16-01-2026 (Important News Clippings)
To Download Click Here.
Date: 16-01-26
Information Omission
India needs more transparency. For that, CIC and other information commissions must cooperate.
TOI Editorials

Ask not why Indian Railways charges you what it does. That’s the message Central Information Commission – a body set up to ensure “smoother and greater access to information” – has sent across to the public through a recent order. The applicant in the case wanted to know how Railways fixes passenger fares for different categories, under different conditions, such as Tatkal. After a two-year wait, the application has been dismissed on the grounds that it seeks “trade secret/intellectual property”.
Point taken. Trade secrets should be kept secret, like Coke’s formula scribbled on a scrap of paper and stored in a bank vault. You don’t want rivals to get hold of them and launch copycat versions. Absolutely. But who are Railways’ competitors? Whether you board a train in Jammu, Chennai, Guwahati or Kutch, you are riding the same state-owned monopoly. Unless you’re thinking about Tejas Express, run by IRCTC, which is also under the railway ministry, hence owned by the people of India. So, what business risk does Railways run by disclosing how it calculates the fare for, say, the lower aisle-side berth in a 2AC coach of Paschim Express?
We are not surprised that Railways refused to share information. It’s a govt body raised on the Official Secrets Act. But for CIC to buy its logic is odd. In another recent case, CIC agreed with the customs department that no public interest would be served by sharing details of businesses exporting limestone from Meghalaya to Bangladesh. But such information should be in the public domain anyway. Researchers, environmentalists, anyone might need it.
Twenty years ago, RTI was brought to increase transparency in governance, and CIC’s job was to be its guardian. Back in 2017, it sided with an applicant who wanted govt to reveal why it had agreed to Russia’s hiked bill for aircraft carrier INS Vikramaditya – formerly Gorshkov. In 2011, it had overruled RBI’s objection to listing the top 100 defaulters of PSU banks. But now, a similar request for a list of defaulters has been moved to a larger bench, even though RBI says the information should be public.
India in 2026 should be more transparent than it was in 2016. But it can’t be if CIC blocks legitimate requests. Notably, it now has its full strength of 10 commissioners after nine years. But it has a backlog of over 32,000 cases. Deciding them without taking up any new cases would take over three years. That defeats the whole point of RTI.
Bye, Treaty Shopping, Yeh Tiger Zinda Hai
Tiger Global ruling won’t dent India’s appeal.
ET Editorial
Supreme Court on Thursday issued a landmark judgment in India’s treatment of tax on capital gains by foreign investors by ruling that Tiger Global was liable to pay tax on sale of its stake in Flipkart to Walmart. Dispute arose because Tiger Global’s investments were made prior to the period when India amended its treaty with Mauritius, through which investments were made, to plug exemptions to capital gains tax. The law is now settled that Indian taxmen can go beyond routing mechanisms for foreign investments, and probe the intention behind the specific arrangement. If there is reasonable doubt over routing of investments, grandfathering and residence clauses constitute weak arguments in India’s evolving tax jurisprudence.
Import of the ruling is wide because it affects a class of investments made over a specific period to minimise tax incidence in India. GoI has made consistent efforts to dis-courage treaty shopping, and the current set of rules is watertight, and in keeping with international norms. Fresh investments into the country must flow through routes GoI deems kosher.
Ambiguity exists over previous investments. But the tax administration can, at best, examine them on their merits. The development is unlikely to alter India’s investment climate. Tax optimisation is not the principal consideration in investment decisions. Returns available to foreign investors in India arise from a far more intricate interplay of economic factors. India’s tax rates and policy orientation compare favourably in the global context, and have low deterrence value for prospective investors.
The top court’s verdict brings clarity to a period when venture capital was peaking. India’s regulators have worked on dissipating froth in startup valuations. The centre of gravity is shifting back to the country because of its business prospects. Offshore tax avoidance structures are becoming less relevant as the Indian startup ecosystem matures. Courts are weighing in on this vision of entrepreneurship in the country.
आठ देशों का संगठन क्या चीन का विकल्प बनेगा?
