23-12-2025 (Important News Clippings)
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Date: 23-12-25
आरबीआई के नए आंकड़े हमें क्या सच बताते हैं?
संपादकीय
आरबीआई ने वर्ष 2024-25 के राज्यवार जीडीपी और उसके अनुसार प्रति व्यक्ति एनएसडीपी (आय) के आंकड़े जारी किए। इसके अनुसार बिहार (9.9 लाख करोड़ की जीएसडीपी और 69312 रु. आय) के साथ सबसे गरीब राज्य रहा है, जबकि सभी राज्यों में दिल्ली 4.93 लाख रु.) आय के साथ सबसे ऊपर रहा। देश के 18 बड़े राज्यों में महाराष्ट्र (45.30 लाख करोड़ रु.) शीर्ष पर बना रहा, जबकि तमिलनाडु, यूपी, कर्नाटक और बंगाल क्रमशः 31.10 लाख करोड़, 29.70 लाख करोड़, 28.80 लाख करोड़ और 18.20 लाख करोड़ की जीएसडीपी के साथ दूसरे से पांचवें स्थान पर रहे। बिहार के बाद प्रति व्यक्ति आय में सबसे गरीब राज्य यूपी और एमपी रहे । भारत में दशकों से असंगठित क्षेत्र के आंकड़े अनुपलब्ध हैं। जबकि सांख्यिकी विभाग इस क्षेत्र का योगदान जीडीपी में 30% (कृषि को छोड़कर) से ज्यादा मानता है और इसे संगठित क्षेत्र के विकास के अनुरूप मानकर कम या ज्यादा करता है। नतीजतन, मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों या किसी सॉफ्टवेयर उद्योग के बड़े योगदान की तेज गति से यह मान लिया जाता है कि उत्तर भारत में रेहड़ी या सब्जी बेचने वाले ने भी विकास किया होगा। यानी उत्तर भारत के औद्योगिक रूप से कम विकसित राज्यों की वास्तविक स्थिति और चिंताजनक हो सकती है। ऐसे में रास्ता एक ही है- औद्योगिक क्रांति ।
Date: 23-12-25
बांग्लादेश में अराजकता हम सबके लिए चिंता का सबब
सैयद अता हसनैन, ( लेफ्टिनेंट जनरल कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर )

बांग्लादेश अपने हालिया इतिहास के सबसे खतरनाक दौर में से एक से गुजर रहा है। छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या ने उस सड़क आंदोलन को और भड़का दिया है, जो वहां पहले से ही भीतर ही भीतर सुलग रहा था। एक हिंसक घटना से शुरू हुआ आक्रोश अब शासन, स्थिरता और देश के क्षेत्रीय संबंधों के लिए एक व्यापक चुनौती में बदल चुका है। आने वाले हफ्तों में लिए जाने वाले फैसले यह तय करेंगे कि बांग्लादेश संतुलन की ओर लौटेगा या लंबे समय तक अनिश्चितता के दौर में फिसल जाएगा।
मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाला अंतरिम प्रशासन आज असाधारण दबाव में काम कर रहा है। और यह दबाव काफी हद तक उसकी अपनी नीतियों का परिणाम है। उसके सामने एक और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी ओर अगले वर्ष की शुरुआत में होने वाले चुनावों की जमीन तैयार करने की चुनौती | उसे अवामी लीग पर प्रतिबंध और उसके शीर्ष नेतृत्व की अनुपस्थिति के बाद बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य से भी निपटना पड़ रहा है। बांग्लादेशी राजनीति के एक केंद्रीय स्तंभ को हटा तो दिया गया, लेकिन उसके स्थान पर कोई व्यापक रूप से स्वीकार्य वैकल्पिक व्यवस्था नहीं दी गई। इस खालीपन को सड़कों ने भर दिया है।
बांग्लादेश अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। मौजूदा उथल-पुथल उसे राजनीतिक रूप से उस रास्ते पर ले जा सकती है, जहां असंतोष आधारित राष्ट्रवाद और टकराव को बढ़ावा मिलता है। लेकिन इस मुल्क ने हाल के सालों में जो तरक्की की थी, वह व्यावहारिकता की जमीन पर टिकी थी राजनीतिक स्थिरता, बाहरी दुनिया से जुड़ाव और विकास पर ध्यान । जबकि जमीनी विरोध-प्रदर्शनों के साथ लगातार तालमेल बिठाकर शासन चलाना न तो टिकाऊ है और न ही समझदारी भरा। जनआंदोलनों को अंततः किसी निष्कर्ष पर पहुंचना होता है, और जितनी देर इस क्षण को टाला जाता है, संस्थागत सत्ता को बहाल करना उतना ही कठिन हो जाता है। नेतृत्व का अर्थ है जनभावनाओं को समझना, उनमें वह जाना नहीं।
