06-01-2026 (Important News Clippings)
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Cities Can’t Be Clean Only On Dashboards
ET Editorial

Cities like to boast about rankings and glossy scorecards. But none of that counts when the water flowing into homes carries disease instead of life. The toll from consuming contaminated water in Indore’s Bhagirathpura neighbourhood continues to rise — 16 deaths and more than 140 people hospitalised — as a diarrhoea outbreak lays bare a grave public health failure. This is a tragedy wherever it occurs. But that it happened in Indore, a city repeatedly ranked the cleanest in the country, raises uncomfortable questions about conditions in other places. What makes the episode even more disturbing is that it was not unforeseen.
Comptroller and Auditor General audit reports, dating back to 2019, have flagged serious concerns about water management in Indore, including the risk of contamination.
This crisis of urban governance is not limited to water alone. Variations of the same failure can be seen across towns and cities — untreated sewage being reused, garbage left uncollected, sky-high landfills turning into public health hazards, potholed roads and missing manhole covers. Poor infrastructure design, compounded by shoddy maintenance, corners cut during the tendering process and poor execution, as well as the endless digging up of roads in the name of improvement projects, steadily erodes urban living standards.
Fixing this urban crisis demands stronger systems and oversight, real accountability, regular maintenance and upgrades, and administrations that respond to citizens rather than ignore them. Urban local bodies must deliver the basics: clean water, effective waste management and safe roads. Business as usual will not deliver the smart cities promised under Viksit Bharat. Without a fundamental shift in attitude, more Bhagirathpuras are inevitable.
मादुरो वाला तर्क मुनीर पर क्यों लागू नहीं करते ट्रम्प ?
संपादकीय
दुनिया के कुल तेल भंडार का 18.17% हिस्सा और प्रचुर रेयर अर्थ मटेरियल का स्वामी वेनेजुएला अचानक अमेरिका का दास बन गया। इसके मुखिया मादुरो को सैनिक अभियान में पकड़कर अमेरिकी जेल में डाल दिया गया। वेनेजुएला के पास तेल शोधन की क्षमता न होने के कारण अमेरिकी कंपनियों की गिद्ध दृष्टि उन पर लग गई। अपने पहले कार्यकाल से ही ट्रम्प मादुरो से नाराज रहे थे और बाद में उनकी गिरफ्तारी पर इनाम बढ़ाते हुए 5 करोड़ डॉलर कर दिया। मादुरो ने प्रतिक्रिया में चीन से तेल और रूस से हथियार खरीद की नीति बनाई तो ट्रम्प की नाराजगी और बढ़ गई। माना जा रहा है कि वेनेजुएला सरकार के अंदर के लोगों ने ही बड़ी इनामी रकम के लालच में अमेरिकी सेना को मादुरो के महल तक पहुंचा दिया। लेकिन अगर ड्रग कार्टेल चलाने की सजा यह है तो जिस पाकिस्तान को सबूत सहित यूएन से लेकर स्वयं अमेरिका ने आतंकी पनाहगार माना है, उसके सबसे मुखर चेहरे मुनीर को किस जेल में होना चाहिए? मुनीर को पाकिस्तान का अघोषित तानाशाह बनाने में मदद किस प्रजातांत्रिक मूल्य की रक्षा कही जाएगी? ट्रम्प के मागा का एक साल पहले नारा था- अब और युद्ध नहीं, जबकि आज नारा है- वेनेजुएला पर हमला। अगर यही दोहरा रवैया चलता रहा तो फिर रूस के यूक्रेन पर हमले या चीन के ताइवान पर दावे को कैसे गलत ठहराया जा सकेगा?
Date: 06-01-26
वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले का कोई कानूनी आधार नहीं है
मनोज जोशी, ( विदेशी मामलों के जानकार )
वेनेजुएला में अमेरिका ने जो किया, उसकी कानूनी वैधता को लेकर तीखी बहस छिड़ गई है। अमेरिका ने इस कार्रवाई को मादुरो की गिरफ्तारी के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सैन्य समर्थन देने की तरह बताया है। मादुरो पर 2020 में नार्को-आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में अभियोग लगाया गया था। लेकिन मजे की बात है कि मादुरो की पत्नी सेलिया फ्लोरेस को भी गिरफ्तार कर लिया गया है और संशोधित अभियोग का हिस्सा बना दिया गया है। जबकि 2020 के मूल अभियोग में उनका नाम शामिल नहीं था।
अधिकांश अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञों, यूएन और कई देशों की सरकारों का कहना है कि अमेरिका की ये कार्रवाई अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। उनकी दलीलों की बुनियाद में राज्यसत्ता की सम्प्रभुता है। जबकि ट्रम्प प्रशासन इस आरोप का बचाव एक कानून प्रवर्तन कार्रवाई के रूप में करता है, जिसका उद्देश्य अमेरिकी कानून के तहत नार्को-आतंकवादी घोषित एक व्यक्ति को मुकदमे के लिए कठघरे में लाना है।
प्रचलित अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सम्प्रभु देश के राष्ट्राध्यक्षों को विदेशी अदालतों में इम्युनिटी प्राप्त होती है। स्वयं अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 1812 में इस विषय पर दिए एक निर्णय में इसे मान्यता दी थी। लेकिन ट्रम्प प्रशासन का दावा है कि मादुरो वैध राष्ट्रपति नहीं हैं। तथ्य तो यही है कि उन्होंने बार-बार चुनाव जीते हैं और वे अपने देश की राष्ट्रीय निर्वाचन परिषद द्वारा निर्वाचित घोषित किए गए हैं। इसलिए चुनावों में धांधली का दावा भी किस अधिकार के बूते किया जा सकता है?
