10-03-2026 (Important News Clippings)

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10 Mar 2026
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Date: 10-03-26

लोकतंत्र का उपहास उड़ाती रेवड़ी संस्कृति

विकास सारस्वत, ( लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )

अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों द्वारा चुनावी राजनीति के दृष्टिगत मुफ्त सुविधाएं बांटने वाली प्रवृत्ति की कड़ी आलोचना की। ऐसी राजनीति को देश के आर्थिक विकास में बाधक बताते हुए कोर्ट ने कहा कि समर्थ लोगों को भी मुफ्त सुविधाएं देना गलत है और ऐसी सुविधाएं बांटने की बजाय सरकारों को रोजगार पैदा करने पर ध्यान देना चाहिए। कोर्ट तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें विद्युत संशोधन नियम 2024 के उस नियम 23 को रद करने की मांग की गई थी, जो राज्य सरकार द्वारा गरीब-अमीर, सभी को मुफ्त बिजली आवंटन के उसके प्रस्ताव में बाधा बन रहा था। सुनवाई के दौरान करदाताओं के पैसे का मुफ्त सुविधाओं और कैश ट्रांसफर के लिए अंधाधुंध उपयोग करने पर भी कोर्ट ने गहरी चिंता व्यक्त की। उसने इस पर हैरानी जताई कि वित्तीय घाटे के बावजूद राज्य सरकारें मुफ्तखोरी को बढ़ावा दे रही हैं और इन योजनाओं के लाभार्थियों में संपन्न लोग भी शामिल हैं।

चुनाव पूर्व इस वित्त वर्ष के लिए पेश तमिलनाडु के बजट में लगभग 99,000 करोड़ की राशि कैश ट्रांसफर, सब्सिडी और मुफ्त योजनाओं के लिए आवंटित की गई है। यह राशि समूचे बजट की एक तिहाई बनती है, जबकि विकास कार्यों में खर्च होने वाली राशि इस व्यय की आधी यानी करीब 47,000 करोड़ है। बजट राशि का ऐसा बेपरवाह आवंटन एक राजनीतिक प्रवृत्ति बन गया है और इसके दुष्परिणाम अनेक राज्यों में देखे जा सकते हैं। यह विडंबना ही है कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से रेवड़ी संस्कृति पर चिंता जताए जाने के बीच ही अभिनेता से नेता बने विजय ने घोषणा की कि उनके दल टीवीके की सरकार बनने पर 60 साल की उम्र तक की महिलाओं को हर महीने 2,500 रुपये की आर्थिक सहायता, हर परिवार को साल में छह मुफ्त एलपीजी सिलेंडर, दिए जाएंगे।

उन्होंने अन्य लोकलुभावन घोषणाएं करते हुए युवतियों की शादी के समय आठ ग्राम सोना और एक रेशमी साड़ी देने का भी वादा किया। ऐसी योजनाओं ने कई राज्यों के राजकोष पर भारी दबाव बनाया है। पंजाब की स्थिति विशेषकर खराब है। यहां कुल राजस्व प्राप्ति का 18 प्रतिशत बिजली की सब्सिडी में ही व्यय हो रहा है। राज्य के बजट का 10 प्रतिशत से भी कम आवंटन विकास परियोजनाओं की मद में हो रहा है। बिजली सब्सिडी के अलावा अन्य लाभार्थी योजनाओं के चलते पंजाब का वित्तीय प्रबंधन इतना खराब हो चला है कि ऋण से राज्य सकल घरेलू उत्पाद यानि डेट टू एसजीडीपी रेशियो 45 से 46 प्रतिशत के करीब आ पहुंचा है। जबकि राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन यानी एफआरबीएम समिति इसे 20 प्रतिशत पर रखने का सुझाव देती है। इसके बाद भी पंजाब सरकार ने महिलाओं को हर माह 1,000 रुपये देने की घोषणा की है।

वर्ष 2025-26 के अंत तक कर्नाटक पर कुल देनदारियां 7.64 लाख करोड़ तक पहुंच गई थीं, जो सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 27 प्रतिशत है। कर्नाटक का डेट टू एसजीडीपी रेशियो अभी ठीक है, पर यह 10 वर्ष पूर्व की स्थिति से काफी खराब है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस प्रवृत्ति को रेवड़ी संस्कृति बताते हुए इसकी आलोचना की थी, पर दुखद यह है कि भाजपा शासित मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी वित्त प्रबंधन बुरी तरह गड़बड़ाया हुआ है। मध्य प्रदेश के 2026-27 के 4.38 लाख करोड़ रुपये के बजट में लगभग 80,000 करोड़ रुपये राशि का आवंटन कैश ट्रांसफर, सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं के लिए किया गया है। यह राशि लाड़ली बहना, लाड़ली लक्ष्मी, किसान कल्याण, तीर्थ यात्रा, साइकिल एवं दुग्ध वितरण और बिजली सब्सिडी जैसे प्रयोजनों पर खर्च की गई है।

