06-03-2026 (Important News Clippings)

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06 Mar 2026
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Date: 06-03-26

Protecting women’s rights amid conflict and instability

Global instability makes this year’s International Women’s Day theme urgent

Archana Ramasundaram, [ Retired from the Indian Police Service as a Director General of the Sashastra Seema Bal, a central armed police force). She has also served as Member, Lokpal of India ]

International Women’s Day is once again in our midst. Observed globally on March 8, the day has evolved from its early 20th century labour roots into a leading platform for deliberating on women’s rights, celebrating achievements and demanding concrete action toward gender equality. Officially recognized by the United Nations (UN) in 1977, the day continues to serve as both a celebration and a call to action.

Rights, justice and action

For 2026, the UN has chosen “Rights, Justice, Action: For All Women and Girls” as the global theme for International Women’s Day. While these words resonate powerfully, affirming women’s rights to equality and justice, the reality remains far from supportive of translating this theme into a practical programme. The unpleasant truth is that this ambitious call for action is against the ominous backdrop of a world marked by conflict, displacement, economic instability and political uncertainty. Multiple wars and conflicts are raging in several parts of the world.

Relentless targeted attacks by warring nations have already claimed so many lives and caused the destruction of several strategic locations. Those killed include a large number of women and children. What is worse, instead of de-escalation, we are witnessing a hardening of positions on all sides, with no early cessation of hostilities in sight.

What do these conflicts portend for living conditions and rights of women and children?

Gender equality is not a privilege but a fundamental human right. But it is easier said than done, more so in a world facing multiple crises in which women and children are the most vulnerable. Research and field studies have clearly established that women and girls suffer disproportionately in wars. Conflict and insecurity dramatically escalate incidents of gender-based violence, food insecurity, restricted mobility or forced displacement, disruption of families, loss of livelihood, breakdown of social support systems and lack of access to health care and education. Women trapped in conflict zones are also targeted as a strategy of war. Rape and sexual violence against women have been committed during wars since ancient times to subjugate and humiliate the enemy.

Many women also suffer mental health issues such as depression, anxiety and post-traumatic stress disorder. The side-lining of women in peace talks and reconstruction processes further reduces their chances of addressing these problems.

Promises but no progress

Acknowledging the disproportionate impact of armed conflict on women and girls, the UN Security Council, on October 31, 2000, unanimously adopted the United Nations Security Council Resolution 1325 on Women, Peace and Security. It was affirmed in this historic resolution that women must be protected during conflicts and included actively in peacebuilding processes. Yet, the gap between commitments and implementation continues to remain wide. While a few countries have developed national action plans to implement Resolution 1325, no tangible change is noticed on the ground.

In fact, the conditions for women and children have worsened over these decades. Inequalities have become more acute in many places, with wars and political instability further weakening the institutions for the protection of women. The UN Secretary-General Report on Women, Peace and Security for 2025 categorically states that the world is experiencing the highest number of active conflicts since 1946, resulting in unprecedented risks and suffering for women and girls. The report adds that nearly 676 million women live within 50 kilometres of deadly conflicts, the highest level since the 1990s. Civilian casualties among women and children quadrupled when compared to the previous two-year period. Conflict-related sexual violence increased by 87% in two years.

Moreover, despite overwhelming evidence that women’s participation makes peace more durable, they remain largely excluded from decision-making. In 2024, nine out of 10 peace processes had no women negotiators, with women making up just 7% of negotiators and 14% of mediators globally. This is despite the research consistently showing that peace agreements are more durable when women are meaningfully involved in these processes.

Rights require action

Women, being important stakeholders as well as victims of war, should be given equal opportunity to participate in talks and other processes. Women’s collectives and global bodies should also play a more action-oriented role instead of confining themselves to slogans and conferences. Women and children in conflict zones should be protected from violence and sexual exploitation. In fact, helping them with food, education, health care, financial assistance and also emotional support is the duty of other stakeholders as well.

This underscores why the 2026 emphasis on rights and justice is both urgent and essential, making International Women’s Day more than a calendar date and a reminder that protecting women’s rights amid conflict and instability is a collective responsibility.


