03-03-2026 (Important News Clippings)

Afeias
03 Mar 2026
A+ A-

 

To Download Click Here.


Date: 03-03-26

In AI Race, Ethics Collateral Damage?

Anthropic case could be lighthouse ruling

TOI Editorials

Should AI be allowed to power killer robots? Anthropic, which has developed software that can be used to target weapons autonomously, thinks it should not. Pentagon, which has contracted the San Francisco-headquartered AI company to work with classified data, thinks it should. Trump has sent Anthropic packing, threatening to place it in the same national security risk bucket as Chinese tech major Huawei. His argument is that law, not company morals, will dictate how the US prosecutes its wars. Pentagon used Anthropic’s code during the latest Iran strike, even as US Department of Defense negotiated more acceptable terms with Anthropic’s rival OpenAI. Anthropic says it will sue.

There is a troubling ethical dimension to the development. Typically, lawmakers get to decide the limits of technology development, or its dispersal. But the law is still some way behind AI’s development. The ethical burden, thus, must be shared by producers and consumers until voters decide on the matter. This was how human cloning for reproductive purposes was halted long before it was widely banned. Tech companies share reservations over AI safeguards. But these may not withstand the competitive intensity of strong investor interest. So, there may be a case for allowing the law to catch up with AI.

The US approach to regulating AI has been through a conversation with technology creators. Any ethical concerns emerging from the other side of the table acquire special emphasis in dialogue-based rule-setting. Unlike earlier technology developments, the state has a diminished role in the evolution of AI. Tech creators must be comfortable with the products they are bringing to the market. They need to be sure automation can fulfil customer expectations. Hopefully, Anthropic will find a resolution to its moral dilemma in court. The incident is, of course, a chilling reminder of the intensity of the AI race, where ethics can very easily become collateral damage.


Date: 03-03-26

इस युद्ध का असर पूरी दुनिया पर पड़ने जा रहा है

संपादकीय

अमेरिका और इजराइल का ईरान पर हमला मात्र तीन देशों का मामला नहीं है। तेल जैसे महत्वपूर्ण संसाधन की वैश्विक सप्लाई चेन में व्यवधान दुनिया के लिए काफी महंगा पड़ेगा। भारत के लगभग एक करोड़ लोग अरब दुनिया में हैं और इनके जरिये भारत को भारी धन (रेमिटेंस) मिलता है। चूंकि इस युद्ध से अरब जगत में उथल-पुथल लाजमी है, लिहाजा भारत को दो-तरफा मार पड़ेगी- पेट्रोल की कीमतों के रूप में और रेमिटेंस के स्तर पर। चूंकि ईरान शिया बहुल देश है, लिहाजा तमाम अरब मुल्क जहां अमेरिकी बेस हैं, ईरानी मिसाइलों के शिकार हैं। वे या तो यूएस के साथ खुले तौर पर हैं या परोक्ष रूप से। भारत का ईरान से संबंध बहुत दोस्ताना नहीं रहा है और वहां के हुक्मरान अक्सर वर्तमान भारत सरकार के खिलाफ बोलते रहे हैं। लेकिन देश के भीतर भी शियाओं की प्रभावी आबादी वाले क्षेत्र कश्मीर, हैदराबाद और लखनऊ हैं। पिछले साल जब अमेरिका ने ईरान पर जीबीयू-57 ( बंकर बस्टर) बी – 2 – बॉम्बर से गिराए तो ऐसा करने के पीछे तर्क था ईरान को परमाणु-शक्ति बनने से रोकना । लेकिन अबकी बार हमले के औचित्य को लेकर ट्रम्प का कहना है कि ईरानी शासन बदलना होगा। लेकिन ईरान और वेनेजुएला में अंतर है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्स की कमान किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं, एक समूह के पास होती है।