संपादकीय
जापान को रेयर – अर्थ न देने के चीन के ताजा फैसले से सतर्क हुए यूएस ने आठ भरोसेमंद देशों के संगठन पैक्स सिलिका (सिलिकॉन और उस पर आधारित सेमीकंडक्टर और एआई) में भारत सहित अन्य देशों को शामिल करने का फैसला किया है। उद्देश्य है रेयर – अर्थ में चीन की चौधराहट खत्म करते हुए पैक्स सिलिका के सप्लाई चेन को मजबूत करना। लेकिन अभी तक के आंकड़े ट्रेड की दुनिया में चीन की ताकत बताते हैं। चीन से व्यापार घाटा भारत के ट्रेड इतिहास में सर्वाधिक 100 अरब डॉलर पहुंच गया है। इसके विपरीत चीन का ट्रेड सरप्लस रिकॉर्ड 1.20 ट्रिलियन डॉलर हो गया है और वह भी तब, जब ट्रम्प ने चीन के खिलाफ टैरिफ असाधारण रूप से बढ़ा दिया है। यह सच है कि पिछले साल के मुकाबले अमेरिका को चीन का निर्यात घटा है, लेकिन उसकी भरपाई यूरोप, एशिया और अफ्रीका के देशों ने की है। जो चीन पिछले दो-तीन दशकों से दुनिया को सस्ते बल्ब, खिलौने, सेल, टॉर्च, दवाएं, मूर्तियां सप्लाई करता था, वह अब सोलर पेनल, बैटरी, रेयर – अर्थ, हथियार और एआई मॉडल्स बेच रहा है। चीन ने ऑटोमोबाइल सेक्टर पर भी कब्जा शुरू किया है। यूएस मजबूर है क्योंकि लैपटॉप, एलईडी, विंड टरबाइन, जेट इंजन्स, ऑटोमोबाइल, एमआरआई में भी रेयर – अर्थ एलीमेंट्स का प्रयोग होता है, जिसकी 90 फीसदी सप्लाई चीन करता है।
Date: 16-01-26
बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती से निपटने में सफल रहे हम
शशि थरूर, ( पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद )
इस सदी की शुरुआत तक हिंसक माओवादी विद्रोह की चुनौती काफी गहरा गई थी। ‘रेड कॉरिडोर’ फैलता जा रहा था। नतीजा यह हुआ कि डॉ. मनमोहन सिंह के शब्दों में, यह भारत के सामने सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बन गया। लेकिन भारत इस चुनौती से निपटने में सक्षम साबित हुआ है। रेड कॉरिडोर 2013 में 126 जिलों में फैल गया था, जो अब सिमटकर 11 जिलों तक रह गया है। गृह मंत्री अमित शाह ने घोषणा की है कि नक्सलवादी विद्रोह आने वाले कुछ महीनों में पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा।
लेकिन यह उस तरह की विनाशकारी हिंसा के चलते नहीं हुआ, जैसी श्रीलंका ने 2009 में तमिल टाइगर्स को हराने के लिए अपनाई थी। न ही भारत ने उन क्रूर तौर-तरीकों का सहारा लिया, जिनका इस्तेमाल पेरू में अल्बेर्तो फुजीमोरी ने 1990 के दशक में ‘सेंदेरो लुमिनोसो’ गुरिल्लाओं को कुचलने के लिए किया था। भारत ने एक परिष्कृत रणनीति बनाई, जिसमें विद्रोह के कारणों और परिणामों- दोनों को ध्यान में रखा गया।
कहानी की शुरुआत भूमिहीनता, आर्थिक वंचना और हाशिये पर पड़े समुदायों- खासकर दूरदराज के, संसाधन-समृद्ध वनों में रहने वाली आदिवासी आबादी की सरकारी सेवाओं तक पहुंच के अभाव की विरासत से होती है। इसने जमींदारों के खिलाफ किसान विद्रोह को जन्म दिया। विद्रोहियों ने माओवादी सैन्य रणनीति यानी जनयुद्ध को अपनाया।
