20-02-2026 (Important News Clippings)

Afeias
20 Feb 2026
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Date: 20-02-26

Privacy and transparency

There must be no information asymmetry between state and citizens

Editorial

On Monday, the Supreme Court of India referred a series of petitions challenging the amendment to Section 8(1)(j) of the Right to Information (RTI) Act by Section 44(3) of the Digital Personal Data Protection (DPDP) Act, 2023, to a Constitution Bench, recognising its “constitutional sensitivity”. The Chief Justice of India even remarked that the Court might “have to lay down what is meant by ‘personal information’”. The RTI Act, 2005 was enacted to create an informed citizenry and ensure state accountability, which is vital for a democracy. Over two decades later, the DPDP Act has delivered a body blow by diluting one of its foundational sections. Section 8(1)(j) originally allowed the withholding of personal information only if it had no relationship to any public activity or interest, or if its disclosure resulted in an unwarranted invasion of privacy. Crucially, the section included a “public interest override” as an integral feature of the 2005 Act, permitting disclosure if a Public Information Officer was satisfied that the larger public interest justified it. The DPDP amendment removes this override and prohibits the disclosure of “any information which relates to personal information”, amounting to a blanket ban. This enables rejecting requests concerning officials, procurement records, audit reports or public spending. In its campaign for the RTI, the Internet Freedom Foundation has highlighted a “legitimate uses” paradox here: while Section 7 of the DPDP Act allows the state to process personal data without consent, the RTI amendment prevents citizens from using similar principles to seek transparency from the state. Thus, while the government can monitor the citizen, the citizen is denied the ability to scrutinise the government.

This amendment also creates a severe “chilling effect” on the press. As argued in one of the writ petitions by The Reporters’ Collective, journalists could be classified as “data fiduciaries” under the DPDP Act and its Rules when collecting information for investigative reports. Non-compliance with the Act can attract fines up to ₹250 crore. Such a legal framework threatens reducing journalism to just publishing government releases. It is ironic that the DPDP Act provides exemptions to startups but omits similar protections for journalism. This is in sharp contrast with the European Union’s General Data Protection Regulation (GDPR), which balances privacy and transparency to ensure accountability. The Constitution Bench must refer to the judgment, Central Public Information Officer (2019), which held that personal information should remain private unless disclosure is necessary for the larger public interest. It is known that the RTI has significantly reduced state-citizen (this includes the poor) information asymmetry over two decades. Ensuring its survival is essential for a responsive government.


Date: 20-02-26

अपनी क्षमताओं से चौंकाया है हमारे ‘सर्वम्’ एआई ने

संपादकीय

भारत सरकार द्वारा वित्त, तकनीकी और डेटा के स्तर पर पोषित निजी उपक्रम द्वारा बनाया गया सर्वम् एआई चैटजीपीटी, जेमिनी, क्लॉड से कई मायनों में बेहतर साबित हुआ है। इस एआई को सरकार ने न केवल अपनी टेक्निकल क्षमता के प्रदर्शन के लिए एआई समिट में रखा बल्कि इसे गवर्नेस की रीढ़ भी बनाने जा रही है। हिंग्लिश, स्थानीय भाषाओं और निम्न वर्ग की बोलचाल, देशज जरूरतों, 22 भारतीय भाषाओं और हिंदी-अंग्रेजी बोलने की क्षेत्र – विशेष की शैली पर बुलबुल – वी-3 (टेक्स्ट-टु-स्पीच) मॉडल पर प्रशिक्षित सर्वम् सभी वर्गों के लिए उपयोगी होगा। गांव की महिलाएं भी इसे उसी सहजता से इस्तेमाल कर सकेंगी, जैसे कोई अंग्रेजी बोलने वाला । भारत सरकार ने इस एप को विकसित करने के लिए इस उपक्रम को अपने हजारों जीपीयू का नेटवर्क उपलब्ध कराया और ओडिशा और तमिल सरकार ने ट्रेनिंग के लिए डेटा और रेस्पॉन्स के जरिये आगे बढ़ाया। चूंकि भारत में हिंदी-अंग्रेजी शब्दों का सम्मिलित प्रयोग होता है और उसमें स्थानीय और देशज शब्द भी शामिल होते हैं, लिहाजा विदेशी एआई मॉडल्स के मुकाबले इसे अधिक उपयोगी माना जा रहा है। जबकि कई बार चैटजीपीटी या जेमिनी उन शब्दों को न समझ कर अर्थ का अनर्थ कर देता है। सॉवरेन एआई होने के कारण सरकार मानती है सर्वम् के प्रयोग से देश का डेटा भी लीक नहीं होगा ।