रेवड़ी संस्कृति के चलते पंजाब, बंगाल, आंध्र और राजस्थान ऐसे राज्य बन गए हैं, जहां ढांचागत विकास कार्यों पर पूंजीगत व्यय कुल बजट के 10 प्रतिशत से भी कम हो गया है। इस परिपाटी का दुखद पहलू यह है कि सामाजिक कल्याण और मुफ्तखोरी में भेद खत्म हो गया है। पार्टियां स्कूटी, टीवी, मिक्सर ग्राइंडर और सोना तक बांटने की घोषणा करती हैं। मुफ्तखोरी पर खर्च प्रत्येक रुपया शिक्षा, स्वास्थ्य एवं ढांचागत विकास जैसे आवश्यक निवेश की कीमत पर हो रहा है, जिनसे गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन का दीर्घकालिक समाधान संभव है। ऐसा नहीं है कि पार्टियां यह सब समझती नहीं। उन्हें पता है कि उत्पादकता में अपेक्षित वृद्धि के बिना मुफ्तखोरी पर भारी खर्च मुद्रा का अवमूल्यन भी करेगा, फिर भी राजनीतिक हित राष्ट्र हित पर भारी पड़ रहे हैं।

रेवड़ी आवंटन विकास कार्यों में तो बाधा बन ही रहा है, यह ऐसी राजनीतिक संस्कृति को भी जन्म दे रहा है, जहां नागरिकों का ध्यान सरकारों के शासकीय दायित्व से हटकर व्यक्तिगत लोभ और लालच पर अटका दिया गया है। जन अपेक्षा सरकारों की कार्यकुशलता और पारदर्शिता की बजाय इस ओर मुड़ रही है कि अगले चुनाव में कौन पार्टी कितनी लुभावनी योजनाएं घोषित करेगी। चुनावों में छिपकर नोट, शराब और साड़ी वितरण जैसे प्रयत्नों से परे रेवड़ी संस्कृति ने राजनीतिक भ्रष्टाचार को ऐसा संस्थागत रूप दे दिया है, जहां मतदाता को एलानिया घूस दी जा रही है।

मूल संसाधन एकत्रित करने से लेकर शिक्षा और विवाह जैसे गृहस्थ दायित्वों का भार अपने ऊपर ले रही सरकारें शासन को ऐसी धारा में ले जा रही हैं, जहां व्यक्तिगत पुरुषार्थ का महत्व क्षीण हो रहा है। इसका सीधा असर उत्पादकता पर भी पड़ रहा है। दक्षिण के कई राज्यों में हो रहे प्रवासन का बड़ा कारण ऐसी कल्याणकारी योजनाओं के चलते स्थानीय श्रम शक्ति की बढ़ती अनुपलब्धता है। कुछ शोध यह दर्शा रहे हैं कि ऐसी योजनाएं अवैध बांग्लादेशी आप्रवासन को भी बढ़ावा दे रही हैं। नीति निर्धारण, विधायिका के हाथ में होने के कारण न्यायालय भी टिप्पणी के अतिरिक्त ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। वहीं नेताओं में मुफ्त सुविधाएं देने की होड़ लगी हुई है। रेवड़ी संस्कृति का विरोध करने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने भी अब इस रुझान से समझौता कर लिया है। ऐसे में प्रबुद्ध जनों को ही राजनीति के इस बिगड़ते स्वरूप पर लोगों को जागरूक करना होगा।


Date: 10-03-26

भारत के शहरों को चाइए जवाबदेही सीईओ

लवीश भंडारी, ( लेखक सीएसईपी रिसर्च फाउंडेशन के प्रमुख हैं। )

देश में 16वें वित्त आयोग ने ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों के लिए आवंटन बढ़ाकर लगभग 8 लाख करोड़ रुपये करने का बिल्कुल सही कदम उठाया है जिसका वितरण पांच वर्षों के दौरान किया जाएगा। इसमें से 41 फीसदी राशि विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों के लिए निर्धारित की गई है। इसके अलावा, वित्त आयोग ने इन अनुदानों पर कुछ शर्तें भी जोड़ी हैं जिनमें प्रमुख शर्तें राज्य वित्त आयोगों की स्थापना, स्थानीय निकायों के लेखा परीक्षा को समय पर पूरा करना और निर्वाचित स्थानीय निकायों के गठन से जुड़ी हैं। ये शर्तें आवश्यक और सही हैं जो संबंधित संस्थाओं को मजबूत करने में मदद करेंगी।

इसके साथ ही केंद्रीय बजट में शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के लिए 1 लाख करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है जिसका उपयोग अगले पांच वर्षों में शहरी चुनौतियों को हल करने के लिए किया जाएगा। हालांकि इसके लिए भी शर्तें हैं, मसलन इस आवंटन का 25 फीसदी तब ही जारी किया जाएगा जब राज्य सरकार समान राशि का योगदान करेगी और बाकी राशि, बाजार से बॉन्ड, ऋण, सार्वजनिक-निजी साझेदारी आदि के रूप में जुटाई जाएगी। ऐसे में बजट का उद्देश्य केवल फंड प्रवाह बढ़ाना ही नहीं बल्कि बाजार संस्थाओं को भी मजबूत करना है।

मेरे विचार से ये दोनों उपाय उन संस्थाओं में महत्त्वपूर्ण रूप से सुधार लाएंगे जो शहरी स्थानीय निकायों के संचालन और उनके लिए फंड प्रवाह से जुड़े हैं। ये उपाय फंड प्रवाह को सुगम जरूर बनाते हैं लेकिन ये भारत के शहरों के व्यापक रूप से खराब प्रदर्शन का कारण बने शहरी प्रशासनिक समस्या का हल नहीं करते। ऐसे में हमें एक और पहल की आवश्यकता है जो उस बुनियादी समस्या को ठीक करे जो भारत के अधिकांश शहरों की समस्याओं की जड़ है।