2004 में, विद्रोह के विभिन्न धड़े एकजुट होकर सीपीआई (माओवादी) बने, जिसका उद्देश्य भारतीय लोकतंत्र को उखाड़ फेंकना और एक नया जनवादी राज्य स्थापित करना था। दूरस्थ इलाकों में प्रशासनिक और सुरक्षागत शून्यों का लाभ उठाते हुए सीपीआई (माओवादी) ने इन जिलों में समानांतर शासन का आभास दिया और स्वयं को पूंजीवादी शोषण के खिलाफ उत्पीड़ितों के रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया। उसे नए रंगरूट मिलते रहे।
लेकिन संरक्षण का यह एजेंडा अकसर हिंसा के जरिये आगे बढ़ाया गया और इसकी वित्तीय व्यवस्था लूट तथा उगाही से की गई। जून 2009 में सरकार ने सीपीआई (माओवादी) और उसके सहयोगी संगठनों को आतंकवादी घोषित किया और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत इस संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया। माओवादियों ने जवाब में हिंसा और तेज कर दी।
2010 में उन्होंने भारतीय अर्द्धसैनिक बलों पर सबसे घातक हमला किया, जिसमें छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के 74 जवान और दो पुलिसकर्मी मारे गए। तीन साल बाद एक और हमले में उसी राज्य के कांग्रेस पार्टी नेतृत्व को ले जा रहे काफिले को निशाना बनाया गया और उसे तबाह कर दिया गया।
तत्कालीन यूपीए सरकार को एहसास था कि केवल दमन से काम नहीं चलेगा और एक ऐसे नए दृष्टिकोण की जरूरत है, जो सुरक्षा चुनौती के साथ-साथ उन आर्थिक शिकायतों का भी सामना करे, जो विद्रोह को पोषित कर रही थीं। यूपीए सरकार द्वारा शुरू की गई कार्रवाई को 2014 के बाद गति मिली, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नई सरकार ने सुरक्षा और विकास- दोनों को ध्यान में रखते हुए एक व्यापक, बहु-स्तरीय रणनीति लागू की।
सरकार ने पुलिस की क्षमताओं को मजबूत करने में भारी निवेश किया- आधुनिक हथियार, बेहतर संचार उपकरण और उग्रवाद-विरोधी अभियानों के लिए विशेष प्रशिक्षण उपलब्ध कराया गया। इसके अलावा, पहले से दुर्गम रहे इलाकों में सैकड़ों नए फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस स्थापित किए गए, जिससे माओवादियों के तथाकथित सुरक्षित क्षेत्र सिमटे और उनकी आवाजाही बाधित हुई। सरकार ने उगाही के नेटवर्क और अन्य अवैध आय स्रोतों पर भी प्रहार किया और केंद्रीय तथा क्षेत्रीय नेतृत्व को पकड़ने या निष्क्रिय करने के प्रयास तेज किए। साथ ही गरीबी-उन्मूलन और विकास के प्रयास भी किए गए।
लेकिन स्थायी समाधान के लिए प्रणालीगत बदलाव भी अनिवार्य हैं। सरकार को जल, जंगल और जमीन पर स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा करनी होगी। आर्थिक विकास की परिभाषा को इस तरह से गढ़ना होगा कि वह पारंपरिक अधिकारों का सम्मान करे। साथ ही, नए सिरे से अशांति के चक्र को जन्म देने से बचने के लिए शोषणकारी उपक्रमों को आदिवासी इलाकों को रिमोट-कंट्रोल से संचालित करने की कोशिशों से भी बाज आना चाहिए ।
साइबर असुरक्षा
संपादकीय

भारत में साइबर धोखाधड़ी नहीं थम पा रही, तो आखिर इसकी वजह क्या है ? वर्तमान समय में इस अपराध के इतने स्वरूप हैं कि पीड़ित व्यक्ति ठगों की साजिश को एकबारगी समझ नहीं पाता और वह जीवन भर की कमाई लुटा बैठता है । यही वजह है कि साइबर अपराधी हर वर्ष लोगों को करोड़ों की चपत लगा रहे हैं। विश्व आर्थिक मंच ने दावोस बैठक से पहले अपनी ‘वार्षिक जोखिम रपट’ में भारत में बढ़ती इसी साइबर असुरक्षा को लेकर आगाह किया है। मंच ने