Date: 20-02-26

एआई की मदद से मुकदमों का बोझ क्यों नहीं घटाते हम?

विराग गुप्ता, ( सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत’ के लेखक )

देश में एआई की आंधी चल रही है। यह एक समस्या साबित होगी या विकसित भारत का शंखनाद, इसकी तस्वीर जल्द साफ हो जाएगी। फिलहाल 4 बिंदुओं के जरिए न्यायिक व्यवस्था में एआई से जुड़ी चुनौतियों व विरोधाभासों का मूल्यांकन किया जा सकता है :

1. ई-कोर्ट्स प्रोजेक्ट के तीसरे चरण में एआई और ब्लॉकचेन के इस्तेमाल के लिए सिर्फ 53.57 करोड़ दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में शोध और अनुवाद के लिए कई एआई टूल बनाए गए हैं। लेकिन 99 फीसदी से ज्यादा मुकदमे हाईकोर्ट और जिला अदालतों में लंबित हैं। वहां एआई के माध्यम से पुलिस, अदालत, जेल, अभियोजन और वादकारों को जोड़कर जमानत से जुड़े लाखों मामलों में जल्द फैसला हो सकता है। एआई के इस्तेमाल से चेक बाउंसिंग और ट्रैफिक चालान जैसे करोड़ों मुकदमों के त्वरित निस्तारण से अदालतों में मुकदमों का भारी बोझ कम हो सकता है। अदालतों में एआई टूल के इस्तेमाल से मुकदमों की कार्रवाई की ट्रांसस्क्रिप्ट बने तो तारीख पे तारीख का गोरखधंधा कम हो सकता है। लेकिन आम जनता के लिए जल्द और सही न्याय के अधिकार को सुनिश्चित करने में एआई का व्यावहारिक इस्तेमाल नहीं होना चिंताजनक है।

2. विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस दिनेश माहेश्वरी ने कहा कि फैसले पर पहुंचने की प्रक्रिया में मदद और केस मैनेजमेंट के माध्यम से एआई न्याय की रफ्तार बढ़ा सकता है। लेकिन यह जजों के विवेक और मानवीय भावनाओं की जगह नहीं ले सकता। न्यूजीलैंड में क्राइस्टचर्च की जिला अदालत के जज ने एआई के माध्यम से लिखे माफीनामा को अस्वीकार करते हुए कहा कि उसमें संवेदना और मानवीय भावों का अभाव है। पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस गवई ने कहा था कि चैटजीपीटी के इस्तेमाल से संवैधानिक व्यवस्था के सामने बड़े संकट आ रहे हैं। पिछले महीने बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी एआई से बनाए गए काल्पनिक मुकदमे के उल्लेख पर 50 हजार का जुर्माना लगाया था। अब चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने नए सिरे से इस मर्ज पर चिंता जाहिर की है। वकीलों की ड्राफ्टिंग और जजों के फैसलों में एआई के गलत इस्तेमाल से मुकदमेबाजी को जटिल बनाया जा रहा है।