अब, पहले इस पर विचार करते हैं कि आखिर क्या कारण है कि कई ग्रामीण क्षेत्र वास्तव में शहरी क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत होना नहीं चाहते हैं? कुछ लोगों का मानना है कि यह उच्च करों के डर के कारण है। हालांकि भारत में संपत्ति कर बहुत कम होते हैं ऐसे में यह एक बुनियादी कारण नहीं हो सकता। कुछ लोग मानते हैं कि इससे क्षेत्रीय नियमन लागू होगा जो बड़े भूमि मालिकों के लिए हानिकारक हो सकता है लेकिन यह भी तर्क सही नहीं है क्योंकि शहरी क्षेत्र में बदलाव आने से बुनियादी ढांचे में भी सुधार होता है और जमीन की कीमतें बढ़ जाती हैं जिससे भूमि मालिकों को बड़ा लाभ मिलता है।

एक मुख्य कारण यह भी है कि ग्रामीण सरकारों पर नेताओं का नियंत्रण होता है लेकिन शहरी सरकारी प्रशासन में शक्तियां अफसरशाहों के पास होती हैं। ऐसे में एक ग्रामीण क्षेत्र के शहरी क्षेत्र में बदलने पर एक ग्रामीण नेता को प्रभावी रूप से अपनी शक्तियां राज्य सरकार के नियंत्रण वाली अफसरशाही व्यवस्था को सौंपनी होती है।

कई रिपोर्टों और अध्ययनों ने इस मुद्दे को कुछ इस तरह पहचाना है: स्थानीय निर्वाचित अधिकारी (जैसे महापौर या मेयर) जो चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से जनता के प्रति जिम्मेदार होते हैं वास्तव में उनके पास बहुत कम शक्तियां होती हैं। वहीं, दूसरी ओर शहर के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी (सीईओ) के पास अधिक शक्तियां होती हैं और वह प्रशासन को नियंत्रित करता है और प्रभावी रूप से राज्य सरकार को रिपोर्ट करता है।

इस तरह जो लोग शहर के नागरिकों के प्रति जिम्मेदार होते हैं (नगरपालिका के पार्षद और महापौर), उन्हें अफसरशाही के माध्यम से काम कराना पड़ता है जो वास्तव में शहर के लोगों के प्रति उतने जिम्मेदार नहीं होते बल्कि राज्य सरकार के प्रति अधिक जवाबदेह होते हैं। इस तरह की जवाबदेही और अधिकार के बीच असमानता वास्तव में प्रशासनिक विफलताओं का कारण बनती है। इससे शहरी सरकारों का पूंजी प्रवाह भी प्रभावित होता है जिससे शहरों के संसाधनों और क्षमताओं में कमी आती है।

लेकिन एक और तथ्य पर भी ध्यान देना होगा। हमारी संस्थागत व्यवस्था में ऐसा कुछ भी नहीं है जो राज्य सरकार को नगर परिषद के राजनीतिक प्रमुख को अधिक अधिकार देने से रोकता हो। लेकिन आजादी के 75 से अधिक वर्षों में किसी भी राज्य सरकार ने नगर स्तर के नेताओं को वास्तविक शक्तियां नहीं सौंपी हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो जहां एक ओर नागरिक समाज और अकादमिक जगत के लोगों के बीच इस बात पर सहमति है कि स्थानीय स्तर के नेताओं को अधिक अधिकार मिलने चाहिए वहीं दूसरी ओर अफसरशाही और राजनीतिक वर्ग के बीच एक अनकही आपसी सहमति भी दिखाई देती है कि भारत के शहरों पर नियंत्रण, राज्य सरकार द्वारा नियुक्त अफसरशाहों के माध्यम से ही होना चाहिए।

लेकिन सभी यह मानते हैं कि मौजूदा व्यवस्था वास्तव में शहरी प्रशासन और संसाधनों के प्रबंधन में कई प्रकार की असफलताओं की स्थिति बना रही है। यही कारण है कि इन समस्याओं को सुधारने के लिए केंद्र सरकार और वित्त आयोग को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में यह तनाव कैसे दूर किया जा सकता है? उदाहरण के लिए, केंद्र सरकार एक सशर्त योजना के माध्यम से स्थानीय नेताओं को अधिक अधिकार दे सकती है।

इस योजना के तहत पहला कदम यह हो सकता है कि शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी की नियुक्ति और हटाने का अधिकार मेयर को दिया जाए। इसके साथ-साथ कुछ सहायक सुधार भी आवश्यक होंगे जैसे कि रिपोर्टिंग की कुछ व्यवस्थाओं में बदलाव करना।

बेशक, अफसरशाही में शायद ही कोई इन सुधारों से सहमत होगा क्योंकि कार्यरत अधिकारी आमतौर पर राज्य या राष्ट्रीय मुख्यालय को रिपोर्ट करना पसंद करते हैं, जहां से वास्तव में उनके करियर की प्रगति तय होती है। इस व्यवस्था को और बेहतर बनाने के लिए एक विकल्प यह भी है कि सरकार, शहर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पदों को अफसरशाही से बाहर के पेशेवर प्रबंधकों के लिए भी खोल सकती है।

