20-01-2026 (Important News Clippings)

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20 Jan 2026
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Date: 20-01-26

क्या प्रदूषण घटाना हमारे लिए इतनी बड़ी चुनौती है?

संपादकीय

पहले पक्षी की बीट और अब कचरा गिरने से दिल्ली में चल रहे अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन सेमीफाइनल को बीच में रोकना पड़ा। कई विदेशी खिलाड़ी देश की राजधानी में प्रदूषण से सांस लेने में दिक्कत के कारण मैच से नाम वापस ले रहे हैं या शिकायत कर रहे हैं। इन्हें झुठलाना शुतुरमुर्गी बचाव होगा । सन् 2010 में भी कॉमनवेल्थ खेलों के दौरान ऐसी आवाजें उठी थीं, पर हमने नजरअंदाज किया। नतीजतन, पिछले 10-15 वर्षों में पीएम 2.5 का एक्यूआई (वायु गुणवत्ता सूचकांक) कम करने में दुनिया का औसत 10% रहा, चीन का 32%, लेकिन भारत का लगभग वहीं का वहीं बना हुआ है। दुनिया के जिन दस शहरों ने सबसे तेजी से प्रदूषण कम किया, उनमें से नौ चीन के हैं। भारत के राजनेता- विचारक चीन और सिंगापुर के विकास को कठोर प्रजातंत्र या अधिनायकवादी राज्य की देन कहकर बचने की कोशिश करते हैं। लेकिन क्या दक्षिण कोरिया या अन्य सक्षम दक्षिण एशियाई देश भी इसी श्रेणी में आते हैं? क्या प्रदूषण घटाना दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए इतनी बड़ी चुनौती होनी चाहिए? सरकार की चिंता तो यह होनी चाहिए कि इन 12 वर्षों में पुणे, सूरत, हैदराबाद, मुंबई, अहमदबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी एक्यूआई काफी तेजी से बढ़ा है और ये शहर विदेशी कंपनियों के हब हैं व जीडीपी में भारी योगदान देते हैं।


Date: 20-01-26

ग्रीनलैंड में ट्रंप की दिलचस्पी के पुख्ता सामरिक कारण

लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन, ( कश्मीर कोर के पूर्व कमांडर )

स्कूल के दिनों में भूगोल मेरे सबसे कम पसंदीदा विषयों में शामिल था। ऐसे में आर्कटिक सर्कल के पास फैली उस विशाल, फीकी भू-आकृति ग्रीनलैंड पर मैंने शायद ही कभी ध्यान दिया था। ‘रेयर अर्थ्स’ उस समय हमारी शब्दावली का हिस्सा नहीं थे और न ही तब मुझमें कोई सैन्य या रणनीतिक चेतना थी, जो संघर्ष के क्षेत्र से दूर के किसी भूभाग के सामरिक मूल्य को समझ सके। यह कल्पना कि बर्फ से ढका कोई दूरस्थ भू-भाग किसी दिन वैश्विक रणनीतिक महत्व हासिल कर सकता है, उस समय तो मुझे अविश्वसनीय ही लगती। लेकिन हाल ही में ग्रीनलैंड बार-बार अंतरराष्ट्रीय विमर्श में उभरा है- मुख्यतः ट्रम्प के कारण।

इस पर शुरुआती वैश्विक प्रतिक्रिया अविश्वास की थी। भला अमेरिका एक ऐसे द्वीप में दिलचस्पी क्यों लेने लेगा, जहां मुश्किल से 57,000 लोग रहते हैं और जिसका अधिकांश हिस्सा बर्फ से ढका है? विश्लेषकीय टिप्पणियां रेयर अर्थ्स, खनिजों और भविष्य की व्यावसायिक संभावनाओं पर केंद्रित रहीं। यकीनन, ये तमाम पहलू महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ये मूल मुद्दा नहीं हैं। ग्रीनलैंड के पुनः उभार को समझने के लिए एक दूसरे आयाम को देखना होगा।

