उच्च शिक्षा में संकट
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उच्च शिक्षा में सुधार को लेकर उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को नौ निर्देश जारी किए हैं। ज्ञातव्य हो कि देश के टॉप संस्थान आईआईटी में ही आत्महत्या के मामले काफी बढ़े हैं। इसको लेकर न्यायालय ने चिंता व्यक्त की है।
कुछ बिंदु –
- न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 का संज्ञान लिया है। यह अनुच्छेद न्यायालय को ‘पूर्ण न्याय‘ करने के लिए व्यापक शक्तियाँ प्रदान करता है।
- न्यायालय के नौ में से सात निर्देश उच्च शिक्षा संस्थानों में आत्महत्या का रिकार्ड रखने, रिपोर्टिंग करने और उसे ट्रैक करने से जुडे हैं।
- दो निर्देशों में रजिस्ट्रार और कुलपति के पदों के साथ-साथ सभी खाली फैकल्टी पदों को भरने से जुड़े हुए हैं।
कुछ तथ्य –
- उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र के प्रवेश के कारण फैलाव तो बहुत हुआ है। लेकिन गुणवत्ता में उस हिसाब से कोई सुधार नहीं हुआ है।
- जमीनी स्तर पर हुए अध्ययन से पता चलता है कि विशेष तौर पर विश्वविद्यालयों में संकायों की 50% सीटें खाली पड़ी हैं।
- यदि तमिलनाडु के मद्रास विश्वविद्यालय के स्तर का ही उदाहरण लें, तो पता चलता है कि पिछले एक दशक में वहाँ नए शिक्षकों की भर्ती नहीं हुई है।
- कुलपति की नियुक्तियाँ राज्यपाल ने रोक रखी हैं।
- संकायों के पदों को भरने के लिए यूजीसी की प्रक्रिया पर चलना होगा। इसमें कम से कम छः महीने लगते हैं। बजट का हिसाब केंद्र सरकार की मदद से पूरा करना होगा।
- भ्रष्टाचार और नियुक्तियों में घुसी राजनीति ने गुणवत्ता को बहुत प्रभावित किया है।
अच्छा है कि निर्देशों के पालन के लिए न्यायालय ने चार महीने का समय तय किया है। उच्च शिक्षा से जुड़े आर्थिक, सामाजिक और अकादमिक मुद्दों को सुलझाकर ही आत्महत्याओं को रोका जा सकता है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 19 जनवरी 2026
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