न्यायाधीशों को प्रगतिशील होना चाहिए
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय के दो न्यायाधीशों ने कुछ ऐसे निर्णय दिए हैं, जो समाज में पितृसत्ता और लैंगिक असमानता को बढ़ाने का काम करते हैं। न्यायालयों का ऐसा रवैया समाज और देश को पीछे ढकेलता है। क्यों –
- क्योंकि मंदिरों या अन्य शीर्ष धार्मिक संस्थानों की तरह न्यायालय को भी सर्वोच्च माना जाता है। इनमें लोग सामाजिक गलतियों में सुधार और निवारण चाहते हैं। इससे नागरिक अधिकारों को सुरक्षा मिलती है।
- क्योंकि न्यायालयों को कानून का संरक्षक माना जाता है।
- क्योंकि न्यायालय समाज को दिशा-निर्देश भी देते हैं, जो नैतिक आदर्शों का रूप ले लेते हैं।
- क्योंकि न्यायाधीश जिस भाषा का उपयोग और जिन सिद्धांतों का पालन करते हैं, वे जनता के दृष्टिकोण और न्याय में जनता के विश्वास को आकार देते हैं।
- क्योंकि न्यायालय के लापरवाह या प्रतिगामी निर्णय प्रगति को कमजोर करते है, और नैतिक अधिकार को नुकसान पहुँचाते हैं।
अतः न्यायाधीशों की यौन शोषण के संदर्भ में ‘एक हाथ से ताली नहीं बज सकती‘ जैसी प्रतिगामी धारणाएं निंदनीय हैं। भारतीय न्यायालयों को प्रगतिशील एवं संवेदनशील न्यायाधीशों की आवश्यकता है। इससे न्यायालयों में आधुनिक समावेशी वातावरण बनेगा, जो समाज का सही मार्गदर्शन कर सकेगा।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 2 जून, 2025
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