28-08-2017 (Important News Clippings)

28 Aug 2017
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28-08-2017 (Important News Clippings)

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Not my spokesperson

All India Muslim Personal Law Board must now make way for a more representative body

 Saba Naqvi
After recent events in Haryana we should not underestimate the power of men of religion. I recently had the experience of sitting next to a furious mullah in a TV studio. Don’t want government money for madrasas, he hollered, don’t want modern syllabus, don’t want to produce doctors or engineers, just want to produce more maulanas and it’s my right to do so. He was banging his fists on the table and was in quite a state as he saw his freedoms being curtailed.Mullah saab is quite right in that like the Mormons or the Amish people in the US he has every right to do exactly what he wants and live in a separate universe – especially now that the right to privacy has been reinforced in a magnificent manner by the Supreme Court.What the mullah should not have is the right to legally impose his views on others but actually he does have this right via the All India Muslim Personal Law Board (AIMPLB), which has set itself up as the ‘sole spokesperson’ of the Muslim community. Founded in 1973, AIMPLB is a collection of clerics (with a few professionals thrown in) whose main purpose is to protect sharia law. Half its members are life members and ever since it compelled Congress to overturn the Shah Bano judgment in 1986, it’s grown in clout, even as it has created the ecosystem necessary to posit the argument of ‘appeasement’ of a particular community.

Yes, the mullahs have been appeased, even as the people they claim to speak for head downwards on every social and economic indicator. Yet on every matter involving Muslims, including the Ayodhya case, AIMPLB is there positing its views. Now that they have been defeated in the triple talaq matter it’s a good time to ask, on whose mandate does AIMPLB claim to speak for the world’s third largest Muslim community? Did they descend from the heavens to represent India’s unfortunate Muslims till eternity? And why can’t AIMPLB be disbanded and a more representative body created?Although the triple talaq judgment disappoints in still upholding personal laws over fundamental rights, yet a process has begun where women can question men’s rights to determine laws. All the world religions have historically discriminated against women either on the basis of religious texts or social custom (after all Eve came from Adam’s rib, while virgins await men in paradise and till the last century it was acceptable in parts of India for women to burn themselves on their husband’s pyres). But the whole point of modern societies is equality before law, regardless of religion, caste or gender.We in India have in theory given all citizens equal rights but in practice personal laws (not just those applicable to Muslims) have been the backdoor route to disempowering women in matters of marriage, divorce, rights over children and inheritance. And because we were a nation born in the bloodshed and chaos of the Partition, those at the helm of affairs have also had a deep neurosis involving the Muslim community. Somewhere down the line, Congress, the dominant party to shape India’s narrative till recently, appeared to have taken the path of auctioning out ‘secularism’ to clerics, naturally all men, who were then expected to deliver the Muslim ‘herd’ as a voter bloc.

It’s as if the great votaries of secularism could not dirty their hands by directly dealing with Muslims so they brought on the mullahs. Regional parties, most notably SP, BSP and TMC have taken this model of politics to the next level. The first two have been vanquished in the age of BJP while TMC is holding ground in Bengal – yet it is inevitable that its advocacy of conservative clerics will lead to a counter polarisation.Although secularism actually means a separation of state and church, we have evolved something of a perversion in India where the clerics have used the cover of secularism to keep retrograde personal laws in place and thereby their own relevance intact. And it’s not all motivated by divine impulses: Control over a social group also ensures control over whatever resources are available, most notably in the Waqf properties that are reservoirs of corruption instead of being a resource to serve the poor in the community. If our secularism appears to have been virtually flattened by the organised assault of right wing nationalism, it’s because there was a serious structural flaw in it to begin with. Let’s admit that.A few women have now given some oxygen to the Muslim identity that was being suffocated by the relentless presence of the mullah. This identity should always have been grounded in the reality of artisans and craftsmen who make beautiful things with their hands and in the great subcontinental reservoir of poetry and literature that questioned every structure and saw the mullah as an impediment to knowledge and liberation.Even today we live in an age of neurosis, where some accuse the women who fought the case of being pawns in a larger conspiracy scripted by BJP. To such commentators i would only say liberate your minds and regardless of whether BJP set a bait or not, equality is always worth fighting for. It is also true that personal laws may not be the most pressing matter confronting the Muslim community, although any set of rules that disempowers women should always matter.It’s good to see the self-appointed guardians of Islam put in their place. My mullah saab would still be fuming, but frankly, i don’t give a damn as he believes women must live at the mercy of men.


