02-02-2026 (Important News Clippings)
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खास तरह का आम बजट
संपादकीय
वैश्विक अनिश्चितता के बीच जब आम बजट को लेकर कई अनुमान लगाए जा रहे थे, तब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लीक से हटकर चलने का फैसला किया। यह समय की मांग भी थी। इसी कारण इस बजट में कोई चौंकाने वाली या फिर लोकलुभावन घोषणा नहीं। ऐसा इसीलिए है, क्योंकि अनिश्चित माहौल में कोई योजना बनाना एक तरह से अंधेरे में तीर मारना होता।
मोदी सरकार ने बजट के जरिये अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने और उसे स्थिरता प्रदान करने वाले फैसले लिए हैं। यह भी दिख रहा है कि उसकी कोशिश आर्थिक मोर्चे पर स्थितियों को सुधारने पर जोर देना है। इसी कारण यदि आम या खास आदमी इस बजट में सीधे तौर पर खुद को लाभान्वित होता हुआ नहीं देख रहा है तो आश्चर्य नहीं। इसका यह अर्थ भी नहीं कि उसे परोक्ष तौर पर भी कुछ मिलने नहीं जा रहा है। बुनियादी ढांचे के निर्माण से लेकर सामाजिक विकास की अनेक योजनाओं के माध्यम से सभी वर्गों को राहत या सुविधाएं देने की कोशिश की गई है।
निःसंदेह बजट पर शेयर बाजार ने निराशाजनक प्रतिक्रिया दी, लेकिन यह पहली बार नहीं, जब शेयर बाजार को बजट रास नहीं आया हो। चूंकि यह बजट पारंपरिक नहीं है, इसलिए उसकी व्याख्या भी नए तरीके से की जानी चाहिए। बजट का केंद्रीय तत्व आर्थिक और वित्तीय अनुशासन है, इसका एक प्रमाण राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को और कम करना है। इसके अतिरिक्त उन योजनाओं पर पैसा खर्च करना भी है, जिनसे देश की आर्थिक बुनियाद मजबूत हो और आत्मनिर्भर भारत की नींव सशक्त बने।
बजट में ऐसे कई उपाय किए गए हैं, जो उद्योग-व्यापार जगत को सीधा संदेश देते हैं कि उसे अपने तौर-तरीके बदलने होंगे। यदि भारतीय उद्योग जगत को चुनौतियों से पार पाना है तो उसे यह करना ही होगा। यूरोपीय संघ से मुक्त व्यापार समझौते के बाद ऐसा करना और भी आवश्यक हो गया है। इसकी अनदेखी नहीं की जाए कि हमारा उद्योग जगत वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सामना करने के लिए तैयार नहीं। कहना कठिन है कि इस बजट की घोषणाएं उसे इसके लिए प्रेरित कर सकेंगी या नहीं?
जो भी हो, यह अच्छा है कि सरकार ने बजट में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम श्रेणी के उद्योगों को सक्षम बनाने के लिए अनेक कदम उठाए हैं। ये कदम यही बता रहे हैं कि जो काम छोटे और मझोले कारोबारियों को करना चाहिए, उसमें सरकार हाथ बंटाने के लिए आगे आ रही है। यदि इसके बाद भी एमएसएमई क्षेत्र सक्षम नहीं बनता तो यह निराशाजनक ही होगा। वास्तव में छोटे-बड़े, सभी कारोबारियों को अपने हिस्से की जिम्मेदारी समझनी होगी।
इसी तरह नौकरशाही को भी अपने रंग-ढंग बदलने होंगे। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो पांच लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में बुनियादी ढांचे के विकास और ऐसी ही अन्य बड़ी योजनाओं का वही हश्र होगा, जो स्मार्ट सिटी योजना का हुआ। यह समझना होगा कि शहरों का विकास करने की जिम्मेदारी मूलतः राज्यों और नगर निकायों की है। केंद्र सरकार ऐसे कुछ नियम-कानून अवश्य बना सकती है, जिनसे राज्य सरकारें और नगरीय विकास की एजेंसियां अपना काम कुछ उसी तरह करें, जैसे मेट्रो परियोजनाओं को क्रियान्वित करने के मामले में किया जा रहा है।