ग्रीनलैंड का महत्व उसकी लोकेशन में निहित है। यह यूरेशिया और उत्तरी अमेरिका के बीच सबसे छोटे हवाई और मिसाइल मार्गों पर स्थित है। शीत युद्ध के दौरान, ग्रीनलैंड-आइसलैंड-यूके गैप नाटो की समुद्री रणनीति का केंद्रीय तत्व था, जो अटलांटिक में प्रवेश करने वाली सोवियत पनडुब्बियों की निगरानी को संभव बनाता था। दशकों तक आर्कटिक एक जमे हुए बफर की तरह रहा- दूरस्थ, दुर्गम और लंबे समय तक चलने वाली प्रतिस्पर्धा से लगभग अप्रभावित।

लेकिन अब जलवायु परिवर्तन आर्कटिक को एक सक्रिय क्षेत्र में बदल रहा है। पिघलती बर्फ नए समुद्री मार्ग खोल रही है। साथ ही, हाइपरसोनिक हथियारों, लंबी दूरी के सटीक प्रहार, अंतरिक्ष-आधारित सेंसर, मिसाइल रक्षा और समुद्रगत प्रणालियों में प्रगति दूरी को लगातार समेट रही है। ऐसे में ग्रीनलैंड हाशिये से खिसककर अग्रिम रणनीतिक क्षेत्र में बदल जाता है। जो दूरी कभी सुरक्षा देती थी, वह सिमट रही है; प्रतिक्रिया का समय घट रहा है; और अमेरिकी मुख्यभूमि के लिए चेतावनी का अंतराल सिकुड़ता जा रहा है।

अमेरिका ने ऐतिहासिक रूप से बहुत कम प्रत्यक्ष खतरों का सामना किया है। पर्ल हार्बर ने उसके मेनलैंड को निशाना नहीं बनाया था और 9/11 एक अपवाद था। अमेरिका की पारम्परिक प्राथमिकता यही रही है कि वह खतरों को अपनी सीमाओं से दूर रखने के लिए विदेशों में संलग्न रहे। महाशक्तियों की होड़ अब नाटकीय आक्रमणों से कम और विरोधियों को रणनीतिक बढ़त हासिल करने से रोकने से अधिक जुड़ी है।

ऐसे रणनीतिक क्षेत्र जो कम आबादी वाले हों, राजनीतिक रूप से सीमित हों या पर्याप्त रूप से सुरक्षित न हों, स्वाभाविक रूप से आकर्षक बन जाते हैं- और केवल सैनिक तैनाती भर के लिए नहीं। ऐसे में ग्रीनलैंड को रणनीतिक रूप से कमजोर छोड़ देना अमेरिका के लिए जोखिम बढ़ाने वाला है। ग्रीनलैंड अमेरिका तक की दूरी घटाता है और यही उसकी चिंता का कारण है।

भारत के उदाहरण से समझें। सियाचिन ग्लेशियर का कोई विशेष आर्थिक मूल्य नहीं है, उस पर भारी लॉजिस्टिक लागत भी आती है और वह अनुभवी सैनिकों के लिए भी अत्यंत दुर्गम है। इसके बावजूद भारत दशकों से सियाचिन पर कायम है। क्योंकि उसे खाली करने का अर्थ होगा पाकिस्तान को ऐसे भू-भाग पर कब्जा करने देना, जो भले ही आज सीमांत लगे, लेकिन भविष्य में उपयोग में लाया जा सकता है।

एक बार ऐसा इलाका हाथ से निकल जाए तो उसे वापस हासिल करना कई गुना महंगा पड़ता है। इसलिए सियाचिन पर बने रहने का फैसला तात्कालिक सामरिक लाभ से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक दूरदृष्टि से उपजा है। अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड भी कुछ ऐसा ही है। रूस ने आर्कटिक के बड़े हिस्सों का दोबारा सैन्यीकरण कर लिया है। उसने पुराने ठिकानों को फिर से सक्रिय किया है और अपनी उत्तरी सैन्य क्षमताओं का विस्तार किया है।