बाबाओं की दुनिया और भ्रमित जनता

शेखर गुप्ता

देश के किस हिस्से में प्रति वर्ग किलोमीटर सबसे ज्यादा बाबा मौजूद हैं? अगर ताजा उदाहरण इतना स्पष्टï न होता तो यह सवाल ज्यादा पेचीदा नजर आता। इन दिनों तो कोई भी पंजाब और हरियाणा का नाम ले लेगा। यह इलाका कई अन्य चीजों के लिए जाना जाता रहा लेकिन धर्म, अध्यात्म और स्वयंभू बाबाओं के लिए इसकी चर्चा पहले इस कदर नहीं होती थी। सारे लोग ऐसे ठगबुद्धि के नहीं होते। कई तो अपने ही अलग आध्यात्मिक दर्शन के साथ सामने आए। वे कानून का पालन करते रहे और उन्होंने जन सेवा तथा परोपकार का काम भी किया। बाकी बाबाओं में ज्यादातर जमीन हथियाने की फिराक में रहने वाले, राजनीतिक दलाल, सत्ता के लिए काम करने वाले तथा छद्म कारोबारी निकले। ये बाबा काफी कुछ शोले फिल्म के खलनायक गब्बर सिंह की तरह नजर आते रहे जिसकी अपनी ताकतवर अदालत थी।हमें ऐसे लोगों के लिए शोले का उदाहरण सामने रखते समय सावधानी बरतनी होगी जिनके लाखों-करोड़ों अनुयायी हैं। पिछले दिनों देश के इस इलाके को एक दोषसिद्ध बलात्कारी बाबा के अनुयायियों ने बंधक सा बना लिया। इस स्वयंभू बाबा पर अभी बलात्कार का एक और मामला तथा एक निर्भीक स्थानीय पत्रकार की हत्या का मामला चलना शेष है। बाबा को जिस मामले में सजा हुई है, उसे उजागर करने वाला वही पत्रकार था। बाबा ने मुक्ति दिलाने के नाम पर अपने 400 अनुयायियों के अंडकोष निकलवाकर उन्हें बधिया करा दिया। खबरों के मुताबिक इन अंडकोषों को फ्रिज में रखा गया।इन दिनों बाबा गुरमीत राम रहीम सिंह इंसा का नाम सुर्खियों में है। संभवत: वह सबसे ज्यादा अनुयायियों वाले बाबा हैं। सिरसा में बाबा के उच्च सुरक्षा वाले ‘डेरे’ (जो एक छोटा मोटा शहर ही है) के अलावा पड़ोस के हिसार जिले में बाबा रामपाल का ठिकाना था। रामपाल भी जेल में है और उस पर इतने गंभीर आरोप हैं कि उसकी बाकी जिंदगी जेल में कटनी तय है। आपको याद होगा कि अभी नवंबर 2014 में हरियाणा पुलिस को उसके अनुयायियों से कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। कई मौतों के बाद ही वह पुलिस के हाथ लगा था। हरियाणा के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक एस एन वशिष्ठ ने कहा था कि उनकी पुलिस को रामपाल के कमांडो की सेना से भिड़ंत लेनी पड़ी।
इन सभी डेरों और पंथों में व्यक्ति विशेष का प्रभाव रहता है। हिसार और सिरसा के आसपास के करीब आठ जिलों में इन दोनों बाबाओं के लाखों भक्त हैं। इनका आध्यात्मिक आभामंडल फीका भी पड़ता है तो अन्य बाबाओं के आगमन से ही। सारे बाबा इतनी समस्याएं पैदा नहीं करते लेकिन उनमें रंगीनियत तो होती है। पंजाब में राधास्वामी और निरंकारी पंथ काफी समय से मौजूद हैं। उत्तर भारत के तमाम इलाके में इनका विस्तार है। राधास्वामी पंथ कभी विवादित नहीं रहा। इसके मौजूदा मुखिया या बाबाजी कैंसर से जूझ रहे हैं। ध्यान रखें कि पंजाब में किसी भी आध्यात्मिक व्यक्ति को गुरु के बजाय बाबाजी ही कहा जाता है क्योंकि सिखों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने खुद को आखिरी गुरु घोषित किया था। उन्होंने कहा था कि आगे पवित्र गुरु ग्रंथ साहब को ही गुरु का दर्जा रहेगा। राधास्वामी संप्रदाय का मुख्यालय जालंधर और अमृतसर के बीच जीटी रोड पर व्यास नदी के करीब है। वहां अब कोई वंशज वारिस नहीं होता बल्कि इसके लिए एक सुविचारित योजना के साथ काम किया जाता है। राधास्वामी संप्रदाय के नए मुखिया का नाम भाई शिविंदर मोहन सिंह है। हममें से ज्यादातर लोग उनको रैनबैक्सी/रेलिगेयर/फोर्टिस जैसी अव्वल कंपनियों से जुड़े भाइयों में से एक के तौर पर जानते हैं। दूसरे भाई मालविंदर मोहन सिंह हैं। सत्ता के गलियारों में दोनों को एमएमएस और एसएमएस के नाम से भी जाना जाता था।निरंकारियों का इतिहास कहीं अधिक घटनाप्रधान रहा है। लंबे समय तक उनके प्रमुख रहे बाबा गुरबचन सिंह की जरनैल सिंह भिंडरांवाले के लोगों ने यह कहकर हत्या कर दी थी कि वह खुद को ‘गुरु’ बताते हैं। सच तो यह है कि भिंडरांवाले का उदय ही उस समय हुआ जब सन 1978 में बैसाखी के दिन उसके अनुयायी निरंकारियों के धार्मिक जमावड़े के समक्ष प्रदर्शन करने पहुंचे। बाबा के समर्थकों ने उन पर गोलीबारी कर दी जिसमें 16 लोगों की मौत हो गई। उस वक्त स्वर्ण मंदिर स्थित अकाल तखत ने एक हुक्मनामा जारी किया कि निरंकारियों के साथ किसी तरह का सामाजिक संपर्क न रखा जाए। साधारण शब्दों में कहा जाए तो उनके साथ रोटी-बेटी का संबंध खत्म करने को कहा गया।
इसके बाद बात आती है नामधारियों की। सफेद पगडिय़ों वाले ये सिख सबसे अधिक मित्रवत और विनम्र होते हैं। उनके पिछले प्रमुख जगजीत सिंह का कोई बेटा नहीं था और उन्होंने अपने दो भतीजों में से एक  उदय सिंह को वारिस चुना। उदय सिंह ने अपनी मां ‘बाबा’ चांद कौर की मदद से पंथ का नेतृत्व संभाला। लुधियाना में 4 अप्रैल 2016 को मोटरसाइकिल सवार बंदूकधारियों ने चांद कौर की हत्या कर दी। दोनों भतीजों ने एक दूसरे पर इसका आरोप लगाया। पंजाब के रूपनगर जिले के नूरपूर बेदी में भनियारा बाबा का पंथ भी एक छोटा लेकिन सुगठित पंथ है। उनके अनुयायियों में पूर्व गृहमंत्री और कांग्रेस नेता बूटा सिंह शामिल रहे हैं। उनका मानना था कि उनकी पत्नी की बीमारी बाबा के चमत्कार से ठीक हुई। परंतु 2001 में जब उन्होंने अपने चमत्कारों से सजी किताब प्रकाशित कराई तो उन्हें गुरुद्रोही माना गया। हरियाणा में एक अदालती पेशी के वक्त बब्बर खालसा के एक सदस्य ने उन्हें चाकू मार दिया। इनके अलावा भला फ्रीजर बाबा को कौन भूल सकता है? आशुतोष का संबंध बिहार से था। पंजाब में उन्होंने अपने लाखों अनुयायी बनाए। जनवरी 2014 में उनका निधन हो गया लेकिन अनुयायियों का मानना है कि वह समाधि में हैं और वापस आएंगे। उनके शव को फ्रिज में रख दिया गया और अंतिम संस्कार तक से इनकार कर दिया गया। तीन साल से उच्च न्यायालय यह मसला सुलझाने में लगा है। एकल पीठ ने अंतिम संस्कार का आदेश दिया लेकिन खंडपीठ ने उसे पलट दिया। इस बीच श्रद्धालु आशू बाबा आएंगे … के गीत गा रहे हैं। समाज विज्ञानियों को इस प्रश्न का उत्तर तलाश करना चाहिए कि यह क्षेत्र बाबाओं के लिए इतना अनुकूल क्यों है? मैंने इस बारे में कई बातें सुनी हैं लेकिन एक बात जो मुझे सही लगती है वह यह है कि सिख धर्म दुनिया का सबसे नया बड़ा धर्म (500 वर्ष से कुछ ज्यादा) है और अभी इसका विकास हो रहा है। यह एक किताबिया धर्म भी है। बाबा तीन काम करते हैं। पहला, वे इसके आचरण को सरल बनाते हैं, यानी जीवन में कोई खास प्रतिबंध नहीं थोपते। दूसरा, चूंकि सिख और हिंदू धर्मों पर एक-दूसरे का व्यवहार प्रभाव है, इसलिए इनका बाजार भी बड़ा होता है। तीसरी बात, पवित्र पुस्तक में भले ही तमाम बुद्धिमानी की बातें कही गई हों लेकिन निराशा के क्षणों में आपको किसी मनुष्य की आवश्यकता होती है।
ऐसा व्यक्ति अगर ईश्वर जैसी प्रतिष्ठा रखता हो तो बात ही क्या? राम रहीम की फिल्मों, गीतों, मोटरसाइकिलों और तमाम तड़क-भड़क से हम परिचित हैं। वह सभी बाबाओं से अधिक लोकप्रिय हुए। यही वजह है निरंकारियों के खिलाफ हुक्मनामे के 35 साल बाद अकाल तख्त ने एक और हुक्मनामा जारी किया। इस बार कहा गया कि राम-रहीम के अनुयायियों से रोटी-बेटी का कोई संबंध न रखा जाए। वोट के लालच में घिरी अकाली-भाजपा सरकार ने दबाव बनाया कि बाबा की वीडियो के जरिये मांगी गई माफी को स्वीकार किया जाए और माफी दी जाए। सिखों ने इसका विरोध किया और वह माफी वापस लेनी पड़ी। हालांकि आम धारणा यही है उनने हालिया चुनाव में अकाली-भाजपा गठबंधन की मदद इसलिए की ताकि उनको सीबीआई मामलों में राहत मिल सके। अब उनमें से एक मामले में उसे सजा हो चुकी है। बाबाओं का यह वोट बैंक और राजनेताओं का लालच पंजाब और हरियाणा के लिए अभिशाप बन चुका है। पहले कांग्रेस यह काम करती रही है। अब भाजपा ने भी सीख ले ली है। अकालियों ने भी इन डेरों को भरपूर संरक्षण दिया है। एक बहादुर पत्रकार ने बलात्कार के मामले उद्घाटित किए और उसे अपनी जान गंवानी पड़ी। सिरसा में पूरा सच नामक अखबार निकालने वाले रामचंद्र छत्रपति ऐसे ही बहादुर व्यक्ति थे। बाबाओं को लगने लगा कि वे कानून से ऊपर हैं। परंतु सीबीआई के बहादुर न्यायाधीश जगदीप सिंह जैसे लोग जब सामने हों तो कहानी का अंत बदल भी जाता है।


न्यायपालिका पर मुख्य न्यायाधीशों का संक्षिप्त कार्यकाल पड़ रहा भारी

अदालती आईना

ऐसा लगता है कि संविधान निर्माताओं के जेहन में यह ख्याल ही नहीं आया कि देश के मुख्य न्यायाधीश का कार्यकाल कितना होना चाहिए। संभवत: इस मुद्दे का समाधान परिपाटी पर छोड़ दिया गया। इसी का नतीजा है कि इस साल देश को तीन मुख्य न्यायाधीश मिले हैं। कुछ मुख्य न्यायाधीशों का कार्यकाल तो महज 41, 35 और 17 दिन का भी रहा है। वहीं एक मुख्य न्यायाधीश सात साल से भी अधिक समय तक अपने पद पर रहे।स्थापित परंपरा के मुताबिक उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जाता है और इस दौरान यह नहीं देखा जाता कि उस न्यायाधीश की सेवानिवृत्ति में कितना समय बाकी है। विभिन्न न्यायविदों ने सुझाव दिया है कि मुख्य न्यायाधीश के लिए भी एक लंबा कार्यकाल सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि वह न्यायपालिका को समुचित दिशानिर्देश दे सके। लेकिन इस विचार के कुछ अपने जोखिम भी हैं। अगर किसी कनिष्ठ न्यायाधीश का लंबा कार्यकाल बचा हुआ हो और उसे पदोन्नत कर मुख्य न्यायाधीश बना दिया जाए तो उससे वरिष्ठ न्यायाधीश काफी नाखुश हो जाएंगे। इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री रहते समय मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्ति के समय दो बार वरिष्ठतम न्यायाधीश की वरिष्ठïता का उल्लंघन किया था। लेकिन इंदिरा के उस फैसले के पीछे लंबे कार्यकाल का सिद्धांत न होकर यह धारणा काम कर रही थी कि न्यायाधीशों को तत्कालीन सरकार के आर्थिक एवं सामाजिक दर्शन के प्रति प्रतिबद्ध होना चाहिए। हालांकि हरेक सरकार की ही यह चाहत रही है कि उनके हमकदम लोग न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठें लेकिन इंदिरा सरकार के उन फैसलों के अरुचिकर नतीजों को देखने के बाद फिर किसी सरकार ने अपनी अंगुलियां जलाने की कोशिश नहीं की।विधि आयोग ने हाल ही में यह सुझाव दिया था कि मुख्य न्यायाधीशों का कार्यकाल दो साल के लिए तय कर दिया जाए। विधि आयोग के मुताबिक इस सुझाव को वर्ष 2022 से अमल में लाया जा सकता है क्योंकि मौजूदा दौर के सबसे कनिष्ठ न्यायाधीश भी उस समय तक मुख्य न्यायाधीश बनकर सेवानिवृत्त हो जाएंगे। इससे मौजूदा न्यायाधीशों के वरिष्ठता पदानुक्रम को भी ठेस नहीं पहुंचेगी। सरकार ने भी एक विचार पेश किया है जिसमें मुख्य न्यायाधीश को कम से कम एक साल का कार्यकाल देने का प्रस्ताव है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 1997 से अब तक बने 17 मुख्य न्यायाधीशों में से केवल तीन का ही कार्यकाल दो साल से अधिक रहा है। इसका मतलब है कि कम समय तक अपने पद पर रहने से उन्हें दीर्घकालिक फैसलों को लागू करने का वक्त ही नहीं मिल पाता है।