गलत सूचनाओं और भ्रामक जानकारियों के प्रसार पर भी चिंता जताई है। वहीं भारत के मामले में एक अध्ययन ने शीर्ष पांच जोखिमों की पहचान की है, जिनमें साइबर असुरक्षा को विशेष रूप से शामिल किया है। दरअसल, देश में इस असुरक्षा के लगातार बढ़ते जाने की एक बड़ी वजह यह है कि ठगों ने देश से लेकर विदेश तक अपना जाल बिछा लिया है। इस लिहाज से यह न सिर्फ तकनीकी समस्या है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मसला भी है।
चिंता की बात यह है कि हम साइबर अपराधियों पर शिकंजा कसने के लिए निगरानी तंत्र आज तक मजबूत नहीं कर पाए हैं। नागरिकों में भी डिजिटल साक्षरता का अभाव दिखता है। एक गंभीर समस्या डिजिटल रूप से बदले गए वीडियो और चित्रों की भी है जो आज नागरिकों के लिए परेशानी का सबब बन गए हैं। इसको लेकर भी विश्व आर्थिक मंच ने चिंता जताई है। ऐसे कई विवादित वीडियो सामने आ चुके हैं। अगर साइबर अपराधियों का हौसला बढ़ा है, तो यह व्यवस्था की खामी है। हैरत की बात है कि अपराधियों के संजाल तक पहुंचने की तमाम कोशिशों के बावजूद देश में साइबर असुरक्षा लगातार बढ़ती चली गई है। आखिर क्या कारण है कि हम धोखेबाजों के असल ठिकानों पर नहीं पहुंच पा रहे हैं ? भारत में इस असुरक्षा का जोखिम इसलिए भी गहरा है, क्योंकि लोगों के पास सजगता और व्यक्तिगत जानकारी साझा न करने जैसे सीमित विकल्प ही हैं । दोराय नहीं कि अब सरकार को सख्ती बरतनी होगी । साइबर अपराध के संजाल को तोड़ने का वक्त आ गया है।
बंगाल से मांगा जवाब
संपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की याचिका पर पश्चिम बंगाल सरकार, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य पुलिस को नोटिस जारी करते हुए व्यवस्था की एक त्रासद पहेली को सुलझाने की कोशिश की है। बीते सप्ताह कोलकाता में आई पीएसी के दफ्तर पर ईडी ने छापामारी की थी, जिसे रोकने या प्रभावित करने की कोशिश खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व में की गई। ऐसी कोशिश क्यों हुई? इसकी सीबीआई जांच की मांग ईडी ने सर्वोच्च न्यायालय में की और न्यायालय ने संबंधित पक्षों से जवाब-तलब किया है। यह बात सर्वविदित है कि छापेमारी के समय मुख्यमंत्री का वहां पहुंचना और स्वयं ही कुछ कागजों या सुबूतों को अपने साथ ले जाना उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है। न्यायालय में एक बड़ा सवाल यह उठा कि क्या राज्य की एजेंसियां केंद्रीय एजेंसी को किसी गंभीर अपराध की जांच करने से रोक सकती हैं? अगर नहीं रोक सकतीं, तो फिर ममता बनर्जी के लिए मुश्किलें बढ़ जाएंगी ? उन्हें अदालत में यह बताना होगा या साबित करना होगा कि राज्य की एजेंसी अचानक किसी केंद्रीय एजेंसी के काम में दखल दे सकती है।
बेशक, जांच में दखल की सीमा तय करना जरूरी है, क्योंकि आने वाले समय में जब स्वार्थ की सियासत तेज होगी, तब ऐसे अनेक मौके आएंगे, जब एजेंसियां आमने-सामने खड़ी हो जाएंगी। ऐसे में, यह तय