चीन ने भी स्वयं को नियर-आर्कटिक राष्ट्र घोषित करते हुए शोध केंद्रों, निवेश और कूटनीति के जरिये इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ाई है। ऐसे में अगर अमेरिका कुछ ना करता तो यह हैरानी की बात होती। ट्रम्प की शैली चाहे जैसी हो, लेकिन डेनमार्क को लेकर उनकी रणनीतिक प्रेरणा तर्कहीन नहीं है। तेजी से सैन्यीकृत हो रहे आर्कटिक के मद्देनजर कोई भी अमेरिकी सरकार अंततः ग्रीनलैंड के महत्व का पुनर्मूल्यांकन करने को विवश ही होती।

आर्कटिक को अब हमें उभरते हुए रणनीतिक महत्व के नए रंगमंच के रूप में स्वीकार लेना चाहिए। भूगोल नहीं बदला है, लेकिन उसके मायने बदल गए हैं। मजबूत राष्ट्र अपनी कमजोरियां उजागर होने से पहले कार्रवाई करते हैं।


Date: 20-01-26

नैरेटिव गढ़ने में एआई माहिर है, हमें सावधान रहना होगा

रिचर्ड के. शेरविन, (  न्यूयॉर्क लॉ स्कूल में प्रोफेसर इमेरिटस )

आठ वर्ष पहले व्लादिमीर पुतिन ने कहा था कि जो भी एआई में महारत हासिल करेगा, वही दुनिया पर राज करेगा। तब से इस तकनीक में निवेश विस्फोटक रूप से बढ़ा है। अकेले 2025 में ही माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, अमेजन और मेटा ने एआई पर 320 अरब डॉलर से अधिक खर्च किए। एआई में वर्चस्व की यह दौड़ तीखी प्रतिक्रिया भी पैदा कर रही है।

आशंकाएं बढ़ रही हैं कि बुद्धिमान मशीनें सुरक्षा के नए जोखिम पैदा करेंगी- जैसे आतंकवादियों, हैकरों और अन्य बुरे तत्वों को सशक्त करना। और यदि एआई मानव नियंत्रण से पूरी तरह बाहर निकल जाए तो? तब क्या वह अपने वर्चस्व की तलाश में मनुष्यों को पराजित कर सकती है? लेकिन इससे भी अधिक तात्कालिक खतरा मौजूद है।

लगातार अधिक शक्तिशाली लेकिन अपारदर्शी एआई एल्गोरिदम हमारी स्वतंत्रता के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। जितना अधिक हम सोचने का काम मशीनों को सौंपते जाएंगे, उतनी ही कम हमारी क्षमता चुनौतियों से निपटने की रह जाएगी। हमारी स्वतंत्रता पर यह खतरा दोहरा है। एक ओर रूस और चीन जैसे निरंकुश शासन पहले ही एआई का उपयोग व्यापक पैमाने पर लोगों की निगरानी और पहले से कहीं अधिक परिष्कृत तौर-तरीकों से उनके दमन के लिए कर रहे हैं।

वे न केवल असहमति को कुचल रहे हैं, बल्कि सूचना के किसी भी ऐसे स्रोत को निशाना बना रहे हैं जो असंतोष को जन्म दे सकता है। दूसरी ओर, निजी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां- जिनके पास अपार पूंजी और डेटा तक पहुंच है- अपने उत्पादों और प्रणालियों में एआई को एकीकृत करके मानवीय हस्तक्षेप को कमजोर कर रही हैं।

उनका इकलौता मकसद अपने मुनाफे को अधिकतम करना है। सोशल मीडिया के गंभीर सामाजिक, राजनीतिक और मानसिक-स्वास्थ्य प्रभाव तो हम पहले ही देख चुके हैं। एआई उदार लोकतंत्रों के सामने भी अस्तित्वगत प्रश्न खड़ा करती है। यदि यह तकनीक निजी क्षेत्र के नियंत्रण में ही बनी रहती है तो जनता की, जनता के द्वारा और जनता के लिए सरकार कैसे बच सकेगी?

