जब बैंकाक में इतना तेज भूकम्प महसूस किया गया। हालांकि थाईलैंड को भूकम्प के लिहाज से ज्यादा संवेदनशील नहीं माना जाता है, शायद इसीलिए वहां भवनों को बनाने के क्रम में भूकम्परोधी तकनीक का इस्तेमाल करना बहुत जरूरी नहीं माना जाता । मगर चूंकि थाईलैंड के पड़ोस में स्थित म्यांमा में अधिक भूकम्प आते हैं, इसलिए उसके असर से इस बार नुकसान का दायरा ज्यादा होने की आशंका है।
दरअसल, इस स्तर के भूकम्प के तुरंत बाद उससे हुई क्षति का आकलन नहीं हो पाता है, लेकिन बाद में आमतौर पर तबाही का दायरा बड़ा दर्ज किया जाता है। यही वजह है कि म्यांमा के बड़े हिस्से में आपातकाल का एलान कर दिया गया। इस तरह की किसी भी प्राकृतिक आपदा की स्थिति में स्वाभाविक ही सबसे पहली जरूरत प्रभावित इलाकों में तुरंत पीड़ितों के लिए हर जरूरी चीजों की सहायता पहुंचाना होती है । इसी के मद्देनजर भारत ने बिना देर किए तबाही पर चिंता जाहिर करते हुए मदद की पेशकश की। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर संभव सहायता देने और अधिकारियों को तैयार रहने को कहा। पिछले कुछ दशकों से कुदरती आपदाओं के स्वरूप में तेजी से बदलाव आता दिख रहा है। भारत में भी आए दिन भूकम्प के झटके किसी बड़ी आशंका के संकेत हो सकते हैं। प्राकृतिक आपदा को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उससे बचाव के पुख्ता इंतजाम करके उससे होने वाले नुकसान को कम जरूर किया जा सकता है।
भारत धर्मशाला नहीं
संपादकीय
आप्रवास और विदेशियों विषयक विधायक 2025 अंततः लोक सभा से पारित आप्रवास आधर के दिनों में विशेषकर भारत में बांग्लादेश में रोहिंग्या घुसपैठ के कारण इस विधायक की जरूरत ज्यादा ही महसूस की जा रही थी। कुछ एजेंटों तथा सक्रिय निहित स्वार्थ के कारण इन दोनों समुदायों के लोग भारत में आकर न केवल भारतीय पहचान पत्र बनवाने में सफल हो जाते हैं बल्कि अपने लिए अस्थाई और अस्थाई अजीविका भी तलाश लेते हैं। अगर मामला यहीं तक सीमित होता तब भी गनीमत थी, लेकिन इन समुदायों के लोग सामान्य से लेकर गंभीर अपराधों तक और यहां तक की भारत विरोधी गतिविधियों में भी लिप्त पाए गए हैं। भारत सरकार तथा भारतीय हितों के पोषक लोग लंबे समय से इनके खतरे के प्रति आगाह भी करते रहे हैं और इसे नियंत्रित करने के प्रयासों पर चर्चा करते रहे हैं। इन्हीं सब की परिणति है यह नया विधेयक । इस विधेयक पर चर्चा करते हुए गृह मंत्री अमित शाह की इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता कि भारत कोई धर्मशाला नहीं है कि कोई भी यहां चला आए, बस जाए और बिना किसी रोक-टोक के जो मन आए करता रहे। वास्तविक समस्या बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की नहीं बल्कि उनकी जो उनके आगमन को संभव बनाते हैं। उनके रहने और रोजगार की व्यवस्था करते हैं और फिर उन्हें भारत विरोधी गतिविधियों का हिस्सा बनते हैं। अब देखना है कि इस नाम इस कानून के लागू होने के बाद किस तरह से घुसपैठियों पर रोक लगेगी और किस तरह से उनके विरुद्ध कार्रवाई होगी जो भारत में घुसपैठ को सुगम बनाते हैं। याद रखना चाहिए कि इन घुसपैठियों की मदद करने वाले तथा इन्हें भारत में बसने के दस्तावेज उपलब्ध कराने वालों का एक वृहद तंत्र है जो समूचे भारत में फैला हुआ है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि गृह मंत्री ने इस घुसपैठ को रोकने में सहयोग करने का आरोप पश्चिम बंगाल की सरकार पर भी लगाया है। उन्होंने कहा है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों के पास जो आधार कार्ड मिलते हैं वह पश्चिम बंगाल में 24 परगना जिले के होते हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि यह नया कानून और गृह मंत्री के प्रयास सही परिणति तक पहुंचेंगे, भारत को घुसपैठ से राहत मिलेगी और धर्मशाला खाली होगा।