 अगर यह योजना अमल में आती है तो सरकार को न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक और शर्त मिल जाएगी। नियुक्ति के समय कैलेंडर यह बता देगा कि वह न्यायाधीश आगे चलकर मुख्य न्यायाधीश बन पाएगा या नहीं। दो साल का न्यूनतम कार्यकाल एक अतिरिक्त कारक होगा। पहले से ही भाषा, भूगोल, धर्म, जाति और लिंग के आधार पर प्रतिनिधित्व जैसे कारकों के साथ निश्चित कार्यकाल भी एक कारक हो जाएगा। लेकिन इससे न्यायाधीश की चयन प्रक्रिया न केवल जटिल हो जाएगी बल्कि कॉलेजियम प्रणाली में भी अंतर्विरोध पैदा हो सकते हैं।न्यायाधीशों के चयन के कुछ अघोषित मानदंड भी हैं, जैसे उम्मीदवार की वैचारिक पृष्ठभूमि। जब वी आर कृष्ण अय्यर का नाम इस पद के लिए सामने आया था तो उनकी साम्यवादी पृष्ठभूमि को लेकर काफी विरोध हुआ था। आधार के इस दौर में फैसलों की छानबीन कर पाना मुमकिन है और किसी न्यायाधीश के राजनीतिक एवं सामाजिक दर्शन को भी पता लगाया जा सकता है। अमेरिका में कानूनी पेशा और मीडिया न्यायाधीशों को रूढि़वादी, उदार, सकारात्मक और अन्य रंगों में पेश करने का आदी रहा है। लेकिन अपने देश में न्यायाधीशों को इस तरह के चश्मे से देखने से परहेज किया जाता रहा है। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि मुख्य न्यायाधीशों के कार्यकाल छोटे रहे हैं जिसके चलते उनके पास न्यायपालिका पर अपनी खास छाप छोडऩे का मौका ही नहीं मिल पाता है।हालांकि लंबे कार्यकाल वाले न्यायाधीशों से कुछ ठोस सुधार लागू कर पाने की उम्मीद करना थोड़ा आकांक्षापूर्ण हो सकता है। पहले कुछ ऐसे न्यायाधीश रहे हैं जो लंबा कार्यकाल होते हुए भी कोई बड़ा बदलाव नहीं कर पाए हैं। सच तो यह है कि अब तक हुए 44 मुख्य न्यायाधीशों के कार्यकाल में न्यायिक प्रणाली का लगातार पराभव ही हुआ है। अदालतों में लंबित मामलों की संख्या बढ़ती गई है, अदालतों को डिजिटल करने का लक्ष्य काफी पीछे चल रहा है और अदालतों के भीतर भीड़भाड़ देखकर किसी मछली बाजार की याद आती है।अधिकतर मुख्य न्यायाधीश अपने न्यायिक कार्यों में ही लगे रहे हैं और न्यायपालिका के प्रशासन पर उनका जोर नहीं रहा है। मौजूदा मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहड़ को अपने सीमित कार्यकाल में कार्यपालिका के दबावों के आगे न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बचाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ा है। नए मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा को भी अपने एक साल के कार्यकाल में अयोध्या जैसे कई संवेदनशील मामलों से निपटना होगा। उन्हें सिनेमाघरों में राष्ट्रगान बजाने को अनिवार्य करने के अपने फैसले के चलते काफी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। आपराधिक मानहानि के प्रावधान को वैध ठहराने, मॉरल पुलिसिंग को बढ़ावा देने वाला अश्लीलता संबंधी फैसला देने और बॉलीवुड के केवल पुरुष मेकअप कलाकारों को ही उनके संगठन का सदस्य बनने वाला लैंगिक फैसला देने को लेकर उन्हें आलोचाएं भी झेलनी पड़ी हैं। निंदक आगे भी उनके फैसलों की आलोचना कर सकते हैं और मौजूदा दौर की प्रचलित रवायत के अनुरूप चलने का आरोप लगा सकते हैं। फिलहाल तो हम उनके फैसलों में लिखे कुछ बेहद लंबे वाक्यों और पहेलीनुमा संदेशों को पढ़ते हुए आश्वस्त हो सकते हैं।


सौंदर्य में है रचनात्मकता की प्रसन्नता

पंकज बिष्ट 

कंबोज या आधुनिक कंबोडिया के उत्तर में, स्याम रीप शहर के निकट स्थित, अंगकोर वाट पहली ही नज़र में आपको अभिभूत कर देता है। वह जो भावना महसूस होती है, जो आह्लादित करती है उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। लेकिन, किसी भारतीय के लिए तो यह स्वप्न जैसा है। दुनिया का सबसे बड़ा पूजा स्थल। वह भी हिंदू मंदिर और उस पर भी भारत में नहीं। 165 एकड़ में फैले विष्णु के इस मंदिर को 12वीं सदी में सूर्यवर्मन द्वितीय नाम के राजा ने बनवाया था। इससे पहले वहां शैव मत का प्रभाव था। निश्चय ही इस मंदिर पर भारतीय पुरातत्व, धर्म, दर्शन, ज्योतिष, आइकनोग्राफी यानी मूर्ति शिल्प और सजावट का असर है। इसका महत्व हिंदू मंदिर होने में नहीं है। यह खामेर शैली की विशिष्टता का उत्कृष्ट नमूना है। चौकोर ज्यामितीय अनुपात में बने इस मंदिर का मुंह पश्चिम की ओर है। यह बड़ा सवाल है।असल में यह मंदिर राजा सूर्यवर्मन द्वितीय ने अपने अंतिम संस्कार के लिए बनवाया था। पश्चिम की ओर मुख होने का तात्पर्य है जीवन का भी अस्त होना पर यह अस्त होना मात्र शरीर का अस्त होना है। मंदिर में अंतिम संस्कार के होने का तात्पर्य है राजा का देवत्व से एकाकार होना। राम और कृष्ण को विष्णु का अवतार माना जाता है। सूर्यवर्मन संभवत: कहना चाहते थे कि वे अवतार हैं और उसी में समा गए हैं। सूर्यवर्मन अवतार थे या नहीं, यह दीगर बात है। सच यह है कि मंदिर ने उन्हें अमर जरूर कर दिया है।
मंदिर के पांच शिखर मेरु पर्वत शृंखला का प्रतिरूप हैं। मंदिर की दीवारें विभिन्न देवताओं की मूर्तियों और रामायण व महाभारत की कथाओं व अप्सरा व देवों से सजी हैं। अप्सरा शब्द पूरे कंबोडिया में अत्यंत लोकप्रिय है। इस नाम से कई व्यावसायिक संस्थान देखे जा सकते हैं। लेकिन, आज यह हिंदू मंदिर न होकर बौद्ध मंदिर है। जगह- जगह बुद्ध की प्रतिमाएं नजर आती हैं। अंगकोर शब्द अपने आप में भारतीय प्रभाव का मजेदार नमूना है। यह शब्द संस्कृत के नगर शब्द से बना है। स्थानीय लोग नगर को नोकोर कहते हैं उसी से यह अंगकोर बना है। वाट शब्द भी संस्कृत का है, जिसका शाब्दिक अर्थ चार दिवारी होता है। यानी अर्थ हुआ मंदिर का नगर या महानगर। यद्यपि मूलत: इसे हिंदू मंदिर के रूप में बनाया गया था पर 12वीं सदी के अंत तक यह बौद्ध मंदिर में बदल दिया गया था। इस बीच वहां बौद्ध धर्म की महायान शाखा का प्रचार बढ़ने लगा था। पर देखने की बात यह है कि यद्यपि बौद्ध धर्म ने कंबोडिया में हिंदू धर्म या ब्राह्मण धर्म का स्थान लिया और अंगकोरवाट को बौद्ध मंदिर में बदला इसके बावजूद उन्होंने किसी भी हिंदू देवी-देवता की मूर्ति का ध्वंस नहीं किया। सूर्यवर्मन के 50 वर्ष बाद शासन संभालने वाला राजा जयवर्मन सप्तम स्वयं बौद्ध था। उसने अंगकोर वाट से कुछ ही दूरी पर नई राजधानी बसाई जो अंगकोर थाम कहलाती है। थाम का अर्थ है महा यानी यह भी महानगर ही था। मंदिरों के इस समुच्चय में सबसे सुंदर मंदिर बोयान है, जिसका अर्थ है चतुर्मुख। मंदिर के हर शिखर पर एक-सी चार विशाल मुखाकृतियां हैं। ये मुखाकृति वैसे तो बुद्ध की हैं पर कहा जाता है कि ये स्वयं जयवर्मन के चेहरे की प्रतिकृति हैं। यहां मैंने सिर्फ दो मंदिरों की बात की है। स्वयं मैं अपनी यात्रा में पूरे तीन दिन अंगकोर वाट आर्कोलॉजिकल पार्क में जाने के बावजूद सब कुछ नहीं देख सका। असल में अंगकोर एक विशाल क्षेत्र है, जिसमें कई राजधानियां थीं जो किसी न किसी मंदिर के आसपास बसी थीं। यह क्षेत्र चार सौ वर्ग मील में फैला हुआ है। एक-एक मंदिर विशेष कर अंगकोर वाट और बोयान ऐसे मंदिर हैं, जिनकी प्रशंसा में किताबें लिखी जा सकती हैं। और लिखी गई हैं। भारतीय सभ्यता और धर्म ने विशेष कर बौद्ध धर्म ने एशिया में जो प्रभाव छोड़ा उसका सबसे जीवंत असर आज भी आप सुदूर पूर्व के देशों – म्यांमार से चीन और जापान तक देख सकते हैं। पर मलेशिया, थाइलैंड, इंडोनेशिया, कंबोडिया, वियतनाम और लाओस में हिंदू धर्म के अवशेषों को आज पा सकते हैं। देखने की बात यह है कि सुदूर पूर्व में बौद्ध धर्म से पहले हिंदू धर्म गया था। यह उन व्यापारियों के माध्यम से गया जो बंगाल की खाड़ी से मलेशिया इंडोनेशिया होते हुए चीन तक जाते थे। इन्हीं के साथ धर्म प्रचारक भी गए जो वहीं बस गए। पहले यह माना जाता था कि ये भारतीय उपनिवेश थे पर नए अध्ययनों से पता चलता है कि ये भारतीय उपनिवेश नहीं बल्कि भारतीय सभ्यता और धर्म से प्रभावित क्षेत्र थे जहां भारतीय मूल के लोगों ने भी सत्ताएं बनाई पर वे वहीं के होकर रह गए थे। अंगकोर वाट जैसी किसी भव्य भारतीय पद्धति के शिल्प को देखने से और वह भी विदेश में देखने से जो पुलक महसूस होती है, रोमांच से जिस तरह रोएं खड़े हो जाते हैं वह अलग ही किस्म की खुशी है। सौदर्य किसी भी प्रकार का हो वह प्रसन्नता तो देता ही है। दरअसल, यह रचनात्मकता का आनंद है, जो रचनाकार को तो आनंदित करती ही है, देखने वाले को भी उसी किस्म की अनुभूति देती है।