Date: 06-03-26

कूटनीतिक संतुलन साधने की चुनौती

डॉ. अभिषेक प्रताप सिंह, ( लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर हैं )

पश्चिम एशिया के अस्थिर-अशांत परिदृश्य में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते संघर्ष ने भारत को एक जटिल और नाजुक कूटनीतिक स्थिति में डाल दिया है। ईरान पर अमेरिका-इजरायली हमले ने, जिसे ‘आपरेशन रोरिंग लायन’ नाम दिया गया है, के बाद ईरान ने भी जार्डन, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब सहित खाड़ी के अन्य देशों पर मिसाइल हमलों के साथ जवाबी कार्रवाई की है। इसने ऊर्जा आपूर्ति, नागरिक सुरक्षा और व्यापक क्षेत्रीय अस्थिरता को लेकर भारत सहित प्रमुख शक्तियों के बीच वैश्विक चिंताओं को बढ़ा दिया है।

आज यह क्षेत्र पूर्ण युद्ध की कगार पर है, जिससे और अधिक चुनौतियां और चिंताएं पैदा हो रही हैं। जहां भारत-ईरान संबंध पारंपरिक रूप से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संपर्कों द्वारा परिभाषित होते हैं, वहीं पिछले एक दशक में भारत ने इजरायल के साथ भी एक मजबूत और व्यापक रक्षा साझेदारी बनाई है। प्रधानमंत्री मोदी की हालिया इजरायल यात्रा ने दोनों देशों ने अपने संबंधों को “शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी” के स्तर तक बढ़ाया है।

पश्चिम एशिया के साथ गहरे जुड़ाव को देखते हुए भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता व्यापार, अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा आपूर्ति है। भारत को न केवल संतुलन बनाने, बल्कि क्षेत्र में अपने बड़े हितों को सुरक्षित करने पर भी ध्यान देना होगा। यह संकट हमारी “ऊर्जा सुरक्षा” के लिए चिंताएं पैदा करता है। यह क्षेत्र हमारे तेल आयात का लगभग 55 प्रतिशत आपूर्ति करता है, जिसमें इराक और सऊदी अरब जैसे देश शीर्ष आपूर्तिकर्ता हैं। मध्य एशिया से आने वाले कच्चे तेल की आपूर्ति को इसकी क्षेत्रीय निकटता और रिफाइनरी अनुकूलता के लिए महत्व दिया जाता है। इसके अलावा भारत कच्चे तेल का लगभग दो-तिहाई और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का आधा हिस्सा होर्मुज की खाड़ी के माध्यम से आयात करता है, जो एक प्रमुख शिपिंग मार्ग है और जिसे ईरान ने बंद कर दिया है। यह हमारे तेल आयात का महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है।

पश्चिम एशिया से तेल की शिपिंग के लाजिस्टिक फायदे भी हैं। हालांकि भारत वैकल्पिक ईंधन स्रोतों की खोज कर रहा है, विशेष रूप से पश्चिम अफ्रीका में, लेकिन पश्चिम एशिया क्षेत्र में बढ़ता संघर्ष भारत की ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार मार्गों के लिए चिंताजनक स्थिति पैदा करता है। 2025 में इसी तरह के तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को सौ डालर प्रति बैरल से ऊपर धकेल दिया था, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ गया था और घरेलू मुद्रास्फीति की दर भी प्रभावित हुई थी। तेल की कीमतों में वृद्धि हमारे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि को प्रभावित करेगी और घरेलू बाजार पर दबाव डालेगी।

भारत के ईरान और इजरायल, दोनों से व्यापारिक संबंध हैं। 2025 में ईरान के साथ व्यापार लगभग 2.42 अरब अमेरिकी डालर रहा, जिसमें भारत ने 1.24 अरब डालर के सामान का निर्यात किया। यूरोप और उत्तरी अफ्रीकी क्षेत्र में भारत अपने निर्यात का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा ‘बाब अल-मंदब जल मार्ग के जरिए करता है।

हाल के समय में इजरायल के साथ भारत के रक्षा संबंधों में एक मौलिक बदलाव आया है, जो केवल परंपरागत लाजिस्टिक रक्षा आपूर्ति से आगे बढ़कर भारत में संयुक्त सैन्य संसाधनों के साझा विकास और उत्पादन तक पहुंच गया है। इजरायल भारत के लिए उन्नत हथियारों का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है, जिसमें ड्रोन और मिसाइल सिस्टम शामिल हैं। ऐसे में ईरान और इजरायल के बीच कूटनीतिक संतुलन साधते हुए अपने हितों को बचाना भारत की पहली प्राथमिकता होगी।