अकेले पड़ते लोग
संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में सुनवाई करते वक्त यह टिप्पणी की है कि क्या हम एक व्यक्ति, एक परिवार की तरफ बढ़ रहे हैं, यानी अपने निकटतम परिजनों को भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। हम बात वसुधैव कुटुम्बकम् की करते हैं, लेकिन हालात ये हैं कि निकटतम संबंधी भी साथ नहीं रह पा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय खंडपीठ ने यह टिप्पणी वृद्ध माता-पिता और उनके बेटे के बीच संपत्ति विवाद पर फैसला सुनाते हुए की। परिवारों में संपत्ति के विवाद तो पता नहीं कब से चले आ रहे हैं, लेकिन आधुनिक समाज में ये विशेष रूप से बढ़ गए हैं। एक वजह तो यह है कि औद्योगीकरण और शहरीकरण की वजह से एकल परिवारों की संख्या बढ़ी है और संयुक्त परिवार बिखर रहे हैं। दूसरी बड़ी समस्या यह है कि आधुनिक समाज ने जिस तरह की उपभोक्ता संस्कृति को जन्म दिया है, उसमें लोगों की जरूरतें बढ़ गई हैं। उपभोक्ता संस्कृति ने जिस तरह के भौतिकवाद को प्रश्रय दिया है, उसमें हर व्यक्ति के जीवन की सफलता या सार्थकता की एकमात्र कसौटी यह है कि उसके पास कौन-से उपभोग के साधन हैं।
पुराने समाज में इंसान के सम्मान के लिए कई कसौटियां थीं, अब एकमात्र कसोटी उसकी आर्थिक हैसियत है। पहले परिवार से किसी भी मनुष्य की पहचान जुड़ी होती थी, इसलिए लोग परिवार से जुड़े रहते थे। अब उसकी पहचान उसकी कार या कपड़ों के ब्रांड से होती है। यह भौतिकवाद की मृगतृष्णा इंसान की सामाजिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक पहचान पर हावी हो गई है, बल्कि अब तो संस्कृति और आध्यात्मिकता भी उपभोक्ता वस्तु की तरह बाजार में हैं। एक बड़ी समस्या उन देशों में है, जो इस दौड़ में शामिल हो गए हैं, पर इतने समृद्ध नहीं हुए हैं कि इस जीवनशैली को आसानी से अपना सकें। हम भारतीय इसी दौड़ में शामिल हो गए हैं। इस अकेले या अलग- थलग रहना चाहता है । रास्ते पर चलकर चीनी नागरिक पहले ही तरह-तरह के दबाव झेल रहे हैं। भौतिकतावाद और अपेक्षाकृत कम संसाधनों के दोहरे दबाव में चीनी नागरिक पिस रहे हैं। चीन के शहर भले ही चकाचौंध कर देने वाले हों, लेकिन वहां रहने वाले कामकाजी नौजवानों पर दोहरा दबाव है। इसकी वजह यह है कि विकसित पश्चिमी देशों की तरह चीन में ऐसी सामाजिक सुरक्षा नहीं है, जिसके तहत बेरोजगारों को या वृद्धजनों को सरकारी आर्थिक सहायता मिले। दूसरी ओर, दशकों तक एक संतान की नीति की वजह से ज्यादातर लोग इकलौती संतान हैं, इसलिए अक्सर अपने मां-बाप या दादा-दादी या नाना-नानी की देखभाल की जिम्मेदारी भी नौजवानों पर होती है। कई बार नौजवानों के लिए शादी करना या बच्चा पैदा करना भी एक संकट बन जाता है, यह अकेलापन इस भौतिकतावादी संस्कृति का एक प्रतिफल है ।
भारत में ही अगर देखें, तो परिवार के सदस्यों में परस्पर दूरियां लगातार बढ़ रही हैं। भूमि संबंधी विवाद भाई-भाई के बीच ही होते हैं। और मामला हत्या तक पहुंच जाता है। ताजा मामला भी संपत्ति विवाद का ही है। आज के बेटों को पुश्तैनी संपत्ति का लाभ तो चाहिए, पर् पिता-माता के साथ रिश्ते अच्छे रखना उनकी प्राथमिकता नहीं है। ऐसे में, कई माता-पिता भी अपनी संतानों को बेदखल करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यह वक्त है, जब हमें जानना होगा कि अपने लोगों से संबंध और संवाद ही जीवन को सार्थक बनाता है। हमें अपने रिश्तों का दायरा इतना तो जरूर बढ़ाना चाहिए, जिसमें कम से कम अपना निकटतम परिवार पूरी तरह से शामिल हो जाए।