लोगों को समझने की जरूरत है कि स्वतंत्रता का सार्थक प्रयोग इस बात पर निर्भर करता है कि मानवीय-प्रसंगों की रक्षा की जाए। उन्हें उन मशीनों के अतिक्रमण से बचाया जाए, जिन्हें सोचने और महसूस करने की हमारी प्रक्रियाओं को इस तरह ढालने के लिए बनाया गया है कि इसका लाभ कॉर्पोरेट हितों को हो।

हालिया एक अध्ययन- जिसमें लगभग 77,000 लोगों ने राजनीतिक मुद्दों पर एआई मॉडलों के साथ संवाद किया- में पाया गया कि लोगों को किसी नैरेटिव की तरफ झुकाने के मकसद से डिजाइन किए गए चैटबॉट उन मॉडलों की तुलना में- जिन्हें इस तरह से प्रशिक्षित नहीं किया गया था- 51% तक अधिक प्रभावी थे।

एक अन्य हालिया अध्ययन (कनाडा और पोलैंड में) में हर दस में से एक मतदाता ने शोधकर्ताओं को बताया कि एआई चैटबॉट्स के साथ हुई बातचीत ने उन्हें किसी विशेष उम्मीदवार का समर्थन न करने की स्थिति से समर्थन करने की ओर मोड़ दिया। फ्री-स्पीच का पारम्परिक सिद्धांत भी उस डिजिटल बाजार के लिए उपयुक्त नहीं रह गया है, जो सर्वव्यापी एल्गोरिदमों द्वारा आकार ले रहा है- एल्गोरिदम जो चुपचाप एआई इन्फ्लुएंसर की तरह काम करते हैं।

ऑनलाइन सेवाओं के यूजर्स को लग सकता है कि उन्हें वही दिखाया जा रहा है जो वे चाहते हैं, लेकिन जिन व्यापक तरीकों से एल्गोरिदम यूजर्स को उस दिशा में मोड़ देते हैं, जहां कॉर्पोरेट प्लेटफॉर्म उन्हें ले जाना चाहता हैं, वे गोपनीय बने रहते हैं। फ्री-स्पीच सिद्धांत की ऐसी ही विकृति 1996 के कम्युनिकेशंस डिसेंसी एक्ट की धारा 230 में भी दिखती है, जो डिजिटल प्लेटफॉर्म मालिकों को ऑनलाइन सामग्री से होने वाले नुकसान के लिए जिम्मेदारी से बचाती है।

यह कॉर्पोरेट-फ्रेंडली नीति मानकर चलती है कि ऐसी सारी सामग्री यूजर-जनरेटेड होती है- यानी लोग इनके माध्यम से बस विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं और अपनी पसंद जाहिर कर रहे हैं। लेकिन मेटा, टिकटॉक, एक्स और अन्य प्लेटफॉर्म किसी तटस्थ मंच की तरह काम नहीं करते। उनका अस्तित्व ही इस धारणा पर टिका है कि यूजर्स के अटेंशन से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना ही फायदे का सौदा है।

कॉर्पोरेट्स अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए एआई को इस तरह तैनात कर रहे हैं कि यूजर्स अधिक से अधिक ऑनलाइन समय बिताएं- ताकि वे टारगेटेड विज्ञापनों के ज्यादा संपर्क में रहें। इसके लिए खास तरह की जानकारी परोसने से भी उन्हें हर्ज नहीं।