करना जरूरी हो जाएगा कि कौन जांच एजेंसी किस जांच एजेंसी के काम में दखल दे सकती है। इस पूरे मामले को सिर्फ सियासी नजरिये से नहीं देखा जा सकता और इसमें सांविधानिक स्थिति बहुत स्पष्ट होनी चाहिए। कोलकाता में जो अभूतपूर्व स्थिति बनी, उसका सही पटाक्षेप होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और विपुल पंचोली की पीठ ने ईडी की याचिका को गंभीरता से लिया है। हालांकि, न्यायालय में बचाव पक्ष की ओर से पूरी कोशिश रही कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री या राज्य पुलिस को किसी प्रकार का नोटिस जारी न हो। इस कोशिश के जवाब में बंगाल सरकार को फटकार लगाते हुए अदालत ने कह दिया कि इस मामले की जांच जरूरी है, ताकि अपराधियों को राज्य की कानून प्रवर्तन एजेंसियों की आड़ में संरक्षण न मिल सके। लगे हाथ, अदालत ने ईडी के लिए भी कहा कि किसी भी केंद्रीय एजेंसी को किसी भी पार्टी के चुनाव कार्य में हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। वाकई, हमें ऐसे सभ्य लोकतंत्र की ओर बढ़ना चाहिए, जहां किसी भी सरकारी जांच एजेंसी के सियासी इस्तेमाल को अपराध माना जाए। ऐसी एजेंसियों का काम देश में अपराध रोकना है, अगर ये एजेंसियां सियासी पार्टियों के बचाव में खड़ी होने लगेंगी, तो हमारी पूरी व्यवस्था चरमरा जाएगी।
खासकर जब चुनाव पास हों, तब एजेंसियों को बहुत सावधानी से कदम बढ़ाने चाहिए। दुर्भाग्य से हमारे देश में एजेंसियों पर आरोप लगाने की गलत परंपरा रही है, लेकिन ऐसी परंपरा का पटाक्षेप तभी हो सकता है, जब एजेंसियां भी पारदर्शिता से काम करें। कोलकाता में हुआ यह है कि ईडी को केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी और बंगाल पुलिस को राज्य में सत्तारूढ़ दल से जोड़कर देखा जा रहा है। ईडी का काम आर्थिक अपराधों पर लगाम लगाना है और सुप्रीम कोर्ट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ईडी अपने कर्तव्य की पालना कानून के दायरे में रहकर ही करे। अगर किसी सरकारी एजेंसी का दुरुपयोग नहीं हो, तो ही सियासी दल देश की सही मायने में सेवा कर पाएंगे।
Date: 16-01-26
अमेरिका में भारतवंशियों की नई परीक्षा
फ्रैंक एफ इस्लाम, ( अमेरिकी उद्यमी व समाजसेवी )
पिछले तीन दशकों में भारतवंशियों ने अमेरिका के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षितिज पर अपना अलग मुकाम बनाया है। भारतवंशी समुदाय आज यहां के स्वास्थ्य सेवा, वित्त, अकादमिक और इन सबसे बढ़कर सूचना-प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में प्रभावकारी भूमिका अदा कर रहा है।
अमेरिका में बाहर से आकर बसे समुदायों में भारतीय सबसे ज्यादा पढ़ा-लिखा समुदाय है। इस समुदाय के 75 प्रतिशत से अधिक लोगों के पास स्नातक व उससे ऊंची की डिग्री है। फॉर्च्यून 500 कंपनियों के सीईओ से लेकर सिलिकॉन वैली के एक अरब डॉलर से ज्यादा वाले यूनिकॉर्न स्टार्ट-अप के संस्थापकों तक, डॉक्टरों- प्रोफेसरों से लेकर सरकारी कर्मचारियों तक इतने बड़े पैमाने पर इस समुदाय की उपस्थिति है कि अब इसको सामान्य बात मान लिया गया है।