दूसरा, और अधिक गंभीर पहलू वेनेजुएला पर कब्जा करके उसके तेल संसाधनों का नियंत्रण अपने हाथों में लेने की अमेरिकी योजना है। वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा प्रमाणित तेल भंडार है। ट्रम्प ने संकेत दिया है कि उन्होंने वेनेजुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज को अमेरिकी निर्देशों का पालन करने के लिए मना लिया है। हालांकि इसके बाद रोड्रिगेज ने अमेरिकी कार्रवाइयों की निंदा की।
ट्रम्प यह भी कह चुके हैं कि अमेरिका वेनेजुएला में एक ऑकुपेशन-फोर्स के साथ ही तेल विशेषज्ञों को भी भेज सकता है, ताकि उसके तेल उद्योग को अपने नियंत्रण में लिया जा सके। लेकिन किसी देश पर कब्जा करने और उसके संसाधन को वैश्विक बाजार में बेचने के लिए न तो अमेरिकी कानून और न ही अंतरराष्ट्रीय कानून ट्रम्प को कोई कानूनी इजाजत देते हैं।
यूएन चार्टर का अनुच्छेद 2(4) आत्मरक्षा के औचित्य या यूएन की स्पष्ट अनुमति के बिना किसी अन्य राज्य की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग करने या इसकी धमकी देने पर भी प्रतिबंध लगाता है। इन अर्थों में वेनेजुएला पर किया गया हमला यूएन चार्टर का स्पष्ट उल्लंघन हैं।
नार्को-तस्करी का आरोप भी केवल इन अवैध अमेरिकी कार्रवाइयों को जायज ठहराने के लिए ही लगाया गया है। वास्तव में, अमेरिका की आधिकारिक नेशनल ड्रग थ्रेट असेसमेंट रिपोर्ट 2025 में मादुरो के बारे में बहुत कम या लगभग कुछ भी नहीं कहा गया था। इसके विपरीत, इसमें मैक्सिको, कोलंबिया और कुछ अन्य लैटिन अमेरिकी देशों को मादक पदार्थों के प्रमुख स्रोत के रूप में चिह्नित किया गया था।
अमेरिकी कानून के तहत भी इस कार्रवाई की वैधता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। युद्ध की घोषणा करने का अधिकार केवल अमेरिकी कांग्रेस के पास है, लेकिन ट्रम्प प्रशासन इसे महज एक कानून प्रवर्तन कार्रवाई बता रहा है। जबकि ऐसी कार्रवाइयों में पूरे नौसैनिक बेड़े, 150 विमानों और हजारों कर्मियों का इस्तेमाल नहीं किया जाता। ट्रम्प तो यह भी संकेत दे चुके हैं कि यदि पहली कार्रवाई विफल होती तो अमेरिका दूसरा और बड़ा हमला करने जा रहा था।
यह तो साफ है कि ट्रम्प की नजर वेनेजुएला के 350 अरब बैरल के तेल भंडार पर है। पिछले लगभग बीस वर्षों में, कुप्रबंधन और प्रतिबंधों के कारण वेनेजुएला का उत्पादन प्रतिदिन 32 लाख बैरल (बीपीडी) के उच्च स्तर से गिरकर मात्र 10 लाख बीपीडी रह गया है। अब ट्रम्प के अनुसार अमेरिका उसके तेल उद्योग को अपने नियंत्रण में लेगा, उसका पुनर्गठन करेगा और तेल का निर्यात करेगा।
ट्रम्प दावा कर रहे हैं कि इससे मिलने वाला धन न केवल वेनेजुएला के लोगों के भले के लिए इस्तेमाल होगा, बल्कि अमेरिका को हुए नुकसान की भरपाई भी करेगा। लेकिन हकीकत यह है कि अगर अमेरिका वास्तव में ही वेनेजुएला के तेल उद्योग का संचालन शुरू कर देता है, तो वहां के लोगों को अपने तेल से मुनाफा मिलने में अभी बहुत समय लगने वाला है।
साम्राज्यवाद का प्रतिरोध आवश्यक
श्रीराम चौलिया, ( लेखक जिंदल स्कूल आफ इंटरनेशनल अफेयर्स में प्रोफेसर और डीन हैं )
वेनेजुएला में अमेरिकी हमला यही दर्शाता है कि हम महाशक्तियों की घातक प्रतिस्पर्धा और उनके मनमाने हस्तक्षेपों के दौर में जी रहे हैं। ऐसे दौर में जहां अंतरराष्ट्रीय कानूनों और जंगल के कानूनों में कोई अंतर ही नहीं रह गया है। वेनेजुएला में तख्तापलट के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शेखी बघारते हुए कहा, ‘हमें इसे फिर से करना होगा, हम फिर से ऐसा कर सकते हैं और कोई हमें रोक नहीं सकता।’ यानी जिसकी लाठी उसी की भैंस। ट्रंप का यह औपनिवेशिक दावा कि ‘हम वेनेजुएला को चलाएंगे और सुनिश्चित करेंगे कि इसे ठीक से चलाया जाए’, स्पष्ट संकेत है कि शक्तिशाली ही शक्तिहीन पर राज करेंगे। ट्रंप ने वेनेजुएला में अवैध रूप से सत्ता परिवर्तन करके वहां के खनिजों को अमेरिकी कंपनियों के एकाधिकार में लाने की खुलेआम घोषणा से सिद्ध कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों के जो भी बचे-कुचे बंधन थे, वे भी ध्वस्त होते जा रहे हैं।