3. लोकसभा में कानून मंत्री ने दिसंबर 2025 में कहा था कि न्यायपालिका में एआई के इस्तेमाल से एल्गोरिदम बायस, अनुवाद की समस्या और डेटा सुरक्षा जैसे गंभीर मुद्दों पर ई-कमेटी विचार कर रही है। उसके पहले मार्च 2025 में मंत्री ने संसद में कहा था कि नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर के माध्यम से फैसलों का 18 भाषाओं में अनुवाद हो रहा है। पिछले दिसंबर में जनहित याचिका में सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा था कि एआई के गलत इस्तेमाल से न्यायिक प्रशासन में गतिरोध नहीं होना चाहिए। उसके बावजूद सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी को वैध ठहराने के लिए सबूत के तौर पर सरकार ने तीन मिनट के भाषण का आठ मिनट में अनुवाद पेश किया है। जस्टिस अरविंद कुमार और वराले की पीठ ने कहा कि एआई के दौर में अनुवाद के मामलों में कम से कम 98 फीसदी सटीकता जरूरी है। जजों के अनुसार सरकार किसी ऐसी चीज पर भरोसा कर रही है, जो वास्तविक नहीं है।

4. सुनवाई और प्रसारण में वॉट्सएप और जूम जैसे एप्स का इस्तेमाल होना गैरकानूनी होने के साथ न्यायिक व्यवस्था में विदेशी हस्तक्षेप भी है। गृह मंत्रालय के नवीनतम आदेश के अनुसार वर्गीकृत जानकारी को मीडिया से साझा करने वाले अधिकारियों के खिलाफ गोपनीयता कानून के तहत सख्त आपराधिक कार्रवाई होगी। लेकिन डिजिटल और एआई कंपनियों के साथ जनता और सरकार के डेटा को गैरकानूनी और संगठित तरीके से साझा करने के खिलाफ कारवाई नहीं हो रही। निजता के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट के नौ साल पुराने फैसले को लागू करवाने के बजाय ठंडे बस्ते में कैद डेटा सुरक्षा कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अदालतों में सुनवाई होना एक अलग ही प्रहसन है। एआई के माध्यम से ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ का लक्ष्य सधे तो अच्छा है। लेकिन एआई क्रांति की आड़ में विदेशी कंपनियों का आधिपत्य हो गया तो संविधान की सार्वभौमिकता और आत्मनिर्भर भारत के सामने खतरों की सुनामी आ सकती है।

अदालतों में एआई टूल के इस्तेमाल से मुकदमों की कार्रवाई की ट्रांसस्क्रिप्ट बने तो तारीख पे तारीख का गोरखधंधा कम हो सकता है। लेकिन आम जनता के हित में एआई का व्यावहारिक इस्तेमाल नहीं किया जाना चिंताजनक है।


Date: 20-02-26

बोझ बनी मुफ्त की संस्कृति

संपादकीय

यह पहली बार नहीं, जब सुप्रीम कोर्ट ने मुफ्त की रेवड़ियां कही जाने वाली लोकलुभावन योजनाओं पर अपनी आपत्ति और चिंता प्रकट की हो। वह कई बार यह कह चुका है कि मुफ्त की संस्कृति आर्थिक विकास में बाधा है। गत दिवस भी उसने सरकारों की ओर से मुफ्त सुविधाएं और वस्तुएं देने के चलन पर यह प्रश्न किया कि यदि वे इसी तरह फ्री अनाज, बिजली, साइकिल आदि देते रहे तो विकास के लिए धन कहां से आएगा?

उसने इस पर भी बल दिया कि सरकारें मुफ्त की सुविधाएं और सामग्री के स्थान पर रोजगार दें, लेकिन इसमें संदेह है कि इस पर ध्यान दिया जाएगा, क्योंकि राजनीतिक दल यह मान चुके हैं कि लोकलुभावन योजनाएं चुनाव जीतने की गारंटी बन गई हैं। इसका परिणाम यह है कि चुनाव आते ही सत्तारूढ़ दल और सत्ता की चाह रखने वाले विपक्षी दल मुफ्त की योजनाओं का पिटारा खोलने में जुट जाते हैं।