हालांकि इस बात का अंदाजा किसी को नहीं है शायद कोई सुधारवादी सरकार भविष्य में शहरों को दूसरे देशों से भी योग्य सिटी सीईओ नियुक्त करने की अनुमति दे दे। हालांकि, ऐसे कदम भले ही कार्यकुशलता बढ़ाएं लेकिन इससे अफसरशाही व्यवस्था में नाराजगी हो सकती है और इसका विरोध भी संभव सकता है।

इसके अलावा कई मुख्यमंत्री भी इससे खुश नहीं होंगे क्योंकि इससे शहरों पर उनका नियंत्रण कम होकर स्थानीय नेताओं के पास चला जाएगा। इसी कारण भारत के लिए वह व्यवस्था अपनाना कठिन हो सकता है जिसे दुनिया के कई देशों में अपनाया गया है यानी सशक्त मेयर मॉडल। यह मॉडल भारत में लागू होना मुश्किल है क्योंकि सत्ता के मौजूदा केंद्रों को इससे बहुत कुछ खोना पड़ सकता है।

ऐसे में भारत के लिए एक अधिक व्यावहारिक समाधान जवाबदेह सीईओ मॉडल हो सकता है। इसके लिए तीन महत्त्वपूर्ण पहलुओं की आवश्यकता होगी। पहला, शहरों के प्रदर्शन की हर साल व्यापक और निष्पक्ष निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए। दूसरा, इन मानकों के आधार पर सिटी सीईओ के लिए स्पष्ट और अच्छी तरह परिभाषित मुख्य जिम्मेदारी क्षेत्र (केआरए) तय किए जाएं और उनके साथ पुरस्कार या प्रोत्साहन की एक तय प्रणाली भी हो। तीसरा, सीईओ के नेतृत्व वाली शहर प्रशासन व्यवस्था को कई स्तरों पर जवाबदेह बनाया जाए मसलन मोहल्ला स्तर पर नागरिक समाज, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन और बाजार संघों के प्रति, वार्ड स्तर पर पार्षदों के प्रति और शहर स्तर पर नगर परिषद के प्रति जवाबदेही तय हो।

कुछ देशों जैसे चीन में, शहरों का नेतृत्व अफसरशाह ही करते हैं। लेकिन उन देशों के उलट भारत में शहर के सीईओ की कामयाबी या विफलता का आकलन करने और उसके आधार पर पुरस्कार या दंड देने की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है। साथ ही, शहर के लोगों के प्रति उनकी जवाबदेही भी स्पष्ट रूप से तय नहीं है।

यदि ऐसी निगरानी व्यवस्था बनाई जाए तो अफसरशाह-सीईओ का उद्देश्य केवल व्यवस्था बनाए रखना नहीं रहेगा बल्कि शहर की अर्थव्यवस्था, रोजगार, बुनियादी सेवाओं, सुरक्षा, सार्वजनिक परिवहन और सार्वजनिक स्थानों में सुधार लाना भी होगा। नागरिक समाज की प्रतिक्रिया, स्पष्ट मापदंडों और उपयुक्त प्रोत्साहन प्रणाली का यह संयोजन मौजूदा व्यवस्था की तुलना में बेहतर शहरी शासन सुनिश्चित कर सकता है। इससे फंड का बेहतर उपयोग होगा, नीतियों पर बेहतर प्रतिक्रिया मिलेगी और संसाधनों के आवंटन के बेहतर परिणाम सामने आएंगे।


Date: 10-03-26

विकल्प की राह

संपादकीय

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध में एक और इजराइल -अमेरिका की तरफ से हमले में ईरान के तेल उत्पादन केंद्रों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश हो रही है, तो दूसरी ओर ईरान के जवाब की जब में भी कतर, बहरीन और सऊदी अरब जैसे खाड़ी के कई तेल उत्पादक देश आ रहे हैं। इसके अलावा, ईरान ने होर्मुज समुद्री मार्ग को जिस तरह बाधित कर दिया है. उसका मुख्य असर तेल की आपूर्ति पर पड़ना शुरू हो चुका है। हमलों की तीव्रता अगर बनी रही, तो केवल भारत नहीं, समूचे एशिया में तेल और गैस की कीमतें काफी बढ़ सकती हैं एशिया के कई विकासशील देश शायद इसका बोझ नहीं उठा पाएंगे और नतीजतन उन्हें अपने यहां तेल और गैस की मांग को घटाने की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे में भारत के सामने भी अपने तेल और गैस की जरूरत भर आपूर्ति को बनाए रखने की बहुस्तरीय चुनौती आ खड़ी हुई है। तेल खरीच के मोर्चे पर भारत जिन नई परिस्थितियों से बो-चार है, उसमें अब स्वाभाविक हो नए विकल्प तैयार करना वक्त का तकाजा है।