पश्चिम एशिया में लंबे समय तक चलने वाला संकट वहां हमारी कनेक्टिविटी परियोजनाओं को भी प्रभावित करेगा। एक बड़ी चिंता भारत के ‘अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे’ (आइएनएसटीसी) के बाधित होने की हो सकती है, जिसका उद्देश्य ईरान के माध्यम से यूरोपीय व्यापार को बढ़ावा देना है। आइएनएसटीसी का पूरा होना ईरानी रेल और सड़क नेटवर्क पर निर्भर करता है। युद्ध के चलते इन बुनियादी ढांचों को सैन्य रसद के लिए स्थानांतरित कर दिया गया है।

इसके अतिरिक्त ईरान का चाबहार बंदरगाह भी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक निवेश है, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया के साथ सीधा संपर्क स्थापित करता है। यह न केवल पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह, जिसे चीन द्वारा बनाया जा रहा है, का एक रणनीतिक विकल्प है, बल्कि हमारी ऊर्जा सुरक्षा की आवश्यकता पूरी करने और मध्य एशिया में दुर्लभ खनिजों को प्राप्त करने में एक महत्वपूर्ण कदम है। चाबहार बंदरगाह आइएनएसटीसी का प्रवेश बिंदु है। इज़रायल-ईरान संघर्ष का बढ़ना इस परियोजना को प्रभावित कर सकता है।

एक और महत्वपूर्ण परियोजना जो इस संघर्ष से प्रभावित हो सकती है, वह है भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आइएमईसी)। क्षेत्र में अपने रणनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए दिल्ली की यह एक और महत्वपूर्ण पहल है। प्रधानमंत्री मोदी की ‘एक्ट वेस्ट पालिसी’ का उद्देश्य स्वेज नहर के माध्यम से स्थापित परंपरागत व्यापार मार्गों से हटकर भारत, पश्चिम एशिया और यूरोप के बीच एक नए आर्थिक एकीकरण को बढ़ावा देना है और आइएमईसी इस उद्देश्य के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कड़ी है। ईरान संकट ने इन सभी कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

रणनीतिक और आर्थिक कारणों के अलावा इस संकट का एक मानवीय पक्ष भी है, जो भारत के राष्ट्रीय हित का एक बड़ा पहलू है। पश्चिम एशियाई क्षेत्र में लगभग 90 लाख भारतीय प्रवासी रहते हैं। यह समुदाय भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए हर साल लगभग सौ अरब डालर का योगदान देता है।

यह वित्तीय प्रवाह भारत के विदेशी मुद्रा भंडार के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, जो व्यापार असंतुलन और वैश्विक मुद्रा में उतार-चढ़ाव के खिलाफ एक बफर (सुरक्षा) प्रदान करता है। इस पूरे विवाद में भारत की नीति बहुपक्षीय सहयोग की नीति के अनुसार है। सभी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ अपने अच्छे संबंधों का लाभ उठाकर दिल्ली एक विश्वसनीय मध्यस्थ के रूप में भी कार्य कर सकती है।


Date: 06-03-26

डब्ल्यूटीओ में सुधार और भारत की रणनीति

अमिता बत्रा, ( ले​खिका जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर हैं। )

विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) की महानिदेशक नगोजी ओकोंजो इवेला ने कहा कि बहुपक्षीय संस्थानों के लिए अब ‘यथास्थिति’ कोई विकल्प नहीं है। उनके वक्तव्य से यह स्पष्ट हो गया कि डब्ल्यूटीओ के सुधार इस महीने कैमरून के याउन्दे में होने वाले 14वें मंत्री स्तरीय सम्मेलन (एमसी-14) के एजेंडे में प्रमुख रूप से रहेंगे। इससे पहले 5 फरवरी से एक महीने की अवधि को डब्ल्यूटीओ सुधार का महीना घोषित किया गया।

उम्मीद है कि एमसी-14 के बाद सदस्य एक ऐसी कार्ययोजना के साथ आएंगे जिससे सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। ध्यान रहे कि यह डब्ल्यूटीओ की निर्णय लेने वाली सर्वोच्च संस्था है। इसमें सदस्य देशों के व्यापार मंत्री शामिल हैं और ये हर दो साल में बैठक करते हैं।

डब्ल्यूटीओ सुधारों के तात्कालिक कारणों में से एक है ई-कॉमर्स में इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर सीमा शुल्क लगाने पर रोक। यह स्थगन एमसी-14 के समापन के साथ समाप्त होने वाला है। डब्ल्यूटीओ के अधिकांश सदस्य स्थायी स्थगन की मांग कर रहे हैं। उनका तर्क है कि यह डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए पूर्वानुमान लगाने का अवसर देता है।