अब तो वे सीधे धन देने की भी घोषणा करने लगे हैं। यह तब है, जब अधिकांश राज्य घाटे में हैं। विडंबना यह है कि वे बुनियादी ढांचे के विकास के लिए धन की कमी का रोना रोते हैं और फिर भी मुफ्त की संस्कृति को बढ़ावा देते हैं। साफ है कि वे अपनी आर्थिक स्थिति की अनदेखी करते हैं।

इस पर आश्चर्य नहीं कि पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव करीब आते ही संबंधित राज्य सरकारों की ओर से मुफ्त की योजनाओं की घोषणा की जाने लगी है। तमिलनाडु सरकार ने हर किसी को फ्री बिजली देने की पेशकश कर दी है। इसके खिलाफ दायर याचिका पर ही सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है।

यह उल्लेखनीय है कि यह याचिका तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कार्पोरेशन लिमिटेड ने दायर की है। इसके पहले भी ऐसी ही याचिकाओं पर सुनवाई हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई ठोस फैसला नहीं आया है। निःसंदेह कल्याणकारी राज्य का यह दायित्व बनता है कि वह निर्धन-वंचित वर्गों के आर्थिक-सामाजिक उत्थान के लिए विशेष उपाय करे और उन्हें कुछ मुफ्त या रियायती सुविधाएं उपलब्ध कराए।

ये सुविधाएं ऐसी होनी चाहिए, जो लोगों को अपने पैरों पर खड़ा कर सकें और उन्हें अपने स्तर पर अपनी आय बढ़ाने के लिए प्रेरित करें। बीते कुछ समय से तो वोट हासिल करने के इरादे से ऐसी सुविधाएं देने की पहल होने लगी है। यह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव का उपहास और संसाधनों का दुरुपयोग भी है।

जब सक्षम लोगों को भी मुफ्त की योजनाओं का लाभ दिया जाता है तो लोग एक तरह से काम न करने के आदी बनते हैं और वे शासन पर बोझ बनते हैं। अच्छा हो कि सुप्रीम कोर्ट ऐसी कोई व्यवस्था बनाए, जिससे गरीब एवं अक्षम लोगों को मुफ्त की सुविधाएं देने का काम राज्य के आर्थिक संसाधनों के आधार पर हो, न कि मनमाने तरीके से चुनाव जीतने के लिए।


Date: 20-02-26

न्याय की संवेदना

संपादकीय

महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों की सुनवाई और फैसले की दिशा रख बात पर निर्भर करती है कि न्यायालय में पीड़िता के पक्ष पर कितनी संजीदगी के साथ गौर किया गया। खासतौर पर हमारे देश में बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के मामले में न केवल इस अपराध की प्रकृति, बल्कि उसका पीड़िता के मन-मस्तिष्क पर पढ़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखते हुए बेहद संवेदनशील रुख अपनाने की जरूरत होती है, लेकिन कई बार इन तकाजों को प्राथमिक नहीं माना जाता। मगर अब सर्वोच्च न्यायालय ने इस संदर्भ में एक जरूरी मानक सामने रखा है कि निचली अदालतों में बलात्कार के मामलों पर सुनवाई करते हुए कितना संवेदनशील होने की जरूरत है। गौरतलब है कि पिछले वर्ष मार्च में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने फैसले में एक नाबालिग लड़की पर यौन हरादे से शारीरिक बलप्रयोग को बलात्कार के प्रवास का अपराध नहीं माना और आरोपों को हल्का करार दिया। उस समय भी अदालत के रुख और उसकी टिप्पणियों पर तीखे सवाल उठे थे मगर अब सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को रह कर दिया, उससे एक बार फिर महिलाओं की गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायिक व्यवस्था के प्रति भरोसा मजबूत हुआ है। दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संबंधित मामले में बलात्कार से संबंधित कानून के प्रावधानों की विचित्र व्याख्या करके आरोपियों के प्रति जिस तरह नरम रुख अख्तियार किया था, वह अपने आप में न्याय की प्रक्रिया पर एक गंभीर सवाल था। खासतौर पर एक नाबालिग लड़की पर तीन युवकों के शारीरिक बलप्रयोग, बदतमीजी और उसकी गरिमा को चोट पहुंचाने की जिस स्तर पर अनदेखी की गई और आरोप की गंभीरता को कम किया गया, उस पर खुद नीम कोर्ट ने भी गहरी नाराजगी जताई थी। बीते वर्ष 25 मार्च को शीर्ष अदालत की पीठ ने साफ शब्दों में कहा था कि यह फैसला पूरी तरह से असंवेदनशील और अमानवीय नजरिए को दिखाता है, इसलिए इस पर रोक जरूरी है। अब उसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट को फटकार लगाई और उसके विवादित फैसले को पलटते हुए नाबालिग लड़की से की गई हरकत को ‘बलात्कार का प्रयास’ करार दिया। अब यह मुकदमा गंभीर अपराध और पाक्से अधिनियम के सख्त प्रावधानों के तहत चलेगा।

