04-09-2023 (Important News Clippings)

04 Sep 2023
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1 Nation, Many Questions

One-time elections are an intuitively appealing idea. But will they make govts work better?

TOI Editorials

The attempt to explore the feasibility of holding simultaneous elections in India across all levels of government got off to a controversial start. Adhir Ranjan Chowdhury, Congress leader in Lok Sabha and the only opposition politician in the eight-member committee headed by former president Ram Nath Kovind, opted out of it. The Kovind committee has been tasked with studying the issue.

India had simultaneous elections for the first 15 years. However, unstable coalitions after the 1967 elections led to a breakdown in the synchronicity of government formation. Five years ago, the law commission explored the subject in a draft report. It concluded that significant legislative changes would be needed, including constitutional amendments which should be ratified by at least half the state assemblies. The commission suggested that the goal could be reached gradually by bunching assembly elections in batches till we finally hold them together. As an overarching principle, simultaneous elections are an appealing goal. However, since it involves significant disruption in a politically charged atmosphere, including prospective delimitation, it’s important to weigh the costs and benefits.

The most frequently cited reasons for the transition are that it will improve governance and costs of conducting elections will come down. The governance argument is unconvincing. First, governance issues at local bodies like municipalities are unrelated to elections. State governments have been reluctant to devolve power, which has led to underfunded and often fragmented urban governance systems. In case of state assemblies, election-influenced disruption comes at the tail end of the term. If a government fails to perform till that phase, the problem is unlikely to be solved by simultaneous elections.

On the cost front, there’s no doubt that simultaneous elections will help EC. But the elephant in the room is the real spending by political parties. Delhi-based CMS estimated that between 1998 and 2019, aggregate Lok Sabha poll expenditure by political parties increased from ₹9,000 crore to over ₹55,000 crore. We seem to have the most expensive elections globally, which impact governance. The Kovind committee should examine the issue in all its dimensions.


Small Towns Getting Big Deal for Jobs

Tech pushing gig economy into the hinterland.

ET Editorials

India’s job market is moving out of its metropolises and into its tier-2 and -3 cities. The middle class is growing at its most rapid pace in these towns, and both white and blue collar employment is tracking the associated rise in consumption. Principal exports of goods and services are served from these locations, and companies are ramping up hiring closer to talent pools. Manufacturing and pharmaceuticals are clustered beyond the metros as are skilling opportunities for those in the IT industries. Financial services are radiating out, creating strong demand for manpower. Technology is pushing the gig economy into the hinterland. GoI and state governments are doing their bit, too, by plugging connectivity and infrastructure gaps.

Delhi and Mumbai are already in the list of the world’s top 10 megacities. But India has a sizable number of urban agglomerations that are actually pushing its urbanisation. Economic output is concentrating in these cities ferociously. Demand for housing and transportation are the most powerful propellers followed by healthcare and education services. All these industries have a big multiplier effect on employment. Realignment of global supply chains should contribute to the process by developing new manufacturing clusters with allied growth in indirect jobs in services.

Migration is principally intra-state, which makes radial urbanisation the natural course to follow. The cost of replenishing infrastructure in metro cities outweighs greenfield investments in tier-2 towns where land and labour are cheaper and demand is stronger. Job-seekers find it a compelling option in terms of cost of living. Since these are the growth markets, career progression is also reasonably assured. Skilling needs are also being addressed: a big slice of the team that placed a craft on the lunar surface are from small towns with initial education outside the top drawer of the country’s technical institutes. India is sustaining its economic growth on talent that cannot emigrate. Jobs need to go where it is to be found.


चुनाव प्रस्ताव पर हो व्यापक विमर्श


पिछले सप्ताह केंद्र सरकार ने दो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक प्रस्ताव लाकर सबको चकित कर दिया। पहले सरकार ने 18 से 22 सितंबर के बीच संसद का विशेष सत्र आयोजित करने की घोषणा कर दी। हालांकि, सरकार ने यह सार्वजनिक नहीं किया कि विशेष सत्र की कार्य सूची क्या होगी। मगर सरकार की तरफ से जो दूसरी राजनीतिक घोषणा की गई वह अधिक चौंकाने वाली थी। सरकार ने कहा कि देश में लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ आयोजित करने की संभावनाओं का पता लगाने के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति गठित की गई है। गृह मंत्री अमित शाह, राज्यसभा में विपक्ष के पूर्व नेता गुलाम नबी आजाद, 15वीं वित्त आयोग के पूर्व चेयरमैन एन के सिंह, लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप और पूर्व मुख्य सतर्कता अधिकारी संजय कोठारी समिति के अन्य सदस्य होंगे। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी को इस समिति में शामिल किया गया था, मगर उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।