दूसरा तात्कालिक मुद्दा है निवेश सुगमीकरण विकास समझौते (आईएफडीए) का एकीकरण, जिसे ज्यादातर सदस्य 1994 के माराकेश समझौते के अनुलग्नक 4 के माध्यम से डब्ल्यूटीए की नियम पुस्तिका में चाहते हैं। दोनों मुद्दों पर सफलता प्राप्त करने में एक सामान्य बाधा है बहुपक्षीय समझौतों पर आपत्ति और डब्ल्यूटीओ में सर्वसम्मति-आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया।

डब्ल्यूटीओ में बहुपक्षीय वार्ताओं के विकल्पों की आवश्यकता तक पहुंचने वाले संदर्भ को रेखांकित करना महत्त्वपूर्ण है। अपने तीन दशक के अस्तित्व में, डब्ल्यूटीओ मुख्यतः पहले हुए समझौतों के क्रियान्वयन से संबंधित मुद्दों से निपटा है और/अथवा दोहा विकास एजेंडा से जुड़े मुद्दों में उलझा रहा है।

विशेष रूप से पिछले दशक में, डब्ल्यूटीओ का कामकाज गंभीर रूप से बाधित हुआ है क्योंकि अमेरिका ने अपील निकाय में नियुक्तियों को बाधित किया और अमेरिका-चीन के द्विपक्षीय व्यापार तनावों के प्रभावों ने स्थिति को और जटिल बना दिया। पिछले 30 वर्षों में, डब्ल्यूटीओ केवल दो समझौतों को सफलतापूर्वक पूरा कर पाया है। एक व्यापार सुविधा पर और दूसरा मछली पालन के लिए दी जाने वाली सब्सिडी पर।

यद्यपि, इस दौरान वैश्विक व्यापार में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। वैश्विक मूल्य श्रृंखलाएं (जीवीसी) और हिस्सों व घटकों में व्यापार वैश्विक व्यापार के प्रमुख तंत्र के रूप में उभरे हैं। इसके परिणामस्वरूप व्यापार, निवेश, प्रौद्योगिकी/ज्ञान हस्तांतरण और बौद्धिक संपदा के बीच अंतर्संबंधों को वैश्विक व्यापार नियमों में पूरक विकास की आवश्यकता है। आदर्श रूप से, डब्ल्यूटीओ में बहुपक्षीय वार्ताएं उपयुक्त नए युग के व्यापार प्रावधानों को विकसित करने का साधन होनी चाहिए थीं। लेकिन डब्ल्यूटीओ, बढ़ती सदस्यता के विविध हितों और कठिन परिस्थितियों में फंसा हुआ है और पुराने मुद्दों से आगे बढ़ने के लिए संघर्ष करता रहा है।

जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स ऐंड ट्रेड (गैट) के अनुच्छेद 24 के तहत मंजूर किए गए मुक्त व्यापार समझौतों को जीवीसी के नेतृत्व वाले व्यापार को बढ़ावा देने वाले वैकल्पिक उपाय के रूप में सफलतापूर्वक अपना लिया गया है। इसके प्रासंगिक प्रावधानों की संख्या और गहराई को निरंतर बढ़ाया गया है। हालांकि, डब्ल्यूटीओ के प्रावधानों के अंतर्गत, इसके कुछ सदस्य देशों द्वारा शुरू किए गए बहुपक्षीय समझौते 21वीं सदी के व्यापार-संबंधी मुद्दों पर समान सफलता हासिल नहीं कर पाए हैं। जहां एफटीए प्रावधान केवल भाग लेने वाले देशों तक सीमित रहते हैं, वहीं बहुपक्षीय वार्ताओं का परिणाम या समझौता डब्ल्यूटीओ समझौते के अनुलग्नक 4 के माध्यम से डब्ल्यूटीओ की नियम पुस्तिका में शामिल किया जा सकता है।

डब्ल्यूटीओ सदस्यता के एक उपसमूह द्वारा शुरू की गई वार्ताओं (जो सर्वसम्मति पर आधारित नहीं होतीं) के परिणामों को सभी सदस्यों तक विस्तारित करने की संभावना ही बहुपक्षीय समझौतों के प्रति मूल आपत्ति रही है। हालांकि यह समझना आवश्यक है कि शुरुआत सर्वसम्मति-आधारित नहीं होती, लेकिन अनुलग्नक 4 के तहत बहुपक्षीय समझौतों को नियम पुस्तिका में शामिल करने के लिए सभी सदस्यों की सर्वसम्मति आवश्यक होती है। खासतौर पर आईएफडीए के मामले में इसे अनुलग्नक 4 में शामिल करने से संबंधित आपत्ति इसी संभावित असंगति पर आधारित है। भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल है जो आईएफडीए को अनुलग्नक 4 में शामिल करने का विरोध कर रहे हैं।