निश्चित रूप से सुप्रीम कोर्ट का यह रुख महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों की रोकथाम और खासतौर पर अदालतों में बलात्कार जैसे गंभीर अपराध की सुनवाई के क्रम में कभी-कभार बरती जाने वाली असंवेदनशीलता के महेनजर बेहद अहम है। सवाल है कि ऐसे मामलों में कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करते हुए अपराध की प्रकृति, पीड़िता की स्थिति और सामाजिक हकीकतों को ध्यान में रखना जरूरी क्यों नहीं समझा जाता! जब भी अदालतों की ओर से ऐसे मामलों में जरूरी संवेदनशीलता के तकाजों की अनदेखी की जाती है तब यौन अपराधों के विरुद्ध महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के प्रवास कमजोर होते हैं। शायद इन्हीं वजहों से सुप्रीम कोर्ट ने अब दीन अपराधों और अन्य संवेदनशील मामलों के संदर्भ में न्यायाधीशों के दृष्टिकोण और न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता तथा करुणा पैदा करने के लिए दिशानिर्देश तैयार करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी की एक समिति गठित करने को कहा है। यह इसलिए भी जरूरी पहल है कि न्याय की उम्मीद तभी पूरी हो सकती है जब न्यायाधीशों के भीतर पीड़ित की वास्तविक स्थितियों के प्रति जरूरी संवेदनशीलता, करुणा और समझ की भावना हो।


Date: 20-02-26

मुफ्त योजना पर चोट

संपादकीय

सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न राज्यों में राजनीतिक दलों द्वारा अपनाई जा रही मुफ्त योजनाओं की जो कड़ी आलोचना की है, वह स्वागतयोग्य है । न्यायालय ने साफ कहा है ऐसी योजनाओं से विकास में बाधा आती है, अतः ऐसी नीति पर पुनर्विचार होना चाहिए। न्यायालय की यह टिप्पणी तमिलनाडु से जुड़े एक मामले में सामने आई है। कुल मामला यह है कि तमिलनाडु की सरकार वहां सभी को मुफ्त बिजली देना चाहती है। फिलहाल वहां प्रतिमाह 100 यूनिट बिजली मुफ्त है और नई योजना अगर लागू हुई, तो यह राज्य पूरी तरह मुफ्त बिजली की दिशा में कदम बढ़ा देगा। गरीबों को मुफ्त बिजली देने की बात समझ में आती है, मगर सक्षम लोगों को भी मुफ्त बिजली देने का क्या मतलब है? न्यायालय ने इसी दलील के साथ मुफ्त योजनाओं का विरोध करते हुए बिल्कुल सही कहा है कि ऐसी योजनाओं के जरिये संसाधन बांटने के बजाय, सरकारों को ऐसी सुनियोजित नीतियां लागू करनी चाहिए, जो लोगों के जीवन- स्तर को बेहतर बनाने के उपाय करें, बेरोजगारी दूर हो। न्यायालय की फटकार वाजिब है, अगर हर चीज मुफ्त मिलने लगेगी, तो काम करना कौन चाहेगा? क्या कार्य संस्कृति खराब नहीं हो जाएगी?