इससे पहले रूस ने अपने मुकाबले कमजोर पड़ोसी यूक्रेन पर आक्रमण कर उस पर विशेषाधिकारों का दावा किया। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के अनुसार बड़ी शक्तियों को अपने-अपने प्रभाव वाले क्षेत्र रखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए और यूक्रेन की सच्ची संप्रभुता तभी संभव है जब वह रूस के प्रति मित्रवत और पराधीन रहे। इनके उलट चीन ने अभी तक ताइवान पर पूर्ण पैमाने पर आक्रमण करने या भारत, वियतनाम, फिलीपींस अथवा जापान पर सीधे हमले का प्रयास नहीं किया है, परंतु कमजोर पड़ोसियों के प्रति उसका भी औपनिवेशिक और दबंग रवैया है जो दिन-प्रतिदिन और बिगड़ता जा रहा है। जब सभी बलशाली देश आक्रामक और लुटेरे तेवरों पर उतर आएं तो बड़ी मछली का छोटी मछली को निगलना सामान्यीकृत होने लगता है।
वैश्विक राजनीति के बारे में कहा जाता है कि वह सिद्धांतों एवं मानदंडों के आधार पर संचालित होती है, लेकिन हालिया उदाहरण कुछ और ही संकेत करते हैं। वेनेजुएला में अमेरिकी हमले के बाद ताइवान को लेकर समय-समय आक्रामकता दिखाने वाले चीन पर भी अंतरराष्ट्रीय कानून वाले तर्क बेमानी हो जाते हैं। लैटिन भाषा में ‘टू कुआकवे’ जैसी एक संकल्पना है, जिसके अनुसार प्रतिद्वंद्वी के व्यक्तिगत व्यवहार और कार्यों को उनके तर्क के साथ असंगत बताकर उनके तर्क को अमान्य कर दिया जाता है। वेनेजुएला में सशस्त्र हमला कर और उसकी आंतरिक राजनीति को जबरदस्ती बदलकर ट्रंप ने हर संभावित हमलावर को सुविधाजनक बहाना दे दिया है। ट्रंप प्रशासन की नवीनतम राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अमेरिका लैटिन अमेरिका पर प्रभुत्व स्थापित करने और एक ऐसे पश्चिमी गोलार्ध का निर्माण करने के लिए उन्नीसवीं सदी के ‘मोनरो सिद्धांत’ को समकालीन संदर्भ में लागू करेगा, जिससे पूरे क्षेत्र की सरकारों को अमेरिका के आर्थिक और सामरिक हितों के अनुसार चलना होगा। अगर लैटिन अमेरिका में अमेरिका की धौंस जायज है, तो एशिया में चीन अपने आप को बेताज बादशाह क्यों न मान ले?
देखा जाए तो ताइवान का परिप्रेक्ष्य वेनेजुएला से भिन्न है, मगर जब संप्रभुता और शांतिपूर्वक बर्ताव के सिद्धांत ही लुप्त हो रहे हों तो राष्ट्रपति शी चिनफिंग जैसे आक्रामक नेता अराजकता का फायदा क्यों नहीं उठाएंगे? चीन निश्चित रूप से इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और अब वेनेजुएला में पश्चिमी दखलंदाजी का हवाला देकर ताइवान और अन्य एशियाई पड़ोसियों पर दबाव और हमले की योजनाओं को तेज करेगा। रूस की तरह चीन भी कहता आ रहा है कि पश्चिमी शक्तियों के पाखंड और दोहरे रवैये के कारण ही अंतरराष्ट्रीय कानूनों के चिथड़े उड़ गए हैं और वे दोनों अपनी ‘आत्मरक्षा’ के नाम पर सख्त से सख्त कार्रवाई करने के लिए स्वयं को विवश बताते हैं। ताइवान को धमकाने के लिए चीन द्वारा किए जा रहे प्रत्येक युद्ध अभ्यास में अनिश्चितता अंतर्निहित है और इनमें से कोई भी वास्तविक युद्ध में तब्दील हो सकता है।