Date: 03-03-26

विश्व अर्थव्यवस्था पर युद्ध का नकारात्मक प्रभाव

संपादकीय

ईरान के खिलाफ इजरायल-अमेरिका की संयुक्त सैन्य कार्रवाई फिलहाल किसी नतीजे पर पहुंचती नहीं दिख रही है। न तो इजरायल-अमेरिका के हमले थम रहे हैं और न ही ईरान की जवाबी कार्रवाई। भले ही ट्रंप यह कह रहे हों कि ईरान वार्ता के लिए राजी हो गया है, पर ईरानी नेता इससे साफ इन्कार कर रहे हैं। कहना कठिन है कि यह सैन्य टकराव कब और कैसे खत्म होगा, क्योंकि इसके आसार नहीं कि ईरान के सर्वोच्च नेता खामेनेई की मौत से वहां सत्ता परिवर्तन सुनिश्चित हो गया है। ईरान फिलहाल भले ही नेतृत्व विहीन सा दिख रहा हो, लेकिन उसकी सेना और विशेष रूप से इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कोर अपने कदम पीछे खींचने के लिए तैयार नहीं। वह इजरायल और अमेरिका के ठिकानों को निशाना बनाने के साथ खाड़ी के देशों के नागरिक क्षेत्रों में भी ड्रोन और मिसाइलें दाग रही है। इससे इन देशों में अफरा-तफरी का माहौल है। पता नहीं ईरान पड़ोसी देशों के नागरिक ठिकानों को किस मकसद से निशाना बना रहा है, क्योंकि इससे वह अपने विरोधी तो बढ़ा ही रहा है, पहले से अधिक अलग-थलग भी पड़ता जा रहा है।

ईरान जिस तरह ऊर्जा आपूर्ति के मार्गों और विशेष रूप से होर्मुज जल मार्ग के लिए खतरे पैदा कर रहा है, उससे तेल और गैस की आपूर्ति पर असर पड़ना शुरू हो गया है। यह समुद्री जल मार्ग लगभग 25 प्रतिशत तेल और 30 प्रतिशत एलएनजी आपूर्ति का रास्ता है, जो इसे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता है। इस जल मार्ग के बाधित होने का मतलब है तेल और गैस के दाम बढ़ना और एशिया, यूरोप समेत दुनिया के अन्य हिस्सों की अर्थव्यवस्था प्रभावित होना। यह ध्यान रहे कि तेल के दाम बढ़ने शुरू हो गए हैं। यदि वे इसी तरह बढ़ते रहे तो पहले से ही अनिश्चितता से गुजर रही विश्व अर्थव्यवस्था का संकट और बढ़ जाएगा। इसके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ही जिम्मेदार होंगे, क्योंकि यह एक तथ्य है कि इजरायल अमेरिका की सहमति और सहायता के बिना ईरान पर हमला बोलने की स्थिति में नहीं था। इस विनाशकारी सैन्य टकराव का केंद्र बिंदु भले ही पश्चिम एशिया हो, लेकिन उससे पूरा विश्व प्रभावित हो रहा है। कठिनाई यह है कि कोई भी बीच-बचाव करने की स्थिति में नहीं। यह सैन्य संघर्ष जितनी जल्दी थमे, उतना ही पश्चिम एशिया समेत विश्व के लिए अच्छा, लेकिन इसकी सूरत तब बनेगी, जब दोनों पक्ष यह समझेंगे कि वे अपनी ही नहीं चला सकते। ईरान भले ही इजरायल-अमेरिका को सबक सिखाने का दम भर रहा हो, लेकिन वह इन दोनों देशों की सैन्य शक्ति का लंबे समय तक सामना करने की स्थिति में नहीं। इसी तरह अमेरिका और इजरायल के लिए यह आसान नहीं कि वे ईरान में आनन-फानन सत्ता परिवर्तन कर सकें।


Date: 03-03-26

ईरान का त्रासदी भरा सफर

अर्शिया मलिक,

वर्ष 1979 में अयातुल्ला रुहेल्ला खुमैनी के नेतृत्व में ईरान एक राजशाही से मजहबी गणराज्य में परिवर्तित हुआ, लेकिन उनके उत्तराधिकारी अयातुल्ला अली खामेनेई के शासनकाल में स्थिति और बिगड़ गई। इन 46 वर्षों में ईरानी समाज का सफर कट्टरपंथी इस्लामवाद, परोक्ष युद्ध, जनता की कीमत पर अत्यधिक सैन्य खर्च, पश्चिम एवं यहूदी विरोधी विचारधाराओं और गहरी जड़ें जमा चुकी स्त्री-द्वेषी संस्कृति से भरा रहा। इसने आधी आबादी का दम घोंटा और ईरान को वैश्विक स्तर पर अलग-थलग किया। उसके सामाजिक ताने-बाने को भी खोखला किया। इस पतन की नींव 1979 की ईरानी क्रांति में पड़ी, जिसने शाह मोहम्मद रजा पहलवी को सत्ता से हटाकर खुमैनी को सर्वोच्च नेता बनाया।