आईएफडीए का विधिक पाठ एक संयुक्त पहल वक्तव्य के रूप में 2017 में पेश किया गया था जिसे 2023 में पूरा किया गया। इसे डब्ल्यूटीए के 166 सदस्य देशों में से 128 का समर्थन मिला था। इनमें विकसित, विकासशील और सबसे कम विकसित देश सभी शामिल थे। इस समझौते का लक्ष्य है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आवक में मदद करना।

निवेश सुविधा से संबंधित उपायों पर व्यापक रूप से ध्यान केंद्रित किया गया है, जैसे पारदर्शिता, प्रशासनिक प्रक्रियाओं का सरलीकरण और सुव्यवस्थित करना, घरेलू नियामक सामंजस्य में सुधार और सतत निवेश के लिए क्षमता निर्माण। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आईएफडीए में पहुंच या निवेशक संरक्षण पर मौजूदा प्रतिबद्धताओं में किसी भी प्रकार का संशोधन शामिल नहीं है। क्षेत्र-विशिष्ट एफडीआई उदारीकरण से संबंधित प्रावधान इस समझौते के दायरे से बाहर हैं।

इसके अलावा समझौते में एक ‘फायरवॉल प्रावधान’ शामिल है, जिससे आईएफडीए की व्याख्या को किसी देश के अंतरराष्ट्रीय निवेश समझौतों से अलग रखा जा सके और किसी भी दोहराव को रोका जा सके। उल्लेखनीय है कि आईएफडीए गैर-भागीदारों पर कोई बाध्यता नहीं डालता, लेकिन निवेश सुविधा संबंधी सुधारित उपायों के लाभ सभी पर समान रूप से लागू होंगे।

आईएफडीए निस्संदेह अपने विकासात्मक उद्देश्यों के लिए महत्त्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त, डब्ल्यूटीए के ढांचे में आईएफडीए को शामिल करने के भी महत्त्वपूर्ण निहितार्थ हैं। वैश्विक व्यापार में बढ़ती अनिश्चितता के इस समय में, संदर्भ-विशिष्ट बहुपक्षीय व्यापार नियमों को विकसित करने की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक है।

भारत के लिए, नियामक अनिश्चितता को कम करके निवेश को सुगम बनाने वाले आईएफडीए उपाय हाल के वर्षों में शुद्ध एफडीआई प्रवाह में गिरावट की पृष्ठभूमि में विशेष रूप से सहायक हो सकते हैं। इसलिए भारत को आईएफडीए पर अपने रुख पर पुनर्विचार करना चाहिए।

बहुपक्षीय समझौतों के बड़े मुद्दे पर भी भारत को अपने लंबे समय से चले आ रहे कठोर रुख की समीक्षा करनी चाहिए ताकि 21वीं सदी के मुद्दों पर वार्ताओं को आगे बढ़ाया जा सके। भारतीय वार्ताकारों को बहुपक्षीय वार्ता शुरू करने के नियमों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। यह डब्ल्यूटीओ सदस्यता के एक निर्दिष्ट बहुमत अनुपात या वैश्विक व्यापार के आधार पर हो सकता है।

अनुलग्नक 4 में बहुपक्षीय परिणामों को शामिल करने पर, भारत को अन्य सदस्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ मिलकर पारदर्शिता, समावेशिता जैसे आवश्यक सुरक्षा उपाय विकसित करने पर काम करना चाहिए।

भारत को डब्ल्यूटीओ में अपनी पुरानी रक्षात्मक व्यापार नीति स्थितियों में उलझे रहना बंद करना चाहिए। एक दूरदर्शी मानसिकता, बहुपक्षीय मंच पर अपनी वार्तालाप के हालात में आवश्यक लचीलेपन के साथ, इसके प्रणालीगत पुनरुद्धार और निरंतर प्रासंगिकता में योगदान करेगी।


Date: 06-03-26

रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण ओर निरतंर बढ़ते कदम

तमाल बंद्योपध्याय

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के मासिक बुलेटिन में जनवरी 2026 से देश के कुल निर्यात और आयात की रुपये में बिलिंग और निपटान से संबंधित दो सारणियां शामिल की जाने लगीं। हालांकि फिलहाल भारत के कुल अंतरराष्ट्रीय व्यापार का लगभग 5 फीसदी हिस्सा ही रुपये में तय होता है, फिर भी यह आंकड़ा ऐसे बदलाव की ओर इशारा करता है जो समय के साथ-साथ देश के शेष विश्व के साथ व्यापार करने के तरीके को बदल सकता है।

फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद अमेरिका ने रूस की सभी डॉलर संपत्तियों न केवल फ्रीज कर दिया, बल्कि उसे स्विफ्ट प्रणाली का उपयोग करने से भी रोक दिया और न्यूयॉर्क स्थित डॉलर भुगतान और निपटान प्रणाली तक उसकी पहुंच अवरुद्ध कर दी। स्विफ्ट एक सुरक्षित नेटवर्क है जिसका उपयोग कम से कम 200 देशों में वित्तीय संस्थान अंतरराष्ट्रीय धन और प्रतिभूति अंतरण के लिए निर्देश भेजने के लिए करते हैं।

इस वजह से भारत समेत कई देशों ने डॉलर और डॉलर – प्रधान भुगतान एवं निपटान प्रणाली के विकल्पों की खोज शुरू कर दी। आरबीआई ने रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए एक रोडमैप तैयार करने के वास्ते एक अंतर- विभागीय समूह (आईडीजी) का गठन किया।

जुलाई 2023 में प्रकाशित इसकी रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक व्यवस्था के पुनसंतुलन के साथ, आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक है। इस पृष्ठभूमि में रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आरबीआई के 90 वर्ष के होने पर आयोजित समारोह में 1 अप्रैल, 2024 को मुंबई में अपने संबोधन में कहा कि रुपया विश्व भर में सुलभ और स्वीकार्य होना चाहिए।

आईडीजी की रिपोर्ट में एक प्रमुख सिफारिश यह थी कि व्यापारिक साझेदारों के साथ स्थानीय मुद्रा में लेन- देन की व्यवस्था की जाए ताकि निर्यात और आयात के बिल, भुगतान और निपटान रुपये या व्यापारिक साझेदार की मुद्रा में किए जा सकें। इस तरह की व्यवस्था का मुख्य लाभ यह है कि यह विनिमय दर के जोखिम को सीमित करता है। यह उस देश के निर्यातकों के लिए फायदेमंद है जिसकी मुद्रा में बिलिंग होती है।

सशक्त और स्थिर अर्थव्यवस्था वाले देशों द्वारा जारी की गई मुद्राएं अत्यधिक स्थिर, तरल और सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत होती हैं। इन्हें सुरक्षित निवेश माना जाता है। क्योंकि ये अपना मूल्य बनाए रखती हैं, और इनका व्यापक रूप से अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में उपयोग किया जाता है। प्रमुख मजबूत मुद्राएं अमेरिकी डॉलर, यूरो, जापानी येन, ब्रिटिश पाउंड स्टलिंग, स्विस फ्रैंक, कैनेडियन डॉलर, ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और न्यूजीलैंड डॉलर हैं। सिंगापुर डॉलर, हॉन्ग कॉन्ग डॉलर और स्वीडिश क्रोना को दूसरे स्तर की मजबूत मुद्राएं माना जाता है।

जुलाई 2023 से आरबीआई ने संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया, मालदीव और मॉरीशस के केंद्रीय बैंकों के साथ स्थानीय मुद्रा व्यवस्था पर समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। कई अन्य केंद्रीय बैंकों के साथ भी इसी तरह के समझौता ज्ञापन पर काम चल रहा है।

स्थानीय मुद्रा व्यवस्था के तहत, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार के भुगतान और निपटान भारत में विशेष रुपी बोस्त्रो खातों (एसआरवीए) और साझेदार देशों में इसी तरह के खातों के माध्यम से होते हैं। जर्मनी और ब्रिटेन जैसे विकसित देशों के बैंकों सहित 35 देशों के 83 बैंकों ने भारतीय बैंकों में एसआरवीए खाते खोले हैं।

निर्यातकों को डॉलर के बजाय रुपये में बिल बनाने को प्रोत्साहित करने के लिए भारतीय निर्यातकों ने सिफारिश की है कि निर्यात का बिल रुपये में बने या डॉलर में, दोनों ही स्थितियों में भारतीय निर्यातकों को समान प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए। सरकार ने रुपये में बिल बनाने वाले भारतीय निर्यातकों को समान प्रोत्साहन उपलब्ध करा दिए हैं।

आरबीआई के बुलेटिन के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 के पहले नौ महीनों में यानी अप्रैल से दिसंबर 2026 के बीच, भारत से वस्तुओं और सॉफ्टवेयर के निर्यात का 6.08 फीसदी और भारत को आयात का 4.82 फीसदी रुपये में बिल किया गया था। रुपये में निपटान के लिए ये आंकड़े क्रमशः 2.84 फीसदी और 2.36 फीसदी थे।