बजट में सीधे तौर पर टैक्स छूट देने के बजाय टैक्स संबंधी नियम-कानूनों का सरलीकरण करने और कठोर दंडात्मक उपायों से परे जाने के जो अनेक फैसले किए गए हैं, उनसे लोगों को सचमुच राहत भी तभी मिलेगी, जब नौकरशाही का रवैया बदलेगा। इस बजट में बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने, उसका विस्तार करने, कृषि क्षेत्र की हालत सुधारने और रेयर अर्थ मिनरल्स में आत्मनिर्भर बनने के अतिरिक्त कई घोषणाएं ऐसी हैं, जिनका लाभ मिलने में समय मिलेगा, लेकिन कम से कम यह तो सुनिश्चित किया ही जाए कि उन पर अमल सही तरह और समय पर हो।
Date: 02-02-26
वित्तीय अनुशासन को समर्पित बजट
धर्मकीर्ति जोशी, ( लेखक क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री हैं )
वैश्विक अनिश्चतता के माहौल में केंद्र सरकार ने भारत की विकास गाथा को निरंतरता प्रदान करते हुए अर्थव्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करने पर ध्यान केंद्रित किया है। बजट का मर्म यही है कि सरकार ने बड़ी घोषणाएं न करके कई छोटी-छोटी योजनाओं को आगे बढ़ाने का निर्णय किया है, जो दीर्घकाल में बड़े परिणाम देने में सक्षम हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट के माध्यम से यही संकेत दिया कि सरकार ने पिछले कुछ वर्षों के दौरान जो बड़ी घोषणाएं की हैं, उनके असर को ही पहले और आगे विस्तार दिया जाए।
यानी पहले से जिन क्षमताओं के निर्माण की योजना बनाई गई, उन्हें अपेक्षित रूप से सतत गति के साथ साकार किया जाए। गत वर्ष पहले आयकर में रियायत और फिर जीएसटी दरों में कटौती से जहां राजस्व के मोर्चे पर स्थिति थोड़ी संकुचित हुई थी, उसे देखते हुए राहत के मोर्चे पर इस बार बहुत ज्यादा उम्मीदें बेमानी ही थीं। इसके बावजूद सरकार सराहना की पात्र है कि राजकोषीय अनुशासन की राह से विचलित नहीं हुई। चालू वित्त वर्ष के लिए राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.5 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा था, वह संशोधित अनुमानों में 4.4 प्रतिशत रहा। राजकोषीय अनुशासन की प्रतिबद्धता दोहराते हुए वित्त मंत्री ने अगले वित्त वर्ष के लिए 4.3 प्रतिशत का लक्ष्य तय किया है।
राजस्व को लेकर कुछ दबावों के बावजूद राजकोषीय घाटे को नियंत्रित रखने में सरकार की सफलता में व्यय की गुणवत्ता ने अहम भूमिका निभाई। सरकार ने पूंजीगत व्यय के साथ कोई समझौता किए बिना राजस्व व्यय को घटाकर यह संतुलन बनाया है। केंद्र सरकार का यह दृष्टिकोण तब और आवश्यक हो जाता है जब कई राज्य सरकारें कल्याणकारी योजनाओं के नाम पर खुले हाथों से खर्च कर रही हैं। राजकोषीय अनुशासन सुनिश्चित करना केवल केंद्र के भरोसे संभव नहीं और राज्यों को भी इसके साथ ताल मिलानी होगी। हालांकि राज्यों को इसके लिए तैयार करने में केंद्र के हाथ कुछ बंधे हुए हैं। इस दिशा में जब केंद्र सरकार स्वयं व्यय की गुणवत्ता कायम करेगी तभी राज्य भी इसी राह पर आगे बढ़ने के लिए सोचेंगे। इसके अलावा केंद्र सरकार विनिवेश को लेकर भी व्यावहारिक रुख अपनाती हुई प्रतीत हो रही है कि उसमें व्याप्त संभावनाओं को भुनाकर भी अपेक्षित राजस्व हासिल किया जाए।