दरअसल, व्यापार समझौते में अमेरिका ने जिस तरह भारत के सामने रूस से तेल नहीं खरीदने की शर्त लगाई, उससे स्थितियां ज्या जटिल हुई। मगर बुद्ध की वजह से पैदा हुई नई परिस्थिति में इस संबध में फैसला लेने के लिए भारत स्वाभाविक ही अपनी जरूरतों के मुताबिक कदम बढ़ा रहा है। शायद यही वजह है कि हो जलडमरूमध्य का रास्ता रोके जाने के बाद पैदा होने वाली स्थिति के मदेनजर भारत को अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए रूस या अन्य विकल्प की ओर देखने को लेकर अमेरिका ने नरम रुख अख्तियार किया है। गौरतलब है कि भारत में एलएनजी यानी तरल प्राकृतिक गैस का पचास फीसर खाड़ी देशों से आता है, जिसका उपयोग बिजली उत्पादन और खाप बनाने में किया जाता है। इसी तरह एलपीजी का साठ फीसद इन्हीं देशों से आता है। मगर जब से ईरान ने होर्मुन समुद्री मार्ग को बाधित किया है, तब से तेल और गैस की सहज आपूर्ति पर इसका व्यापक असर पड़ा है। हमले के कई दिनों बाद भी दोनों पक्षों की ओर से युद्ध विराम के लिए किसी तरह की पहल करने के संकेत नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में दुनिया के एक बड़े हिस्से में तेल और गैस का संकट खड़ा हो सकता है।

हालांकि भारत के पास अगले करीब दो महीने के लिए अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए पर्याप्त भंडार है, लेकिन अभी जिस तरह बुद्ध के लंबा खिंचने की आशंका दिख रही है, उसके मदेनजर पूर्व तैयारी की जरूरत है। इसी वजह से भारत ने अब अपनी ऊर्जा खरीर की रणनीति में काफी बदलाव किया है, ताकि किसी एक रास्ते के बाधित होने पर आपातकालीन आपूर्ति भी बाधित होने की स्थिति पैदा हो फिलहाल भारत ने जहां रूस से तेल खरीदने का रास्ता खुला रखा है, वहीं अब इसके सामने पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका, मध्य एशिया और कई अन्य देशों से आपूर्ति को सहज बनाए रखने का विकल्प है। इसके अलावा, आस्ट्रेलिया और कनाडा सहित कई अन्य देशों ने भी गैस आपूर्ति की पेशकश की है और मौजूदा संकट को देखते हुए भारत अपनी ऊर्जा साझेदारी के चायरे में विस्तार कर रहा है। जाहिर है मुश्किल वक्त में भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के नए रास्ते तैयार किए हैं और उम्मीद है कि बुद्ध की वजह से उपजे संकट की मार आम लोगों पर नहीं पड़ेगी।


Date: 10-03-26

बदलाव की बयार

संपादकीय

नेपाल में हुए चुनाव के नतीजे आने के बाद देश की राजनीतिक तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई है। नई पीढ़ी के अगुआ बने बालेंद्र शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) ने कई दिग्गजों और पुरानी पार्टियों को भारी शिकस्त दी है। अगर सब कुछ उम्मीद के अनुरूप हुआ और बालेंद्र शाह को ही नेता चुना गया, तो नेपाल के संसदीय इतिहास में वे सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री होंगे। अब तक वहां जितने भी प्रधानमंत्री बने हैं, वे कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। माना जा रहा है कि दो-तिहाई सीटों पर जीत के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल कर चुकी आरएसपी के नेतृत्व में बनने वाली सरकार अपना पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करेगी। देश में पिछले दिनों हुए चुनावों में नागरिकों और विशेषकर युवा वर्ग ने इस पार्टी पर जिस तरह भरोसा किया है, उसके मद्देनजर नेपाल में भावी सरकार के सामने जन आकांक्षाओं को पूरा करने की बड़ी चुनौती होगी। वहीं नई सरकार को घरेलू समस्याओं से निपटने के साथ देश के आर्थिक विकास में आए ठहराव को दूर करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा । उसे पड़ोसी देशों खासकर भारत से संबंध बेहतर बनाने के भी प्रयास करने होंगे । पुरानी सरकार के कामकाज के जिस तरीके के खिलाफ वहां युवा वर्ग के भीतर व्यापक आक्रोश पैदा हुआ, उसे बदलना सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगा ।

नेपाल के लोगों का मानना है कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेता बालेंद्र शाह के भीतर देश की राजनीति और नीतियों को बदल सकने की क्षमता है। दरअसल, शाह को महापौर के अपने कार्यकाल में जमीनी स्तर पर सुधार के कई कार्यों के लिए जाना जाता है। चुनावी नतीजों के बाद अब उनसे उम्मीद की जा रही है कि वे भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार करने के साथ व्यवस्था में भी बड़ा बदलाव करेंगे। नई सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती रोजगार सृजन की भी होगी । नेपाल में बेरोजगारी एक बहुत बड़ी समस्या है और बड़ी संख्या में वहां के युवा वर्षों से काम के लिए पलायन करते रहे हैं। बहरहाल, नेपाल में छह महीने पहले व्यवस्था में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के मुद्दे को लेकर नई पीढ़ी के व्यापक आंदोलन से उभरे बालेंद्र शाह और उनकी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी सबकी उम्मीदों पर कितना खरा उतरेंगे, देश को किस तरह की वैकल्पिक राजनीति देंगे, यह देखने की बात होगी ।