अब तक अगर ताइवान पर चीन ने धावा नहीं बोला है तो यह अंतरराष्ट्रीय नियम या विधि के प्रति शी चिनफिंग की श्रद्धा के कारण नहीं है, बल्कि उस उपयुक्त समय की प्रतीक्षा की वजह से है जब हिंद-प्रशांत में शक्ति संतुलन और भूराजनीतिक परिस्थितियां चीन के पक्ष में कहीं अधिक झुक जाएं। चीन भली-भांति जानता है की अमेरिका अब भी ‘खुले एवं स्वतंत्र’ हिंद-प्रशांत को अपना मूल राष्ट्रीय हित मानता है और अमेरिकी सैन्य सामग्री लगातार ताइवान तथा अन्य एशियाई मित्र देशों को बेची भी जा रही है। चिनफिंग यह चाहेंगे कि वेनेजुएला में हस्तक्षेप के बाद अगर अमेरिका उसी पड़ोसी क्षेत्र में उपनिवेशवादी मंशा से ज्यादा उलझ जाए और चीन के साथ व्यापार समझौते के चलते एशिया की तकदीर चीन के हाथों छोड़ दें तो ताइवान पर आधिपत्य का उसके पास सुनहरा मौका होगा।
आक्रामक महाशक्तियों द्वारा अंतरराष्ट्रीय कानूनों पर किए जा रहे व्यापक आघातों के मद्देनजर छोटे देशों के लिए अपना अस्तित्व बचाए रखने की क्या रणनीति हो सकती है? मौलिक स्तर पर उन्हें समूचे ‘वैश्विक दक्षिण’ में एकजुट होकर हस्तक्षेप की नितांत अस्वीकृति के सिद्धांत पर जोर देना होगा, ताकि महाशक्तियों का जंगल-राज एक सामान्य दस्तूर न बन जाए। व्यावहारिक स्तर पर उन्हें क्षेत्रीय एकीकरण और एकता को प्राथमिकता देनी होगी, ताकि कोई भी महाशक्ति आसानी से उनमें भेद पैदा करके उन्हें बांट न सके। वेनेजुएला में मादुरो ने सबसे बड़ी भूल यह की कि पड़ोसी लैटिन अमेरिकी देशों के साथ उन्होंने वर्षों से दुश्मनियां मोल लीं और अंत में अमेरिकी आक्रमण को टालने के लिए कोई प्रांतीय गठबंधन या संस्थान शेष नहीं रहा। स्मरण रहे कि एक सभ्य विश्व व्यवस्था का निर्माण तभी संभव है, जब कमजोर देश एकजुट होकर वर्चस्व का विरोध करें। इतिहास से हम थोड़ी बहुत सीख-समझ भी ले सकते हैं कि यदि साम्राज्यवाद सदियों पुराना है तो समानता और मर्यादा की चाह भी उतनी ही पुरानी है।
कठघरे में उदारता
संपादकीय

आमतौर पर जघन्य अपराधों के दोषी ठहराए गए कैदियों के प्रति गैरजरूरी और एक सीमा से ज्यादा नरमी बरतना न्याय की अवधारणा के अनुकूल नहीं माना जाता है। मगर हत्या और बलात्कार के अपराध में दोषी ठहराए जाने के बावजूद किसी खास सजायाफ्ता कैदी के प्रति सरकार का रुख जब जरूरत से ज्यादा उदार दिखने लगे, तो स्वाभाविक ही यह सवाल उठता है कि आखिर कानून और सजा का मतलब क्या रह गया ! गौरतलब है कि बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध में दोषी साबित होने के बाद जेल में सजा काट रहे डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम को एक बार फिर चालीस दिनों की पैरोल मिल गई। भले ही इस छूट के लिए सरकार की ओर से पेश दलीलों पर तमाम सवाल उठ रहे हों, लेकिन राम रहीम अगले चालीस दिनों तक जेल के बाहर रहेगा। दरअसल, अदालत में इस पैरोल मिलने के मसले पर हरियाणा सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि वह कोई ‘पेशेवर अपराधी’ नहीं है और जेल में ‘अच्छे चाल-चलन’ वाला कैदी है।
सवाल है कि जिस कसौटी पर सरकार ने राम रहीम के प्रति लगातार उदारता दिखाई है, क्या वह यही पैमाना जेल में बंद जघन्य अपराधों के अन्य दोषियों के प्रति भी लागू करती है । दो डेरा साध्वियों से बलात्कार के मामले के अलावा राम रहीम को हत्या के अन्य मामले में भी दोषी ठहराया जा चुका है। मगर सजा काटने के लिए जेल में जाने से लेकर अब तक उसे पंद्रहवीं बार ‘पैरोल’ या फिर ‘फरलो’ पर बाहर आने की सुविधा मुहैया कराई गई है। अब तक वह कुल चार सौ दिन से ज्यादा वक्त तक जेल से बाहर रह चुका है । जघन्य अपराधों के दोषियों को लेकर कोई सरकार शायद ही कभी इस हद तक उदार होती है। सही है कि पैरोल एक कानूनी व्यवस्था है और इसके तहत कैदी को शर्तों के साथ जेल से कुछ दिनों के लिए रिहा किया जाता है, लेकिन इस कानूनी प्रावधान का बेजा इस्तेमाल न्याय की अवधारणा पर चोट पहुंचाने से अलग नहीं है। सरकार को इस बात से शायद कोई फर्क नहीं पड़ता कि इससे कानूनों की मनमानी व्याख्या और पीड़ितों के प्रति न्याय की अवधारणा को चोट पहुंचाने को लेकर कैसे उदाहरण बन रहे हैं !