दिलचस्प बात यह है कि इस समिति का गठन ऐसे समय में हुआ है जब देश में एक के बाद एक कई चुनाव होने वाले हैं और अगले वर्ष लोकसभा चुनाव संपन्न होने के बाद यह प्रक्रिया समाप्त होगी। जहां तक समिति के सदस्यों के चयन की बात है तो यह बिंदु विचारणीय है कि चुनावों के समय में संशोधन लाने का प्रस्ताव राजनीतिक विषय है, इसलिए इसमें अधिक प्रतिनिधित्व होना चाहिए था।

समिति लोकसभा, राज्य विधानसभाओं, नगर निगम और पंचायतों के चुनाव एक साथ आयोजित करने से संबंधित संवैधानिक एवं अन्य पहलुओं पर विचार करेगी और अपने सुझाव सरकार को सौंपेगी। देश में सभी स्तरों का चुनाव एक साथ आयोजित करने का विषय नया नहीं है और इसकी पहले भी विवेचना हो चुकी है। विधि आयोग और व्यक्ति, लोक शिकायत, विधि एवं न्याय पर विभाग-संबंधित संसद की स्थायी समिति भी इस प्रस्ताव का अध्ययन कर चुकी है। वास्तव में देश में 1952 से 1967 तक लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ ही हो रहे थे। मगर 1968 और 1969 में विभिन्न कारणों से कार्यकाल पूरा होने से पहले ही राज्य विधानसभाओं के भंग होने के बाद चुनाव आयोजित करने के समय बदल गए। कई बार लोकसभा भी समय से पहले भंग हो चुकी है।

लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव का आधार कम से कम सिद्धांत रूप में मजबूत प्रतीत होता है। यद्यपि, आदर्श आचार संहिता से विकास कार्य प्रभावित होते हैं मगर इससे भी बड़ी समस्या यह है कि राजनीतिक दल लगातार चुनाव अभियान में लगे रहते हैं, जिससे नीति-निर्धारण पर प्रतिकूल असर होता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुसार ईंधन के मूल्य तय करने में भी कई बार चुनावी नफा-नुकसान के चक्कर में देर हो जाती है। चुनाव साथ-साथ कराने का एक लाभ यह भी होगा कि धन की बचत- सरकारी कोष एवं राजनीतिक दल दोनों के लिए- होगी। हालांकि, जैसा कि पिछली कई रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है, संविधान एवं अन्य कानूनों- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 आदि- में संशोधन के अतिरिक्त कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां भी होंगी।

राज्य विधानसभाओं या लोकसभा के समय पूर्व भंग होने की आशंका बनी रहेगी। इन स्थितियों में निर्धारित समय से पहले चुनाव नहीं कराने के दूसरे परिणाम भी हो सकते हैं। यह सुझाव दिया गया था कि विधानसभाओं का कार्यकाल बढ़ा दिए जाए या एक सीमा तक इसे कम कर दिया जाए। लोकसभा के निर्धारित कार्यकाल से पहले भंग होने की स्थिति से बचने के लिए विधि आयोग और चुनाव आयोग ने सुझाव दिया था कि अविश्वास प्रस्ताव के साथ एक वैकल्पिक सरकार के लिए विश्वास का प्रस्ताव भी रखा जाए। मगर यह एक पर्याप्त समाधान नहीं होगा। सरकार के पास सदन का विश्वास होना महत्त्वपूर्ण है, भले ही विपक्ष एक वैकल्पिक सरकार देने में स्वयं को समर्थ पाए या नहीं। इस प्रकार, कोविंद समिति को ऐसे सभी सुझावों पर सावधानी से विचार करना होगा। समिति चाहे तो अपने सुझाव सौंपने से पहले व्यापक विचार-विमर्श कर सकती है और ऐसा करना उचित भी होगा। सरकार के लिए भी आवश्यक है कि वह इस प्रस्ताव पर किसी तरह की जल्दबाजी नहीं दिखाए क्योंकि इन बदलावों के महत्त्वपूर्ण राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं।