रोजगार सृजन के लिए बजट में सेवा क्षेत्र के साथ ही विनिर्माण गतिविधियों को प्रोत्साहन जारी रखा गया है। वित्त मंत्री ने तात्कालिक आवश्यकताओं के दृष्टिकोण से अहम सेमीकंडक्टर, बायोफार्मा, इलेक्ट्रानिक्स जैसे उदीयमान क्षेत्रों पर ध्यान देते हुए वस्त्र-परिधान एवं एमएसएमई जैसे पारंपरिक क्षेत्रों का भी पूरा ख्याल रखा है। कर सुधारों, आयात शुल्कों को तार्किक बनाकर और आयात प्रक्रियाओं को सुगम बनाकर सरकार इन क्षेत्रों से जुड़ी संभावनाओं को साकार करना चाहती है। ऐसे आसार बन रहे हैं कि देश के कुल पूंजीगत व्यय का एक चौथाई हिस्सा इन उभरते हुए नए क्षेत्रों पर केंद्रित हो सकता है, जिसकी 2021 से 2025 के बीच कुल खर्च में 12 प्रतिशत हिस्सेदारी थी।
शिक्षा, उद्यम और रोजगार का परिदृश्य सुधारने के लिए बजट में कई प्रविधान किए गए हैं। इस संदर्भ में एक स्थायी समिति का गठन उल्लेखनीय है। कर सुधारों एवं बजटीय समर्थन के जरिये पर्यटन, हेल्थकेयर, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और खेल गतिविधियों पर सरकार ने एक बड़े आर्थिक कायाकल्प को लेकर दांव लगाया है। सरकार की मंशा तेजी से उभरते हुए क्षेत्रों में अवसरों को भुनाने के साथ ही उसके लिए अपेक्षाओं के स्तर पर गहरी खाई को पाटने की भी है। इस लिहाज से पर्यटन पर विशेष जोर दिया गया है, जिसमें विदेश में बढ़ते भारतीय सैर-सपाटे की वजह से हो रहे नकारात्मक प्रभाव का संज्ञान लिया गया है। अभी विदेशी पर्यटक भारत आकर जितना नहीं खर्च कर रहे, उससे कहीं अधिक खर्च भारतीय सैलानी विदेश में कर रहे हैं।
हालांकि ऐसा रुझान केवल भारत तक ही सीमित नहीं है। दुनिया भर में उच्च आय वर्ग में खर्च को लेकर यही रवैया दिखता है। एआइ के दौर में यह क्रम और तेजी पकड़ता दिख सकता है। इसका ही परिणाम है कि आलीशान सुविधाओं वाले महंगे पर्यटन केंद्रों के प्रति दुनिया भर में उत्सुकता बढ़ी है, जहां पर्यटक अनोखे अनुभव का आनंद उठाना चाहते हैं। इस लिहाज से भारत के पास संभावनाओं की कमी नहीं है और सुविधाओं-सेवाओं का स्तर बढ़ाकर हम भी दुनिया भर के लोगों को लुभा सकते हैं। वैसे भी मेडिकल और वेलनेस पर्यटन के मामले में भारत को वैश्विक प्रतिष्ठा प्राप्त है। ऐसे में ई-वीजा योजना और आध्यात्मिक पर्यटन केंद्रों के माध्यम से यह स्थिति और मजबूत होनी चाहिए। ये रोजगार सृजन की दृष्टि से भी बहुत उपयोगी हैं, क्योंकि इनमें मेट्रो शहरों से इतर भी पर्याप्त रूप से कामकाज के मौके तैयार करने की भरपूर संभावनाएं हैं। बजट में जलमार्गों पर दिए गए जोर से परिवहन सेवाओं में भी सुधार संभव होगा। इन सुधारों के दम पर अगर राज्यों के साथ सहयोग बढ़ाकर विशेष पर्यटन केंद्र विकसित किए जाएं तो इससे न केवल बड़े पैमाने पर लोगों को आजीविका मिलेगी, बल्कि विदेशी मुद्रा की भी प्राप्ति होगी।