प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची व न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली का विश्लेषण प्रशंसनीय है कि देश के अधिकांश राज्य राजस्व घाटे में है और फिर भी वे विकास की अनदेखी करते हुए ऐसी मुफ्त योजनाएं पेश करते रहते हैं। सवाल यह भी है कि सरकारें चुनाव से ठीक पहले क्यों मुफ्त योजनाएं लाती हैं? मुफ्त योजनाओं के बजाय सरकारों को विकास पर अपना खर्च बढ़ाना चाहिए। अगर समाज में मुफ्तखोरी बढ़ेगी, तो कमाएगा कौन ? अगर नहीं कमाएगा, तो टैक्स कौन चुकाएगा? टैक्स नहीं चुकाएगा, तो सरकारों के पास राजस्व कैसे आएगा? अगर सरकारों के पास राजस्व नहीं आएगा, तो गरीबों की मदद कैसे होगी या देश का विकास कैसे होगा ? हालांकि, यह आज की राजनीति का एक स्थापित पहलू है कि हर पार्टी मुफ्त योजनाओं से सिवासी फायदा उठाना चाहती है। एक दुखद राजनीतिक धारणा यह भी है कि विकास से वोट नहीं मिलते हैं और असंख्य मतदाता अपना तात्कालिक लाभ देखते हैं। ऐसे में, सियासी दलों की मदद भी तात्कालिक होने लगी है। बहरहाल, एक समस्या और है। अब तमिलनाडु में वह सियासत होगी कि तमिलों के हित में आ रही योजना को रोका जा रहा है, जबकि बिहार में जब मुफ्त रेवड़ियां बंट रही थीं, तब नहीं रोका गया। क्या ऐसी सियासत वा उसकी मुफ्त योजनाओं पर कोई लगाम लगा सकता है ?

वैसे, भारत में कोई पहली बार नहीं है, जब मुफ्त योजनाओं पर आपत्ति जताई गई है। अनेक नेता ऐसी मुफ्त योजनाओं पर आपत्ति जता चुके हैं। हालांकि, ऐसे नेता भी हैं, जो इन योजनाओं का बचाव करते हैं। द्रमुक के नेता दयानिधि मारन ने ही कहा है कि ये योजनाएं खैरात नहीं, सशक्तीकरण का प्रयास हैं। न्यायालय भी एक हद तक यही मानता है। उसे आपत्ति केवल इस बात पर है कि मुफ्त का लाभ सक्षम लोगों को क्यों मिले ? न्यायालय का तर्क ठीक है, पर आगे की राह कैसी है? क्या न्यायालय ऐसा कोई दिशा-निर्देश जारी कर सकता है, जिससे मुफ्त योजनाओं की हदें तय हो जाएं? क्या न्यायालय चुनाव से पहले किसी राजनीतिक पार्टी को मुफ्त योजनाओं की घोषणा या क्रियान्वयन से रोक सकता है? फिलहाल, यह सिर्फ एक उम्मीद भर है एक दिन आएगा, जब मुफ्त योजनाओं का दुरुपयोग रुक जाएगा।


Date: 20-02-26

देशों की आर्थिक दशा बदलती एआई

अरुण कुमार, ( वरिष्ठ अर्थशास्त्री )

नई दिल्ली में चल रहा ‘एआई इम्पैक्ट समिट’ अब अपने अंतिम चरण में है, लेकिन इसमें अर्थव्यवस्था पर एआई के बढ़ते प्रभाव पर हुई चर्चाएं अहम है। दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं अब इस नई तकनीक से प्रभावित होने लगी हैं। यह कोई छोटा-मोटा बदलाव नहीं है, क्योंकि एआई एक क्रांतिकारी तकनीक है।