Date: 20-01-26

संघीय ढांचे के समक्ष नए खतरे

डॉ. जगदीप सिंह, ( लेखक राजनीतिक विज्ञान के प्रोफेसर हैं )

भारतीय संघीय ढांचा संविधान की आधारशिला है, जिसमें केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन सातवीं अनुसूची के माध्यम से किया गया है। संघीय ढांचा सहकारी और प्रतिस्पर्धी, दोनों रूपों में कार्य करता है। इसमें राज्य कानून-व्यवस्था जैसे विषयों पर मुख्य अधिकार रखते हैं, जबकि मनी लांड्रिंग जैसे आर्थिक अपराध समवर्ती सूची में आते हैं, जिसके तहत प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) जैसी केंद्रीय एजेंसियां स्वतंत्र जांच कर सकती हैं। हाल में पश्चिम बंगाल और झारखंड में हुईं घटनाएं इस संघीय ढांचे की मजबूती पर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं। इन घटनाओं से स्पष्ट है कि संघीय ढांचा अब केवल संवैधानिक प्रविधानों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति और संस्थागत संघर्ष से प्रभावित हो रहा है।

बंगाल में ईडी ने कोयला तस्करी और मनी लांड्रिंग के एक पुराने मामले में राजनीतिक परामर्शदाता फर्म आइ-पैक के कोलकाता स्थित कार्यालय और उसके निदेशक प्रतीक जैन के आवास पर छापेमारी की। यह कार्रवाई तृणमूल कांग्रेस से जुड़ी होने के कारण राजनीतिक रूप से संवेदनशील थी, क्योंकि आइ-पैक पार्टी की चुनावी रणनीति तैयार करने में भी सहयोगी रहा है। छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं घटनास्थल पर पहुंचीं, जहां उन्होंने कुछ दस्तावेज और डिजिटल उपकरण ले लिए। राज्य पुलिस ने ईडी के अधिकारियों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की, जिसमें दस्तावेज चोरी और जबरन घुसपैठ का आरोप था।

ईडी ने इसे अपनी जांच में प्रत्यक्ष बाधा बताया और सुप्रीम कोर्ट का सहारा लिया। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य पुलिस की प्राथमिकी पर रोक लगा दी, सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने का आदेश दिया और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को नोटिस जारी किया। अदालत ने इसे ‘बहुत गंभीर मामला’ करार दिया, जिसमें राज्य स्तर से केंद्रीय एजेंसी के कामकाज में हस्तक्षेप का पैटर्न दिखाई दे रहा है। यह घटना संघीय ढांचे के मूल सिद्धांत केंद्र की जांच शक्ति और राज्य की पुलिस अधिकारिता के बीच टकराव को उजागर करती है। इसी प्रकार झारखंड में रांची पुलिस ने ईडी के क्षेत्रीय कार्यालय पर छापेमारी की। यह कार्रवाई एक पूर्व सरकारी कर्मचारी की शिकायत पर आधारित थी, जिसमें ईडी के अधिकारियों पर पूछताछ के दौरान मारपीट का आरोप था।

पुलिस सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्य जुटाने के लिए ईडी के कार्यालय पहुंची। ईडी ने इसे भी अपनी जांच में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप बताया और झारखंड उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। उच्च न्यायालय ने पुलिस जांच पर रोक लगा दी, छापेमारी को ‘पूर्व नियोजित’ करार दिया और ईडी कार्यालय की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त बल तैनात करने का आदेश दिया। अदालत ने इसके लिए रांची के पुलिस अधीक्षक को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि केंद्रीय एजेंसी के काम में बाधा डालना अस्वीकार्य है। ये दोनों घटनाएं विपक्ष शासित राज्यों में केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई के खिलाफ राज्य स्तर से सक्रिय प्रतिरोध दर्शाती हैं, जो संघीय ढांचे की अक्षुण्णता को चुनौती दे रही हैं।