Date: 06-01-26
वेनेजुएला पर कार्रवाई से उठे सवाल
पुष्परंजन
वेनेजुएला पर अमेरिका का हमला और वहां के तात्कालिक राष्ट्रपति निकोलस मादुरो एवं उनकी पत्नी को हिरासत में लेने के मामले में दुनिया एक बार फिर से बंट गई लगती है। कई देशों ने वेनेजुएला पर अमेरिका की इस कार्रवाई का स्पष्ट विरोध किया है। मगर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों का प्रचार करने की रणनीति भी पीछे नहीं है। समर्थन और विरोध से इतर यह सवाल अनुत्तरित रहेगा कि आखिर मादुरो पर ही यह कार्रवाई क्यों की गई! यदि नशीले पदार्थों की तस्करी ही उनका गुनाह-ए-अजीम है, तो इसको लेकर तो चीन पर भी सवाल उठते रहे हैं।
देखा जाए तो वेनेजुएला के विपुल खनिज और तेल पर अमेरिकी कंपनियों का नियंत्रण, ट्रंप की नीयत को पूरी तरह से उजागर नहीं करता है। अमेरिका और वेनेजुएला के बीच तनाव का यह सिलसिला पुराना है। वेनेजुएला में वर्ष 1999 में ह्यूगो शावेज के सत्ता संभालने के बाद से ही दोनों देशों के बीच तनाव की शुरुआत हो गई थी। शावेज खुद को समाजवादी और अमेरिकी साम्राज्यवाद का विरोधी बताते थे। उन्होंने अमेरिका को आंख दिखाते हुए क्यूबा और ईरान जैसे कई अमेरिकी विरोधी देशों से दोस्ती बढ़ाई। कहानियां यह भी गढ़ी जा रही हैं कि अमेरिका के हमले का मकसद उस ‘स्वघोषित समाजवादी क्रांति’ को खत्म करना है, जिसे मादुरो के राजनीतिक गुरु और पूर्व राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज ने 1999 में शुरू किया था।
बात फिर नशीले पदार्थों की तस्करी पर आती है कि आखिर वह ऐसा कौन सा पदार्थ था, जिसकी वजह से अमेरिका की नींद हराम हो गई थी? यह गांजा, अफीम, चरस-हशीश, या हेरोइन नहीं, बल्कि सबसे घातक नशीला पदार्थ ‘फेंटानिल’ है। कहा जा रहा है कि इस पदार्थ की तस्करी ने अमेरिका में बड़ी संख्या में लोगों की जान ले ली। इसने ट्रंप की आभासी मुद्रा क्रिप्टोकरंसी को तबाह कर दिया। कायदे से बहस फेंटानिल के मुख्य आपूर्तिकर्ता चीन पर और ट्रंप के क्रिप्टो गोरखधंधे पर होनी चाहिए थी।
एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 1999 से अब तक अमेरिका में लगभग दस लाख लोगों की इस नशीले पदार्थ की वजह से मौत हो चुकी है। वर्ष 2020 में नशीले पदार्थों से हुई मौत के कुल मामलों में से 82 फीसद फेंटानिल से जुड़े थे। 2022 में यह संख्या 107,941 पर पहुंच गई। 2025 तक अमेरिका में नशीले पदार्थों से होने वाली मौत की दर दोगुनी से ज्यादा हो गई, इसका मुख्य कारण फेंटानिल की बढ़ती तस्करी को माना गया है। दरअसल, फेंटानिल प्रयोगशाला में बनने वाला एक सिंथेटिक नशीला पदार्थ है, जो मार्फिन से 80-100 गुना और हेरोइन से पचास गुना ज्यादा घातक है। वैसे इसका नियंत्रित इस्तेमाल आमतौर पर अस्पतालों में दर्द कम करने के लिए किया जाता है।
इसकी खरीद-फरोख्त के लिए ‘डार्कनेट’ का सबसे अधिक इस्तेमाल होता है। डार्कनेट बाजार वेब पर एक वाणिज्यिक वेबसाइट है, जिसके जरिए नशीले पदार्थ, हथियार, चोरी किया हुआ डेटा और नकली दस्तावेज का अवैध लेन-देन होता है। उदाहरण के लिए, ‘सिल्क रोड’, जो वर्ष 2011 में बना, वह एक डार्कनेट बाजार था। यह बिटकाइन के शुरुआती उपयोगकर्ताओं में से कुछ का ठिकाना था। ज्यादातर डार्कनेट बाजार अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजंसियों से बचने के लिए अपने मंच पर फेंटानिल जैसे नशीले पदार्थों पर साफ तौर पर प्रतिबंध का संकेत देते हैं। बावजूद इसके, कई लोग फेंटानिल पर दिखाई जाने वाली पाबंदी से बचने का रास्ता निकाल लेते हैं।
वर्ष 2020 की ‘ड्रग एनफोर्समेंट एडमिनिस्ट्रेशन’ (डीइए) की रपट में चीन को फेंटानिल का शीर्ष उत्पादक देश बताया गया था। इस संस्था ने फेंटानिल उत्पादन की एक शृंखला का पता लगाया है, जिसमें खतरनाक रसायनों को अवैध रूप से लैटिन अमेरिकी देशों में भेजा जाता है, जहां उनका इस्तेमाल फेंटानिल बनाने के लिए किया जाता है। इसे बाद में बेचने के लिए अमेरिका ले जाया जाता है। अमेरिका के कानून प्रवर्तन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि इस नशीले पदार्थ से जुड़े लेन-देन में शामिल अधिकांश लोग आभासी मुद्रा क्रिप्टोकरंसी का इस्तेमाल करते हैं। कई अमेरिकियों को लगता है कि प्रवासी लोग ही उनके देश में फेंटानिल ला रहे हैं