जनवरी के मध्य में ब्लूमबर्ग इंडेक्स सर्विसेज ने अपने प्रमुख ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में भारतीय बॉन्ड को शामिल करने का निर्णय स्थगित कर दिया। इस वर्ष के अंत तक हमें इसके अगले कदम के बारे में पता चल जाएगा। लेकिन यह सच है कि भारतीय सरकारी बॉन्ड प्रमुख उभरते बाजारों के बेंचमार्क में लगातार अपनी जगह बना रहे हैं। जेपी मॉर्गन इमर्जिंग मार्केट लोकल करेंसी इंडेक्स में जून 2024 में इन्हें शामिल किया गया, जिसके बाद ब्लूमबर्ग इमर्जिंग मार्केट लोकल करेंसी बॉन्ड इंडेक्स (जनवरी 2025 ) और एफटीएसई रसेल इमर्जिंग मार्केट इंडेक्स (सितंबर 2025 ) ने भी इन्हें शामिल किया।

विदेश में रुपये में होने वाले लेन-देन के लिए यह आवश्यक होगा कि भारत में रहने वाले और अनिवासी भारतीय रुपये और अन्य मुद्राओं में भुगतान और प्राप्ति कर सकें। इसे संभव बनाने के लिए, आईडीजी की रिपोर्ट में सिफारिश की गई थी कि भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं के माध्यम से भारत के बाहर रुपये में बैंकिंग सेवाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए। एनआरआई अब ऐसे रुपये खाते खोल सकते हैं। आरबीआई ने एक कदम आगे बढ़ते हुए हाल ही में नेपाल, भूटान और श्रीलंका में रहने वाले एनआरआई को भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं से रुपये में ऋण लेने की अनुमति दी है।

क्या अमेरिका को नाराज करने वाले देशों को स्विफ्ट और डॉलर – प्रधान वैश्विक भुगतान एवं निपटान प्रणाली से बाहर किए जाने का खतरा है? यह एक अनुमान मात्र है, लेकिन अगर ऐसा होता है, तो इससे निपटने का एकमात्र तरीका भारतीय भुगतान प्रणालियों, जैसे कि आरटीजीएस (रियल टाइम ग्रॉस सेटलमेंट) और एसएफएमएस (स्ट्रक्चर्ड फाइनैंशियल मेसेजिंग सिस्टम) को अन्य देशों की भुगतान प्रणालियों से सीधे जोड़ना है। इस दिशा में काम जारी है।

कुछ हलकों में यह चिंता जताई जा रही है कि रुपये में सीमा पार लेनदेन से विनिमय दर में अस्थिरता बढ़ सकती है और विदेशी मुद्रा भंडार कम हो सकता है, या यहां तक कि मौद्रिक नीति अप्रभावी भी हो सकती है। लेकिन ये चिंताएं निराधार प्रतीत होती हैं। रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए एक साथ बड़े बदलाव करने के बजाय क्रमिक दृष्टिकोण अपनाने से ऐसी आशंकाओं को दूर करने में मदद मिलेगी। उदाहरण के लिए, स्थानीय मुद्रा व्यवस्था का उपयोग पहले व्यापार के लिए, फिर गैर-व्यापारिक लेनदेन के लिए और अंत में पूंजी खाता लेनदेन के लिए किया जा सकता है। भारत के बाहर वित्तीय बाजारों को खोलने और रुपये को तरलता प्रदान करने में भी इसी तरह का क्रमिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। रुपये का अंतरराष्ट्रीयकरण एक धीमी और स्थिर प्रक्रिया होनी चाहिए। जल्दबाजी से व्यवधान उत्पन्न हो सकते हैं। और नुकसान हो सकता है।

किसी देश की मुद्रा उसकी शान होती है उसकी संप्रभुता की अभिव्यक्ति भारत वर्ष 2047 तक एक विकसित देश बनने की आकांक्षा रखता है, इसलिए रुपये को परिवर्तनीय और आरक्षित मुद्राओं में स्थान प्राप्त करने का लक्ष्य रखना चाहिए।


