रसोईघर में स्वच्छ ईंधन की कितनी पहुँच
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- आज भी भारत में लगभग 50 करोड़ लोग लकड़ी, बायोमास, उपले, फसल की ढूंढ और मिट्टी के तेल जैसे प्रदूषणकारी ईंधनों पर निर्भर हैं। इससे पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ पैदा होती हैं।
- कई विकासशील देशों की तरह भारत ने भी खाना पकाने के लिए स्वच्छ ईंधन की पहल शुरू की है –
- पाइप्ड नैचरल गैस की पहुंच बढ़ाना।
- प्रधानमंत्री उज्जवला योजना और बायोगैस को बढ़ावा देना।
- ये सभी प्रयास स्वच्छ ईंधन के निरंतर प्रयोग या बायोमास को पूरी तरह बदलने में कारगर नहीं हैं। पाइप्ड लाइन गैस के लिए बुनियादी ढाँचे की कमी है। इसके कारण लगभग एक तिहाई लाइसेंस प्राप्त शहरी गैस वितरण क्षेत्रों में इसे नहीं लगाया जा सका है।
- इन सब प्रयासों में इलेक्ट्रिक कुकिंग को भी शामिल किया जाना चाहिए। इसी दिशा में इंडक्शन स्टोव के लिए सब्सिडी और प्रधानमंत्री द्वारा सौर पीवी ई-चूल्हे को समर्थन दिया जा रहा है।
- खाना पकाने के स्वच्छ साधनों को अपनाने से होने वाले स्वास्थ्य और पर्यावरणीय लाभों के बारे में जन जागरूकता फैलाए जाने की भी जरूरत है।
स्वच्छ ईंधन के लिए भारत में क्षेत्र-विशिष्ट समाधानों को ढूंढा जाना चाहिए। इसके साथ ही संबद्ध बुनियादी ढांचे में निवेश और सुव्यवस्थित विनियमन की जरूरत है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 10 जुलाई, 2025
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