खुमैनी ने एक ऐसी व्यवस्था स्थापित की, जहां मजहबी सत्ता ने लोकतांत्रिक इच्छा को पीछे छोड़ दिया और मजहबी तंत्र को लोकलुभावन बयानबाजी के साथ मिला दिया। यह महज राजनीतिक बदलाव नहीं, एक सामाजिक उथल-पुथल थी, जिसने ईरानी जीवन के हर पहलू में कट्टरता का संचार कर दिया। 1989 में सलमान रुश्दी के खिलाफ खुमैनी का फतवा इसी कट्टरता का उदाहरण था, जिसने साहित्यिक आलोचना को हत्या के वैश्विक आह्वान में बदल दिया और ईरान को वैचारिक आतंक के निर्यातक के रूप में स्थापित कर दिया। ईरान ने परोक्ष आतंकवाद को विदेश नीति के एक अंग के रूप में अपनाया। 1980 के दशक में ईरान ने इजरायली और पश्चिम का मुकाबला करने के लिए लेबनान में हिजबुल्ला की स्थापना कर उसे पैसा, हथियार और प्रशिक्षण दिया। यह कथित क्रांति के निर्यात की एक सोची-समझी रणनीति थी। खुमैनी ने कहा था कि इस्लाम का प्रसार तब तक आवश्यक है, जब तक कि ‘अल्लाह के सिवा कोई ईश्वर नहीं है’ का नारा विश्व भर में गूंज न उठे।

1989 में जब खामेनेई ने सत्ता संभाली तो उग्रवाद और तीव्र हो गया। उनके शासनकाल में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आइआरजीसी) ने कुद्स फोर्स का विस्तार किया। एक समय ईरान इराक में शिया मिलीशिया, गाजा में हमास और सीरिया में असद शासन का समर्थन करने के साथ ही भारी खर्च कर रहा था। अक्टूबर 2024 में ईरान द्वारा इजरायल पर किए गए मिसाइल हमले तेहरान में हमास नेता इस्माइल हानिये की हत्या के प्रतिशोध में किए गए। इससे परोक्ष आतंकवाद प्रत्यक्ष टकराव में बदल गया। दिसंबर 2024 में असद के पतन से ईरान को झटका लगा, फिर भी खामेनेई शासन ने अपना रुख नहीं बदला। उनकी रणनीति ने युद्धों को लंबा खींचा, लाखों को विस्थापित किया और ईरान को अछूत देश बना दिया।

हथियारों पर केंद्रित रहना ईरान के लिए विनाशकारी साबित हुआ। क्रांति के बाद ईरान की तेल पर निर्भर अर्थव्यवस्था को सैन्य शक्ति की ओर मोड़ दिया गया। खामेनेई के शासनकाल में सैन्य खर्च में भारी वृद्धि हुई। 2005 में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के प्रस्तावों का उल्लंघन करते हुए यूरेनियम संवर्धन शुरू किया गया। इस कारण अमेरिका के साथ वार्ता रुक गई। कड़े आर्थिक प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को पंगु बना दिया। मुद्रास्फीति, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के कारण हालात खराब हुए। इससे गरीबी बढ़ी और लाखों कुशल कामगारों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ। पश्चिम और यहूदी विरोध ही ईरानी की मजहबी सत्ता को टिकाए रखने वाली वैचारिक धुरी बनी रही। खुमैनी ने अमेरिका को ‘बड़ा शैतान’ करार देते हुए 1979-1981 के बंधक संकट के बाद उससे संबंध ही तोड़ लिए। खामेनेई ने खुमैनी के उन्मादी रवैये को और आगे बढ़ाया। ईरान इजरायल का नाम लेने के बजाय उसे ‘जायोनी सत्ता’ बताता है। वह फलस्तीन के लिए लड़ रहे हमास जैसे समूहों को समर्थन देते हुए गाजा के 90 प्रतिशत बजट का प्रबंध भी करता है। ईरान में ठीक-ठाक संख्या वाले यहूदियों की आबादी लगातार सिमट रही है। जो बचे हैं, वे भी प्रतिबंधों के शिकार हैं।