Date: 10-03-26

कृत्रिम मेधा और शक्ति संतुलन की चुनौती

धीरज यादव

चौथी औद्योगिक क्रांति के इस दौर में कृत्रिम मेधा (एआइ) केवल एक तकनीकी उपकरण नहीं रह गई है, बल्कि यह उत्पादन, शासन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की केंद्रीय शक्ति बनती जा रही है। स्वचालन, मशीन लर्निंग और डेटा विश्लेषण पर आधारित प्रणालियां विनिर्माण से लेकर सेवा क्षेत्र तक उत्पादकता की प्रकृति बदल रही हैं। सैन्य क्षेत्र में स्वायत्त प्रणालियां, खुफिया विश्लेषण और निगरानी तकनीक रणनीतिक क्षमता को प्रभावित कर रही हैं। साइबर सुरक्षा में हमलों की पहचान और रोकथाम के लिए एआइ आधारित तंत्र अनिवार्य होते जा रहे हैं।

इन सभी आयामों का मूल तत्त्व है डेटा और उसे संसाधित करने की क्षमता। कृत्रिम मेधा को अब केवल साफ्टवेयर के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह ऊर्जा, तेल या सेमीकंडक्टर की तरह एक रणनीतिक संसाधन का रूप ले चुकी है। जिस इकाई के पास उच्च स्तरीय कंप्यूटिंग अवसंरचना, विशाल डेटा भंडार और उन्नत ‘एल्गोरिद्म’ क्षमता है, वह आर्थिक और सामरिक निर्णयों पर प्रभाव डाल सकती है। इस बदलते परिदृश्य में शक्ति का पारंपरिक संतुलन केवल सैन्य या भौगोलिक कारकों से निर्धारित नहीं होगा, बल्कि तकनीकी दक्षता और डिजिटल अवसंरचना भी उसकी दिशा तय करेगी।

अब कृत्रिम मेधा का प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था में स्पष्ट रूप से दिखने लगा है। विनिर्माण, साजो-सामान, स्वास्थ्य और वित्त जैसे क्षेत्रों में एआइ आधारित स्वचालन तथा विश्लेषण से उत्पादकता में वृद्धि दर्ज की गई है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों की रपटें यह बताती हैं कि डेटा विश्लेषण एवं मशीन ‘लर्निंग’ से निर्णय प्रक्रिया तेज होती है और संसाधनों का उपयोग अधिक कुशल बनता है। इससे पूंजी निर्माण की प्रकृति भी बदल रही है। पारंपरिक भौतिक संपत्तियों की तुलना में अब डेटा, एल्गोरिद्म और कंप्यूटिंग क्षमता नई पूंजी के रूप में उभर रहे हैं।

इस परिवर्तन का एक महत्त्वपूर्ण आयाम सेमीकंडक्टर उद्योग और ‘क्लाउड’ अवसंरचना है। उन्नत चिप निर्माण और उच्च क्षमता वाले डेटा सेंटर एआइ विकास की आधारशिला हैं। जिन देशों और कंपनियों के पास अत्याधुनिक चिप डिजाइन, विनिर्माण क्षमता और वैश्विक क्लाउड नेटवर्क हैं, वे तकनीकी मूल्य शृंखला के ऊपरी हिस्से पर नियंत्रण बनाए रखते हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था में कुछ बड़े वैश्विक मंचों का केंद्रीकरण यह दर्शाता है कि डेटा और नेटवर्क प्रभाव से बाजार संरचना सिमट सकती है।

जाहिर है, जिनके पास उन्नत एआइ माडल, व्यापक डेटा संसाधन और उच्च स्तरीय कंप्यूटिंग अवसंरचना है, वही वैश्विक मूल्य शृंखला के निर्णायक बिंदुओं पर प्रभाव रखते हैं। इससे आर्थिक शक्ति की पारंपरिक परिभाषा का विस्तार हुआ है, जिसमें तकनीकी क्षमता और डिजिटल नियंत्रण केंद्रीय तत्त्व बनते जा रहे हैं। इस आर्थिक संरचना ने तकनीकी कंपनियों की भूमिका को भी असाधारण रूप से विस्तारित किया है।

एआइ के विकास ने बड़ी तकनीकी कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली भूमिका प्रदान की है। उनके मंच, क्लाउड नेटवर्क और उन्नत एआइ माडल करोड़ों उपयोगकर्ताओं, वित्तीय लेन-देन और सूचना प्रवाह को संचालित करते हैं। इस कारण उनकी नीतियां और तकनीकी निर्णय अनेक देशों की अर्थव्यवस्था, मीडिया संरचना और यहां तक कि सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं। मगर यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि ये कंपनियां पूर्णत: स्वायत्त इकाइयां नहीं हैं। वे राष्ट्रीय कानूनों, डेटा संरक्षण नियमों, प्रतिस्पर्धा आयोगों और निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं से बंधी रहती हैं।

अमेरिका और चीन के बीच चल रही तकनीकी प्रतिस्पर्धा इसका स्पष्ट उदाहरण है। उन्नत एआइ चिप और सेमीकंडक्टर उपकरणों के निर्यात पर लगाए गए नियंत्रण यह दर्शाते हैं कि अंतिम नियामक शक्ति अभी भी राष्ट्र-राज्य के पास है। इसी प्रकार यूरोप में डिजिटल बाजार कानून और डेटा संरक्षण विनियम तकनीकी कंपनियों के संचालन पर प्रभाव डालते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि निगमित शक्ति और राज्य शक्ति के बीच सीधा प्रतिस्थापन नहीं, बल्कि एक जटिल अंतर-संबंध विकसित हो रहा है।