सरकार ने देश में डाटा सेंटर स्थापित करने के लिए लंबी अवधि तक कर रियायतों का भी एलान किया है। इससे विदेशी निवेशक आकर्षित होंगे। बजट ने निवेश सीमाएं बढ़ाकर एनआरआइ और विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय इक्विटीज में दांव लगाने के लिए नई राहें भी खोली हैं। स्पष्ट है कि वित्त मंत्री ने पूंजीगत लाभ के स्तर पर किसी बाजीगरी के बजाय समग्र माहौल को सुगम बनाने पर अधिक जोर दिया है। समय के साथ इन दोनों की जुगलबंदी अपना असर दिखाएगी। कुल मिलाकर, बजट के जरिये सरकार ने अनिश्चित वैश्विक माहौल में क्षमता निर्माण और दृढ़ता बढ़ाने को प्राथमिकता दी है, ताकि किसी प्रतिकूल परिस्थिति में राहत के लिए गुंजाइश कायम रखी जा सके।
Date: 02-02-26
अनिश्चित समय के लिए बजट
संपादकीय
वर्ष 2026-27 का केंद्रीय बजट असाधारण भूराजनीतिक उथल-पुथल कारण के बीच प्रस्तुत किया गया। भारत की वृद्धि दर 7.4 फीसदी के साथ मजबूत बनी रही लेकिन आगे इसे बनाए रखना चुनौतीपूर्ण होगा। बीते कई सालों से सरकार का रुख सार्वजनिक निवेश को वृद्धि को बढ़ावा देने में प्रयोग करने का रहा है। इस वर्ष बुनियादी ढांचे पर होने वाला व्यय बढ़कर 12.2 लाख करोड़ रुपये होने जा रहा है जो काफी अधिक है। इसके साथ ही नई और बड़ी अधोसंरचना परियोजनाओं के लिए दृष्टिकोन में भी विस्तार किया गया है। इसमें शामिल हैं: दक्षिण भारत में विशेष रूप से विभिन्न विकास केंद्रों को जोड़ने वाली नई उच्च गति की रेल लिंक श्रृंखला, पूर्व- पश्चिम धुरी पर नए समर्पित मालवाहक गलियारे, तटीय माल परिवहन, जिससे रेल और राजमागों पर दबाव कम हो सके और 20 नए राष्ट्रीय जलमार्ग, जिनका उद्देश्य आंतरिक क्षेत्रों से खनिज संपदा को आसानी से बंदरगाहाँ तक पहुंचाना है। यह बात ध्यान देने लायक है कि अतिरिक्त पूंजीगत व्यय का बड़ा हिस्सा व्याज रहित ऋण में इजाफे के रूप में है जो राज्यों को उनके ही निवेश के लिए दिया जाता है।
बहरहाल, फैक्टरियों और परियोजनाओं में निजी निवेश ने सरकारी निवेश को लेकर प्रतिक्रिया नहीं दी और रोजगार वृद्धि सीमित बनी रही। सरकार ने विनिर्माण पर जो जोर दिया उसे निस्संदेह कुछ कामयाबी मिली। केंद्रीय वित्त मंत्री ने घोषणा की है कि इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन का दूसरा दौर शुरू किया जाएगा और इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग स्कीम के आवंटन को 23,000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 40,000 करोड़ रुपये किया जाएगा। मेक इन इंडिया को प्रतिकूल हालात का सामना करते रहना होगा। इसमें मौजूदा कारोबारी तनाव भी शामिल हैं। इस बार बजट में सेवा क्षेत्र पर बहुत अधिक ध्यान दिया गया है। एक उच्चस्तरीय समिति का प्रस्ताव रखा गया है जो सेवा क्षेत्र में ‘शिक्षा से रोजगार और उद्यमिता’ तक रोजगार और उत्पादन पर ध्यान देगी। आईटी सक्षम सेवाओं, पर्यटन, स्वास्थ्य और पशु चिकित्सा, सामाजिक देखभाल और रचनात्मक क्षेत्रों तक कई सेवा क्षेत्रों की सहायता के लिए बजट समर्थन की घोषणा की गई। इसमें नए उत्कृष्टता केंद्रों की स्थापना से लेकर नए संस्थानों के लिए तक शामिल हैं। यह परिवर्तन सरकार की व्यापक चिंता को दर्शा सकता है। यह चिंता