कहने को तो इस्लामी मानकों के अनुरूप बना संविधान महिलाओं को बराबरी के दर्जे की बात करता है, लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। आधी आबादी का संस्थागत दमन होता है। महिलाओं की गवाही का प्रभाव पुरुषों की तुलना में आधा माना जाता है। महिलाओं के जीवन का मोल भी आधा है। हिजाब के लिए कड़ी बंदिशें हैं। खुमैनी ने फतवा जारी करके लड़कियों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु को घटाकर नौ वर्ष कर दिया था। खामेनेई के दौर में हिजाब की अनिवार्यता को लेकर बड़ी सख्ती कई गई। इसके अनुपालन के लिए तेहरान में 70,000 पुलिसकर्मियों की तैनाती हुई। इसका नतीजा तमाम गिरफ्तारियों के रूप में सामने आया। महिलाओं के स्टेडियम में प्रवेश से लेकर ग्लैमरस हेयरस्टाल और कुत्ते पालने तक पर प्रतिबंध है। 2022 में कथित अनुचित हिजाब के आरोप में हिरासत के दौरान महसा अमीनी की मौत के बाद देशव्यापी विरोध-प्रदर्शन हुए। उनमें 500 से अधिक लोग मारे गए और हजारों गिरफ्तार हुए। पक्षपाती कानूनों की वजह से दुष्कर्मों के मामले में दोष सिद्धि असंभव सी है। यह सही है कि महिला साक्षरता बढ़कर 80 प्रतिशत तक हो गई और उनका संसद में प्रतिनिधित्व बढ़ा है, पर ये उपलब्धियां उस असमानता की खाई को नहीं ढक सकतीं, जिनसे महिलाओं को जूझना पड़ रहा है।

ईरान की 1979 से अब तक की यात्रा पर दृष्टि डालें तो ईरानी समाज क्रांति के उत्साह को पीछे छोड़ते हुए दमन और अलगाव की ओर ही बढ़ा है। पश्चिम-विरोधी और यहूदी-विरोधी नीतियों से जहां सहयोगी छिटकते गए, वहीं स्त्री-विरोध ने महिलाओं की आवाज को दबाकर समाज की मूल संरचना को ही आहत किया। ईरान आज जिस स्थिति में है, उससे कहीं बेहतर का हकदार है। एक ऐसी स्थिति का, जहां समाज मजहबी जकड़नों से मुक्त हो, उग्रता की जगह समानुभूति का भाव हो और महिलाओं, अल्पसंख्यकों और असहमति रखने वाले लोगों को भी फलने-फूलने का अवसर मिले। सच्ची क्रांति के भाव भीतर से ही उपजेंगे और वही भाव उन मानवीय मूल्यों की भरपाई करेंगे, जो बीते दशकों में तिरोहित होते गए।


Date: 03-03-26

भारत के लिए चुनौती

संपादकीय

अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच छिड़े युद्ध से भारत के समक्ष तेल की कीमतें बढ़ने से लेकर प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और विदेशी मुद्रा की आमद में ठहराव जैसी कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इस टकराव का अंतिम परिणाम क्या होगा, इस बारे में अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं है। इसका मतलब यह है कि लड़ाई यदि लंबी चली तो हालात से निपटने के लिए भारत को अपने पास मौजूद सभी नीतिगत उपाय अपनाने होंगे।

