14-03-2026 (Important News Clippings)
To Download Click Here.
Date: 14-03-26
You’re Fired
Humanity’s march, down to ChatGPT, is story of fire
TOI Editorials
There’s so much anxiety about gas out there. But it isn’t about gas, really. Deep down, it’s about being human. We are children of fire, and its masters, too. On current evidence, our ape-like ancestors figured out how to manage fire – mostly started by lightning –about 1.5mn years ago. Then, by a lucky accident, they started cooking, which made food not only tastier, but also more nutritious, and easier to digest. That made large digestive systems unnecessary, along with large jaws and teeth. While apes chewed their stringy, fibrous food six hours a day; for us, one hour was enough. In fact, it left us with an energy surplus, which supports brain growth.
Human brains are so energy-hungry, they account for 20% of calorie burn at rest. So what? So this: without fire, there would be no Homo sapiens, and no ChatGPT. Fire also helped our brains grow, by letting us sleep long hours, without fear. A moonless night has, roughly, onetrillionth the light of a sunny day. And humans, with fewer rod cells in their eyes, are sitting ducks for leopards, and other nocturnal predators. Fire turned the scales, and not only against animals. Burning midnight oil became key to social mobility. Bricks, Roman cement, engines, cannon, Apollo missions, Tomahawk missiles, even electricity – largely – are fire’s gifts. We need fire, and because gas is the only fuel most of us know how to use, we can’t help being especially antsy when we can’t get it.
Price pressures
India must find sources of sustainable energy to curb inflation
Editorial

he new series of the Consumer Price Index (CPI), the second data release of which was issued on Thursday, does not yet have enough historical data for robust com- partsons, but does include enough information to provide clues about the future. Retail Inflation In India quickened to a 10-month high of 3.2% in February 2026, largely driven by food inflation and precious metal prices. This rise is something that the government should take note of early, avoiding any complacency that might have crept in due to the low inflation levels of the last year or so. Food has a lower weight in the new series as compared to the old one, but is nevertheless a major driver of inflation with a 36.75% weight in the overall CPI. Inflation in food and beverages rose to 3.35% in February from 2.1% in the pre- vious month, driven by quickening price levels in the meat, oils, and fruits and nuts categories. Notably, inflation in tomato prices stood at more than 45%. Thankfully, this was accompanied by a contraction in prices of the two other staples – onions and potatoes – by 28% and 18%, respec- tively. A large part of the low inflation last year was due to a statistical base effect that is now
gone. Looking ahead, there are various factors that could result in rapidly rising food Inflation. The first is that climate scientists are predicting the return of the El Niño effect in the middle of the monsoon this year. A weak monsoon will nat- urally raise food prices. The second impact will depend on how long the conflict in West Asia continues. Sustained natural gas supply con- straints will hurt fertilizer production, affecting food output and, eventually, prices.
The other factor that has driven inflation up, and which will likely remain a major driver in the near future, is the price of gold and silver. Goldje- wellery saw inflation rise to 48.2% in February from an already-blistering 46.8% in January. Infla- tion in silver jewellery stood at more than 160% in both January and February. With global uncer- tainty and anxiety skyrocketing, the demand for safe-haven precious metals is not going to let up any time soon. Rising oil prices and LPG and LNG shortages are already raising input prices for in- dustry, which will eventually be passed on to con- sumers. The Reserve Bank of India’s Monetary Policy Committee has a tough job in its next meeting in April. Inflation is being driven by sup- ply constraints, so trying to reduce demand by raising interest rates will not only have a minimal impact on inflation but could also further hurt growth when fuel constraints are already impact- ing it. The onus lies with the government and its efforts to expedite alternative sources of fuel.
