मनरेगा की पहचान बदलना कितना सही?
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हाल ही में महात्मा गांधी नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (एमजीएनआरईजीए) या मनरेगा की जगह लेने के लिए नया कानून लाया गया है। इसकी जगह विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) ने लिया है। इसको खारिज करने के अनेक कारण हैं –
- योजना का नाम बदलने का एकमात्र कारण यही है कि भाजपा की विचारधारा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़ी है, और आरएसएस के गांधी से गहरे मतभेद थे। 20 साल पुरानी योजना में गांधी के नाम का होना, उनके ग्राम स्वराज से जुड़ा दिखता है। यह लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण को सफल करने वाला रहा है।
- विडंबना यह है कि सरकार योजना के सिर्फ नाम को ही नहीं, बल्कि उसके बुनियादी चरित्र को भी बदलना चाहती है। यह केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसे बदलकर केंद्र और राज्यों के बीच 60 : 40 के अनुपात में निधि को बांटा जाना है। राज्यों की माली हालत पहले ही अच्छी नहीं है। दूसरे, कैश ट्रांसफर से उनके वोट बैंक को लाभ मिलता है, तो वे कल्याणयकारी योजना का धन उसी में लगाना चाहेंगे।
- पहले के कानून की आत्मा एक बॉटम अप डिमांड बेस्ड स्कीम की है। यानि रोजगार को निचले स्तर के लोगों को देने की प्राथमिकता रखी जाती है। बदली योजना सप्लाई-ड्रीवन या आपूर्ति संचालित व्यवस्था है। इसका निर्णय केंद्र सरकार करेगी कि किस क्षेत्र को कितना आबंटन किया जाना है।
- कोई भी अतिरिक्त खर्च राज्यों को ही उठाना होगा।
- गांधी के ग्राम स्वराज की विचारधारा का इस योजना में कोई स्थान नहीं दिखाई देता है। जमीनी स्तर पर लोकतंत्र के फैलाव के बिना केंद्र सरकार सुशासन कैसे लाएगी, यह समझ से परे है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 18 दिसंबर 2025