चुनाव का समय


सरकार लंबे समय से चाहती रही है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं। प्रधानमंत्री कई मौकों पर दोहरा चुके हैं कि ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ का विधान होना चाहिए। इसे लेकर निर्वाचन आयोग मंथन भी कर चुका है। विधि आयोग ने भी इस पर अपने विचार दिए हैं। अब लगता है कि यह व्यवस्था लागू करने की कोई सूरत बन सकेगी। इसके लिए केंद्र ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक समिति गठित कर दी है। यह समिति किस तरह इस विचार को व्यावहारिक रूप दे पाती है, देखने की बात है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग समय पर कराने से सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ता है। सरकारी कर्मचारियों का काफी समय इनकी तैयारियों और इन्हें संपन्न कराने में जाया हो जाता है। ऐसे में सारे चुनाव एक साथ कराने से सार्वजनिक धन की काफी बचत होगी। हालांकि निर्वाचन आयोग बता चुका है कि इसके लिए उसे बड़ी संख्या में वोटिंग मशीनों और दूसरे उपकरणों की जरूरत पड़ेगी। मगर अलग-अलग चुनावों पर आने वाले खर्च की तुलना में इन संसाधनों को जुटाना कोई बड़ा काम नहीं माना जा सकता। असल मुश्किल संविधान संशोधन और फिर यह सुनिश्चित करने की है कि भविष्य में भी चुनाव एक साथ होते रहें। इसका क्या विधान होगा, यह एक जटिल काम है।

आजादी के शुरुआती वर्षों में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही हुआ करते थे। मगर करीब बीस वर्षों बाद कुछ विधानसभाएं और फिर लोकसभा अपना तय कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई, जिसके चलते वह चक्र टूट गया और फिर टूटता ही गया। अब स्थिति यह है कि साल में कई चुनाव कराने पड़ते हैं। इस तरह चुनावों का मौसम कई बार साल भर बना रहता है। इससे राजनीतिक दलों के नेताओं को अपना काफी वक्त इसमें देना पड़ता है। निर्वाचन आयोग को भी पूरे समय अपना ध्यान कहीं न कहीं चुनाव की तैयारियों पर लगाए रखना पड़ता है। सुरक्षाबलों और सरकारी कर्मचारियों को अपने नियमित कामकाज छोड़ कर इनमें शामिल होना पड़ता है। चुनाव खर्च का बजट लगातार बढ़ता गया है। इस पर काबू पाना निश्चित रूप से अच्छा विचार है। मगर इसके लिए कई विधानसभाओं के कार्यकाल में कटौती और कई के कार्यकाल में विस्तार करना आसान नहीं होगा। जिन विधानसभाओं के चुनाव कुछ समय पहले ही हुए हैं और उनका कार्यकाल तीन साल से अधिक है, उन्हें यह फैसला स्वीकार्य नहीं होगा। फिर, यह संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन होगा।

एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था लागू होने के बाद फिर भी यह सवाल बना रहेगा कि अगर आगे कभी लोकसभा या कोई विधानसभा अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती, बीच में ही सरकार गिर जाती है, तो उस स्थिति में क्या होगा। ऐसे में मध्यावधि चुनाव के बजाय क्या तब तक वैकल्पिक व्यवस्था लागू रखी जाएगी, जब तक कि अगले चुनाव का समय नहीं आ जाता? ऐसा नियम बनाने से पूरी शासन-प्रणाली गड़बड़ा सकती है। इसलिए केंद्र सरकार की ताजा पहल पर विपक्षी दलों का कहना है कि अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो पूरा संघीय ढांचा ही खतरे में पड़ सकता है। इस महीने बुलाए गए संसद के विशेष सत्र में सरकार इसकी क्या रूपरेखा पेश करती है, सारी कवायद उसी पर निर्भर करेगी। पर यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि किसी भी रूप में इसका ढांचा अव्यावहारिक नहीं होना चाहिए।