ईरान युद्ध से भारत सहित कई देशों की अर्थव्यवस्था को नुकसान हो सकता है
ओपिनियन
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 9 मार्च को ऐलान किया कि ईरान के खिलाफ उनका अभियान जल्द खत्म हो जाएगा। ट्रम्प को पहले टैरिफ लगाने की कीमत समझ में आई और अब उन्हें युद्ध के असर का अहसास होने लगा है। ईरान द्वारा होर्मुज की खाड़ी बंद करने से दुनिया की 15 प्रतिशत तेल सप्लाई रुक गई है। अमेरिकी वोटर महंगाई से त्रस्त हैं।
इसलिए मध्यावधि चुनाव का सामना कर रहे ट्रम्प ने संकेत दिया है। कि वे यह कीमत नहीं चुका सकते। युद्ध से ग्लोबल अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान होगा। हालांकि, इसका असर देशों पर अलग-अलग होगा। अमेरिका और यूरोप के मुकाबले भारत सहित एशिया के कुछ देश सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। इन देशों की जीडीपी कम हो सकती है। वैश्विक अर्थव्यवस्था को आघात लगने की शुरुआत हो चुकी है।
फिर भी, आर्थिक नीति की तरह ट्रम्प युद्ध और शांति के मामले में भी अराजक हैं। इस बीच अमेरिका के रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने पहले से कहीं ज्यादा विकट लड़ाई की बात कही है। भ्रम की स्थिति ट्रम्प के पास अच्छे विकल्पों की कमी दर्शाती है। जहां व्यापार युद्ध को कम करना कमोबेश उनके हाथ में है, वहीं पुराने ऊर्जा बाजार जैसे- तेल, गैस, बिजली आदि को वे बहाल नहीं कर सकते हैं। घटनाक्रम कुछ भी हो पर विश्व ऊर्जा असुरक्षा के नए दौर में प्रवेश कर रही है।
यह सच है कि दुनिया 1973 के समान आज तेल पर निर्भर नहीं है जब अरब देशों के प्रतिबंध से कच्चे तेल के मूल्य चार गुना बढ़ गए थे। परंतु आज तेल की मांग बहुत अधिक है, लिहाजा सप्लाई अस्त-व्यस्त होने से मूल्य बढ़ेंगे। 1970 के मुकाबले सप्लाई में ज्यादा कमी आएगी। संकट के सबसे बुरे दौर में भी व्यापारियों ने खाड़ी के अनिश्चितकाल तक बंद होने की संभावना को ध्यान में रखकर तेल मूल्यों को ज्यादा नहीं बढ़ाया है। ऐसी स्थिति में मांग और सप्लाई के बीच संतुलन के लिए आवश्यक तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो सकती है। विश्व की इकोनॉमी में ट्रांसपोर्ट की अहम भूमिका है। जाहिर है, उसमें रुकावट से गंभीर नुकसान होगा।
युद्ध का आघात तेल तक सीमित नहीं है। ड्रोन हमले से कतर का मुख्य गैस प्लांट बंद है । कतर से निर्यात बंद होने से एशिया में हड़बड़ी मच गई है। युद्ध खत्म होने के बाद भी दुनिया बदल जाएगी। ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई अब जानते हैं कि पेट्रोल, गैस के मूल्य अमेरिका की कमजोरी है। खासतौर से यदि ईरान मान लेता है कि सुरक्षित रहने के लिए उसे परमाणु हथियार की जरूरत है तो भू-राजनीतिक तनाव के साथ ऊर्जा बाजार अस्त-व्यस्त होते रहेंगे। निवेशकों, कारोबारियों और नीति निर्माताओं हालात से जूझना पड़ेगा। पेट्रोल, गैस के मूल्यों में बढ़ोतरी के खतरों के साथ कारोबारों को नए जोखिम का सामना करना पड़ेगा | वोटर राजनेताओं से पेट्रोल, गैस पर सब्सिडी की अपेक्षा करेंगे। यूक्रेन युद्ध के समय यूरोपीय देशों की सरकारों ने जनता को भारी ऊर्जा सब्सिडी दी थी। इससे एशिया के गरीब देशों पर बोझ पड़ेगा। उन पर कर्ज बढ़ेगा।
ट्रम्प को विश्वास होगा कि अगर बाजारों में दहशत फैलती है तो वे लड़ाई रोककर युद्ध के आर्थिक नुकसान को सीमित कर सकते हैं, लेकिन काफी नुकसान पहले ही हो चुका है। उनके द्वारा छेड़े गए व्यापार युद्धों के विपरीत उनके हाथ में नियंत्रण के सभी सूत्र नहीं हैं। इस सप्ताह ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स के एक प्रवक्ता ने कहा है कि युद्ध कब खत्म होगा, यह हम तय करेंगे।
Date: 14-03-26
संवेदनशील बने न्यायिक तंत्र
ऋतु सारस्व, ( लेखिका समाजशास्त्री हैं )

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को रद कर दिया, जिसमें यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम, 2012 (पोक्सो) के एक मामले में समन के महत्व को कम कर दिया गया था। जज सूर्यकांत, जायमाल्य बागची और एनवी अंजारी की पीठ ने ट्रायल कोर्ट के मूल समन आदेश को बहाल किया और कहा कि प्रथमदृष्ट्या आरोपों से दुष्कर्म करने का “प्रयास” प्रतीत होता है, न कि केवल “तैयारी”। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने लैंगिक संवेदनशीलता के नवीन मानकों को स्थापित करते हुए यौन अपराधों के मुकदमों में अधिक संवेदनशील और एकसमान न्याय-निर्णय के लिए दिशा-निर्देश तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की।