नई विनिर्माण इकाइयों में निजी निवेश की कमी, नए कारखानों की बढ़ती पूंजीगत लागत और भारतीय वस्तुओं के लिए वैश्विक बाजार तक पहुंच और शुल्क तथा गैर शुल्क बाधाओं से संबंधित है। सेवा क्षेत्र को इन समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता। हालांकि, इसमें कार्यबल में उच्च कौशल की आवश्यकता होती है। इस कमी को दूर करना ही इन नई पहल का मुलभूत विषय प्रतीत होता है फिर भी वह उचित प्रश्न है कि आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की क्रांति इन क्षेत्रों में रोजगार सृजन पर कितना प्रभाव डालेगी क्योंकि अब सरकार अपना ध्यान इन पर केंद्रित कर रही है। मौजूदा सरकार की आर्थिक नीति का दूसरा प्रमुख स्तंभ, पूंजीगत व्यय के अलावा राजकोषीय संयम भी रहा है। यह बजट पर्यवेक्षकों को अपेक्षाकृत विरोधाभासी संकेत देता है। वह पहला साल है जब औपचारिक लक्ष्य अगले वर्ष के राजकोषीय घाटे से अनुपात पर केंद्रित किया गया है, जिसे अब ‘ऋण लक्ष्य निर्धारण के लिए परिचालन साधन’ के रूप में पुनः परिभाषित किया गया है। इससे विश्लेषण कुछ जटिल हो जाता है, क्योंकि अब भविष्य में जीडीपी की दिशा और भी महत्वपूर्ण हो गई है। बजट अगले वर्ष के लिए 10 प्रतिशत नॉमिनल वृद्धि मानकर चलता है, जो इस वर्ष से थोड़ी अधिक है। इसमें यह भाव निहित है कि उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति इस वर्ष कुछ अधिक होगी।
“इसका नतीजा यह हुआ कि पित मंत्री यह वादा कर सकती है कि ऋण- जीपी अनुपात को मौजूदा वर्ष के 56.1 फीसदी से कम करके 2026- 27 में 55.5 फीसदी किया जाएगा। यह अपेक्षा से धीमा है। राजकोषीय घाटा भौजीडीपी के 4.4 फीसदी से घटकर 4.3 फीसदी हो जाएगा। ये बहुत छोटे बदलाव हैं और राजकोषीय एकीकरण के प्रति गत दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाती हैं। इस वर्ष एक और वैश्विक दबाव काफी अधिक है और वित्त मंत्री शायद प्रणाली को झटका देना पसंद न करें, खासकर तब जबकि कुछ प्रणालियां, जैसे जीएसटी प्राप्तियां, संकट का संकेत दे रही हों। दूसरी ओर, ऋण का गणित प्रतिकूल है क्योंकि पिछले उधार की कई किश्तें इस वर्ष परिपक्व होंगी। शुद्ध उधारो केवल मामूली रूप से बढ़ेगी, सकल बाजार उधारो तेजी से बढ़कर 17.2 लाख करोड़ रुपये हो जाएगी, जो 14.6 लाख करोड़ रुपये से अधिक है। इससे स्वाभाविक रूप से बॉन्ड बाजार पर काफी दबाव पड़ेगा और बोल्ड तथा दरों पर बोझ बनेगा।
तक सामान्य निवेशक, छोटे व्यवसायी और उपभोक्ताओं का सवाल है, सरकार की कार्रवाई का ध्यान तंत्र और शासन को आसान बनाने पर केंद्रित है। यह स्वागत योग्य है। बजट में जो वादे किए गए हैं उनमें छोटे उद्यमों के लिए ट्रेड्स प्रणाली के उपयोग का विस्तार, कई कर अपराधों को अपराध मुक्त बनाना और कुछ चूकों (जैसे विदेशी संपत्तियों के लिए) पर प्रतिरक्षा प्रदान करना, भरोसे पर आधारित कस्टम्स के लिए नए दृष्टिकोण का यादा और व्यक्तिगत यात्रा के लिए शुल्क मुक्त भत्तों का संशोधन शामिल हैं। एक चीज जिसे सख्त किया गया है, यह है वायदा एवं विकल्प कारोबार पर प्रतिभूति लेनदेन कर कुछ बड़े बाजार प्रतिभागी चिंतित हैं कि इससे नकदी कम होगी लेकिन तथ्य यह है कि खुदरा व्यापारी इन जटिल लेन-देन में अत्यधिक शामिल हो रहे थे, और वायदा एवं विकल्प में लग रही तिकड़मों को रोकने के लिए कुछ कदम उठाना आवश्यक था। कुल मिलाकर, यह बजट इस दांव पर आधारित है कि धीमा राजकोषीय एकीकरण, राज्य का पूंजीगत व्यय और सेवाओं को बढ़ावा देना विकास को जारी रखेगा।