अब जब डोनाल्ड ट्रंप ने दूसरे कार्यकाल में ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ की राजनीति को अपने प्रशासन का मूल मंत्र बनाया है, तो बहुत कुछ यहां बदला-बदला सा नजर आने लगा है। ट्रंप समर्थक न सिर्फ अवैध रूप से रहने वालों को निशाना बना रहे, बल्कि उन्होंने अति- कुशल आप्रवासियों के खिलाफ भी अभियान छेड़ दिया है। इसका दुष्प्रभाव भारतवंशियों पर सर्वाधिक पड़ा है। भारतीयों के लिए दशकों से अमेरिका आने का सबसे सुगम रास्ता एच1बी वीजा कार्यक्रम रहा है। कुल एच1बी वीजा का लगभग 70 प्रतिशत भारतीयों को ही मिलता रहा है। यहां भारतवंशियों की ठीक-ठाक आबादी हो गई है। अमेरिका में 1990 में 8,15,000 भारतीय थे, जो अब 50 लाख से ज्यादा हो गए हैं।
‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ अभियान में ट्रंप- भक्तों के साथ वामपंथियों का एक गुट भी शामिल है। इस समूह कातर्क है कि एच1बी वीजा प्रणाली अमेरिकी नौकरियां चुराती है, भारतीय कंसल्टिंग फर्म ‘सिस्टम में हेरफेर करते हैं’ और कई कर्मचारी ‘निम्नस्तरके’ हैं। हालांकि, ‘नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी’ और ‘बुकिंग्स इंस्टीट्यूशन’ समेत लगभग हरेक बड़े संस्थानों के अध्ययन में इन आरोपों का खंडन किया गया है। जिन भारतवंशी पेशेवरों को यहां एक समय ‘मॉडल अल्पसंख्यक’ के रूप में पेश किया जाता था, उसी समुदाय को अब आर्थिक खतरे और सांस्कृतिक आक्रांता का पर्याय बनाया जा रहा है।
पिछले एक साल में दक्षिणपंथी मीडिया व सोशल मीडिया में ‘टेक कॉरिडोर’ में घर की कीमतों में बढ़ोतरी से लेकर समावेशीकरण में आई कमी तक, हर बात के लिए भारतवंशियों को दोषी ठहराए जाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। ट्रंप- समर्थकों द्वारा वायरल किए जा रहे मीम में भारतीय किराना स्टोर से लेकर हिंदू त्योहारों तक, हर चीनका मजाक उड़ाया जा रहा है। कॉस्टको में खरीदारी जैसी उपभोक्ता आदत को ‘नस्लवाद’ या ‘संकीर्ण सामुदायिक आर्थिक व्यवहार’ के सुबूत के तौर पर पेश कर उनका उपहास उड़ाया जाने लगा है। ‘रेमिटेंस’ को अब ‘पूंजी पलायन’ कहकर इस पर सवाल उठाया जा रहा है। बड़े पैमाने पर जारी आउटसोर्सिग विरोधी बयानबाजी में भारतीय कॉल सेंटरों को उदाहरण के तौर पर रखा जा रहा है और इन सबसे बुरा यह है कि भारतवंशियों को अब बुजुर्ग अमेरिकियों को धोखा देने वाला बताया जा रहा है।
ऐसे में सवाल यही है कि एक ऐसा समुदाय, कभी अजेय सा महसूस करता था, अपनी स्थिति को वापस कैसे पाए ? इसका सबसे अच्छा तरीका तो यही है कि भारतवंशियों को धीरज रखना चाहिए। यह एक कठिन राजनीतिक दौर है, जो आज नहीं तो कल बीत जाएगा। आप्रवासी विरोधी भावना अमेरिका तक सीमित नहीं है। पूरे यूरोप, दक्षिण अमेरिका और एशिया के कुछ हिस्सों में राष्ट्रवादी आंदोलन बढ़े हैं, जो आर्थिक विस्थापन, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और सांस्कृतिक चिंता के डर से प्रेरित हैं। ऐसे चक्र स्थायी नहीं होते, वे चरम पर पहुंचते हैं और फिर कम हो जाते हैं। इसलिए भारतवंशियों को अमेरिकियों के मौजूदा व्यवहार को दुश्मनी के तौर पर नहीं देखना चाहिए।
दूसरा, भारतवंशी समुदाय को अपनी सफलता की कहानियां तथ्यात्मक रूप से बतानी चाहिए। अमेरिका में डॉक्टरी के पेशे जुड़े लोगों में भारतवंशियों का हिस्सा लगभग आठ प्रतिशत है। किसी भी आप्रवासी समूह के मुकाबले सबसे ज्यादा तेजी से स्टार्टअप शुरू करने वाले भारतवंशी ही हैं। वे हर साल टैक्स, अनुसंधान और नवाचार में अरबों डॉलर का योगदान देते हैं।