आज बांग्लादेश की सड़कों पर भारत विरोधी नारे नजर आ रहे हैं। कूटनीतिक परिसरों के सामने प्रदर्शन हो रहे हैं। हालांकि अगस्त 2024 से अब तक नई दिल्ली ने संयम बरता है, बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति पर सार्वजनिक टिप्पणी से परहेज किया है और शांत कूटनीतिक संवाद पर भरोसा किया है। लेकिन यह हमारी उदासीनता नहीं, बल्कि रणनीतिक धैर्य है। वैसे भी हमारी ओर से किसी भी तरह की अति प्रतिक्रिया हस्तक्षेप के आरोपों को ही मजबूत करेगी।
किसी भी देश में राजनीतिक अस्थिरता के दौर ऐसे बाहरी तत्वों को आकर्षित करते हैं, जो अव्यवस्था में ही फलते-फूलते हैं। पाकिस्तान का खुफिया तंत्र ऐतिहासिक रूप से ऐसे अवसरों का लाभ उठाता रहा है। इसीलिए एक अधिक गंभीर खतरा यह है कि बांग्लादेश की धरती से भारत के खिलाफ उग्रवादी या आतंकवादी गतिविधियां उभरें। दशकों तक भारत और बांग्लादेश के बीच घनिष्ठ सहयोग ने ऐसे खतरों को पनपने नहीं दिया था। लेकिन यदि अब ऐसा हुआ तो सुरक्षा संबंधी धारणाएं नाटकीय रूप से बदल जाएंगी और कठोर प्रतिक्रिया से जुड़े जटिल प्रश्न खड़े हो जाएंगे।
इसी संदर्भ में सीमा प्रबंधन विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। भारत-बांग्लादेश सीमा को एक स्थिरता पैदा करने वाले संपर्क बिंदु के रूप में काम करना चाहिए, न कि गलतफहमियां बढ़ाने वाले क्षेत्र के रूप में शांत रवैया, सीमा सुरक्षा बलों के बीच प्रभावी समन्वय और उकसावे वाले संकेतों से परहेज अनिवार्य है। एक संस्था जो आने वाले समय में विशेष रूप से ध्यान के केंद्र में आएगी, वह है बांग्लादेश की सेना परंपरागत रूप से उसने स्वयं को पेशेवर बनाए रखने और रोजमर्रा की राजनीति से अलग रखने की कोशिश की है, अपने मुल्क के सैन्य हस्तक्षेप के कठिन इतिहास से वह भली-भांति परिचित है, लेकिन लंबे समय तक जारी अस्थिरता सभी संस्थानों पर दबाव डालती है। जब नागरिक सत्ता की परीक्षा होती है, तो व्यवस्था के संरक्षक के रूप में सेना से अपेक्षाएं बढ़ने लगती हैं। ऐसी अपेक्षाएं स्वस्थ नहीं हैं। इससे उस संस्था के राजनीतिकरण का खतरा पैदा होता है, जिसकी विश्वसनीयता उसकी तटस्थता पर टिकी है।
फिलहाल तो बांग्लादेश के नेतृत्व के लिए सबक साफ हैं। सड़कों पर होने वाले आंदोलन फौरी बदलाव तो ला सकते हैं, लेकिन दीर्घकालीन सुप्रशासन नहीं दे सकते। बांग्लादेश जितनी देर तक ठोस राजनीतिक नेतृत्व से दूर रहेगा, वहां पर स्थायित्व लाना उतना ही मुश्किल होता चला जाएगा।
Date: 23-12-25
अरावली की परिभाषा
संपादकीय
अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर हो रहे विवाद पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री ने यह तो स्पष्ट कर दिया कि अरावली क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित हैं और उसके सिर्फ 0.19 प्रतिशत इलाके में ही खनन होगा, लेकिन इसमें संदेह है कि इसके बाद विवाद शांत हो जाएगा। इसका कारण सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश की गई वह रिपोर्ट है, जो कहती है कि सौ मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली पर्वतमाला माना जाएगा। यदि इस परिभाषा को स्वीकृति मिली तो इसका मतलब होगा कि 99 मीटर ऊंची पहाड़ियां अरावली का हिस्सा नहीं रह जाएंगी। यदि ऐसा होता है तो आशंका है कि अरावली के बड़े क्षेत्र में खनन का रास्ता साफ हो सकता है। उचित यह होगा कि इस आशंका को दूर किया जाए। इसके लिए वह स्पष्ट करना होगा कि क्या उक्त परिभाषा को मान्यता मिलने की स्थिति में भी अरावली के केवल 0.19 प्रतिशत क्षेत्र में ही खनन होगा ? कहना कठिन है कि ऐसा ही है या नहीं, लेकिन यह आवश्यक है कि अरावली क्षेत्र में एक तो सीमित खनन ही हो और दूसरे अवैध खनन को हर हाल में वास्तव में रोका जाए। वह एक तथ्य है कि तमाम रोक के बाद भी अरावली क्षेत्र में अवैध खनन होने की खबरें आती रहती हैं।
वन एवं पर्यावरण मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि एनसीआर क्षेत्र में खनन की अनुमति नहीं है और इसे लेकर कई लोगों ने भ्रम फैलाया है, लेकिन एनसीआर से इतर क्षेत्र में खनन के दायरे को लेकर भी तो स्पष्टता आवश्यक है। आम तौर पर अवैध खनन वहीं होता है, जहां वैध खनन की अनुमति होती है। अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला मानी जाती है। वह मैदानी इलाकों को रेगिस्तानी रेत से बचाने के लिए एक अवरोधक की तरह काम करती है। मान्यता है कि इस पर्वतमाला के चलते ही थार रेगिस्तान हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक नहीं फैल पाया। अरावली की थार रेगिस्तान और शेष क्षेत्र के बीच जलवायु को संतुलित करने और भूजल के प्रबंधन में भी अहम भूमिका है। चूंकि अरावली क्षेत्र कई नदियों का स्रोत है, इसलिए उसमें एक सीमा से अधिक खनन कदापि नहीं होना चाहिए। इसलिए और भी नहीं, क्योंकि अरावली के पहाड़ धूल भरी आंधियों को रोकते हैं और इस तरह प्रदूषण कम करने में योगदान देते हैं। क्या यह किसी से छिपा है कि दिल्ली-एनसीआर के साथ-साथ उसके आसपास प्रदूषण की समस्या कितनी गंभीर होती जा रही है? चूंकि अरावली क्षेत्र में चूना पत्थर, संगमरमर और ग्रेनाइट के साथ-साथ लेड, जिंक, कापर और टंगस्टन जैसे खनिज भी हैं, इसलिए उन्हें पर्यावरण को क्षति पहुंचाए बिना हासिल करने के भी जतन किए जाने चाहिए। अरावली को लेकर पर्यावरण और विकास में सटीक संतुलन बनाना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
Date: 23-12-25
दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति
संपादकीय

दिसंबर के दौरान दिल्ली में अभी तक हर दिन हवा प्रदूषित रहना और ज्यादातर दिन इसके बहुत खराब या गंभीर श्रेणी में बने रहना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। इस पर विचारणीय यह कि 10 दिनों से ग्रेप के चारों चरण लागू होने के बावजूद वायु गुणवत्ता में सुधार न होना कई सवाल खड़े करता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि रोकथाम के लिए किए जा रहे दावों- बातों का कोई नतीजा नहीं निकला। यह अत्यंत निराशाजनक स्थिति है कि देश की राजधानी एक ऐसी समस्या से पिछले कुछ वर्षों से जूझ रही है, जिसे सब पूरी इच्छाशक्ति से जुटें तो हल क्रिया जा सकता है। लगातार प्रदूषित हवा से दिल्ली में रहना मुश्किल हो गया है।