इन निर्देशों को जारी करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने लैंगिक रूढ़ियों से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2023 में जारी की गई हैंडबुक को रद कर दिया। उक्त मामला 17 मार्च, 2025 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस निर्णय से संबंधित है, जिसमें उसने ट्रायल कोर्ट के समन को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत दुष्कर्म के आरोप से घटाकर धारा 354 बी के तहत “वस्त्र उतारने के इरादे से हमला” कर दिया था। इसके साथ ही पोक्सो के संबंधित प्रविधानों को भी धारा 18 से घटाकर धारा 10 कर दिया गया था, जिसमें आजीवन कारावास की आधी सजा का नियम है, जबकि धारा 18 में 5-7 वर्ष के कारावास का प्रविधान है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह माना कि देश की विभिन्न अदालतों में संवेदनशीलता को लेकर बरती जाने वाली सावधानी में कहीं न कहीं चूक हो जाती है, इसीलिए उसने यह कार्य प्रशिक्षण प्रणाली को सौंप दिया तथा भोपाल स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी से एक विशेषज्ञ समिति गठित करने का आग्रह किया। समिति को भाषाई विविधता और आम लोगों के लिए सुगम्यता का ध्यान रखते हुए एक व्यापक रिपोर्ट और दिशा-निर्देशों का मसौदा तैयार करने को कहा गया है। न्यायालय का इस पर विशेष जोर था कि समिति प्रतिवेदन तैयार करते समय राष्ट्र की भाषाई विविधता को ध्यान में रखे।
उसने यह भी इंगित किया कि विभिन्न क्षेत्रों की बोलियों में प्रचलित अनेक ऐसे शब्द एवं अभिव्यक्तियां हैं, जो सामान्य बोलचाल में प्रयुक्त होती हैं, पर वे दंड विधि के तहत आपत्तिजनक या अपराध की श्रेणी में आ सकती हैं। अतः समिति का यह दायित्व होगा कि वह विभिन्न भाषाओं के ऐसे शब्दों की पहचान कर उनका संकलन करे, ताकि वे न्यायिक प्रक्रिया में अनदेखे न रह जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने विशेषज्ञ समिति से इस विषय पर एक समग्र रिपोर्ट तैयार करने को कहा कि यौन अपराध के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता कैसे विकसित की जाए। इससे पूर्व ‘अपर्णा भट बनाम मध्य प्रदेश राज्य, 18 मार्च, 2021’ मामले में शीर्ष न्यायालय ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी से कहा था कि वह युवा न्यायाधीशों के प्रशिक्षण और न्यायाधीशों की सतत शिक्षा में लैंगिक संवेदनशीलता से संबंधित आवश्यक सामग्री को शीघ्रता से तैयार करे, जिसमें न्यायिक तर्क में अंतर्निहित रूढ़ियों और अचेतन पूर्वाग्रहों के प्रति पर्याप्त जागरूकता कार्यक्रम शामिल हों।
सुप्रीम कोर्ट लगातार देश की विभिन्न अदालतों द्वारा यौन अपराधों के मामलों में प्रदर्शित संवेदनात्मक कमी और रूढ़िगत दृष्टिकोण पर आपत्ति व्यक्त करता रहा है। हालिया निर्णय में भी सुप्रीम कोर्ट ने इसी चिंता को दोहराते हुए कहा, “हमारे सभी निर्णयों में करुणा, मानवता एवं समझ की भावना झलकनी चाहिए। यही तत्व एक निष्पक्ष एवं प्रभावी न्यायप्रणाली के निर्माण के लिए जरूरी हैं।” यह टिप्पणी सिर्फ एक न्यायिक अवलोकन भर नहीं, संवेदनशील न्यायशास्त्र की दिशा में किया गया एक सशक्त और ऐतिहासिक हस्ताक्षर है। यह यौन शोषण से गुजरी पीड़िता के लिए आश्वस्ति और सहानुभूति का संदेश देती है। एक ऐसा ही संदेश हाल में उड़ीसा उच्च न्यायालय ने तब दिया, जब उसने कहा कि यौन अपराधों में सेक्सुअल इंटेट यानी यौन मंशा सबसे महत्वपूर्ण है। उसने यह भी कहा कि किसी लड़की के शरीर के ऊपरी हिस्से को छूना, दबाना और खींचना यौन उत्पीड़न है।
निःसंदेह यौन अपराध की यातना को उसकी संपूर्ण गहराई में वही समझ सकता है, जिसने उस आघात को अपने जीवन में भोगा हो। न्यायपालिका की यह मानवीय दृष्टि न केवल विधिक प्रक्रिया को अधिक करुणामय और उत्तरदायी बनाती है, बल्कि पीड़ितों के मन में न्याय व्यवस्था के प्रति विश्वास और गरिमा की भावना को भी पुनर्जीवित करती है। यह कथन उल्लेखनीय है कि “यौन अपराध की यातना को गहराई से वही समझ सकता है, जिसने उसे भोगा हो।” इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि न्यायपालिका की जटिल और औपचारिक शब्दावलियों के बीच कई बार वह मानवीय पीड़ा अनकही रह जाती है, जो वास्तव में पीड़ित के हिस्से में आती है।
