राजकोषीय संघवाद में संतुलन नहीं बना

Afeias
05 Mar 2026
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सोलहवें वित्त आयोग की सिफारिशें आ चुकी हैं।

  • इसका सबसे महत्वपूर्ण बिंदु क्षैतिज विचलन अनुपात है। यानि केंद्रीय करों के विभाजन पूल में राज्यों के हिस्से को 41% रखे जाने का प्रस्ताव है। राज्य चाहते हैं कि यह 50% हो। यह स्थिति तब है, जब आयोग ने माना है कि जीएसटी फ्रेमवर्क के तहत राज्यों के सामने राजकोषीय गुंजाइश कम हो रही है। वे अब बाजार से उधार लेने को मजबूर हो रहे हैं।
  • इस बार ‘टैक्स एफर्ट‘ मानदंड को बदलकर ‘जीडीपी में योगदान‘ को एक बड़ा माप बना दिया गया है। 15वें वित्त आयोग में यह 2.5% था, जो अब 10% कर दिया गया है। इस बदलाव का उद्देश्य उत्पादक और कुशल राज्यों को ईनाम देना है। इससे राज्यों के प्रशासन में सुधार आने की संभावना है।
  • जनसांख्यिकीय आधार के माप को कम कर दिया गया है। भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभांश के चरम पर है। आबादी बढ़ने के अनुसार राजकोषीय स्थानांतरण के फार्मूले को धीरे-धीरे बदला जाना चाहिए। आयोग भी इस पर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है, जिससे केंद्र के अनुदान पर निर्भर राज्यों को झटका न लगे। इसका कुल असर यह है कि तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे औद्योगिक राज्यों के इंटर-स्टेट शेयर में थोड़ा बहुत ही सुधार हुआ है।
  • सेस और सरचार्ज के कारण केंद्र-राज्य के बीच करों के विभाज्य पूल के सिकुड़ने की संभावना है। लेकिन आयोग ने इसे ठीक करने की कोशिश नहीं की है।
  • वित्त वर्ष 2025-26 और 2026-27 में राज्यों को दिया जाने वाला कुछ अनुदान 12.2% बढ़ने का अनुमान है। लेकिन यह केंद्र प्रायोजित योजनाओं के राज्यों में कार्यान्वयन पर निर्भर करता है। कुल मिलाकर यद्यपि यह सिफारिश राज्यों के वित्तीय तनाव को मानती हैं, लेकिन राजकोषीय संघवाद में संतुलन लाने के लिए आवश्यक संरचनात्मक परिवर्तन पर जोर नहीं देती हैं।

‘द हिंदूमें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 3 फरवरी, 2026