अपनी सुरक्षा कैसे करें यही है निजता की लड़ाई

आर. जगन्नाथन

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते निजता को भी मौलिक अधिकार घोषित कर दिया। ज्यादातर लोगों ने इसका यह अर्थ निकाला कि अब alt147आधार’ को सभी मामलों में अनिवार्य नहीं किया जा सकेगा। यह भी कि समलैंगिकों के अधिकार को सिर्फ इसलिए अवैध नहीं बनाया जा सकता कि ज्यादातर लोग उन्हें पसंद नहीं करते हैं। यह फैसला सिर्फ इस बारे में नहीं है कि सरकार को नागरिकों की निजता का सम्मान कैसे करना चाहिए और कानून बनाकर कैसे उसकी सुरक्षा करनी चाहिए। बल्कि एक चेतावनी भी है कि आपकी व्यक्तिगत जानकारियों पर किस तरह निजी कंपनियों का प्रभावी नियंत्रण है। हम में से ज्यादातर को यह भी नहीं मालूम कि हम ऑनलाइन कंपनियों के साथ निजी डाटा साझा कर रहे हैं। यदि हम यह जानते हों तो भी इस बारे में कुछ करने में असमर्थ हैं। यह फैसला सुनाने वाले नौ जजों में से एक जस्टिस संजय किशन कौल ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि निजता चिंता का विषय हो गया है। न सिर्फ सरकार लोगों से उनकी व्यक्तिगत जानकारी मांग रही है, बल्कि जब हम इंटरनेट आधारित सेवाएं लेते हैं स्वेच्छा से अपनी व्यक्तिगत जानकारी साझा कर रहे हैं। उन्होंने कहा, alt147उबर को पता है कि हम कहां आते जाते हैं। फेसबुक जानती है कि कौन हमारे मित्र हैंं। अलीबाबा हमारी शॉपिंग हैबिट्स के बारे में जानती है। एयरबीएनबी को मालूम होता है कि हम कहां की यात्रा कर रहे हैं। तकनीक के विकास ने न सिर्फ सरकार बल्कि बड़ी कंपनियों और निजी संस्थाओं को ‘बिग ब्रदर’ बना दिया है जिनकी घुसपैठ हमारी व्यक्तिगत जानकारियों तक है।’ नंदन नीलेकणी कुछ समय पहले कह चुके हैं कि स्मार्टफोन किसी भी व्यक्ति के चेहरे की निजता के लिए सबसे बड़ा जोखिम बन गए हैं। स्मार्टफोन का दुरुपयोग रोकने के लिए आप स्मार्टफोन को फिंगरप्रिंट या पासवर्ड से लॉक करते हैं। लेकिन इसका सारा ब्योरा उस स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनी के पास मौजूद होता है। जब गूगल आपको फ्री-ईमेल के साथ डॉक्यूमेंट्स सेव करने के लिए क्लाउड स्टोरेज की पेशकश करती है तो आप जो भी डाक्यूमेंट्स वहां सेव करते हैं, गूगल को उसकी पूरी जानकारी होती है। आप जो भी मेल लिखते हैं वह पढ़ा जा सकता है। जरा आप इस डरावने परिदृश्य पर गौर करें- आपके स्मार्टफोन का डाटा, ई-मेल चीन के सर्वर्स पर मौजूद है क्योंकि आज भारतीय बाजार में बिकने वाले ज्यादातर स्मार्टफोन चीनी मूल हैं। इसका मतलब यह है कि आपके फिंगरप्रिंट चीन की टेक्नोलॉजी कंपनियों के पास मौजूद हैं जो प्राय: उस नैतिक आचरण का पालन नहीं करती हैं जिनका एपल या अमेजन जैसी पश्चिम की टेक्नोलॉजी कंपनियां करती हैं। संभवत: वे निजता का सम्मान करती हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या हम चाहते हैं कि चीन के लोग हमारी वित्तीय और अन्य व्यक्तिगत जानकारियों के बारे में जानें?
या आप यह भी सोचें कि हम फेसबुक पर किस तरह की जानकारी शेयर कर रहे हैं। फेसबुक आपको दोस्तों के जन्मदिन की तारीख रिमाइंड कराता है और तब आप उन्हें शुभकामनाएं देते हैं। लेकिन यदि आप अपने जन्म-तारीख की जानकारी शेयर करने के बारे में सावधानी नहीं बरत रहे हैं तो यह जानकारी गलत हाथों में भी जा सकती है। यह ऐसा व्यक्ति भी हो सकता है जो आपके alt147फ्रैंड्स लिस्ट’ में तो हो, लेकिन आप उसे अच्छी तरह न जानते हों। ध्यान रखें, जन्म तारीख एक महत्वपूर्ण डाटा है। फोन बैंकिंग और क्रेडिट कार्ड कंपनियों में इसका उपयोग आपकी पहचान साबित करने में करना होता है। मोबाइल से शेयर ट्रेडिंग करने के समय भी यह डाटा आपकी पहचान साबित करता है। आपका ऐसा कोई फेसबुक alt147फ्रैंड’ जो असल में आपका मित्र न हो, यदि वह आपकी जन्म तारीख जानता है तो वह आपके बैंक को फोन कर आपकी जन्म तारीख बताकर ऐसे पेश आ सकता है जैसे वही आप हैं। आप अपने परिवार के फोटोग्राफ सोशल मीडिया पर या कहीं और शेयर करते हैं, तो बदमाश आपके चेहरे को अश्लील कंटेंट के साथ ऐसे मिक्स कर सकते हैं। वह उसे इस तरह दिखा सकते हैं जैसे उसमें आप खुद ही मौजूद हों। सीख यही है कि आप ऐसी गलती ना करें। निजता को लेकर खास बात यह है कि आपको इस बारे में सजग रहना चाहिए कि चेहरा-विहीन सरकारी नौकरशाह आपके आधार डाटा का दुरुपयोग न करें या इसे ली न कर दें। ध्यान रखें, आप जो भी निजी जानकारी स्वेच्छा से ऑनलाइन शेयर करते हैं उसका इस्तेमाल आपके अपरिचित alt147फ्रैंड’ या हैकर आपको बदनाम करने या धोखाधड़ी करने में इस्तेमाल कर सकते हैं। कुल मिलाकर, निजता की लड़ाई अभी जीत से काफी दूर है। अपनी निजी जानकारी ऑनलाइन कैसे और किनके साथ शेयर करें, इस बारे में सजग रहकर आपको भी इस लड़ाई में शामिल होना होगा।