विधिक तर्क अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, परंतु वे हमेशा उस आंतरिक टूटन, भय और आत्मसम्मान पर पड़े आघात को पूर्णतः व्यक्त नहीं कर पाते। मैं यह बात केवल सैद्धांतिक आधार पर नहीं कह रही, बल्कि अपने अनुभव के आधार पर कह पा रही हूं। लगभग 15 वर्ष पूर्व एक सर्द रात को टहलते समय अंधेरे में अचानक एक अजनबी पुरुष ने सामने आकर मुझे स्पर्श किया और पल भर में ओझल हो गया। वह क्षणिक था, पर उसका प्रभाव दीर्घकालिक रहा। उस दिन के बाद से आज तक मैं सड़क पर पैदल चलते हुए सहजता का अनुभव नहीं कर पाती। यदि कभी चलना भी पड़े तो मेरी दृष्टि सामने से अधिक पीछे की ओर रहती है, जैसे भय ने मेरे आत्मविश्वास के स्थान पर स्थायी निवास बना लिया हो।
जब कोई समर्थ, शिक्षित महिला केवल एक अनचाहे स्पर्श से वर्षों तक अपने भीतर असुरक्षा ढो सकती है, तो यह कल्पना सहज ही की जा सकती है कि वे बच्चियां, जो यौन शोषण जैसी गंभीर त्रासदी का सामना करती हैं, उनमें आत्मसम्मान, विश्वास और सुरक्षा की भावना किस गहराई तक आहत होती होगी। अतः यह केवल एक प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, न्यायिक दायित्व का अनिवार्य विस्तार है कि संपूर्ण न्यायिक तंत्र यौन पीड़िताओं के लिए ऐसा परिवेश निर्मित करे, जो संवेदनशील, करुणामय एवं संरक्षात्मक हो।
Date: 14-03-26
जनसंख्या पर आंध्र की गलती
संपादकीय
आंध प्रदेश राज्य के परिवारों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने के वास्ते जनसंख्या प्रबंधन नीति की घोषणा करने वाला पहला राज्य बन गया है। उसने दशकों पुराने ‘हम दो, हमारे दो’ परिवार नियोजन अभियान को उलटने की योजना बनाई है उस अभियान ने 2000 तक देश की कुल प्रजनन दर को लगभग 3.3 से घटाकर 2 तक लाने में मदद की थी। आंध्र की नई नीति के तहत दूसरे या तीसरे बच्चे को जन्म देने बाले दंपतियों को 25,000 रुपये का प्रोत्साहन दिया जाएगा और इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) उपचार पर सब्सिडी दी जाएगी। यह प्रोत्साहन राशि राज्य की कुल प्रजनन दर के गिरकर 1.5 तक हो जाने की चिंताओं के कारण दी जा रही है, जो प्रतिस्थापन स्तर 2.1 से काफी कम है। राज्य की आशंका यह है कि संभावित परिसीमन प्रक्रिया से पहले जनसंख्या वृद्धि की धीमी गति, संसद में राज्य के प्रतिनिधित्व को कम कर सकती है और प्रत्येक राज्य की जनसंख्या से जुड़ी वित्त आयोग की सिफारिशों के आधार पर आवंटन को भी प्रभावित कर सकती है। ये चिंताएं निराधार नहीं हैं और प्रगतिशील दक्षिणी राज्यों ने भी इसी तरह की आशंकाएं व्यक्त की हैं। लेकिन वास्तव में आंध्र प्रदेश का दृष्टिकोण अनुचित है।
एक तो, यह संकीर्ण जातीय पूर्वग्रह को दर्शाता है जो भारत जैसे एकीकृत देश के अनुरूप नहीं है। यह धारणा नीति के कार्यान्वयन को समस्याग्रस्त बना देगी। यदि पहचान भौगोलिक सीमाओं से परिभाषित होती है तो आंध्र प्रदेश में भारत के अन्य भागों से आए प्रवासियों की बड़ी संख्या है। क्या दशकों से राज्य में रह रहे पंजाबी या बंगाली इस सब्सिडी के पात्र होंगे ? नीति का उद्देश्य निस्संदेह तेलुगु आबादी को बढ़ावा देना है, हालांकि वह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है। दूसरी ओर बड़ी संख्या में तेलुगु भाषी अन्य राज्यों में श्री निवास करते हैं, जिनमें तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र प्रमुख हैं। क्या यह नीति उनकी चिंताओं का समाधान करेगी? मूल निवासी पर जोर देने की नीति का दृष्टिकोन अमेरिका और यूरोप में तेजी से अपनाई जा रही प्रथाओं की एक निराशाजनक नकल है, जो समान प्रजनन दर वाले राज्यों के लिए एक खराब उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह इस तथ्य को नजर अंदाज करता है। कि भारत का हिस्सा होने के नाते राज्य देश के किसी भी हिस्से से प्रतिभा और कौशल जुटा सकता है। प्रचालन आर्थिक विकास की रीढ़ रहा है। देश के सबसे गतिशील शहरों अतीत में कोलकाता, आज मुंबई, बेंगलुरु, गुरुग्राम या हैदराबाद का सबसे अधिक महानगरीय स्वरूप है। इनका निर्माण नौकरीपेशा और श्रमिक वर्ग के प्रचारियों की कड़ी मेहनत पर हुआ है।
