विरासत के संरक्षण में निजी भागीदारी का नया मॉडल

Afeias
05 Feb 2026
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भारत की विरासत को बचाने का काम मुख्यतः पुरातत्व विभाग अर्थात आर्कलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पास रहा है। स्टॉफ और बजट की लगातार कमी के साथ विभाग को लगभग 3000 से ज्यादा स्मारकों की जिम्मेदारी दी गई है। यह एक चुनौतीपूर्ण काम रहा है। अब सरकार ने कुछ स्मारकों की देखरेख का काम निजी क्षेत्र (शर्तों के साथ) को सौंपने का निर्णय लिया है।

कुछ बिंदु –

  • संरक्षण का काम संसाधन और तकनीकी सहायता की मांग करता है। निजी क्षेत्र की भागीदारी से इस मांग को पूरा किया जा सकता है।
  • इस निर्णय में पुरातत्व विभाग अपना सुपरवाइजरी अधिकार बनाए रखेगा, ताकि संरक्षण में किसी प्रकार समझौता न किया जाए।
  • अब पुरातत्व विभाग उच्च कौशल वास्तुकारों और एजेंसियों की मदद लेने को प्रोत्साहित होगा।
  • इस कदम से नेशनल कल्चर फंड के जरिए कॉपोरेट दान प्राप्त किए जा सकते हैं।
  • कुछ समय पहले सरकार ने ‘एडॉप्ट ए हेरिटेज‘ मुहिम चलाई थी। यह उससे अलग है। वह मुख्य रूप से आने वाले दर्शकों की सुविधाओं पर केंद्रित थी। परंतु इस पहल में दानदाता स्थल को व्यापारिक सुविधाओं से लैस कर सकते हैं। चिंता भी इसी बात की है कि कहीं इस कमाई की होड़ में स्मारक की देखभाल पीछे न छूट जाए। इसका हल स्पष्ट दिशा निर्देशों, मजबूत निगरानी और स्थानीय संदर्भों के प्रति संवेदनशीलता को महत्व दिए जाने में है।

पिछले अनुभव कहते हैं कि ऐसी पहलों में जब निजी पूंजी अच्छी तरह से सार्वजनिक फ्रेमवर्क के अंदर काम करती है, तो यह वाकई संरक्षण को बेहतर कर सकती है।

‘द इकॉनॉमिक टाइम्समें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 15 जनवरी 2026