सेहत और अधिकार
संपादकीय

कोई भी संवेदनशील और प्रगतिशील समाज अपने बीच जड़ें जमाए वैसी धारणाओं से लड़ता है, जिनका खामियाजा महिलाओं या कमजोर तबकों को उठाना पड़ता है। मगर यह विचित्र है कि हमारे देश में कुछ ऐसे प्रश्न आज भी सामाजिक विकास में एक बाधा बने हुए हैं, जिनका सीधा संबंध स्त्रियों की सेहत और गरिमा के साथ जुड़ा हुआ है। || मासिक धर्म या माहवारी मूलतः महिलाओं या लड़कियों के स्वास्थ्य से जुड़ा सवाल है, लेकिन कई तरह की पितृसत्तात्मक सोच के कारण उसे संकोच का विषय बना दिया गया है। इसकी वजह से सामान्य जीवन में लड़कियों को बहुस्तरीय मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, इससे उनका स्वास्थ्य और व्यक्तित्व प्रभावित होता है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इसी संदर्भ में एक अहम हस्तक्षेप किया है। और मासिक धर्म से जुड़े स्वास्थ्य को संविधान के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार का हिस्सा बताया। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी बेहद अहम है कि मासिक धर्म स्वच्छता प्रबंधन उपायों की अनुपलब्धता एक लड़की की गरिमा को कम करती है, क्योंकि गरिमा उन परिस्थितियों में व्यक्त होती है, जो लोगों को अपमान, बहिष्कार या अनावश्यक पीड़ा के बिना बाहर निकलने में सक्षम बनाती है।
यह छिपा नहीं है कि महिलाओं और लड़कियों के स्वास्थ्य से जुड़ी माहवारी को लेकर समाज में कैसी मिथकें मौजूद रही हैं। इसकी वजह से घर से लेकर बाहर या कार्यस्थलों पर | महिलाओं को कई तरह की असुविधाजनक स्थितियों का सामना करना पड़ता है। सैनिटरी पैड की उपलब्धता हर जगह नहीं होने की वजह से समस्या और बढ़ जाती है। इसके अलावा, स्कूलों में शौचालयों की स्थिति भी जगजाहिर रही है। अनेक अध्ययनों में ऐसे तथ्य सामने आते रहे हैं कि स्कूलों में स्वच्छ शौचालय की सुविधा न होने की वजह से बहुत सारी लड़कियों को बीच में ही अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ती है। यही वजह है कि शीर्ष अदालत ने देश के सभी सरकारी और निजी स्कूलों को लड़कियों को जैविक रूप से अपघटनीय सैनिटरी पैट निशुक्ल बांटने के साथ-साथ लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय बनाने का निर्देश दिया। व्यवस्था संबंधी समस्याओं को दूर किए जाने के साथ-साथ इस मसले पर समाज और खासतौर पर पुरुषों को सोच के स्तर पर ज्यादा संवेदनशील बनाने की जरूरत है।
तेज सुधार का समय
संपादकीय