मगर आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि फेंटानिल की तस्करी और अवैध बिक्री में प्रवासी लोग केवल पच्चीस फीसद और अमेरिकी नागरिक पचहत्तर फीसद शामिल हैं। अमेरिका का प्रशासन अपने ही घर में इसे रोक पाने में नाकाम रहा। विश्लेषकों के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप के रहते हुए फेंटानिल की तस्करी के तरीकों में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। इसका बड़े पैमाने पर विश्लेषण करने के लिए ‘चैनालिसिस’ ने चीन में सक्रिय फेंटानिल के घटक रसायनों के विक्रेताओं से जुड़े क्रिप्टोकरंसी पते की पहचान की। इनके पास वर्ष 2015 से अब तक 98 मिलियन डालर से ज्यादा की क्रिप्टोकरंसी का पता चला है। चैनालिसिस एक अमेरिकी ब्लाकचेन विश्लेषण फर्म है, जिसका मुख्यालय न्यूयार्क सिटी में है।
सबको इस बात की खलिश है कि भारत ने वेनेजुएला पर अमेरिका के हमले की कार्रवाई को लेकर संतुलित बयान जारी क्यों किया। भारत ने रविवार को राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़े जाने पर गहरी चिंता जताई और सभी पक्षों से क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए बातचीत के जरिए मुद्दों को सुलझाने की अपील की। मगर, हम एक घटना का विश्लेषण गहराई से करेंगे, तो बात समझ में आ जाएगी कि भारत के इस बयान के क्या मायने हैं। 18 सितंबर, 2025 को नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास की वेबसाइट पर एक सूचना जारी की गई कि ‘फेंटानिल प्रीकर्सर की तस्करी में शामिल होने के कारण भारतीय कंपनी के अधिकारियों और उनके परिवार के सदस्यों के अमेरिकी वीजा रद्द।’ दूतावास ने स्पष्ट किया कि ये व्यक्ति अमेरिका की यात्रा के लिए अयोग्य हो सकते हैं।
साथ ही कहा कि दूतावास उन कंपनियों से जुड़े अधिकारियों पर भी कड़ी नजर रख रहा है, जिनके बारे में पता चला है कि उन्होंने फेंटानिल प्रीकर्सर की तस्करी की है। फेंटानिल के प्रवाह को रोकना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में से एक है। यह दिलचस्प है कि भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस कार्रवाई पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी। डोनाल्ड ट्रंप दुनिया को बता रहे हैं कि नशीले पदार्थों की तस्करी ही मादुरो का मुख्य गुनाह है, लेकिन वे यह नहीं बता पा रहे कि इस अवैध धंधे से उनकी कंपनी की क्रिप्टोकरंसी का कितना नुकसान हुआ है। एक हालिया रपट के अनुसार, वर्ष 2025 के आखिर में क्रिप्टो बाजार में गिरावट के कारण ट्रंप की कंपनी की कुल संपत्ति का मूल्य एक बिलियन डालर से ज्यादा कम हो गया।
ब्लूमबर्ग के अनुसार, इस परिवार की संपत्ति का कुल मूल्य लगभग 7.7 बिलियन डालर से घटकर 6.7 बिलियन डालर रह गया और यह डिजिटल संपत्ति में गिरावट के कारण हुआ है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि नशीले पदार्थ फेंटानिल के उत्पादन से जुड़े क्रिप्टोकरंसी-आधारित लेन-देन ने ‘ट्रंप मेमेकाइन’ को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। ट्रंप अपने इस दर्द को सार्वजनिक नहीं कर सकते, लेकिन उन्होंने वेनेजुएला पर कार्रवाई करके एक तीर के साथ कई निशाने साधे हैं।
ढाका का रवैया
संपादकीय
आज विश्व में नाना प्रकार के तनाव हावी हैं, लेकिन हमारे लिए सबसे निकटतम तनाव की वजह बांग्लादेश बना हुआ है। तनाव की सबसे ताजा कारण क्रिकेट जैसा खेल बन गया है। पड़ोसी देश के तेज गेंदबाज मुस्तफिजुर रहमान को कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) टीम से बाहर किए जाने के बाद बांग्लादेश सरकार ने अपने देश में इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के प्रसारण व स्ट्रीमिंग पर अनिश्चितकाल के लिए रोक लगा दी है। बेशक, पड़ोस की कार्यवाहक सरकार अपने तमाम फैसले आवेश में ले रही है और खासकर भारत संबंधी फैसलों में पड़ोसी सरकार को न तो अपना तात्कालिक हित दिख रहा है और न दूरगामी हित । इससे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को कोई खास घाटा नहीं होगा, मगर बांग्लादेश के खिलाड़ियों और क्रिकेट प्रेमियों को जरूर निराशा होगी। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड दुनिया का सबसे ताकतवर और अमीर बोर्ड है, इसका लाभ दूर देश के खिलाड़ी तो उठा रहे हैं, पर दो पड़ोसी देशों के खिलाड़ी वंचित हैं। पाकिस्तान के खिलाड़ियों को भी मुंबई हमले के बाद से आईपीएल में खेलने का मौका नहीं मिल रहा है और अब हालात ऐसे ही रहे, तो बांग्लादेशी खिलाड़ियों के लिए भी आईपीएल में खेलना दूर की कौड़ी हो जाएगा।