इससे पहले जो भी तकनीकी बदलाव हुए हैं, उन्होंने कमोबेश शारीरिक श्रम पर असर डाला था। उनसे हमारे भौतिक कामकाज प्रभावित हुए थे, पर एआई कुशल कामगारों को प्रभावित कर रही है। एआई समिट में यह भी चर्चा हुई कि इससे लोगों की उत्पादकता कितनी बढ़ रही है और उनके काम करने के तरीके कितने बदल रहे हैं। यह बदलाव काफी तेजी से हो रहा है, क्योंकि एआई में निवेश काफी ज्यादा हो रहा है। मसलन, पिछले साल जनवरी में दूसरी बार राष्ट्रपति का पद संभालते ही डोनाल्ड ट्रंप ने एआई के बुनियादी ढांचे को आर्थिक मदद मुहैया कराने के लिए लगभग 500 अरब डॉलर तक के निवेश की घोषणा की। वहां ‘मेटा’ जैसी बड़ी कंपनियां भी अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं। चीन भी इस तरह के कामों में पीछे नहीं है, क्योंकि माना यही जा रहा है कि जो देश एआई में सर्वोच्चता हासिल कर लेगा, वह विश्व व्यवस्था पर अपना नियंत्रण बना लेगा।

यही वजह है किएआई को ‘पब्लिक गुड्स’ के रूप में विकसित करने की वकालत की जाती है, ताकि यह सबको सुलभ हो और सभी इसका इस्तेमाल कर सकें। यह मांग इसलिए भी हो रही है, क्योंकि एआई से अर्थव्यवस्था को काफी ज्यादा फायदा मिल सकता है। यह किसी उद्योग के लिए जरूरी शोध कर सकती है। उपलब्ध सूचनाओं के आधारपर तत्काल बता सकती है कि कहाँ उसके लिए बेहतर कच्चा माल उपलब्ध है और कहाँ से उसे लाना तुलनात्मक रूप से आसान होगा। इसी तरह, मार्केटिंग की रिपोर्ट तैयार करने में भी एआई से काफी मदद मिलती है। कहां और किस क्षेत्र में कैसी मांग है, इससे यह पता करना आसान हो जाता है। यानी, सूचनाएं उपलब्ध रहने से तमाम उद्यमों की क्षमताएं बढ़ जाएंगी। इस तरह उनकी उत्पादन लागत कम हो सकती है।

इसी तरह, नए-नए शोध में एआई से फायदा मिल सकता है। मिसाल के लिए, अब प्रोटीन की संरचना समझने के लिए ‘अल्फाफोल्ड’ सॉफ्टवेयर की मदद ली जाने लगी है। यह प्रोटीन की थ्रीडी संरचना बना देती है वह भी थोक के भाव से पहले प्रोटीन की एक संरचना के विश्लेषण के लिए एक शोध कार्य होते थे, लेकिन ‘अल्फाफोल्ड’ हजार शोध के बराबर काम करने में सक्षम है। इससे दवाओं के निर्माण में फायदा होता है। इस जैसे तमाम पेशेवर कामों में अब एआई की भागीदारी संभव होगी। मुमकिन है कि आने वाले दिनों में हम किसी डॉक्टर या सीए के इंटर्न के रूप में किसी एआई मॉडल को सेवा देते देखें।

एआई भाषायी बाधाओं को दूर करके अर्थव्यवस्था को मदद कर सकती है। अभी सुदूर देशों के साथ संपर्क साधना इसलिए भी मुश्किल हो जाता है, क्योंकि उद्यमी भाषायी तौर पर कुशल नहीं होते, लेकिन एआई द्वारा आसानीसे मूल भाषा में अनुवादकरके सामग्री उपलब्ध कराने में उन्हें मदद मिल सकती है। इससे नई-नई चीजों के ईजाद में काफी सहायता मिलेगी और कामकाज में तेजी आ सकेगी।