आम बजट 2026 को एक सुधारवादी बजट के रूप में देखना ज्यादा मुफीद रहेगा। इस बजट पर किसी तरह का सियासी या चुनावी दबाव नहीं था और इसलिए भी इसमें आर्थिक सुधार की कोशिशें ज्यादा नजर आ रही हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि इसमें कोई लोक-लुभावन या चमकदार घोषणाएं नहीं हैं। किसी सुधारवादी बजट की यह खासियत होती है कि उसे देखकर लगता है, कोई नया या बड़ा कदम नहीं उठाया गया है। वास्तव में, आज भारतीय अर्थव्यवस्था में कदम बढ़ाने से ज्यादा जरूरी है कदम जमाना केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने भाषण की शुरुआत ही जिन तीन कर्तव्यों की चर्चा से की है, उस पर सबका ध्यान जाना चाहिए। पहला कर्तव्य, अस्थिर वैश्विक परिस्थितियों के प्रति लचीलापन बढ़ाते हुए आर्थिक विकास को गति देना और उसे बनाए रखना। दूसरा, अपने लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करना और उनकी क्षमता विकसित करना। तीसरा, यह सुनिश्चित करना कि देश के प्रत्येक परिवार, समुदाय, क्षेत्र और वर्ग तक संसाधनों, सुविधाओं और अवसरों की पहुंच हो। ये घोषित कर्तव्य बहुत स्पष्ट हैं। इनसे सरकार की प्राथमिकताओं का पता चलता है। यह पिछले बजट जैसा निर्णायक भले न हो, पर सकारात्मक रूप से हस्तक्षेपकारी है।
यह बजट साफ संकेत है कि भारत अब रुकने वाला नहीं है। यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बुरे दौर में भी भारतीय अर्थव्यवस्था बेहतर प्रदर्शन कर रही है। ताजा बजट में सबसे प्रशंसनीय पहल यह है कि वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सार्वजनिक पूंजीगत व्यय को बढ़ाकर 12.2 ट्रिलियन कर दिया गया है। हम अक्सर देखते हैं कि सरकार मूलभूत ढांचे में निजी क्षेत्र से निवेश बढ़ाने की अपील करती रहती है। अपनी ओर से भी सरकार ने पूंजीगत व्यय बढ़ाकर निजी क्षेत्र को प्रेरित किया है। एक सड़क भी बनती है, तो उससे अनेक उद्योगों को बल मिलता है, रोजगार बढ़ता है। भारत का बुनियादी विकास अगर तेजी से होता रहेगा, व्यापकता में उसके विकास का रथ कहीं नहीं थमेगा। शहर विकास से लेकर पर्यटन विकास तक और शिक्षा से स्वास्थ्य तक किए गए प्रयास सराहनीय हैं। बजट 2026 के प्रस्ताव आम आदमी को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रभावित करेंगे। आयकर स्लैब में पिछली बार ही भारी बदलाव हुआ था, तो इस बार उसमें बदलाव की बहुत उम्मीद नहीं थी। कर सुधार और कर रियायत, दो ऐसे मोर्चे हैं, जिन पर बजट में प्रक्रियागत सुधार किए गए हैं। इन सुधारों का लाभ निवेश को मिलना चाहिए। हम सब जानते हैं कि अपने देश में व्यापार करने की सुविधा बढ़ाने की जरूरत है और इसके लिए बजट में प्रावधान किए गए हैं। दुनिया यह मान रही है कि भारत संभावनाओं का क्षेत्र है, लेकिन इन संभावनाओं को साकार करने की जिम्मेदारी बजट को सही ढंग से लागू करने में दिखनी चाहिए।
बजट बहुत सावधानी से बनाया गया है और यह संदेश दे रहा है कि आम लोग भी बहुत सावधानी से अपने आर्थिक फैसले लें। मिसाल के लिए, चांदी की कीमतों को देखा जा सकता है। साढ़े चार लाख रुपये किलोग्राम की कीमत तक पहुंच गई चांदी तीन लाख रुपये से भी नीचे उतर आई है। अर्थात, यह किसी आर्थिक फैसले पर टिकने का दौर नहीं है। यह जरूरत और सहूलियत के हिसाब से लचीले फैसलों का समय है। फिर भी, जो लोग बजट से कुछ ज्यादा पाने की उम्मीद लगाए बैठे थे, उन्हें यह जरूर ध्यान रखना चाहिए कि सरकार की लोकलुभावन घोषणाएं महज बजट की मोहताज नहीं हैं।