वर्तमान परिदृश्य में यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि निगमित और राज्य के बीच शक्ति संतुलन का नया समीकरण बन रहा है। तकनीकी नवाचार और पूंजी निगमित संरचनाओं में केंद्रित हैं, जबकि वैधानिक अधिकार और सामरिक नीति निर्माण राष्ट्र या राज्य के हाथ में है। भविष्य की कृत्रिम मेधा इसी अंत:क्रिया से आकार ले सकती है, जहां तकनीकी क्षमता और राजनीतिक संप्रभुता एक-दूसरे को प्रभावित करती रहेंगी।

एआइ का सैन्य और रणनीतिक आयाम इस विमर्श को और गंभीर बनाता है। अनेक देश स्वायत्त या अर्ध स्वायत्त हथियार प्रणालियों पर शोध कर रहे हैं, जिनमें लक्ष्य पहचानने, निगरानी और निर्णय में सहायता के लिए मशीन लर्निंग आधारित प्रणालियां प्रयोग में लाई जा रही हैं। रक्षा विश्लेषण और खुफिया जांच में एआइ आधारित डेटा प्रोसेसिंग से विशाल सूचना का त्वरित आकलन संभव हुआ है। इससे युद्ध क्षेत्र की समझ और प्रतिक्रिया समय, दोनों प्रभावित होते हैं।

जटिल साइबर हमलों की पहचान, नेटवर्क असमानताओं का विश्लेषण और स्वचालित रक्षा तंत्र अब एल्गोरिद्मिक प्रणालियों पर आधारित हैं। दूसरी ओर, आक्रामक साइबर क्षमताओं में भी स्वचालित उपकरणों का उपयोग बढ़ रहा है, जिससे डिजिटल अवसंरचना रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गई है।

इसके साथ ही निगरानी प्रणालियों और डेटा विश्लेषण के माध्यम से राज्य अपनी आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक गतिविधियों पर अधिक व्यापक नियंत्रण स्थापित कर सकते हैं। चेहरा पहचान तकनीक, व्यवहार विश्लेषण और संचार निगरानी जैसी व्यवस्थाएं सार्वजनिक नीति और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का प्रश्न उठाती हैं। इस प्रकार कृत्रिम मेधा केवल आर्थिक शक्ति का साधन नहीं, बल्कि सैन्य और सामरिक संरचना का अभिन्न हिस्सा बन चुकी है, जो वैश्विक शक्ति संतुलन की दिशा को प्रभावित कर सकता है।

वैश्विक परिदृश्य के बीच भारत की स्थिति विशिष्ट है। पिछले एक दशक में देश ने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का एक ऐसा माडल विकसित किया है, जिस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान आकर्षित हुआ है। आधार, यूपीआइ और डिजिटल पहचान तंत्र ने सेवा वितरण, वित्तीय समावेशन और पारदर्शिता में संरचनात्मक बदलाव किया है।

यह ढांचा एआइ अनुप्रयोगों के लिए एक आधार प्रदान करता है, क्योंकि बड़े पैमाने पर डिजिटल लेन-देन और डेटा प्रवाह नवाचार की संभावनाएं खोलते हैं। इसके साथ ही डेटा संप्रभुता का प्रश्न गंभीर होता जा रहा है। यदि भारतीय नागरिकों और संस्थानों से उत्पन्न डेटा का विश्लेषण और मूल्य सृजन किसी विदेशी मंच पर केंद्रित रहता है, तो आर्थिक लाभ और रणनीतिक नियंत्रण दोनों सीमित हो सकते हैं। इसलिए यह बहस केवल गोपनीयता की नहीं, बल्कि दीर्घकालिक आर्थिक हित से भी जुड़ी हुई है।

समकालीन विश्व व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां शक्ति की परिभाषा विस्तार ले रही है। पारंपरिक रूप से सैन्य क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव को शक्ति का प्रमुख आधार माना जाता रहा है, मगर अब डेटा, एल्गोरिद्म और उच्च स्तरीय कंप्यूटिंग अवसंरचना भी उसी श्रेणी में शामिल हो चुके हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के सामने चुनौती यह है कि वे एआइ को केवल बाजार शक्ति या सीमित निगमित हित का साधन बनने से कैसे रोकें। पारदर्शिता, नियमन, प्रतिस्पर्धा नीति और सार्वजनिक निवेश के माध्यम से एआइ को व्यापक सामाजिक हित में रूपांतरित किया जा सकता है। यदि ऐसा संतुलन स्थापित होता है, तो तकनीकी प्रगति लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ कर सकती है। अन्यथा शक्ति का केंद्रीकरण नई असमानताओं को जन्म दे सकता है।