संघीय ढांचे में यह तनाव नया नहीं है, लेकिन 2026 के आरंभ में यह चरम पर पहुंच गया है। भारतीय संविधान संघीय ढांचे को मजबूत बनाने के लिए अनुच्छेद 246 के तहत शक्तियों का विभाजन करता है। ईडी मनी लांड्रिंग निवारण अधिनियम, 2002 के तहत कार्य करता है, जो केंद्र की विशेष शक्ति है। फिर भी, राज्य पुलिस का केंद्रीय एजेंसी पर प्राथमिकी दर्ज करना या छापेमारी करना संघीय ढांचे की भावना के विरुद्ध है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह ‘सहकारी संघवाद’ से ‘प्रतिरोधी संघवाद’ की ओर संक्रमण है। बंगाल और झारखंड में ईडी की छापेमारी को रोकने के प्रयास केंद्र की बढ़ती जांच शक्ति और राज्यों के राजनीतिक प्रतिरोध के बीच गहराते संघर्ष को उजागर करते हैं।

इन दोनों घटनाओं का संघीय ढांचे पर बहुआयामी प्रभाव पड़ेगा। पहला, राजनीतिक प्रभाव-बंगाल विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और ईडी की कार्रवाई को तृणमूल कांग्रेस ने चुनावी रणनीति प्रभावित करने की साजिश बताया है। ममता बनर्जी ने विरोध प्रदर्शन किया और कहा है कि ‘हमला होगा तो ताकत बढ़ेगी।’ झारखंड में भी झारखंड मुक्ति मोर्चा सरकार ईडी की पिछली कार्रवाइयों से प्रभावित रही है। दूसरा, संस्थागत प्रभाव-राज्य पुलिस द्वारा केंद्रीय एजेंसियों पर प्राथमिकी दर्ज करना पहले दुर्लभ था, लेकिन अब यह पैटर्न बन रहा है। सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों ने बार-बार ईडी के पक्ष में फैसले दिए हैं, जो केंद्र की जांच शक्ति को मजबूत करते हैं।

तीसरा, संवैधानिक प्रभाव-अनुच्छेद 356 के तहत केंद्र राज्य सरकार को बर्खास्त कर सकता है, लेकिन यहां राज्य अपनी पुलिस शक्ति का इस्तेमाल केंद्र के खिलाफ कर रहे हैं। यह संघीय ढांचे में असंतुलन पैदा कर सकता है, जहां राज्य केंद्र की जांच को ‘राजनीतिक प्रतिशोध’ मानकर रोकने की कोशिश करते हैं। संघीय ढांचा भारत की एकता की कुंजी है, लेकिन यदि राज्य और केंद्र के बीच यह टकराव जारी रहा, तो सहकारी संघवाद की अवधारणा कमजोर हो सकती है। 2026 के चुनावी मौसम में यह तनाव और बढ़ सकता है, जहां संस्थागत स्वतंत्रता, राजनीतिक स्थिरता और संघीय ढांचे की मजबूती के बीच संतुलन बनाना सबसे बड़ी चुनौती होगी।


Date: 20-01-26

बड़े युद्ध की आशंका

संपादकीय

अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए जैसी जिद ठान रखी है, उसकी कतई प्रशंसा नहीं हो सकती। अमेरिका और खासकर उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पुराने साथियों को भी अपने खिलाफ खड़ा कर लिया है। यूरोप और अमेरिका के बीच बढ़ती दूरी दुनिया के लिए चिंताजनक है, इससे वैश्विक स्तर पर सिर्फ समस्याओं में इजाफा होगा। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फिर कहा है कि नाटो के आठ सदस्य देशों से अमेरिका में आयात होने वाले सामान पर तब तक बढ़े हुए शुल्क लगाए जाएंगे, जब तक ग्रीनलैंड की खरीद के लिए कोई समझौता नहीं हो जाता है। ट्रंप टैरिफ को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं और उन्होंने कह दिया है कि ये शुल्क 1 फरवरी को 10 प्रतिशत से शुरू होकर 1 जून तक बढ़कर 25 प्रतिशत हो जाएंगे। कुछ माह पहले ही यह बात कल्पना से परे थी कि अमेरिका अपने पुराने सहज सहोदर देशों- डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ्रांस, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, नीदरलैंड और फिनलैंड को निशाना बनाएगा। यूरोप में चिंता की लहर है और यूरोप के 27 देश मिलकर कोई फैसला करना चाहते हैं। अगर यह फैसला आक्रामक हुआ, तो पूरी दुनिया के लिए खतरे की घंटी बज जाएगी।