इस नीति से प्रतिकूल परिणाम उत्पन्न होने का भी खतरा है। पहला खतरा मानव पूंजी की गुणवत्ता से संबंधित है। चूंकि भारत और आंध्र प्रदेश में घटती प्रजनन दर बेहतर शिक्षा और आय का परिणाम है, इसलिए सब्सिडी का अधिकांश हिस्सा उन गरीब परिवारों को मिल सकता है जिनके पास बड़े परिवारों का भरण- पोषण करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। राज्य ने इस समस्या को ध्यान में रखते हुए उदार प्रोत्साहन दिए हैं, जैसे कि तीसरे बच्चे के लिए पांच वर्ष की आयु तक 1,000 रुपये प्रति माह पोषण सहायता और दूसरे और तीसरे बच्चे के लिए 18 वर्ष की आयु तक सरकारी संस्थानों में मुफ्त शिक्षा। लेकिन ये किसी भी तरह से बच्चे के पालन-पोषण की पूरी लागत की भरपाई नहीं करते हैं। अब तक, समान प्रोत्साहन देने वाले किसी भी देश ने घटती प्रजनन दर को पलटने में सफलता प्राप्त नहीं की है। दूसरा नकारात्मक परिणाम महिलाओं के अधिकारों से संबंधित है। घटती प्रजनन दर आमतौर पर महिलाओं की शिक्षा में सुधार और कुछ हद तक समाज में उनकी बड़ती सक्रियता को दर्शाती है। छोटे परिवार महिलाओं पर बच्चों की देखभाल का बोझ कम करते हैं और उन्हें शिक्षा वा व्यावसायिक करियर में अवसर तलाशने में सक्षम बनाते हैं। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है भारत जैसे पितृसत्तात्मक देश में अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहन देने से महिलाओं की स्वतंत्रता सीमित हो सकती है और दशकों की कड़ी मेहनत से हासिल की गई सामाजिक प्रगति उलट सकती है।
Date: 14-03-26
लीड बैंक योजना क्या अब भी है प्रासंगिक
एमएस श्रीराम, ( लेखक, भारतीय प्रबंध संस्थान, बेंगलूर के लोक नीति केंद्र में प्राध्यापक हैं )
जब भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने लीड-बैंक योजना (एलबीएस) के लिए नया मसौदा परिपत्र जारी किया तो कई समाचार पत्रों में ग्रामीण शाखाओं में ऋण-जमा (सीडी) अनुपात की बारीकी से निगरानी के प्रस्ताव से संबंधित खबरें छापी गईं। हालांकि, थोड़ी छानबीन करने पर पता चलता है कि ये चिंताएं नई नहीं हैं बल्कि पिछले साल अप्रैल में जारी हुए मुख्य परिपत्र का ही हिस्सा थीं।
आरबीआई के परिपत्र में व्यक्त चिंताओं में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं हुआ है और वे पूर्ववत ही हैं। यानी ये बैंक सेवाओं से वंचित ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की उपस्थिति का विस्तार करने, बैंकिंग सेवाओं को सार्वभौमिक रूप से सुलभ बनाने, अवसरों की प्रखंड-स्तरीय पहचान के आधार पर ऋण का बेहतर वितरण, राज्यों के साथ समन्वय और इसके विकासात्मक अनिवार्यताओं आदि से जुड़ी हैं।
समन्वय तंत्र में कई उप-समितियों को शामिल करके किए गए मामूली बदलावों के अलावा मसौदा परिपत्र में कोई भी बात ऐसी नहीं थी जिस पर सुर्खियां बन सकें। अब जब परिपत्र चर्चा में है तो मौजूदा समय में एलबीएस की प्रासंगिकता का विश्लेषण करना हमारे लिए आवश्यक है। पिछली समीक्षा अगस्त 2009 में हुई थी जब उषा थोराट की अध्यक्षता वाली एक उच्च-स्तरीय समिति ने इस मुद्दे की जांच की थी। तब से हालात काफी बदल गए हैं। सूक्ष्म वित्त क्षेत्र के विकास से महिलाओं को ऋण की उपलब्धता आसान हो गई है। यह इस हद तक आसान हो गई है कि कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक ऋण देने के कारण संकट उत्पन्न हो गया है।
शाखा लाइसेंसिंग नीति (जिसके तहत 25 फीसदी नई शाखाएं उन स्थानों पर होनी चाहिए जहां बैंकिंग सुविधाएं नहीं हैं) ने भौतिक पहुंच बढ़ाने में मदद की है जबकि ‘जन धन योजना’ ने परिवारों को बैंकिंग सेवाओं से जोड़ा है। नए लघु वित्त बैंकों (एसएफबी) को लाइसेंस दिए गए हैं और निजी बैंकों सहित बैंकिंग क्षेत्र ने प्राथमिकता क्षेत्र ऋण (पीएसएल) के लक्ष्यों को लगातार हासिल किया है।
परिपत्र में एलबीएस के दो उद्देश्यों की बात की गई है। पहला उद्देश्य (समावेशी विकास प्राप्त करने के लिए प्राथमिकता क्षेत्रों में ऋण प्रवाह को बढ़ाना) पूरा किया गया है। दूसरे उद्देश्य (वित्तीय सेवाओं तक बेहतर पहुंच और उपयोग के माध्यम से वित्तीय समावेशन को गहरा करना) पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
मसौदा परिपत्र के तहत समन्वय संरचना में बदलाव की बात कही गई है जिसमें समावेशन और साक्षरता, कृषि, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) और भुगतान प्रणाली के लिए उप-समितियां शामिल हैं। यहां भी परिपत्र का लहजा बदले हुए मौलिक ढांचे पर ध्यान देने के बजाय ऋण योजना और वितरण पर केंद्रित है।
एलबीएस का प्रासंगिक ढांचा समाज के वंचित वर्गों तक ऋण पहुंचाने पर आधारित था और इसके लिए जिला-स्तरीय ऋण समितियों और वार्षिक प्रखंड और जिला स्तरीय ऋण योजनाओं की आवश्यकता थी। बैंकों के लिए एक स्पष्ट सेवा क्षेत्र भी निर्धारित था। इनमें से अधिकांश का उल्लंघन हो चुका है। सेवा क्षेत्र की अवधारणा अब अस्तित्व में नहीं है और परस्पर जुड़े बैंकिंग के साथ, गृह शाखा की अवधारणा भी अप्रासंगिक होती जा रही है।
ऋण बाजार की कई इकाइयां (सूक्ष्म वित्त संस्थान, सोना गिरवी रखने के बदले ऋण देने वाली कंपनियां और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां) जमा स्वीकार करने के लिए अधिकृत नहीं है लेकिन ऋण वितरित कर रही हैं। पीएसएल संरचना में बदलाव ने कम बैंकिंग सुविधाओं वाले जिलों को अतिरिक्त महत्त्व देकर कम सेवा वाले क्षेत्रों में ऋण देने को प्रोत्साहित किया है और पीएसएल प्रमाणपत्रों के माध्यम से पीएसएल दायित्वों की व्यापार सुविधा की वजह से अवसरों की खोज हो रही है।