यह बहुत अफसोस की बात है कि हमारा यह पड़ोसी देश हमारी चिंताओं को समझने में नाकाम हो रहा है। बांग्लादेश की ताजा प्रतिक्रिया भी इसी ओर इशारा कर रही है। कार्यवाहक सरकार यह समझना नहीं चाहती कि बीसीसीआई ने यह फैसला क्यों लिया है? आज बांग्लादेश के लोगों को ठेस पहुंची है, वे दुखी और आहत हैं। हालांकि, सवाल तो यह है कि क्या बांग्लादेश के तल्ख बर्ताव से भारत को मुसलसल ठेस नहीं पहुंच रही है? यहां भी लोग दुखी और आहत हैं। बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के साथ जैसा व्यवहार हो रहा है, उसे लेकर भारत में स्वाभाविक ही नाराजगी है। लोग यह पूछ रहे हैं कि जब बांग्लादेश को भारत की कोई परवाह नहीं है, तब बांग्लादेश के किसी खिलाड़ी को आईपीएल में खेलने का मौका देकर 9.20 करोड़ रुपये क्यों दिए जाएं? यहां यह भी देखना वाजिब होगा कि बांग्लादेश के स्थानीय प्रीमियर लीग में बहुत अच्छे खिलाड़ियों को भी पचास लाख रुपये के आसपास ही मिल पाते हैं। लगे हाथ, पाकिस्तान सुपर लीग की भी चर्चा कर लें, तो वहां सबसे महंगे खिलाड़ी ऑस्ट्रेलिया के डेविड वार्नर को 2.7 करोड़ रुपये मिले हैं। कमाई और खर्च के मामले में आईपीएल बहुत आगे है, उसकी तुलना किसी भी दूसरे लीग से नहीं हो सकती। यह बहुत अफसोस की बात है कि अच्छे संबंध बनाकर दोनों देशों को भारत की संपन्नता का लाभ लेना चाहिए, लेकिन दोनों ही अपनी संकीर्ण सोच की वजह से अपने ही खिलाड़ियों या लोगों का नुकसान कर रहे हैं।
यह तो और भी ज्यादा अफसोस की बात है कि रहमान विवाद के बाद बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड (बीसीसी) ने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) को पत्र लिखकर अनुरोध किया है कि वह टी-20 विश्व कप मैचों को भारत से श्रीलंका स्थानांतरित करे। संभव है, बीसीसीआई इसके लिए तैयार हो जाए, मगर इससे भी बांग्लादेश को नुकसान होगा। जहां तक भारत का सवाल है, वैश्विक मोर्चे पर व्यावहारिकता को ज्यादा महत्व देने की जरूरत है। जब पड़ोस से लेकर वेनेजुएला तक दुनिया बड़े बदलावों से गुजर रही हो, तब भारत में लिए जा रहे तमाम फैसलों में परिपक्वता और बढ़ जानी चाहिए।
Date: 06-01-26
जंगो के नए दौर में उलझती दुनिया
एम जे अकबर, ( पूर्व विदेश राज्य मंत्री व वरिष्ठ पत्रकार )
पिछले ही हफ्ते अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चिंता जताई थी कि यदि रूस- यूक्रेन जैसे संघर्ष जल्द खत्म नहीं किए गए, तो दुनिया तीसरे महायुद्ध में फंस सकती है। मगर उन्होंने खुद वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई करके राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सपत्नी बंधक बना लिया और वहां नई सरकार के गठन का एलान कर दिया, जिसे अमेरिका चलाएगा। यह एक देश का ‘कॉरपोरेट टेकओवर’ है, क्योंकि खुद ट्रंप के ही शब्द हैं, ‘उन्हें वेनेजुएला का तेल चाहिए’।
इस घटना से उन देशों को साहस मिलेगा, जिनका एजेंडा अब तक ‘ अधूरा है। यूक्रेन के कई इलाकों पर अधिकार जमाने का एलान रूस ने किया है, जबकि चीन की मंशा 2027 तक ताइवान पर कब्जा करने की है। अब अमेरिका किस मुंह से इनको रोकने के लिए आगे आएगा? पहली झलक में तो यही लगता है कि यूक्रेन की लड़ाई सिर्फ यूरोप की है, मगर क्रीमिया और यूक्रेन के पूरब में चेचन्या है। चेचन्य से कॉकेशस होते हुए हम सीरिया और पश्चिम एशिया में बहुत जल्द पहुंच जाते हैं, यानी यह यूरेशियाई युद्ध है।
वास्तव में, इस समय भूमध्य सागर, काला सागर, कैस्पियन सागर और लाल सागर के बीच जितने भी इलाके हैं, वे सभी युद्ध में फंसे हुए हैं। यहां इजरायल- हमासजंग, इजरायल लेबनान तनाव, काकेशस संघर्ष (खासकर आर्मेनिया, अजरबैजान से ईरान का तनाव), वेनेजुएला के घटनाक्रम से ऐन पहले यमन पर सऊदी अरब का हमला, फ्रांस व ब्रिटेन की इराक व सीरिया के आईएस ठिकानों पर बमबारी (वेनेजुएला हमले के दिन) के रूप में तनाव के मोर्चे खुले हुए हैं। उत्तर कोरिया और जापान की ताजा तनातनी को भी इसमें गिन सकते हैं।