समान नागरिक संहिता का सही वक्त

संजय गुप्‍त

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार में तीन तलाक को असंवैधानिक ठहराकर मुस्लिम समाज में प्रचलित सदियों पुरानी एक कुप्रथा का अंत करने का काम किया है। इस बड़े और व्यापक असर वाले फैसले का श्रेय सुप्रीम कोर्ट को ही जाता है, लेकिन कहीं न कहीं इस निर्णय के पीछे केंद्र सरकार और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी भूमिका है, जिन्होंने खुलकर मुस्लिम महिलाओं के पक्ष में आवाज बुलंद की। यह फैसला मुस्लिम महिलाओं के संघर्ष की एक शानदार जीत भी है। इस मामले की सुनवाई कर रही पांच सदस्यीय पीठ के तीन जजों ने तीन तलाक खत्म करने के फैसले को ऐतिहासिक बनाया, क्योंकि मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर ने तलाक खत्म करने के लिए कानून बनाने की जरूरत जताई थी। उन्होंने न केवल एक बार में तीन तलाक की प्रथा को इस्लामी रीति माना, बल्कि पर्सनल लॉ का हिस्सा बताते हुए यह भी कहा था कि यह मौलिक अधिकार है। ऐसा ही मत एक अन्य जज का भी था। हालांकि इन दोनों जजों की राय का फैसले पर असर नहीं पड़ा, किंतु उनके नजरिये ने कुछ सवाल तो खड़े ही कर दिए हैं। इन दो जजों के विपरीत तीन जजों ने यह पाया कि एक बार में तीन तलाक की प्रथा का कुरान में कोई स्थान नहीं और इसीलिए वह खारिज करने योग्य है। आज का समाज जिस तेजी से आगे बढ़ और बदल रहा उसमें किसी भी वजह से महिलाओं की दोयम दर्जे की स्थिति स्वीकार नहीं की जा सकती। हैरत की बात है कि तमाम इस्लामी देशों ने तो एक बार में तीन तलाक से आजादी पा ली, लेकिन भारत में मुस्लिमों का एक बड़ा हिस्सा पर्सनल लॉ के नाम पर इस कुप्रथा को त्यागने के लिए तैयार नहीं था। अभी भी वह इसे अपनी जीत बता रहा है कि सुप्रीम कोर्ट ने पर्सनल लॉ में हेरफेर करने की इजाजत नहीं दी है। ब्रिटिश शासन के दौरान सामाजिक रीति-रिवाज बदलने के लिए अंग्रेजों ने भारत में विवाह संबंधी कुरीतियां समाप्त करने का मन बनाया था। उन्होंने हिंदू समाज के कानूनों में तो बदलाव की पहल की, लेकिन मुस्लिम समाज के कानूनों की इसलिए अनदेखी की, ताकि मुसलमान उनके खिलाफ न हो जाएं। जब भारत को आजादी मिली तो हिंदुओं के पर्सनल लॉ में बदलाव के लिए हिंदू कोड बिल लाया गया, लेकिन जब मुसलमानों के पर्सनल लॉ में बदलाव का सवाल उठा तो नेहरू पीछे हट गए। इसके बाद जब भारतीय राजनेताओं को यह समझ आ गया कि वे मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति कर अपना फायदा कर सकते हैं तो उनमें इस समाज के तुष्टीकरण की होड़ लग गई। इस होड़ की पराकाष्ठा शाहबानो मामले में देखने को मिली। 1985 में तलाक के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के पक्ष में फैसला देकर उन्हें गुजारा भत्त्ाा देने का आदेश दिया, लेकिन राजीव गांधी सरकार ने अपने प्रचंड बहुमत के चलते 1986 में एक नए कानून का निर्माण कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया। बहुमत की मनमानी वाले इस फैसले के विरोध में आरिफ मोहम्मद खान ने मंत्रिपरिषद से इस्तीफा भी दिया, लेकिन सरकार के रवैये पर असर नहीं पड़ा। कांग्रेस की इस भूल को एक तरह से भाजपा ने सुधारा और उसने तीन तलाक के मामले में मुस्लिम महिलाओं का पक्ष लिया।

अब जब सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को असंवैधानिक ठहरा दिया है तब करीब-करीब सभी राजनीतिक दल उसका स्वागत तो कर रहे हैं, लेकिन कुछ दल अभी भी मुस्लिम तुष्टीकरण वाली राजनीति का मोह छोड़ने के लिए तैयार नहीं दिख रहे और इसीलिए वे समान नागरिक संहिता की जरूरत पर मौन हैैं। समान नागरिक संहिता के मामले में भाजपा का रुख नया नहीं है। वह जनसंघ के समय से ही समान नागरिक संहिता की वकालत करती आ रही है। समान नागरिक संहिता का अर्थ यही है कि देश के सभी नागरिकों को, वे चाहे किसी भी मजहब, जाति या क्षेत्र के हों, के लिए विवाह, उत्तराधिकार आदि के मामले में एक समान पर्सनल लॉ बनें। मुस्लिम समाज को यह समझने की जरूरत है कि उनके अपने समाज में वक्त के साथ बदलाव होना चाहिए। वे अपने पर्सनल लॉ की आड़ में रूढ़ियों को अनंतकाल तक ढोते नहीं रह सकते। जब दूसरे समुदाय के पसर्नल लॉ बदले जा चुके हैं तो फिर यही काम मुस्लिम पर्सनल लॉ के मामले में क्यों नहीं हो सकता? कोई समाज सदियों पुराने रीति-रिवाजों के साथ आगे नहीं बढ़ सकता? आखिर जो समाज अपनी आधी आबादी यानी महिलाओं की लगातार उपेक्षा करे, वह प्रगति कैसे कर सकता है? यह एक तथ्य है कि अन्य समाजों की अपेक्षा मुस्लिम समाज में महिलाएं अधिक पीड़ित और शोषण की शिकार हैं। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल एक साथ तीन तलाक के मामले में अपना फैसला सुनाया है। उसने इस मामले की सुनवाई आरंभ करते ही यह स्पष्ट कर दिया था कि बहुविवाह और निकाह हलाला जैसे विषयों पर बाद में सुनवाई होगी। इसके बाद भी उसके फैसले ने मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर बहस आरंभ की है। अच्छा हो कि मुस्लिम समाज बहुविवाह और निकाह हलाला पर भी खुले मन से विचार-विमर्श करे। यह स्वाभाविक है कि इस विमर्श में समान नागरिक संहिता का मुद्दा स्वत: शामिल हो जाएगा। वैसे भी यह माना जा रहा है कि समान नागरिक संहिता पर विधि आयोग की रपट आने के बाद मोदी सरकार इस दिशा में कदम उठाएगी। उसे ऐसे कदम उठाने भी चाहिए, लेकिन उसके ऐसा करने की स्थिति में इसका अंदेशा है कि मुस्लिम समाज के धर्मगुरु और पर्सनल लॉ बोर्ड जैसे संगठन विरोध कर सकते हैैं। जमात-ए-इस्लामी तो तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध अभी भी कर रहा है। उसके जैसे संगठन यह भी दलील दे रहे हैं कि बहुविवाह और निकाह हलाला उनके धर्म का हिस्सा हैैं। वे यह समझने के लिए तैयार नहीं कि धर्म आधारित कानून भी इंसान ही बनाते हैं और अगर बदलते सामाजिक परिवेश के साथ पुरुषों और महिलाओं को बराबर का अधिकार न देने वाले कानूनों को बदला नहीं जाएगा तो फिर उनका समाज पिछड़ेपन से मुक्त कैसे हो सकता है? समान नागरिक संहिता देश के नागरिकों को समान अधिकार देने के साथ ही सामाजिक एकता को मजबूत करने का भी काम करेगी। वह सबमें बराबरी का भाव भी पैदा करेगी। अच्छा होता कि सुप्रीम कोर्ट ऐसा कुछ कहता कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव हो सकते हैं। समान नागरिक संहिता के मामले में यह ध्यान रहे कि इसकी जरूरत संविधान निर्माताओं ने भी जताई थी। किसी भी देश के लिए उसका संविधान सर्वोपरि होता है और उससे जो मौलिक अधिकार मिलते हैं, उनके जरिये अलग-अलग समाजों के लिए स्वीकार्य साझा पर्सनल लॉ बनाया जा सकता है। आखिर जब दुनिया के अन्य देशों में यह काम हो सकता है यानी समान नागरिक संहिता बन सकती है तो फिर भारत में क्यों नहीं?