आरबीआई ने एसएफबी के लिए प्राथमिकता क्षेत्र दायित्वों को समायोजित शुद्ध बैंक ऋण के 75 फीसदी से घटाकर 60 फीसदी कर दिया है। इसके अलावा, केंद्रीय बैंक ने एनबीएफसी-एमएफआई के लिए पात्रता हेतु परिसंपत्तियों की सीमा को घटाकर 60 फीसदी कर दिया गया है। ये दोनों ही संकेत आरबीआई के कठोर नियमन से हटकर बाजार की शक्तियों का सम्मान करने की ओर अग्रसर होने का संकेत हैं। इस संदर्भ में, प्रमुख बैंक द्वारा बैंकों की ऋण योजनाओं पर नजर रखना और जमा-निवेश अनुपात की निगरानी करना बेमतलब प्रतीत होता है। एमएफआई और अन्य संस्थान उन जिलों में ऋण दे रहे हैं जहां जमा एवं निवेश अनुपात कम है जबकि उन्हें जमा लेने की अनुमति नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में वित्तीय समावेशन की प्राथमिकताएं भिन्न हैं। सबसे पहले बचत आधारित समावेशन पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। जन धन योजना और बिजनेस कॉरेस्पोंडेंट की संरचना के साथ बैंक खातों का लगभग सार्वभौमीकरण हो चुका है। मगर गरीबों को सुरक्षित स्थानों पर बचत करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु कोई अभियान नहीं चलाया गया है जिसमें उन्हें कई विकल्प उपलब्ध कराए जाएं। यह धारणा काफी प्रबल है कि गरीब बचत नहीं करते या नहीं कर सकते। बचत केवल नकदी प्रवाह के प्रबंधन का मामला है जिसे गरीब एक कुशल फंड मैनेजर की तुलना में कहीं बेहतर ढंग से कर सकते हैं।
दूसरी बात, परिपत्र के मसौदे में भुगतान की बात की गई है और हम देखते हैं कि ऐप-आधारित भुगतान सर्वव्यापी हैं। हालांकि, खाता एक उपकरण (डिवाइस) से जुड़ा होता है। यहां मुख्य बात यह होनी चाहिए कि प्रत्येक बैंक खाताधारक को अपने निजी उपकरण से डिजिटल रूप से लेनदेन करने की सुविधा मिले।
तीसरा और सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू उपभोक्ता संरक्षण होगा। किसी कारणवश वित्तीय साक्षरता को हमेशा समावेशन से जोड़ दिया जाता है। ढांचा उपभोक्ता अधिकारों, उपभोक्ता संरक्षण और उपभोक्ता शिक्षा पर केंद्रित होना चाहिए। लोगों के पास विकल्प न होने पर उन्हें चक्रवृद्धि ब्याज दरों की गणना या फायदे सिखाने का कोई अर्थ नहीं है।
‘लीड बैंक’ का नामकरण पुराना हो चुका है। बदली हुई परिस्थितियों में राज्य-स्तरीय बैंकर समिति की संरचना पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है और वित्तीय क्षेत्र के डेटा को एक व्यापक समन्वय तंत्र के साथ एकीकृत करने की आवश्यकता है। चूंकि, आरबीआई सभी नियंत्रित संस्थाओं के लिए एक समान नियामक ढांचा बनाने का प्रयास कर रहा है इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि वह वित्तीय क्षेत्र (जिसमें बैंक, गैर-वित्तीय वित्तीय संस्थान और विभिन्न उप-वर्गीकरण, भुगतान प्रणाली आदि शामिल हैं) को समावेशन की सीमा और डेटा विश्लेषण के लिए एकीकृत रूप से देखे। वर्तमान परिपत्र केवल एक छोटा सा क्रमिक परिवर्तन है जिसके पीछे बहुत सारी पुरानी व्यवस्थाएं मौजूद हैं।
सहकारी समितियों, चिट फंड, गिरवी रखने वाले और साहूकार जैसी संस्थाओं ( जो सभी राज्य विधानों द्वारा विनियमित हैं) को इस ढांचे में एकीकृत किया जाना चाहिए और उन्हें समन्वय के दायरे में लाया जाना चाहिए। आरबीआई को राज्य सरकारों के साथ मिलकर राज्य स्तरीय वित्तीय क्षेत्र विकास और नियामक प्राधिकरण स्थापित करना चाहिए जिन्हें पंजीकरण अनिवार्य करने का अधिकार हो और जो केंद्रीय बैंक के समन्वय से डेटा एकत्र करें और उन्हें विनियमित करें। यह व्यवस्था शहरी सहकारी बैंकों के लिए कारगर साबित हुई है। इसे अन्य राज्य स्तरीय पहल को शामिल करने के लिए विस्तारित किया जाना चाहिए ताकि विकास एजेंडा पर समन्वय स्थापित किया जा सके।
पिछले 15 वर्षों के घटनाक्रम और परिवर्तनों को प्रासंगिक संदर्भ में रखते हुए नए संदर्भों के साथ एक उच्च-स्तरीय समिति के गठन की आवश्यकता है। छोटे-मोटे बदलाव बहुत हो चुके।
भारत के लिए बहुत अहम अमीरात
यशवंत देशमुख
कई बार छोटे देश भी दुनिया पर बड़ा असर डालते हैं, | खासकर जब बात वैश्विक व्यवस्था की हो। भारत और संयुक्त अरब अमीरात, यानी यूएई के रिश्ते को देखते हुए यही बात सबसे पहले ध्यान में आती है। यूएई भले ही आकार में छोटा हो, लेकिन उसकी रणनीतिक अहमियत, सोच, प्रभाव और उसके नेताओं की दूरदर्शिता बहुत बड़ी है। यही वजह है कि पिछले चार- पांच दशकों से भारत की अलग-अलग सरकारों ने उसके साथ मजबूत रणनीतिक साझेदारी पर जोर दिया, जिसका फायद सिर्फ भारतीय अर्थव्यवस्था को नहीं, बल्कि भारतीय नागरिकों और पूरे क्षेत्र को भी मिला है।