सवाल उठता है, क्या यह तीसरे विश्व युद्ध की आहट है? मेरी नजर में यह ‘वर्ल्ड वार’ नहीं, ‘वर्ल्ड वाइड वार’ है, यानी हर महाद्वीप में जंग वाले हालात । इसकी वजह भी है। दूसरे महायुद्ध के बाद दुनिया में शांति व स्थिरता लाने के लिए जितने भी संस्थान बने, वे सभी बेमानी साबित हो रहे हैं। सन् 1945 में दूसरे महासमर का अंत ही नहीं हुआ था, बल्कि औपनिवेशिक देशों में आजादी का आगाज भी हुआ था। इसकी शुरुआत भारत से हुई थी, जब महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए राष्ट्रीय आंदोलन ने वरतानिया हुकूमत का झंडा झुका दिया। उन दिनों अंग्रेज और अंग्रेजीदां हंसते थे कि क्या धोती पहनकर भी कोई ‘महान ब्रिटिश साम्राज्य’ को झुका सकता है? वे अगले 300 वर्षों तक उस हुकूमत के चलने की भविष्यवाणी किया करते थे। मगर 1920 के बाद वह साम्राज्य 30 साल भी नहीं चला और 1947 के बाद तो अगले तीन दशकों में दुनिया के हर कोने से ही उपनिवेशवाद खत्म हो गया। प्रायः सभी देशों को आजादी अहिंसा के रास्ते ही मिली।
उस वक्त संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे तमाम संस्थान गढ़े गए और इनमें हरेक मुल्क का होना यह आश्वासन था कि उनकी संप्रभुता और आजादी अक्षुण्ण रहेगी, बेशक वे अमीर हों अथवा गरीब मगर 1990 के बाद, खास तौर से 21वीं सदी की शुरुआत से ये तमाम संस्थान बेअसर होने लगे, क्योंकि ताकतवर देशों ने अपने लिए या विश्व हित में उस नीति को तोड़ना शुरू किया, जिसमें किसी दूसरे देश में दखल न देने की बात कही गई थी। वि-उपनिवेशीकरण से हुए बदलाव को बड़ी ताकतें मानने को तैयार नहीं हुई, जैसे- चीन ने तिब्बत की आजादी नहीं मानी; वियतनाम विभाजन मानने को तैयार नहीं हुआ और सूडान में जो कुछ हुआ, वह तो जगजाहिर ही है।
वेनेजुएला घटनाक्रम इस सच्चाई को एक नई ऊंचाई पर ले जा रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप उसी ‘मोनरो नीति’ का पालन कर रहे हैं, जिसे साल 1823 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मोनरो ने उस वक्त की भौगोलिक हकीकत के आधार पर तैयार किया था। उस जमाने में पूरा दक्षिणी व उत्तरी अमेरिका का अधिकतर हिस्सा यूरोप का उपनिवेश था। मोनरो ने दावा किया था कि उत्तरी हिस्सा तो अमेरिका का है ही, दक्षिणी ‘हे अमेरिका पर भी अब विदेशी हित स्वीकार नहीं किए जाएंगे, क्योंकि वह उनका ‘आंगन’ है। मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि 19वीं सदी की नीति क्या 21वीं सदी में प्रासंगिक साबित होगी ?
हालांकि, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कर दिया है कि उन्हें अगर कुछ चाहिए, तो वह साम-दाम-दंड- भेद, सबका इस्तेमाल करके उसे अपने कब्जे में लेना पसंद करेंगे। अब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और कानून निरर्थक हैं। वेनेजुएला में जो हुआ है, वह इसी संदेश को पुख्ता कर रहा है। ‘अमेरिका ही असल संयुक्त राष्ट्र है’ यह बात राष्ट्रपति ट्रंप कहते भी रहे हैं। अब क्या वह ग्रीनलैंड जाएंगे ? यूरोपीय देशों के सामने यह दुविधा भी खड़ी हो गई है कि कनाडा को अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की बात ट्रंप मजाक में कहते रहे हैं या वाकई उनकी यह मंशा है ? नवा घटनाक्रम यूक्रेन को भी एक संदेश है। अगर अमेरिका पड़ोस में अपने हित संभालने को स्वतंत्र है, तो रूस भी यह अधिकार रखता है। इससे की की हिम्मत और पस्त हो सकती है।
दूसरी बात । वेनेजुएला की एक सच्चाई यह है कि वहां दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, करीब 300 अरब बैरल । इसके बाद सऊदी अरब (लगभग 265 अरब बैरल ) का स्थान आता है। अमेरिका के पास बमुश्किल 35 अरब बैरल तेल है। वेनेजुएला पर कब्जे के बाद अमेरिका के पास तेल बाजार को नियंत्रित करने की ताकत आ जाएगी। अब तेल ही नहीं, खनिज भी काफी महत्वपूर्ण हैं, खास तौर से सेमीकंडक्टर और चिप के लिए, तो जाहिर सी बात है कि तेल व खनिज की राजनीति अधिक परवान चढ़ेगी। पिछले 100 साल में आधे से अधिक जंग तेल के कारण ही हुए हैं।
रही बात भारतीय नीति की, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बखूबी यह समझते हैं कि आंतरिक ताकत जुटाए बिना कोई भी देश आजाद नहीं रह सकता। आज कई सारे देश स्वतंत्र तो हैं, लेकिन ‘आजाद’ नहीं हैं। हमें आजाद भी रहना है और संप्रभु भी, जो बिना सामरिक ताकत और राजनीतिक इच्छाशक्ति के संभव नहीं है। ‘टैरिफ जंग’ में ही हमने देखा है कि प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका से टकराने की कुव्वत रखते हैं। वह मौजूदा विश्व- व्यवस्था को समझ रहे हैं।
यह घटनाक्रम बता रहा है कि 2026 में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ेगी। दिक्कत यही है कि जिन संस्थानों पर इसे संभालने की जिम्मेदारी थी, बेखत्म कर दिए गए हैं। इस कारण यदि यह सदी का सबसे खतरनाक साल बन जाए, तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।