तीसरा, भारतवंशियों को अपना राजनीतिक जुड़ाव गहरा करना चाहिए। साल 2024 के विरोधाभासों में से एक यह भी रहा कि एक-तिहाई से ज्यादा भारतवंशियों ने ट्रंप को उनके खुले तौर पर आप्रवासी विरोधी बयानबाजी के बावजूद वोट दिया। असल में, इनमें से कई वह गलत धारणा पाले बैठे थे कि दौलत उन्हें ‘नस्लीय विद्वेष’ से बचा लेगी, लेकिन जो परिस्थितियां बन रही हैं, उनमें सियासी फिजा तेजी से बदल सकती है। आजके उद्यमी कल ‘बलि का बकरा’ बन सकते हैं। इसलिए, भारतवंशी इससे सबक लें और अपने दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर वोट दें। भारतीय अमेरिकियों के पास अब कांग्रेस, राज्य विधानसभाओं से लेकर नगर परिषदों और स्कूल बोर्ड के नेताओं तक में रिकॉर्ड संख्या में निर्वाचित जन प्रतिनिधि हैं। यह प्रतिनिधित्व लगातार बढ़ना चाहिए।
आखिर में, हमें सिर्फ पेशेवर जीवन में नहीं, बल्कि नागरिक जीवन में भी फिर से अपनी भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। भारतवंशी आर्थिक क्षेत्रों में तो बहुत अच्छे हैं, लेकिन नागरिक क्षेत्र में वे पीछे हैं। वे स्थानीय आयोजनों, स्कूल बोड़ों, सामुदायिक सेवाओं और अंतर सांस्कृतिक आदान-प्रदान में बहुत कम भाग लेते हैं। यह प्रवृत्ति बदलनी चाहिए। नागरिक स्तर पर जुड़ाव से विश्वास बनता है और रूढ़िवादिता खत्म होती है। ये वे क्षेत्र भी है, जहां आप्रवासी समूह ऐतिहासिक रूप से अमेरिकी ताने-बाने में अपनी जगह बनाते रहे हैं। यह समुदाय कितना भी प्रभावी क्यों न हो जए, खामोशी उसकी हिफाजत नहीं कर सकती ।
भारतवंशी आज अमेरिका में ऐसी परिस्थिति से जूझ रहे हैं, जिसका उन्होंने पहले कभी सामना नहीं किया था। यह परिस्थिति है- राजनीतिक सत्ता द्वारा बढ़ाया गवा सांस्कृतिक संदेह । भारतवंशियों के मन में आज यह बात उठ सकती है कि पीछे हट जाएं. शांत रहकर समय का इंतजार करें या उम्मीद करें कि यह पल गुजर जाएगा, लेकिन इसके उल्टा करने की जरूरत है। यही वह समय है, जब हमें अधिक मजबूती से खड़ा होना चाहिए, अपनी आवाज उठानी चाहिए और ज्यादा भागीदारी करनी चाहिए।
Date: 16-01-26
हमारे गांवों में अच्छे बदलावों से हो मौन क्रांति
गिरीन्द्र नाथ झा, ( ग्रामीण पत्रकार )
देश के अलग-अलग हिस्सों के ग्रामीण इलाकों से गुजरते हुए इन दिनों जो चीज सबसे अधिक ध्यान खींच रही है, वह है पंचायतों में विकास। ग्रामीण इलाकों में एक बड़ा बदलाव मौन तरीके से हो रहा है। यदि आप भी अपने आसपास की पंचायतों पर निगाह डालेंगे, तो एहसास होगा कि सरकार की ग्रामीण योजनाएं आसानी से गांव तक पहुंच रही हैं और बदलाव हो रहा है।
एक ऐसा भी वक्त था, जब ग्रामीण विकास का काम हाथ से बनी रिपोर्टों, व्यक्तिगत राय और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर चलता रहा, लेकिन अब केंद्र सरकार ने पंचायत एडवांसमेंट इंडेक्स (पीएआई) जारी करने की शुरुआत की है। यह एक नया तरीका है, जिसमें आप अपनी पंचायत का रिपोर्ट कार्ड देख सकते हैं। वह सूचकांक पारदर्शी आंकड़ों पर आधारित होता है और सतत विकास लक्ष्यों से जुड़ा।