अब सूर्य की ओर


भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ने एक और ऐतिहासिक मुकाम हासिल कर लिया। योजना के अनुसार, आदित्य-एल1 का संचालन सफलतापूर्वक चल रहा है। भारत ने इसरो के ही पीएसएलवी रॉकेट के साथ अपना पहला सौर अभियान शुरू किया है और भारत ऐसा करने वाला दुनिया का तीसरा देश है। एशिया में इससे पहले किसी भी देश ने सौर अभियान नहीं चलाया है। अब आदित्य एल 1 यान 125 दिन की यात्रा करके सूर्य के करीब एक ऐसी परिक्रमा कक्ष में पहुंच जाएगा, जहां से सूर्य का अध्ययन सुरक्षित ढंग से किया जा सके। सूर्य के पास जाना वैसे तो खतरे से खाली नहीं है, क्योंकि उसके पास जाने की कोशिश करने वाली कोई भी चीज खाक हो सकती है। कुल मिलाकर, सूर्य अभी पृथ्वी के विज्ञान से बहुत दूर है। आदित्य एल 1 पृथ्वी से महज 15 लाख किलोमीटर दूर जाकर उसकी परिक्रमा करने लगेगा, जबकि पृथ्वी से सूर्य 15 करोड़ किलोमीटर दूर है। मतलब, सूर्य की ओर जाने के बावजूद आदित्य-एल1 तुलनात्मक रूप से पृथ्वी के ही करीब रहेगा। सूर्य के 15 लाख किलोमीटर दूर पहुंचना असंभव है, इस दिशा में अमेरिका या नासा की कुछ कोशिशें नाकाम हुई हैं।

आदित्य-एल1 के साथ खास बात यह है कि यह सूर्य को सतत देखेगा और किसी भी प्रकार के ग्रहण का शिकार नहीं होगा। अंतिम रूप से इस यान के साथ सात पेलोड या उपकरण संलग्न रहेंगे। इन उपकरणों के जरिये जो आंकड़े या तथ्य अंतरिक्ष में जुटाए जाएंगे, वे सब पृथ्वी पर अध्ययन के लिए उपलब्ध होंगे। इसमें सबसे महत्वपूर्ण पेलोड या उपकरण विजबिल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ ( वीईएलसी) को माना जा रहा है। यह उपकरण विश्लेषण के लिए प्रतिदिन लगभग 1,440 सौर छवियों को दर्ज करेगा। यह यान सौर शक्ति की मदद से अपने लिए ऊर्जा पैदा करने में सक्षम है और यही नहीं, आगे अपनी निर्धारित कक्ष में स्थापित होने के लिए भी यह यान ऊर्जा पैदा कर सकता है। इस अभियानका प्राथमिक उद्देश्य प्रतिदिन 24 घंटे सूर्य का निरीक्षण करने की क्षमता को बढ़ाना है। सूर्य के अवलोकन से उसकी गतिविधि पर बारीकी से नजर रखने में मदद मिलेगी। आदित्य-एल1 द्वारा किए अवलोकन से सूर्य की सतह और सौर तूफानों के दौरान उच्च- ऊर्जा कणों के उत्सर्जन के बीच संबंध को समझने में मदद मिलेगी।

उधर, चंद्रयान- 3 पूरी तरह से सफल रहा है और चांद पर मौजूद रोवर को इसरो ने साइलेंट मोड में डाल दिया है। अब सबकी नजर नयान पर टिक गई है। आदित्य-एल1 के प्रक्षेपण के अवसर पर केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने बताया है कि देश का अगला अंतरिक्ष अभियान गगनयान की पहली परीक्षण उड़ान होगी। सब कुछ ठीक रहा, तो भारत अक्तूबर महीने में गगनयान को प्रक्षेपित करेगा। विगत अनेक महीनों से गगनयान की तैयारी को अंतिम रूप दिया जा रहा है। गगनयान अभियान के तहत चार अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी के 400 किलोमीटर दूर मौजूद कक्ष में भेजने की योजना है। योजना के अनुसार, गगनयान सात दिन अंतरिक्ष में परिक्रमा करने के बाद पृथ्वी पर लौट आएगा। यहां धरती पर अंतरिक्ष यात्रियों की सफल या सुरक्षित वापसी ही सबसे बड़ी चुनौती है। जहां एक ओर इसरो को पूरी सुरक्षा और सफलता सुनिश्चित करने के बाद ही कदम आगे बढ़ाना चाहिए, वहीं सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इन अभियानों में संसाधन या किसी भी प्रकार की कमी न आने दे।

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