दिल्ली वासियों के स्वास्थ्य को जो नुकसान पहुंच रहा है, वह न सिर्फ उनके शरीर को क्षति पहुंचा रहा है, बल्कि वह उनकी आर्थिक हानि की वजह भी बन रहा है। इसी तरह से ग्रेप के प्रतिबंध लागू होने के कारण निर्माण कार्य व डीजल जेनरेटर समेत जो अन्य प्रतिबंध लगाए गए हैं, ये भी दिल्ली को आर्थिक क्षति पहुंचा रहे हैं। सच यह है कि दिल्ली की जनता अब कोरे वादों से आजिज आ चुकी है। अब वायु प्रदूषण को लेकर नीति नियंताओं को बहुत सख्त होना होगा। अल्पकालिक नहीं बल्कि दीर्घकालिक उपाय अपनाने होंगे। यातायात जाम को रोकने को लेकर पूरी गंभीरता से कार्य करना होगा। धूल प्रदूषण भी थामना होगा। कचरा जलने से रोकना होगा।
Date: 23-12-25
मनरेगा की जगह जरूरी था जी राम जी
निरंजन कुमार, गुंजन अग्रवाल ( दिल्ली विश्वविद्यालय में डीन प्लानिंग है और लक्ष्मीबाई महाविद्यालय में अर्थशास्त्र की प्राध्यापिका है )
भारतीय दर्शन के अनुसार परिवर्तन ही एकमात्र स्थिरता है। प्रसिद्ध अमेरिकी राष्ट्रपति जान एफ कैनेडी का भी कथन है- ‘परिवर्तन ही जीवन का नियम है। जो केवल अतीत या वर्तमान की ओर देखते हैं, वे निश्चित रूप से भविष्य में चूक जाते हैं।’ तेजी से बदलती 21वीं सदी में ‘यंग इंडिया’ की जरूरतों, आकांक्षाओं और विकसित भारत के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने ‘विकसित भारतः जी राम जी -2025′ (विकसित भारत गारंटी फार रोजगार एवं आजीविका मिशन ग्रामीण) कानून बनाया है। हर दीर्घकालीन नीति की 15-20 वर्षों में समीक्षा और मूल्यांकन की जरूरत होती है। इतने समय में परिवार, समाज और देश एक पूरी पीढ़ी का बदलाव देख लेता है। नई पीढ़ी कुछ नई जरूरतों एवं आकांक्षाओं के साथ आती है। वर्तमान भारतीय समाज मिलेनियल्स’, ‘जेन जी’ और ‘जेन अल्फा’ सभी को साथ लेकर चल रहा है। हम गत 15 वर्षों में पेन-पेपर की दुनिया से निकल डिजिटल युग और एआइ में प्रवेश कर चुके हैं।
समय की जरूरत के अनुरूप पुरानी दीर्घकालीन योजनाओं को नए आधुनिक परिवेश में ढालना जरूरी होता है इन्हीं कारणों से 2005 से प्रभावी ‘नरेगा’ (जिसे 2009 में ‘मनरेगा’ कहा गया की जगह मोदी सरकार ने ‘बीबी जी राम जी कानून का श्रीगणेश किया। स्वाधीनता के बाद से ही जरूरत के हिसाब से विभिन्न योजनाओं के स्वरूप में बदलाव किए जाते रहे हैं। 1960 के दशक में तत्कालीन सरकार ने ग्रामीण रोजगार योजनाओं की शुरुआत की और ग्रामीण श्रमशक्ति कार्यक्रम लागू किए गए समय की मांग के अनुरूप समय-समय पर विभिन्न सरकारें इनमें फेरबदल करती रहीं । परिणामस्वरूप देश में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगर कार्यक्रम’ ‘ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम (जवाहर रोजगार योजना, 1993)’, ‘संपूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना’ और रोजगार आश्वासन योजन इत्यादि लागू की गई। 2005 में ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा) कार्यक्रम शुरू किया गया। 2009 में इसमें महात्मा गांधी का नाम जोड़कर ‘नरेगा’ से ‘मनरेगा’ कर दिया गया।
नए और तेजी से बदलते आर्थिक सामाजिक और तकनीकी परिदृश्य में मनरेगा एक प्रभावी योजन के तौर पर खरी साबित नहीं हो पा रही थी। साथ ही इसमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार हो रहा था। इसके अतिरिक्त मनरेगा एक कल्याणकारी गरीबी उन्मूलन कानून के रूप में सीमित था, जबकि आज का ग्रामीण युवा ‘विकसित भारत – 2047 के सपनों को साकार करने के लिए संकल्पित है। इन्हीं सबको ध्यान में रखकर जी राम जी बिल लाया गया।