Date: 10-03-26

विभाजित दुनिया में भारत का तटस्थ रहना ही बेहतर

नितिन पाई

दुनिया के विभिन्न देशों के बीच आज जिस तरह से युद्ध चल रहे हैं, भारत के लिए बेहतर विकल्प यही है कि वह पूरी तरह से तटस्थता की नीति ओढ़ ले। दुनिया भर में जारी युद्धों के कारणों को समझना बहुत जटिल है, लेकिन हमारे लिए सुकून की बात है कि उनसे हमारा कोई वास्ता नहीं है। भारत के पास ऐसी कोई जादू की छड़ी भी नहीं है कि वहयू क्रेन, पश्चिम एशिया या पूर्वी एशिया में निर्णायक भूमिका का निर्वाह कर सके ।

विभिन्न देशों के बीच जारी जंगों में दो में से कोई एक ही पक्ष जीतेगा, लेकिन भारत के हित सभी पक्षों के साथ जुड़े हुए हैं। इसलिए ईरान पर अमेरिका-इजरायल के हमले, रूस-यूक्रेन युद्ध या ताईवान पर चीनी आक्रमण के मंडराते बादलों के मद्देनजर किसी के साथ खड़े होना भारत के हित में नहीं है। उनके बीच चल रही लड़ाइयों में जो जीतेगा, वह खुद भारत के साथ अपने संबंध सुधारने की पहल करेगा एक समय मैंने भारत को अफगानिस्तान युद्ध में अमेरिका का समर्थन करने की सलाह दी थी। रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण के बाद भी मुझ जैसे लोगों ने नई दिल्ली से मॉस्को विरोधी अपने आर्थिक साझेदारों का साथ देने का आह्वान किया था। अतीत में भी नई दिल्ली के रणनीतिक प्रतिष्ठानों को इस बात के लिए बार-बार आगाह किया गया है कि वे दूरदराज के देशों तक अपनी सैन्य शक्ति स्थापित करने के लिए अभियान चलाएं। अब स्थिति बिल्कुल उलट है। अब हमें रक्षा बजट को दोगुना करके अपनी रक्षा वमारक क्षमताओं को तेजी से बढ़ाना चाहिए।

भारत की नीतियां दो लक्ष्यों पर केंद्रित होनी चाहिए। पहला अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के बीच उसके परिणामों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करे और दूसरा, सुनिश्चित करे कि इन युद्धों का विस्तार हमारे देश तक न हो। दोनों लक्ष्य कठिन हैं, लेकिन हमारी सरकार और समाज चाहे, तो इनको पाया जा सकता है। पश्चिम एशिया के युद्ध का असर हमारे नागरिकों की सुरक्षा, तेल-गैस आपूर्ति, व्यापार और वहां से आने वाले धन पर पड़ता है। भारत ने पहले भी बड़ी संख्या में अपने नागरिकों को युद्धग्रस्त इलाकों से निकाला है और वह इस काम में सिद्धहस्त है। हालांकि, इस बार यह बहुत मुश्किल काम है इसे भारतीय वायु सेना, जहाजरानीव विमानन उद्योग और वायु सुरक्षा क्षमताओं से लैस नौसेना कर सकती हैं।

ऊर्जा और व्यावसायिक जल परिवहन की सुरक्षा ज्यादा मुश्किल समस्या है। राष्ट्रपति ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य से बीमा की परवाह किए बिना अपने जहाज भेजेगा और युद्ध के खतरे उठाएगा। ज्ञात है, ईरान ने होर्मुज को बाधित कर रखा है। अमेरिका अपनी योजना में सफल हो जाता है, तो भारत को कुछ राहत मिलेगी, अन्यथा ज्यादा अमेरिकी टैरिफ का खतरा मोल लेकर भी उसे रूस से तेल खरीदने के लिए तैयार रहना चाहिए।

दूसरा, यह सुनिश्चित करना होगा कि दूसरे देशों के युद्ध हमारी जल-थल सीमा से दूर ही रहें। नई दिल्ली को सुनिश्चित करना होगा कि भारत और उसके आसपास का इलाका इस लड़ाई में न फंसे । युद्धरत देशों को भी भारत से सैन्य सहयोग की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। वहीं, अंदरूनी तौर पर देश में विभिन्न विचारों के बीच आपसी सद्भाव का माहौल बनाया जाए, जिससे पहले से ही सामाजिक तौर पर विभाजित देश का सामाजिक सौहार्द और न बिगड़े। कानून प्रवर्तन एजेंसियों को भी विरोध प्रदर्शनों पर सख्ती नहीं करनी चाहिए। असलमें, सिविल सोसाइटी को विदेश नीति पर अपने विचार प्रकट करने की छूट देने से तटस्थता की नीति अपनाने में सहूलियत होती है। भारत को संघर्षों के दौरान अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास दर के साथ-साथ अपनी सीमाओ परनजर रखनी चाहिए। इससे होगा यह कि जब समय के साथ चीजें ठीक हो जाएंगी, तब आज लड़ रहे सभी पक्षों को भारत की जरूरत पड़ेगी।

हो सकता है, कुछ नतीजे हमारे लिए बुरे हों, लेकिन हमें उनसे इसी तरह से निपटना पड़ेगा। तटस्थ और अलग रहते। भारत को कुछ चीजें सार्वजनिक तौर पर और कुछ परदे के पीछे करनी चाहिए। दोनों का घालमेल हमारे लिए शर्मनाक स्थिति पैदा कर सकता है और हमारे राष्ट्रीय हितों को अधिक नुकसान पहुंचा सकता है ।