यह ध्यान देने की बात है कि कुछ यूरोपीय देशों पर पहले से ही अमेरिकी टैरिफ लगे हुए हैं, अब यह जो ग्रीनलैंड संबंधी नया टैरिफ है, यह अतिरिक्त रूप से यूरोपीय देशों पर दबाव बढ़ाएगा। यूनाइटेड किंगडम जैसे देश में दुख मिश्रित आश्चर्य की स्थिति है, क्योंकि यह देश लगभग हमेशा ही आंख मूंदकर अमेरिका समर्थक रहा है। अमेरिका के साहसिक कदमों में ही नहीं, दुस्साहसिक अभियानों में भी यूनाइटेड किंगडम कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहा है। अतः अमेरिका अगर अपने इस पुराने साथी को आंखें दिखाने लगा है, तो भारत जैसे देशों के प्रति अमेरिकी प्रतिकूलता को आसानी से समझा जा सकता है। ध्यान देने की बात है कि यूरोपीय देशों ने अपना एक संघ बना रखा है और 27 देशों वाले इस संघ के एकाधिक देशों पर अगर टैरिफ लगता है, तो एक तरह से तमाम यूरोपीय देशों पर टैरिफ लद जाएगा। इतना ही नहीं, ट्रंप की नई मांगें अगस्त में हुए यूरोपीय संघ अमेरिका व्यापार समझौते के लिए भी खतरा बन गई हैं। अनेक यूरोपीय विशेषज्ञ यह मानकर चल रहे हैं कि अमेरिका के साथ यूरोपीय संघ का व्यापार करार अब खत्म हो चुका है। जाहिर है, अमेरिका ही इस व्यापार व्यवधान के लिए जिम्मेदार है।

अब सवाल यह है कि ट्रंप यूरोपीय देशों पर इतने नाराज क्यों हैं? दरअसल, ग्रीनलैंड के बचाव में कुछ यूरोपीय देशों ने अपनी सेना भेजी है। इस बदलाव को अमेरिका बहुत गंभीरता से ले रहा है। उसकी कोशिश या साजिश है कि ग्रीनलैंड उसे आसानी से मिल जाए। अगर ऐसा नहीं होगा, तो वह बल प्रयोग करेगा। अगर ऐसा हो गया, तो फिर सीधे-सीधे यूरोप के साथ अमेरिका का युद्ध छिड़ जाएगा। दशकों तक अमन-चैन का कथित ठेका उठाने वाली पश्चिमी दुनिया के लिए इससे बुरी कोई त्रासदी हो नहीं सकती। यहां गौर करने की बात है कि यूरोपीय देशों को रूस और चीन दोनों का साथ मिलने की आशंका है। मनमानी पर अड़े ट्रंप ने एलान किया है, हमें अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड की जरूरत है। क्या यह तर्क वाजिब है? अगर यह तर्क वाजिब है, तो अनेक देश ऐसे ही बहाने बनाकर युद्ध छेड़ देंगे, तब अमेरिका किस मुंह से युद्ध रुकवाने के लिए आगे आएगा ? आज दुनिया संकट में है, जिसे टालने के लिए हरसंभव प्रयास होने चाहिए।