निजता का आधार

मेरे पास आधार कार्ड नहीं है। मैं बनवाना भी नहीं चाहता हंू। मेरा उससे कोई विशेष विरोध नहीं है, पर बनवा नहीं रहा हूँ , क्योंकि मैं थक गया हूँ ।मेरे पास पहले सिर्फ राशन कार्ड था। वही काफी था रोजमर्रा की जिंदगी चलाने के लिए। फिर विदेश जाना पड़ा तो अपनी राष्ट्रीय पहचान दिखाने के लिए पासपोर्ट बनवाया। वहां से निपटा तो बताया गया कि अब वित्तीय पहचान बनाना जरूरी हो गया है। सो, पैन कार्ड का फॉर्म भरने में लग गया। इस बीच बैंकों ने केवाईसी (नो योर कस्टमर) लागू कर दिया। मैंने अपनी ‘बैंक पहचान’ भी बनवा ली। ड्राईवर न रखने का फैसला किया, तो वाहन चालक होने की पहचान भी बनवाई। और हां, वोटर पहचान बनवाना तो बहुत जरूरी था। आखिरकार, लोकतंत्र के सिपाही के नाते इतना हथियारबंद होना तो लाजमी था।इधर नौकरी-पेशा होने के नाते पिछले वर्षों में कई पहचान पत्र अलग-अलग संस्थाओं ने बनवा कर दिए हैं, जिनको मशीन पर चिपकाने से कई दरवाजे खुलते रहे हैं। शक्ल से अब कोई नहीं पहचानता है, कार्ड के बिना आप अपनों में भी पराए हैं।अभी हाल ही में घर बदला। सोसाइटी के अफसरों ने सारे कार्ड दरकिनार कर के आदेश दिया कि फ्लैट पुलिस वेरिफिकेशन के बाद ही किराए पर मिलेगा। उन्होंने कहा पासपोर्ट आदि का उनसे कोई मतलब नहीं है, जिसमें वेरिफिकेशन हो चुका है। चरित्र पर असली मोहर तो मोहल्ले के थानेदार जी ही लगाएंगे। रेंट अग्रीमेंट लेकर जब आधार कार्ड बनवाने पहुंचे तो उन्होंने मना कर दिया। आपका यह एड्रेस प्रूफ नहीं माना जा सकता। बैंक की पासबुक पर फोटो चिपका कर मोहर लगवाओ, जिसमें नया पता हो। बैंक ने कहा, बहुत अरसे से आपका केवाईसी नहीं हुआ, करवा लीजिए- आधार कार्ड है?

उधर पैन को आधार से जोड़ना है, आधार को बैंक अकाउंट से, फोन को भी आधार से और उसके बाद ही उस सफर पर हम निकल सकेंगे, जिसका टिकट बे-आधार नहीं होगा। मतलब हमारी हर नित्य क्रिया का ठोस आधार होगा- मरते-मरते भी हम आधारभूत चिह्न छोड़ जाएंगे। मुखाग्नि की क्रिया का आधार हमारे कभी जिंदा होने का सबूत देगा। जैसा मैंने पहले कहा है, आधार या किसी भी कार्ड से मुझे कोई समस्या नहीं है। यह एक सुविचार है। हर समाज का और हर सामाजिक प्राणी का कोई न कोई आधार तो होना ही चाहिए। निजता जब तक सार्वजनिक न हो, तब तक समाज और सरकार आपकी पहचान कैसे करेगा? पर अब मैं थक गया हूँ अपनी पहचान बनवाते-बनवाते और उसको हर दरोगा के आगे साबित करते-करते। न जाने कितने फोटो लगा कर हमने सरकारी मोहरें लगवाई हैं और फिर भी पहचान आज तक पुख्ता नहीं हो पाई है। यह फैसला नहीं हो पा रहा है कि मैं कौन हंू और कहां रहता हंू। मैं असली हंू या नकली।‘तू कौन?’ की गंभीर तहकीकात में निजी संस्थाएं भी लगी हैं। अपने को निजी कहती हैं, पर उनको दूसरे की निजता से कोई लेना-देना नहीं है। वास्तव में निजता को खंगालना व्यावासिक मुनाफे का नया संसाधन बन गया है। आप कब सोते हैं, कब उठते हैं, क्या खाते-पहनते, सोचते हैं आदि जानने के लिए आनलाइन और आफलाइन तमाम ऐसे हथकंडे सृजित किए जा रहे हैं, जिनसे हर व्यक्ति के हलक में अंगुली डाल कर उसकी निजता को आखिरी कण तक उगलवाया जा सके और फिर उसकी निजता को बाजार की नाली में बहाया जा सके। वैसे अगर देखा जाए तो हिंदुस्तान में निजता की अवधारणा ही नहीं है। हम शौच भी खुले में करना पसंद करते हैं। खाना-पीना साझा चूल्हा है। रीति-रिवाज, त्योहार, मोहल्ले-टोलों में सामूहिक तरीके से मनाते हैं। शादी-ब्याह भी सड़क घेर कर करते हैं और पड़ोसी के घर की हर हलचल फौरन से पेश्तर हम तक पहुंचती है।हम कौमी जिंदगी जरूर जीते हैं, पर अपने अलग-अलग तरीकों से। कोई उस पर अपना नियंत्रण स्थापित नहीं कर पाया है और न ही उसका संचालन अपने हाथों में ले पाया है। एक तरह से अपनी विशिष्ट जीवन शैली चुनने का अधिकार हमारे मानस में निहित हो गया है। इसी को हम अपनी निजता कहते हैं, जो कि सार्वजनिक होने के साथ-साथ बहुत ही व्यक्तिगत भी है। वास्तव में आधार कार्ड का मुद्दा कोई मुद्दा नहीं है। अगर एक और कार्ड बन गया तो उससे क्या फर्क पड़ने वाला है। फोटो तो हम ऐसे भी बहुत खिंचा चुके हैं, अब पंजों के निशान भी दे देंगे, आखों का स्कैन भी करा लेंगे और अपनी नागरिक, वित्तीय, कानूनी आदि पहचान को एक-दूसरे से जोड़ भी देंगे, जिससे देखने वाला हमें एक नजर में पूरा पहचान कर ले और हमारी जिंदगी का हर कोना टटोल ले। इसमें कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि मेरे जैसे लगभग सभी नागरिकों की जिंदगी एक खुली किताब है। पैन नंबर से पहले पहचान धर्म, जाति, गोत्र, क्षेत्र, शहर और वंशावली से होती थी और आज भी यह पहचान सबसे कारगर है।

असल मुद्दा पहचान के जरिए नियंत्रण का है। निजता पर नियंत्रण का है। शरीर के जरिए रूह को स्कैन से बचाने का है। किस जीवन शैली का चुनाव हम कैसे करते हैं, उसकी प्रक्रिया को बचाने का है। यह चुनाव व्यक्तिगत भी हो सकता है, सामाजिक भी, संस्थागत और राजनीतिक भी। इन सभी क्षेत्रों में चुनाव करने की क्षमता और स्वतंत्रता हमारे देश में निजता को परिभाषित करते हैं। हिंदुस्तान की यह अनूठी पद्धति और संस्कृति है, जो दुनिया के अधिकतर देशों से नदारद है। आज की दुनिया में बहुत सी वजहों से कार्ड जरूरी है। कार्ड बहुत सारी सुविधाएं उपलब्ध करा सकता है और व्यवस्था को सुचारू रूप से चला सकता है। वह हमारे सार्वजनिक जीवन की प्रभावी पृष्ठभूमि बन कर उसको सरल कर सकता है।पर वह निजी जीवन का नियंत्रक नहीं बन सकता है। उससे ऐसी स्थिति नहीं उत्पन्न होनी चाहिए, जिसमे कोई भी प्रशासनिक अधिकारी भेदभाव के तहत किसी का हुक्का-पानी बंद करने में सक्षम हो जाए। वास्तव में निजता हमारे लिए एक ऐसी अद्भुत जीवन शैली है, जिसमें सूरदास कृष्ण को बालसखा की तरह चुनते हैं, तो बिहारी उनके शृंगार रूप से अटखेली करते हैं। वाल्मीकि राम को राजा राम कहते हैं, तो तुलसीदास के लिए वे मर्यादा पुरुषोत्तम राम हैं। हमने अनंत काल से रूप और प्रकार का चुनाव निज बुद्धि और प्रेम भाव पर छोड़ा है, जिसमे बाहरी हस्तक्षेप मान्य नहीं है। ऐसे में निजता सिर्फ संवैधानिक मुद्दा नहीं है। यह उससे भी बड़ा सांस्कृतिक धरोहर का मसला है, जिसमे भारत की आत्मा रचती-बसती है। इस धरोहर को हमें उजड़ने नहीं देना चाहिए।



सत्तर साल

जाति का अभिशाप

बरसों के अनुभव से मैंने जाना है कि अपनी जाति को श्रेष्ठतम मानने (या जातिवादी होने) की भावना बड़ी आसानी से तमाम गुणों के साथ के मेल बिठा सकती है, उन गुणी लोगों में बिनी किसी ग्लानि या शर्मिंदगी के। जाति का हमेशा खयाल रखने वालों में शिक्षाविद, लेखक, पेशेवर दक्षता वाले लोग और राजनीतिक नेता भी थे और आज भी हैं।  उदाहरण के लिए, बहुत थोड़े-से लोग विद्वत्ता, मेधा और नि:स्वार्थ सेवा में सी राजगोपालाचारी (राजाजी) की बराबरी कर पाएंगे। मद्रास (जैसा कि तब उस राज्य को कहा जाता था) के मुख्यमंत्री पद के लिए वे स्वाभाविक पसंद थे।वे एक महान प्रशासक थे, फिर भी एक मामले में गलती कर बैठे। उन्होंने स्कूली पाठ्यक्रम के एक अंग के रूप में ‘रोजगारपरक प्रशिक्षण’ दिए जाने की वकालत की, लेकिन कौशल/व्यवसाय का चयन विद्यार्थी पर छोड़ देने के बजाय, राजाजी ने इस पर जोर दिया कि विद्यार्थी अपने पिता के पेशे को चुने। राजाजी की योजना जल्दी ही कुला कालवी या जाति आधारित शिक्षा कही जाने लगी। सत्तारूढ़ पार्टी ने विद्रोह कर दिया और उन्हें इस्तीफा देने के लिए विवश होना पड़ा। (राजाजी ने गलती की थी, पर मैं नहीं मानता कि वे जातिवादी थे)।