जीवन स्तर की गुणवत्ता में एआई द्वारा सुधार लाना आर्थिक नजरिये से सुखद माना जाता है। एआई पेशेवर लोगों की क्षमता बढ़ाने में मददगार होगी। इससे उनके जीवन पर सकारात्मक असर पड़ेगा और सूचनाएं न सिर्फ काफी तेजी से आ सकेंगी, बल्कि उनका गहन विश्लेषण भी बेहतर तरीके से हो सकेगा। इससे कर्मियों की क्षमताओं में इजाफा होगा। वित्तीय बाजार पर भी इसका खासा असर पड़ेगा और वित्तीय योजनाएं बनाने में एआई पेशेवरों की मदद कर सकेगी।

हालांकि, इसकी राह में कुछ चुनौतियां भी हैं, जिस पर हमें कहीं अधिक संजीदगी से काम करना होगा। जैसे, सन माइक्रोसिस्टम्स के संस्थापक विनोद खोसला ने एआई समिट में बताया कि एआई की वजह से पारंपरिक रोजगार प्रभावित हो सकते हैं और 2030 तक कॉल सेंटर व बीपीओ जैसे कामों में लोगों की जरूरतें खत्म हो सकती हैं। जाहिर है, अब काम करने के तरीके बदल रहे हैं और उसी बदलाव के अनुसार हमें लोगों की जरूरतें भी पूरी करनी होंगी। यह इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि भारत में महत्त्वाकांक्षी नौजवानों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है।

एआई से कुछ क्षेत्रों में नए रोजगार का सृजन भी होगा, लेकिन अर्थव्यवस्था में शुरुआती दौर में मांग घट सकती है, जिसके लिए हमें अपनी तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। अच्छी शिक्षा और कौशल जिनके पास होगा, वे आगे बढ़ जाएंगे । यही कारण है किए आई में अमेरिका और चीन की तेजी को बाकी दुनिया के लिए खतरा माना जा रहा है। बताया जा रहा है किइससे देशों के बीचठीक उसी तरह असमानता बढ़सकती है, जिस तरह समाज में कुशल और अकुशल लोगों के बीच गैर-बराबरी है। आशंकाएं इस बात की भी हैं किए आई सक्षम देश नव- साम्राज्यवादी ताकत बन सकती हैं और वे उन मुल्कों पदबाव बना सकती हैं, जो एआई अपनाने में कमजोर रहेंगी। इससे दुनिया में आर्थिक विषमता का एक नया चक्र शुरू हो सकता है।

अच्छी बात है कि एआई से अधिक से अधिक फायदा उठाने के लिए भारत जैसे देश लगातार कामकर रहे हैं। हमें कुछ क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना होगा, जिसमें सबसे पहला है, शोध कार्यों के लिए माहौल सुधारना। इसके लिए उच्च शिक्षण व शोध संस्थानों को पहल करनी चाहिए और शोध-संबंधी माहौल की जो कमियां हैं, उनकोदूरकरने के प्रयासकरने चाहिए। सरकारों को भी शोध व विकास पर अपने खर्च बढ़ाने होंगे ।

दूसरा काम शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाना है। बेशक, नई शिक्षा नीति में यह प्रयास किया गया है कि छोटे-छोटे बच्चे भी नई-नई तकनीक को समझ सकें, लेकिन कक्षा के मुताबिक उनकी मानसिक क्षमता विकसित करने के लिए शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार जरूरी है। ‘कैसे हमें सीखना चाहिए यह सीख हमें स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक के बच्चों को सिखानी होगी। अच्छा होगा, भारत यह पहल करे कि ‘ग्लोबल साउथ’ के देश आपस में मिलकर एआई पर काम करें। इससे एआई का हर मोर्चे पर अधिकतम फायदा उठाया जा सकेगा।