जी राम जी कानून की सबसे बड़ी विशेषता है कि यह कृषि चक्रों के साथ सही तालमेल और ज्यदा रोजगार की गारंटी देता है। मनरेगा में जहां केवल 100 दिन की मजदूरी की गारंटी थी, वहीं जी राम जी में ग्रामीण परिवारों को 100 दिन के बजाय 125 दिन के रोजगार की गारंटी है। साथ ही श्रमिकों और किसानों के बीच समन्वय को ध्यान में रखते हुए फसल कटाई और बोऔई के समय श्रमिकों को 60 दिनों की छुट्टी का प्रविधान है, ताकि उन्हें कृषि संबंधी रोजगार भी मिले। इससे कृषि में रोजगार को मिलाकर श्रमिक अब कुल 185 दिन रोजगार प्राप्त कर सकते हैं।
मनरेगा की आलोचना होती थी कि यह अल्पकालीन राहत या कम टिकाऊ संपत्ति बनाने तक सीमित हैं। बिना पूर्व तय मानकों के कार्यक्रमों से संसाधनों का दुरुपयोग बढ़ा। इससे अपेक्षित लाभ और ग्रामीण विकास नहीं हो पाया। मनरेगा में अब तक दस लाख करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च हो चुके हैं, लेकिन बुनियादी ढांचा दिखाई नहीं देता। इस कमी को दुरुस्त करते हुए जी राम जी कानून में टिकाऊ संपत्ति निर्माण पर जोर दिया गया है, ताकि सतत विकास हो सके अब चार स्पष्ट श्रेणियों जल संरक्षण आधारभूत संरचना, आजीविका और प्राकृतिक आपदा से जुड़े कार्य तय किए गए हैं। नए कानून में 40 के बजाय 50 प्रतिशत खर्च निर्माण सामग्री पर होगा इनका निर्णय दिल्ली में बैठे लोग नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर एक ग्राम समिति कार्यक्रम तय करेगी।
मनरेगा में मजदूरी भुगतान में देरी की बड़ी समस्या थी। इससे श्रमिक वर्ग परेशान रहता था। जी राम जी में मजदूरी भुगतान साप्ताहिक या पाक्षिक रूप से अनिवार्य होगा। फिर डिजिटल माध्यम से मजदूरी भुगतान का प्रविधान भ्रष्टाचार की संभावना को खत्म करेगा। कई मीडिया रिपोर्ट्स हैं कि मनरेगा में कुछ राज्यों में ठेकेदारों को फायदा पहुंचाया गया। जी राम जी बायोमीट्रिक अटेंडेंस संपत्ति की जियो टैगिंग और रियल टाइम डैशबोर्ड के उपयोग का प्रविधान करता है। इससे भ्रष्टाचार और फर्जी लाभार्थियों में निश्चित रूप से कमी आएगी। इसके अलावा मनरेगा की तरह जी राम जी भी कानून श्रमिकों को समय पर काम नहीं मिलने पर उनके बेरोजगारी भत्ता प्रविधानों को जारी रखता है और अधिकार आधारित हकदारी को प्रशासनिक दक्षता के साथ संतुलित करता है। मनरेग की एक अन्य कमी थी, केंद्र और राज्यों का अपेक्षकृत कम समन्वय और राज्यों में जवाबदेही का अभाव। नई योजना में पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों में केंद्र सरकार 90 प्रतिशत योगदान करेगी, केवल 10 प्रतिशत राज्य देंगे। बाकी राज्यों को केंद्र 60 प्रतिशत देगा। राजनीतिक मनोवैज्ञानिक आकलन के अनुसार जब अपना पैसा लगता है। तो कार्य की गुणवत्ता निश्चित बेहतर होती है।
विपक्षी दलों के विरोध में कहीं न कहीं यह भाव भी है कि नए कानून का नाम ‘राम’ पर क्यों रखा गया है। देश में नई योजनाओं कार्यक्रमों के लिए नए नाम रखने की परंपरा रही है। जी राम जी नाम से गांधीजी की कहीं अवमानना नहीं होती, क्योंकि नया नाम तो स्वयं गंधीजी के आराध्यदेव प्रभु राम पर आधारित है। जी राम जी कानून रोजगार गारंटी का विस्तार करके वित्तीय अनुशासन को मजबूत करके, तेज भुगतान सुनिश्चित करके काम को कृषि चक्रों के साथ जोड़कर और फोकस को अल्पकालिक राहत से टिकाऊ ग्रामीण विकास की और ले जाकर रोजगार और ग्रामीण विकास को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का संकल्प दिखाता है।
Date: 23-12-25
अरावली की चिंता
संपादकीय