1980 के दशक में यूएई ज्यादातर भारतीयोंके लिए कोई बड़ा देश नहीं था। हां, कुछ लोग दुबई, शारजाह और दूसरी जगहों पर काम करने जाते थे और अच्छी कमाई कर लेते थे । उनमें बड़ी संख्या केरल से थी, कुछ आंध्र प्रदेश से और कुछ अन्य राज्यों से भी। उस समय यूएई की पहचान भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैचों से ज्यादा थी। हालात 1980 के दशक के बाद तेजी से बदले। शारजाह ने भारत को पाकिस्तान के खिलाफ जीतते भी देखा और हारते भी, मगर तब जो रिश्ता बहुत साफ नहीं था, वह अब बहुत अहम बन गया है।
संयुक्त अरब अमीरात भले ही एक छोटा देश है, पर वह भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच व्यापार 100 अरब डॉलर से भी ऊपर जा चुका है। जरा सोचिए अमेरिका, जिसकी आबादी करीब 35 करोड़ है और अर्थव्यवस्था लगभग 30 ट्रिलियन डॉलर की और चीन, जिसकी आबादी लगभग 130 करोड़ है और अर्थव्यवस्था करीब 20 ट्रिलियन डॉलर की ये दोनों भारत के दो सबसे बड़े व्यापारिक साझेदार हैं। लिहाजा ज्यादातर भारतीयों को यह जानकर हैरानी होती है कि अमेरिका और चीन के बाद भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदारन ब्रिटेन है, न कनाडा, न जापान और न ही कोई अन्य बड़ा देश। वह है- संयुक्त अरब अमीरात ।
भारत-यूएई की यह साझेदारीपूरे क्षेत्र के लिए बेहद अहम है। 2022 में दोनों देशों के बीच जो समझौता हुआ, उसके बाद व्यापार तेजी से बढ़ा है, क्योंकि कई शुल्क बाधाएं कम हुई। और यह रिश्ता एकतरफा नहीं है, यूएई को भारत बड़े पैमाने पर सामान निर्यात भी करता है और वहां से आयात भी करता है। 2022 में लक्ष्य रखा गया था कि 2030 तक दोनों देशों के बीच व्यापार 100 अरब डॉलर के पार पहुंच जाए। यह लक्ष्य तो एक साल से भी पहले पूरा हो चुका है। अब 200 अरब डॉलर का लक्ष्य भी असंभव नहीं लगता ।
यहां करीब 40 लाख भारतीय रहते हैं। वे यहां सिर्फ काम करके पैसा कमाने के लिए नहीं हैं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और बेहतर जीवन के साथ रह रहे हैं। उन्हें यह भरोसा है कि कानूनसबकेलिएकाम करता है। इसलिए बात अब सिर्फ इतनी नहीं रह गई कि भारतीय यूएई में रहते हैं और हर साल करीब 25 अरब डॉलर रकम भारत भेजते हैं। बात यह भी है कि जो देश आज से करीब पांच दशक पहले तक दुनिया में बहुत कम जाना जाता था, वह दूरदर्शी नेतृत्वकीबदौलत आज व्यापार, बैंकिंग, वित्त और निवेश का बड़ा वैश्विक केंद्र बन चुका है। यह अब उन जगहों में शामिल हो चुका है, जिनको दुनिया भर के प्रवासी अपना घर मानते हैं। चाहे अमेरिका हो, ब्रिटेन, रूस, मलेशिया, इंडोनेशिया, भारत, पाकिस्तान या कोई अन्य देश यूएई मेहनती पेशेवरों, कारोबारियों और बेहतर जीवन का सपना देखने वालों के लिए सुरक्षित ठिकाना बन गया है।
इस देश की रणनीतिक अहमियत भी खूब है। भारत से यूरोप तक जाने वाला जो कॉरिडोर प्रस्तावित है, वह जब भी पूरी तरह आकार लेगा, उसमें यूएई की बड़ी भूमिका होगी। माना जा रहा है कि इसे पूरा होने में एक दशक का समय लग सकता है, पर तब तक भारत और यूएई एक-दूसरे के मजबूत साझेदार बने रहेंगे। यह रिश्ता राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। इसी वजह से पश्चिम एशिया में हाल का संघर्ष एक अस्थायी रुकावट की तरह देखा जाना चाहिए।
यहां रहने वाले भारतीय इसे अपना दूसराघर मानते हैं। कुछ तो यहां दशकों से रह रहे हैं। मैं खुद यहां 15 सालसे अधिक समय से हूं। लोगों ने अपने परिवार यहां ऐसे माहौल में पाले- बढ़ाए हैं, जहां सुरक्षा का स्तर बहुत ऊंचा । यहां के शासक सिर्फ व्यावहारिक नहीं हैं, बल्कि आगे बढ़कर नेतृत्व करने वाले लोग हैं। भारत में बहुत से लोग दुबई को सिर्फ दो बातों से जोड़कर देखते हैं- कर मुक्त अर्थव्यवस्था और सोना बेचने वाली मशीनें, पर यदि आप यहां रहने वाले लोगों से बात करें, तो वे बताएंगे कि यूएई की विशेषता क्या है।
सबसे बड़ी विशेषता है यहां की सुरक्षा। दूसरी, आसान और डिजिटल व्यवस्था, जहांकारोबार चलाने में बेवजह की सरकारी रुकावटें बहुत कम हैं। तीसरी है, विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा । चौथी है, बड़ा भारतीय समुदाय, खान-पान और संस्कृति की नजदीकी, जिसकी वजह से यहां अपनेपन का एहसास होता है। पांचवीं, भारत के करीब होना। यहां से भारत के एक दर्जन से ज्यादा शहरों के लिए सीधी उड़ानें हैं, और दिल्ली के लिए तो लगभग हर एक-दो घंटे में उड़ान मिल जाती है। इसलिए, इस मुल्क को ‘दूसरा घर’ मानने की वजह सिर्फ टैक्स-फ्रीव्यवस्था या सस्ता सोनानहीं है। इस देश के संस्थापकों ने लगातार कोशिश की है कि यह लाखों मेहनतीप्रवासियों के लिए अवसरों की जगह बने और वह भी अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाए रखते हुए। यह बात सीखने लायक है।