हाल ही में बिहार के पूर्णिया जिला स्थित झुनी कला पंचायत में इस लेखक ने एक बोर्ड देखा, जिसपर ‘ बाल हितैषी पंचायत’ लिखा था। दरअसल, पंचायतों में बच्चों के अधिकार, विकास, सुरक्षा और भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए बाल हितैषी पंचायत नाम से एक योजना है और इस पंचायत का इसके लिए चयन हुआ था पंचायत ने अच्छा काम किया और फिर इसकी प्रवेश सीमा पर यह बोर्ड लगा दिया गया। इन सबके पीछे पीएआई ही है। इस इंडेक्स के कारण कई पंचायत इस बात को लेकर बेहद सतर्क रहती हैं कि वे विकास के मापदंड पर कहीं नीचे न चली जाएं।
महाराष्ट्र और गुजरात में भी कुछ ऐसा ही दिखा। वहां पंचायत प्रमुख बेहद सजग रहते हैं कि उनकी पंचायत को कम अंक न मिल जाए। उत्तर प्रदेश में तो इसके लिए राज्य स्तर पर एक कार्यशाला भी आयोजित की गई थी। पंचायत एडवांसमेंट इंडेक्स की सबसे सकारात्मक रिपोर्ट जो पढ़ने को मिली, वह महाराष्ट्र से है। वहां एक पंचायत ने ‘महिला हितैषी पंचायत’ में कम अंक मिलने के बाद सीसीटीवी कैमरे और सड़क की बत्तियां लगवाई। वहीं, गुजरात के एक गांव ने ‘स्वच्छ और हरित पंचायत’ में पीछे रहने पर तुरंत सफाई अभियान छेड़ दिया। जब आप देश के अलग-अलग हिस्सों के पंचायत प्रमुखों से बात करेंगे, तो पता चलेगा कि इस इंडेक्स के कारण उन्हें अपनी पंचायतों की अच्छाई व कमियां साफ दिखती हैं। और वे जल्दी और सही कदम उठाने को तत्पर होते हैं। कई पंचायतों में इसके अंक देखकर तत्काल सुधार काम शुरू हुए हैं, फिर चाहे वह काम संस्थागत प्रसव से जुड़ा हो, कचरा प्रबंधन से या फिर पानी की किल्लत से ।
पंचायत एडवांसमेंट इंडेक्स की शुरुआत पंचायती राज मंत्रालय ने की है। यह देश का पहला ऐसा ढांचा है, जो ग्राम पंचायतों की प्रगति को ठोस मापदंडों से नापता है। स्वच्छता, स्वास्थ्य, शासन, महिला सशक्तिकरण, बुनियादी ढांचा, पर्यावरण जैसे अहम क्षेत्रों को नौ थीम में बांटा गया है। वे थीम संयुक्त राष्ट्र के 17 सतत विकास लक्ष्यों को स्थानीय स्तर पर लागू करने से बनी हैं। सीधी बात है- राष्ट्रीय लाक्ष्य तभी पूरे होंगे, जब गांवों में काम होगा, और यहीं पंचायतों की भूमिका अहम है। पंचायत एडवांसमेंट इंडेक्स इसी प्रगति को नापने का ठोस तरीका है। बिहार- बंगाल सीमा पर स्थित एक पंचायत में इस इंडेक्स पर चर्चा करते जब कुछ लोग मिले, तो मुझे 2015 में शुरू हुए ‘डिजिटल इंडिया मिशन’ की याद आ गई। आज जिस तरह हम इस इंडेक्स की बात कर रहे हैं, ठीक ऐसी ही बातें 2015 में डिजिटल इंडिया में गांवों की भूमिका को लेकर भी होती थी। तब गांवों में फाइबर केबल के जरिये इंटरनेट पहुंचाने की बात हो रही थी और आज देखिए गांव-गांव में इंटरनेट ने दस्तक दे दी है।
यहां मुझे महात्मा गांधी की एक उक्ति याद आती है। उन्होंने कहा था- अगर हिन्दुस्तान के हर एक गांव में कभी पंचायती राज कायम हुआ, तो मैं अपनी इस तस्वीर की सच्चाई साबित कर सकूंगा, जिसमें सबसे पहला और सबसे आखिरी दोनों बराबर होंगे, या यूं कहिए कि न तो कोई पहला होगा, न आखिरी वास्तव में, गांधीजी मानते थे कि जब पंचायती राज स्थापित हो जाएगा, तब लोकमत ऐसे अनेक काम कर दिखाएगा, जो हिंसा से कभी नहीं हो सकते। सुखद है, सकारात्मक संवाद से स्थानीय लोग अपनी पंचायतों के सतत विकास में भागीदार बन रहे हैं।