जलवायु परिवर्तन के दौर में प्राकृतिक संसाधनों की चिंता अगर प्राथमिकता होनी चाहिए, तो इस विषय को राजनीति से बचाना भी आज की बड़ी आवश्यकता है। पहाड़ों, जंगलों, नदियों और जल स्रोतों को सुरक्षित रखना हमारा कर्तव्य है। जहां एक ओर, अरावली पर्वत श्रृंखला को लेकर सीकर से उदयपुर तक प्रदर्शन हुए हैं, तो वहीं दूसरी ओर, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने उन दावों को खारिज किया है कि केंद्र ने अरावली पहाड़ियों के संरक्षण में ढील दे दी है। दरअसल, पिछले पखवाड़े से ही यह चिंता हावी है कि अरावली की सुरक्षा से समझौता किया जा रहा है। अब जब केंद्रीय मंत्री ने गलतफहमियों को दूर करने की कोशिश की है, तो भ्रम के बादल छंटने चाहिए। माना जाता है कि यह अपने देश की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है और जब टेक्टोनिक प्लेटें आपस में टकराई थीं, तब इस श्रृंखला का जन्म हुआ था। यह एक तरह से थार रेगिस्तान को पूरे भारत में फैलने से रोकने का काम करती है। ऐसी जीवन रक्षक शृंखला की रक्षा प्राथमिकता होनी ही चाहिए और किसी भी प्रकार से इसे लेकर संशय या आशंकाओं का बाजार गर्म नहीं होना चाहिए।
कोई संदेह नहीं कि सरकारों की उपेक्षा की वजह से अरावली का काफी हिस्सा खनन का शिकार हुआ है। खनन को पूरी तरह से रोकना आज भी संभव नहीं हुआ है। आधिकारिक रूप से इसके लगभग दो प्रतिशत हिस्से में खनन जारी है, लेकिन अनधिकृत रूप से क्या-क्या हो रहा है, यह सरकारों के लिए हमेशा जांच का विषय है? यह पर्वत श्रृंखला चार राज्यों में फैली है, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात । इनमें से राजस्थान में सबसे ज्यादा खतरा है और उसके बाद हरियाणा का स्थान आता है। यह भी एक त्रासद पक्ष है कि अरावली के पक्ष में दायर एक याचिका पर 1985 से सुनवाई चल रही है। हालांकि, इस याचिका का ही नतीजा है कि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा संरक्षित श्रेणी में आता है। वैसे, अब समय आ गया है कि अरावली को पूरी तरह से खनन मुक्त रखने का फैसला किया जाए। जितना खनन हो चुका, बहुत है, अब आगे खनन से जो तात्कालिक आर्थिक लाभ होगा, उससे कई गुना ज्यादा कीमत हमें पर्यावरण के मोर्चे पर चुकानी पड़ेगी ।
ध्यान रहे, अरावली से वन्यजीव लगभग खत्म होने को हैं। वहां मानव गतिविधियों का विस्तार हो रहा है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि अरावली को लेकर सरकारों की चिंता नई रंग लाएगी। खनन के विकल्प पर विचार करना होगा। खनन मुख्य रूप से पत्थर के लिए होता है और पत्थरों से सुंदर घर बनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। इस परंपरा से परे सोचने की जरूरत है। घर या इमारत बनाने के दूसरे संसाधन हैं, जिनसे मकान तो बहुत बन जाएंगे, पर कटने वाले पहाड़ फिर कभी खड़े न होंगे। ध्यान देने की बात है, सोमवार को ही सर्वोच्च न्यायालय ने उत्तराखंड में भी जंगलों में हो रहे अतिक्रमण के खिलाफ चिंता का इजहार किया है। संदेह नहीं कि अदालतों को पर्यावरण या प्रकृति के संरक्षण के प्रति कड़ा रुख अपनाना पड़ेगा। अब सभी सरकारों को प्रकृति प्रेम को अपनी प्राथमिकता में रखना होगा। साथ ही, जो समाज अरावली की रक्षा के लिए सामने आया है, उसे भी सतत सजगता से काम लेना होगा। प्रकृति सामूहिक जिम्मेदारी है। प्राकृतिक संसाधनों का हमारे पास कोई विकल्प नहीं है, अतः उनके संरक्षण से कोई भी समझौता मानव जीवन के लिए घातक है।