अभेद्य वर्गीकरण

भारतीय जाति व्यवस्था का स्रोत वर्ण-व्यवस्था है। वर्ण-व्यवस्था हिंदुओं में चारमुखी विभाजन है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। जो रेखाएं उन्हें विभाजित करती हैं वे सपाट, श्रेणीबद्ध और अमिट हैं: एक बार आप ब्राह्मण या क्षत्रिय या वैश्य या शूद्र परिवार में जन्म ले लेते हैं, तो आप आजीवन उसी श्रेणी में रहेंगे और आपकी संतान को भी जीवन भर उसी श्रेणी में रहना होगा। व्यक्ति की आत्मवत्ता और उसकी गरिमा के लिए इससे ज्यादा घातक और कुछ नहीं हो सकता। हिंदू धर्म के इसी वर्गीकरण के खिलाफ हुए विद्रोह से बौद्ध धर्म और जैन धर्म का आविर्भाव हुआ। अगर वर्ण बुरा था, तो जाति और भी बुरी थी। हरेक वर्ण के भीतर श्रेणियां और उपश्रेणियां थीं और उनमें से हरेक श्रेणी या उपश्रेणी जाति या उप-जाति का प्रतिनिधित्व करती थी।प्रत्येक जाति या उप-जाति एक बंद घेरे में बदल गई; इसने अपने तकलीफदेह नियम बना लिये; और उन नियमों का उल्लंघन करने पर बहिष्कार या निष्कासन की सजा मिलती थी।जातिगत उत्पीड़न का सबसे बुरा रूप था छुआछूत। अछूत- जो अब दलित कहे जाते हैं- हिंदू समाज से पूरी तरह बहिष्कृत थे। वे न केवल वर्ण-व्यवस्था में सबसे नीचे समझे जाने वाले शूद्रों से भी नीचे थे, बल्कि वास्तव में हिंदू समाज से बाहर थे। उनकी भूमिका थी चारों वर्णों की सेवा करना, और मोची, अंत्येष्टि प्रबंधक, नालियां साफ करने और मृत पशु का चमड़ा उतारने जैसे ‘अस्वच्छ’ काम करना जो सबसे हेय समझे जाते थे। बेशक, दलित अन्य जातियों के लिए सस्ते कृषि-श्रम का स्रोत भी थे।

विद्रोह और समर्थन

वर्ण, जाति और छुआछूत ने हिंदू समाज को हर प्रकार से दुनिया के सर्वाधिक दमनकारी, शोषणकारी और कम उत्पादक समाज-व्यवस्थाओं में से एक बना दिया। यहां ‘कम उत्पादक’ कहने का क्या अर्थ है इस पर गौर करें: अगर करोड़ों लोग शिक्षा, उचित पारिश्रमिक, संपत्ति के अधिकार, सामाजिक गतिशीलता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित हों, तो वह समाज अपनी पूर्ण आर्थिक संभावना की प्राप्ति कैसे कर सकता है?इनमें से कुछ मुद््दे स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान चर्चा का विषय बने थे। बाबासाहेब आंबेडकर दलितों की प्रामाणिक आवाज बन कर उभरे थे। ईवी रामास्वामी (पेरियार) ने गैर-ब्राह्मण जातियों के हितों से जुड़े मुद््दे उठाए: तमिलनाडु में गैर-ब्राह्मण हिंदू समाज का 97 फीसद हैं! श्रीनारायण गुरु ने तथाकथित निम्न जातियों की एकता और मुक्ति के लिए काम किया।देश का ध्यान पूरी तरह आजादी के लक्ष्य पर रहा; समाज सुधार के काम हाशिये पर ही रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के नेतागण सच्चे देशभक्त थे, स्वतंत्रता के लिए अपना सब कुछ, यहां तक कि अपना जीवन भी बलिदान करने को तैयार रहते थे। पीछे मुड़ कर देखने पर, उनकी एक ही कमजोरी नजर आती है, और वह है, जाति में विश्वास। क्रिस्टोफ जैफ्रिलॉट ने एक प्रकाश डालने वाले लेख (इंडियन एक्सप्रेस, 4 अगस्त, 2017) में 1920 के दशक और 1930 के दशक के दरम्यान के महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय, केएम मुंशी, राजाजी और दयानंद सरस्वती के भाषणों के अंश उद्धृत किए हैं और यह तर्क दिया है कि उन्होंने वर्ण के श्रेणीक्रम को सही माना था, जबकि यह ‘व्यष्टिपरक मूल्यों के खिलाफ’ था। जैफ्रिलॉट ने दीनदयाल उपाध्याय के 1965 के लेखन और योगी आदित्यनाथ के हाल-फिलहाल के एक भाषण के अंश भी उद्धृत किए हैं।कुछ नेताओं के विचार समय के साथ परिवर्धित हुए और बदल गए, जबकि कुछ के विचार और प्रतिगामी हो गए। गांधीजी ने कहा, ‘‘मैं आजकल के अर्थ में जाति में विश्वास नहीं करता। यह अनावश्यक है और प्रगति में बाधक है।’’ दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के भाषण के उद्धरण में कहा गया है ‘‘जो काम खेत में हल करता है वही काम जातियां हिंदू समाज में करती हैं, उसे संगठित और सुव्यवस्थित बनाए रखती हैं।’’

सदियों पुरानी पहेली
जाति व्यवस्था क्यों और कैसे सदियों से चलती रही यह एक पहेली है। क्षत्रियों और वैश्यों ने, जिनके पास शक्ति थी और धन था, क्यों ब्राह्मण को अपने से श्रेष्ठतर स्वीकार कर लिया? गुरु हमेशा ब्राह्मण ही क्यों होता था? जाति व्यवस्था क्या इसलिए कायम रही कि मनुष्य स्वभाव से ही साहचर्य के लिए लालायित रहता है और जाति ने एक सुविधाजनक साहचर्य प्रदान किया जिसमें किसी हद तक भौतिक व सामाजिक सुरक्षा भी थी? शिक्षा और शहरीकरण के कारण जाति क्षीण होते-होते हिंदू समाज की हाशिये की चीज हो जा सकती है, पर जाति अभी हिंदू समाज का मूलाधार है।भारत के संविधान या इसके अनुच्छेद 14, 15, 16, 17 और 21 के बावजूद जाति और जातिवाद अभी तक कायम हैं। विवाह, सामाजिक संबंधों और राजनीति में सबसे प्रमुख कारक है जाति। सरकारी प्रशासन, निजी क्षेत्र, व्यापार और काम-धंधों में भी जाति का खासा प्रभाव अलग-अलग हद तक दिखाई देता है। कला, संस्कृति और साहित्य की दुनिया में भी गहरे जातिगत विभाजन मौजूद हैं। मेरे खयाल से, जाति एक अभिशाप है जो भारत और भारत के लोगों में निहित संभावनाओं को कम करती है। जाति का उन्मूलन फिलहाल कहीं नहीं दिखता।