अगर ईरान होर्मुज स्ट्रेट को अवरुद्ध करता है तो नि​श्चित रूप से कच्चे तेल का आयात बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि वै​श्विक पेट्रोलियम और एलएनजी का लगभग 20 फीसदी इसी मार्ग से जाता है। यद्यपि ईरान ने इस मार्ग को बंद करने की अभी आधिकारिक घोषणा नहीं की है, लेकिन तेल वाले सैंकड़ों जहाजों ने पहले ही यहां से निकलने का फैसला टाल दिया है। युद्ध छिड़ने के साथ ही बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड भी 80 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गया, हालांकि बाद में ये कीमतें 77 डॉलर के स्तर पर आकर ​ठहर गईं। पिछले साल जून में ईरान के परमाणु संयंत्रों पर अमेरिकी हमले के बाद से यह सबसे अ​धिक है। भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, जो अपनी जरूरत का करीब 80 फीसदी कच्चा तेल दूसरे देशों से मंगाता है। इनमें भी आधे से अ​धिक तेल इराक, सऊदी अरब और कुवैत से आता है। अमेरिकी दबाव के बाद रूस से तेल खरीद में कटौती किए जाने से इन देशों पर निर्भरता और बढ़ गई है। भारत के पास इस समय 10 दिन के कच्चे तेल और एक सप्ताह के ईंधन का भंडार मौजूद है। यह ​स्थिति आपूर्ति और कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति इसकी संवेदनशीलता को दर्शाती है। संकट के समय ऐसे हालात से निपटने के लिए भारत को तेल और गैस के लिए मजबूत रणनीतिक भंडार बनाने के लिए गंभीर प्रयास करने होंगे। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में तेल आयात की हिस्सेदारी 3.1 फीसदी है। नोमूरा के आकलन के अनुसार, तेल की कीमत में यदि 10 फीसदी की वृद्धि होती है तो चालू खाता घाटा 0.4 फीसदी अंक बढ़ जाता है। य​द्यपि भारत का चालू खाता घाटा मामूली रहा है, लेकिन वित्तीय बाजारों में उथल-पुथल पहले से ही दबाव का सामना कर रहे पूंजी प्रवाह को और प्रभावित कर सकती है। इससे वित्त प्रबंधन में और मु​श्किल आ सकती है। दूसरे, रुपये पर नए सिरे से दबाव पड़ सकता है।

इसके अलावा बढ़ते मुद्रास्फीति दबाव के कारण बजट एवं मौद्रिक अनुमानों पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। यह सच है कि भारत वेनेजुएला और अमेरिका जैसे देशों का विकल्प चुनकर तेल आपूर्ति में विविधता ला सकता है, लेकिन इन दोनों ही जगह से आयात अपेक्षाकृत महंगा पड़ता है। मुद्रास्फीति फिलहाल कोई बड़ी चिंता की बात नहीं है। सरकार पेट्रोल और डीजल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क कम करके कुछ हद तक इसकी भरपाई कर सकती है, लेकिन गैस अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का 85 फीसदी खाड़ी देशों से आयात करता है और देश में कोई रणनीतिक भंडार भी नहीं है। ईंधन आपूर्ति में व्यवधान से तो भारत किसी तरह निपट सकता है, लेकिन संघर्षरत क्षेत्रों में रह रहे लगभग 90 लाख प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा नि​श्चित रूप से उसके लिए चिंता का विषय है, जहां उसके पास बहुत सीमित विकल्प हैं। वर्तमान में ईरान के हमलों की जद में आए बहरीन, कतर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे देशों में आबादी का एक तिहाई से अधिक हिस्सा भारतीयों का है। यहां अ​धिकांश भारतीय निर्माण और आतिथ्य जैसे कम कौशल की जरूरत वाले क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इन देशों में ज्यादातर लोग उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना के गरीब इलाकों से आते हैं, जबकि कुशल श्रमिक मुख्य रूप से केरल और तमिलनाडु से हैं।

संघर्ष में ​घिरे संवेदनशील क्षेत्रों से इतनी बड़ी संख्या में लोगों को निकालना अपने आप में बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसके अलावा एक और समस्या विदेशी मुद्रा प्रवाह में अवरोध है। अमेरिका के बाद पश्चिम एशिया विदेशी मुद्रा प्रवाह का सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है। यदि विदेश से प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजी जाने वाली रकम रुकती है तो देश में उन पर आश्रित हजारों परिवारों पर एक नया आ​र्थिक संकट आ सकता है। इसलिए इस अनिश्चितता की ​स्थिति से निपटना सरकार के लिए किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं होगा। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि यह युद्ध कितने लंबे समय तक चलेगा और इससे क्षेत्र की भू-राजनीति क्या करवट लेती है।