मौजूदा अमेरिका-इजरायल और ईरान युद्ध के दौरान मैंने कई जगहों पर पड़ा है कि यह जंग यूएई की सुरक्षित छवि को नुकसान पहुंचाएगी। हालांकि, ऐसे दावे करने वाले लोग एक अहम बात भूल जाते हैं। सुरक्षा का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि कोई मिसाइल आपकी तरफ आए और उसे रास्ते में रोक दिया जाए। सुरक्षा का मतलब यह भी है कि आपकी रोजमर्रा की जिंदगी कितनी सुरक्षित और व्यवस्थित है।
यहां की सरकार लोगों को सुरक्षित महसूस कराने के लिए हर कदम उठा रही है। ड्रोन और मिसाइलों को रोक रही है, ठीक वैसे ही, जैसे पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत ने किया था। तब जम्मू, अंबाला और अमृतसर जैसे इलाकों में आसमान में तनाव दिखा था, वैसाही तनाव अभी अरब देशों में दिख रहा है। हम भी इस मुश्किल दौर से निकल जाएँगे। हमारे लिए यह घर है। दूसरा घर सही, पर घर तो है और जब घर पर संकट आता है, तो इंसान उसे छोड़कर नहीं भागता।
Date: 14-03-26
एक और महाभियोग
संपादकीय
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेशकुमार को हटाने के लिए विपक्षी सांसदों ने संसद के दोनों सदन में जो नोटिस दिया है, वह ऐतिहासिक है। कई लोगों कोइस पर अफसोस होगा और कई लोग इसके पीछे सिर्फ सियासत देख रहे होंगे, पर सच यही है कि इस नोटिस या महाभियोग को लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों का समर्थन मिल चुका है। पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस के प्रयासों से यह विपक्षी अभियान चल रहा है। देश में यह पहली बार है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग वाला नोटिस पेश किया गया है। मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त पर मुख्यतः सात आरोप लगाए गए हैं, जिनमें पक्षपातपूर्ण व्यवहार, चुनावी धोखाधड़ी की जांच में जान-बूझकर बाधा डालने और सामूहिक मताधिकार से वंचित करने जैसे आरोप शामिल हैं। देश में पहले भी विपक्षी दल चुनाव आयुक्तों पर पक्षपात के आरोप लगाते थे, पर कभी महाभियोग की जरूरत नहीं पड़ी थी। यह कहना ही चाहिए कि विपक्षी दल मिलकर इतिहास रचने जा रहे हैं।
विगत कुछ वर्षों से विपक्ष वोट चोरी जैसे आरोप कुछ ज्यादा ही लगाता आया है और चुनाव आयोग की भी शिकायत करता आया है। अच्छा मौका है, अब विपक्ष सदन में साबित कर दिखाए कि वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त कैसे अनैतिकता बरत रहे हैं। हाल ही में विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भी हटाने के हर मुमकिन उपाय किए थे, पर सफलता नहीं मिली। अब क्या मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने में सफलता मिलेगी? विपक्ष के पास संख्या बल नहीं है, पर क्या विपक्ष नैतिक रूप से इतना सुदृढ़ है कि वह मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अकाट्य तथ्य पेश कर सकता है ? यहां यह ध्यान रखने की जरूरत है कि एक लंबा दौर देश में ऐसा रहा है, जब चुनाव आयुक्तों को सत्तारूढ़ दल सिर्फ अपनी मर्जी से नियुक्त करता था। पहले की केंद्र सरकारोंने रिटायर हो चुके चुनाव आयुक्तों को ऊंचे पद दिए हैं, केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी शामिल किया है। देश में शायद ही कोई ऐसा दौर रहा हो, जब चुनाव आयुक्तों को आरोपों का सामना न करना पड़ा हो। खैर, विपक्षी दल अपने अधिकार के तहत महाभियोग ला रहे हैं और अगर मुख्य चुनाव आयुक्त अनैतिक हैं, तो उनके लिए चुनाव आयोग में जगह नहीं होनी चाहिए। वाकई, वोट चोरी और फर्जी मतदान को यह देश बर्दाश्त नहीं कर सकता। उम्मीद है, महाभियोग पर सदन में जो बहस होगी, उससे देश को कुछ सबक हासिल होंगे।
ध्यान रहे, पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के खिलाफ है। उसे लगता है। कि यह पुनरीक्षण भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। वैसे, तृणमूल कांग्रेस पुनरीक्षण के खिलाफ कोलकाता से दिल्ली तक हर तरकीब आजमा रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी पुनरीक्षण की प्रक्रिया को रोका नहीं है। पश्चिम बंगाल में अभी पुनरीक्षणका काम न्यायिक निगरानी में चल रहा है, पर स्पष्ट है, तृणमूल कांग्रेस या विपक्षी दलों को न्यायिक निगरानी पर विश्वास नहीं है। यह एक बड़ी चिंता की बात है । वास्तव में, पुनरीक्षण में राजनीतिक दलों की भी बड़ी भूमिका होती है। ये दल और उनके कार्यकर्ता अगर ठान लें, तो फर्जी मतदान तो दूर की बात, कोई फर्जी मतदाता भी नहीं बन सकता। यह अफसोस की बात है कि अपने स्तर पर राजनीतिक दल मतदाता परीक्षण ठीक से नहीं करते हैं। महाभियोग अपनी जगह है, पर बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल इस पूरी कवायद से कुछ सीखेंगे ?