एक कदम आगे, एक कदम पीछे


केंद्र सरकार द्वारा स्थापित एक समिति तय करेगी कि पिछड़ी जातियों, जिन्हें सरकारी नौकरियों में आरक्षण का लाभ मिला हुआ है, को कितने उपवगरे में बांटा जा सकता है। तय करेगी कि पिछड़ी जातियों को मिले 27.5 प्रतिशत आरक्षण में से कितना किस उपवर्ग को दिया जाए। यह निश्चय ही प्रगतिशील कदम है। तमाम अध्ययनों से जाहिर हुआ है कि आरक्षण का लाभ सभी पिछड़ी जातियों को समान अनुपात में नहीं मिला है। कहने की जरूरत नहीं कि यह कदम केंद्र का अपना आविष्कार नहीं है। राज्य सरकारों ने आरक्षण देने में बहुत पहले से पिछड़ी जातियों का वर्गीकरण किया हुआ है। केंद्र की विज्ञप्ति में बताया गया है कि ग्यारह राज्य इस तरह का उपवर्गीकरण कर चुके हैं। वस्तुत: इसकी शुरु आत बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने की थी, जब मंडल आयोग बना भी नहीं था। आरक्षण का विचार सोशलिस्ट नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने दिया था। सभी पिछड़ी जातियां समान रूप से पिछड़ी हुई नहीं हैं। इसलिए कर्पूरी ठाकुर ने पिछड़ी जातियों को तीन वगरे में बांटा था : पिछड़ी, अति पिछड़ी और सब से ज्यादा पिछड़ी जातियां। बेहतर होता कि सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते वक्त इस तय को संज्ञान में लिया होता। सरकारों को निर्देश दिया होता कि आरक्षण की दृष्टि से पिछड़ेपन के अनुपात के आधार पर इन जातियों की तीन या दो सूचियां बनाएं। पिछड़ावादी विचारक और कार्यकर्ता इस मामले में अलग विचार रखते हैं। उनका मानना है कि यह पिछड़ा एकता को तोड़ने की कोशिश है। ‘‘पिछड़ी जातियां’ एक संपूर्ण इकाई है, और इसमें कोई उपविभाजन नहीं किया जा सकता। उपविभाजित होने पर अलग-अलग जातियों की अलग-अलग राजनैतिक पसंदगियां हो सकती हैं। लेकिन यह आरोप आधारहीन है। आरक्षण के दर्शन के पीछे मूल भावना यही है कि चूंकि समाज के सभी लोग आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक प्रगति की दृष्टि से एक ही पायदान पर नहीं खड़े हैं, एक बड़ा वर्ग काफी पिछड़ा हुआ है, इसलिए उसे विशेष अवसर मिलना चाहिए। कम से कम वे लोग इस पर आपत्ति नहीं कर सकते जो आरक्षण को न्याय के एक बुनियादी आधार के रूप में देखते हैं। इस सिलसिले में एक विचारणीय पहलू स्त्रियों को ले कर है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण से पिछड़ी जातियों की स्त्रियों को सब से कम लाभ मिला है। ऐसी स्थिति में, पिछड़ी जातियों में वर्गीकरण करते हुए क्या स्त्रियों की आवश्यकता पर विशेष ध्यान देने की जरूरत नहीं है? यह प्रश्न इसलिए उठता है कि विधायिका-संसद और विधान सभाओं-में 33 प्रतिशत सीटें स्त्रियों के लिए आरक्षित करने का विधेयक इसीलिए अटका हुआ है क्योंकि पिछड़ी जातियों के सांसदों की मांग है कि आरक्षित सीटों का एक हिस्सा पिछड़ी जातियों की स्त्रियों के लिए आरक्षित किया जाए। उनकी मांग का आधार यह है कि अगर पिछड़ी जातियों की सीटों के लिए सीटें अलग से आरक्षित नहीं होती हैं तो विधायिका में स्त्रियों के लिए आरक्षित सभी सीटें अगड़ी जातियों की स्त्रियों को चली जाएंगी। इस तरह विधायिका में आरक्षण का लाभ कुछ खास जातियों को ही मिलेगा और बहुलांश स्त्रियां इससे वंचित रह जाएंगी। यह तर्क निश्चय ही आधारहीन नहीं है, लेकिन इसमें अंतर्निहित तर्क का विस्तार किया जाए तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि सरकारी नौकरियों में आरक्षण का पूरा लाभ पिछड़ी जातियों की स्त्रियों को भी मिल सके, इसके लिए यहां भी स्त्रियों के लिए क्या अलग कोटा नहीं होना चाहिए? और पिछड़ी जातियों में स्त्रियों के लिए अलग कोटा, तो अनुसूचित जातियों और जनजातियों में भी क्यों नहीं? यह सवाल इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि हाल के वर्षो में स्त्री एक अलग वर्ग के रूप में उभरी है। वह अपने मानवीय अधिकारों की मांग कर रही है, और समाज में सभी स्तरों पर अपने लिए जगह चाहती है। रोजगार के क्षेत्र में स्त्रियों का अनुपात बहुत ही कम है। उनके लिए ज्यादातर वे नौकरियां आरक्षित हैं, जहां काम निम्न दरजे का है, और मजदूरी बहुत ही कम। इन कामों में पिछड़ी जातियों की, दलित और आदिवासी महिलाएं ही ज्यादा हैं। अगर सरकारी नौकरियों में स्त्रियों के लिए 25 या 33 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता है, जो ज्यादा से ज्यादा स्त्रियां ऊंचे पदों पर आ सकेंगी। केंद्र सरकार ने एक और निर्णय लिया है। उसने क्रीमी लेयर की सीमा 6 लाख रुपये से बढ़ा कर 8 लाख रुपये कर दी है। शुरू में यह सीमा एक लाख रु पये थी। समय-समय पर बढ़ते हुए यह अब 8 लाख रु पये हो गई है यानी जिस परिवार की आमदनी 66,000 रुपये है, उस परिवार को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। इस समय देश में नौकरी की आमदनी का जो हाल है, उसमें यह मानना कठिन है कि 66,000 रुपये महीने आय वाला परिवार भी पिछड़ा की कोटि में आएगा। सरकार के उपर्युक्त दोनों निर्णयों में अंतर्विरोध भी है। वर्गीकरण द्वारा सरकार चाहती है कि आरक्षण का लाभ गरीब पिछड़ों को भी मिले और दूसरी तरफ क्रीमी लेयर की सीमा बढ़ा कर वह उन लोगों को लाभान्वित करना चाहती है, जो पिछड़ों में अगड़े हैं। 



How we define Assam’s flood problem

is crucial to any attempts towards addressing it. It will require a careful consideration of the history of the state’s complex encounter with floods

Sanjib Baruah 

“If I were given one hour to save the planet,” Albert Einstein once said, “I would spend 59 minutes defining the problem and one minute resolving it.” I am often reminded of this statement when considering Assam’s annual encounter with floods. Prime Minister Narendra Modi has recently announced that he would appoint a high-powered committee to find “a permanent solution” for Assam’s recurring flood problem. Einstein’s words will be highly relevant to this task. Much of the defining of the problem will have to happen before this committee is formed; its composition will reflect how the government chooses to define the problem.Floods have not always been a “problem” for Assam. For centuries, the region has relied on the annual flooding and recession of the Brahmaputra and its tributaries for the productivity of its agriculture and other non-farm activities that sustain rural livelihoods. Following a visit to Assam in 1921, M.K. Gandhi spoke of the “relatively happy” lives of the Assamese. “Their land does not require much cultivation,” he observed.“The flood waters of the rivers fertilise it, so that the people are able to earn their livelihood with little labour.” Even today, the pervasive sight during the monsoons of bamboo fishing nets and traps fixed on water bodies and submerged agricultural lands makes even the casual visitor aware of the significant role that floods play in rural livelihoods.During this year’s floods, the media has paid attention to the large number of animals — including rhinos and lesser known endangered species like hog deer and sambar deer — that have tragically perished. But without Kaziranga’s annual rejuvenation by floods when the park is closed to tourists, the landscape and its unique wildlife will not survive. No remedy can put at risk the integrity of the dynamic system that connects the Brahmaputra with its alluvial floodplains where Kaziranga is located, and which explains its unique biodiversity.Floods are events of nature. But they are not “natural disasters”. Whether a natural event becomes a disaster depends on when and where it occurs. Floods affect the natural and built environments differently. The same flood event can be damaging in a heavily built environment but a boon in a natural environment.

In Assam, the perception of floods as a “problem” is a 20th century phenomenon. British colonial administrators did not think of protection against floods in the 19th century. But they were beginning to eye the low-lying areas of the floodplains of the Brahmaputra as a significant source of potential revenue: As “wastelands”, the vocabulary they used to give away large tracts of land to European tea planters. But unlike those lands, these so-called “wastelands” close to the river were not suited for growing tea.The idea of flood protection appeared on the policy agenda for the first time in the late 1920s and 1930s when floods began to cause damage to the thriving new crop of jute in those low-lying areas. We know from the work of environmental historians that the peasantry in Assam before the 20th century had settled and cultivated lands in the floodplain away from the riverbed. The lowlands close to the river were used for seasonal cultivation.It was the demand for new lands to meet the growing requirements of Bengal’s jute industry that led to the policy of settling those lowlands with migrants from east Bengal. The rapid rise of jute production in the early part of the last century coincides with the reclamation of those areas for year-round settlement and the first wave of migration of east Bengali peasants to Assam: The forefathers of today’s Assamese-speaking Miya Musalman community. Flood control appeared on the policy agenda only after the jute crop in the riverine tracts became “flood-prone”.

The Assam earthquake of 1950 raised the bed of the Brahmaputra, and floods began to threaten the built environment of commercially important cities like Dibrugarh and Jorhat. That was the spur behind flood control in the post-colonial period. Building embankments to protect those urban settlements now became a policy priority.The Assam Embankment and Drainage Act that enables the building and maintenance of embankments “for the purpose of excluding, regulating and retaining water” was adopted by the state assembly in 1953. Assam has since built nearly 5,000 kilometres of flood control embankments, the third most extensive in the country. But while embankments were initially able to protect targeted settlements, they have had many unintended consequences.The confinement of the river flow because of the embankments has led to higher water levels and increased hydraulic pressure during the monsoon, threatening bank erosion and embankment failures. Embankment breaches are now the major cause of flood devastation in Assam. In some parts of the state, embankments affect areas enclosed by an embankment and those outside very differently, adversely impacting the livelihoods of poorer communities and reinforcing social inequalities.

Public policy-making at its best is “a form of collective puzzlement on society’s behalf; it entails both deciding and knowing”. Solving Assam’s “flood problem” will be a complex balancing act. In order to define the problem satisfactorily, one must carefully consider the history of Assam’s complex encounter with floods.There are two radically different ways of thinking about floods. Let me put them schematically. Physical scientists have traditionally viewed rivers as carriers of volumes of water and sediment that need to be harnessed by science in the interest of human progress. Floods, in their view, are destructive natural hazards that inflict property damage and human suffering. Few contemporary physical scientists, however, will take that view. For ecologists on the other hand, floods are not disasters. They are key to the health of riverine ecosystems; they benefit both people and wildlife. For many in contemporary Assam, dependence on the river ecosystem is not just a theoretical idea; it is lived reality. Many grassroots activists give voice to their struggles without the ecologist’s vocabularyAt this point of our history when climate change challenges many of the key assumptions behind past economic policy, both perspectives demand consideration. It will be prudent to define the problem carefully before rushing to find a “permanent solution”. That will be in keeping with Einstein’s wise words on how to go about solving problems.


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