यूरोपीय संघ का कार्बन बार्डर एडजस्टमेंट और भारत

Afeias
25 Feb 2026
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सीबीएएम या कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म यूरोपीय संघ का बनाया जलवायु नीति का उपकरण है। इसके जरिए संघ में आयातित उत्सर्जन करने वाली लोहा इस्पात, सीमेंट, उर्वरक, हाइड्रोजन और बिजली जैसी वस्तुओं पर कार्बन मूल्य निर्धारित किया जाता है।

उद्देश्य –

कार्बन रिसाव को रोकना है। आयातित उत्पादों की कार्बन लागत को घरेलू उत्पादों की कार्बन लागत के बराबर करके ‘कार्बन लीकेज‘ को रोकने का उद्देश्य है। इसमें उत्पादन उन देशों में स्थानांतरित हो जाता है, जहाँ उत्सर्जन संबंधी नियम कमजोर हैं।

भारत पर असर –

  • यूरोपीय संघ से हुए बड़े समझौते में भारत को यह गलत लग सकता है। विकसित देशों की तुलना में भारत का उत्सर्जन काफी कम है। फिर भी हाल ही में हुए संघ-भारत मुक्त व्यापार समझौते में भारत को कोई छूट नहीं दी गई है।
  • भारत और यूरोपीय संघ अलग-अलग क्षमता वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं। 2025 में यूरोपीय संघ का प्रतिव्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद 46,000 डॉलर था, जबकि भारत का लगभग 2,800 डॉलर था।
  • वर्तमान जलवायु मानदंडों से भारत के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों पर वित्तीय तकनीकी बोझ पड़ेगा। हालांकि अगले दो सालों में 50 करोड़ यूरो की सशर्त मदद मिलने की बात है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं होगी।

अवसर को अनुकूल बनाया जा सकता है –

  • निवेश पर बातचीत करते हुए भारत के औद्योगिक बेस के विकार्बनीकरण और परिवर्तन के ठोस प्लान को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  • स्वच्छ ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला, स्वच्छ टैक विनिर्माण और विकार्बनीकरण करने वाली तकनीक में निवेश और साझेदारी को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इस प्रकार भारत अपने औद्योगिक परिवर्तन की गति को तेज कर सकता है।

‘द इकॉनॉमिक टाइम्समें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 30 जनवरी 2026