Date: 06-03-26

भारत और युद्ध

संपादकीय

ईरानी युद्धपोत को जिस तरह से अमेरिकी पनडुब्बी ने निशाना बनाया है, उससे भारत व दक्षिण एशिया में चिंता की लहर स्वाभाविक है। श्रीलंका के माले तट से 50 समुद्री मील दूर खुले समुद्र में अमेरिका ने ईरानी युद्धपोत डेना को डुबो दिया, इसमें सवार कुछ नौसैनिकों को श्रीलंका की सेना ने बचाया है, जबकि 150 से ज्यादा सैनिकों के मारे जाने की आशंका है। हमारे लिए चिंता की बात यह है कि यह ईरानी युद्धपोत भारत में आयोजित एक प्रदर्शनी में भाग लेने के लिए विशाखापत्तनम आया था। प्रदर्शनी या युद्धाभ्यास का समापान 25 फरवरी को हुआ और उसके बाद यह युद्धपोत भारतीय क्षेत्र से बाहर निकल गया। इसके बाद 28 फरवरी को ईरान के खिलाफ युद्ध छिड़ा है। ईरान इस युद्धपोत को भारत का मेहमान पोत बता रहा है, पर वास्तव में यह कूटनीतिक चतुराई है। भारतीय समुद्री सीमा में अगर घुसकर अमेरिका किसी को निशाना बनाता, तो मामला बहुत गंभीर हो जाता। दूसरी बात, इस युद्धपोत ने भारतीय सीमा को छोड़ने के बाद मदद की गुहार नहीं लगाई।

फिर भी इस पूरे प्रकरण में भारत का नाम आना अच्छी बात नहीं है। यह एक सराहनीय बात है कि भारत ऐसे किसी भी देश के युद्धपोत को अपनी सीमा में नहीं रहने देता है, पर श्रीलंका ऐसा करने की स्थिति में नहीं है। मिसाल के लिए, अब सभी की निगाहें ईरानी सैन्य टैंकर बुशेर पर टिकी हैं, जो कोलंबो बंदरगाह से 10 समुद्री मील दूर लंगर डाले हुए है। आज अमेरिका को भारत किस हक से रोक सकता है और अमेरिका भला भारत की बात क्यों सुनेगा ?

हालांकि, भारत को बहुत सावधान रहने की जरूरत है। एक पूर्व अमेरिकी जनरल ने दावा किया है कि पश्चिम एशिया में सैन्य अड्डे तबाह हो चुके हैं और अमेरिका अब भारतीय अड्डों का इस्तेमाल कर रहा है। सावधान, अमेरिका में ऐसे तत्व हैं, जो भारत को युद्ध में घसीटना चाहते हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने उचित ही ऐसे किसी सहयोग से इनकार किया है। युद्ध को लेकर फैल रही तमाम भ्रांतियों के प्रति भारत को सचेत रहना होगा। फिलहाल, ईरान हो या अमेरिका, दोनों से हमारे संबंध उतने अच्छे नहीं हैं कि हम उनकी नीतियों को प्रभावित करने लगें। हालांकि, आज दोनों देश चाहेंगे कि भारत उसके साथ दिखे, पर भारत को अपना हित देखना है। उसकी स्थिति अन्य देशों की तरह नहीं है। भारत सरकार जो फैसला लेगी, उससे उसके 140 करोड़ लोग प्रभावित होंगे। युद्ध नहीं, बुद्ध हमारी नीति रही है और हमें किसी भी बुद्ध में शामिल होकर अपनी परंपरागत छवि के विपरीत नहीं जाना चाहिए।

ईरान और अमेरिका के बीच पूर्ण युद्ध छिड़ा हुआ है। गौर कीजिए, ईरान के बहुत करीबी सहयोगी चीन और रूस रहे हैं, पर इन देशों ने खुद को सिर्फ बयानों तक समेट रखा है। जो लोग भारत पर सवाल उठा रहे हैं कि भारत ईरानी युद्धपोत की मदद कर सकता था, उन्हें चीन से भी यही सवाल पूछना चाहिए। गाले के ज्यादा करीब हम्बनटोटा है, जहां चीन बंदरगाह विकसित कर रहा है। इसके अलावा चीन ने अदन की खाड़ी के तट पर अपना नौसैनिक बल तैनात कर रखा है। ईरानी बुद्धपोत के पक्ष में चीन भी उत्तर सकता था? चीन यह बात जानता है कि किसी भी युद्ध में उतरने के बड़े नुकसान हैं। आज भारत को अपना हित देखने का पूरा हक है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनई की मौत पर भारत में भी लोग गमगीन हैं और सरकार ने भी दुख का इजहार किया है। आज हर घटना पर तत्काल बयान से बचने में ही देशहित है और बुद्ध से भारत जितना दूर रहे, उतना अच्छा है।