विधेयकों पर स्वीकृति की समय सीमा पर राज्यों को झटका

Afeias
26 Dec 2025
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राज्यों की विधानसभा में पारित विधेयकों को लेकर राज्यपाल और राष्ट्रपति की स्वीकृति में लगने वाले समय के मुद्दे पर काफी समय से विवाद चल रहा था। इस संदर्भ में स्पष्टता के लिए राष्ट्रपति ने शीर्ष न्यायालय से सलाह मांगी थी।

न्यायालय का मत –

  • अनुच्छेद 143 के तहत मांगी गई सलाह पर उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि वह विधेयकों को मंजूरी देने के मामले में राज्यपाल और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा तय नहीं कर सकता है।
  • साथ ही यह भी कहा कि राज्यपाल पारित विधेयकों को अनंतकाल तक अपने पास लटकाए नहीं रख सकते। लंबे समय तक देरी या बिना कारण बताए रोके रखने के मामले में न्यायालय राज्यपाल के विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए सीमित निर्देश जारी कर सकते हैं।

प्रभाव –

  • न्यायालय ने अपने मत से राज्यपाल और राष्ट्रपति के अधिकारों के मामले में एक तरह से शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को ध्यान में रखा है।
  • साथ ही संघीय ढांचे के महत्व को यथावत् रखते हुए स्थिति स्पष्ट की है कि राज्यपाल पारित विधेयकों को अनिश्चित काल तक रोके रखने की छूट नहीं ले सकते। इस तरह, 16वें प्रेसिडेंशियल रेफरेंस या राष्ट्रपति को सलाह पर उच्चतम न्यायालय का जवाब एक संवैधानिक संतुलन बनाने जैसा है।

          ज्ञातव्य हो कि यह राय अप्रैल 2025 के एक निर्णय के उलट है, जिसमें तीन महीने की समयसीमा तय की गई थी।

  • अनुच्छेद 200 में, राज्यपाल को अपना फैसला ‘जितनी जल्दी हो सके‘ बताने को कहा गया है। न्यायालय ने इसे बहुत लचीता बताया है। इस दृष्टि से यह संघवाद और लोकतांत्रिक सरकार के लिए खतरा उत्पन्न करने वाला है।

‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22 नवंबर, 2025