चीन के साथ बदलते रिश्ते
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हाल ही में भारत-चीन संबंधों में काफी बदलाव आया है। 2020 के सैन्य गतिरोध के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार चीनी राष्ट्रपति से चीन जाकर द्विपक्षीय मुलाकात की है। शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन के लिए सात साल बाद हमारे प्रधानमंत्री ने चीन की यात्रा की है। यह यात्रा बहुत महत्व रखती है –
- शंघाई सहयोग संगठन एक ऐसा यूरेशियन समूह है, जिसे स्पष्ट रूप से पश्चिम विरोधी माना जाता है। प्रधानमंत्री मोदी तीन साल बाद इसमें सम्मिलित हुए हैं।
- द्विपक्षीय बैठक में दोनों नेताओं ने अक्टूबर 2024 में शुरू होने वाली सीमा सामान्यीकरण प्रक्रिया को अपनी स्वीकृति दी है। इसके तहत एलएसी पर सैनिकों की वापसी प्रक्रिया को तेज किया जाएगा।
- दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों की बहाली, वीजा सुविधा और विश्व व्यापार को स्थिर करने के लिए आर्थिक संबंधों के निर्माण के लिए सहमति हुई है।
- प्रधानमंत्री मोदी ने जहाँ आपसी विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता के आधार पर संबंधों को आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है, वहीं चीनी राष्ट्रपति ने ड्रैगन और हाथी (भारत) को एक साथ आने का आह्वान किया है।
- इस बीच भारतीय और चीनी नेताओं के साथ रूसी नेता की सौहार्दपूर्ण तस्वीरों ने एक निष्क्रिय रूस-भारत-चीन (आरआईसी) त्रिपक्षीय बैठक की यादें ताजा कर दी।
- तियानजिन घोषणापत्र में ‘आतंकवादियों की सीमा पार गतिविधियों’ के खिलाफ कड़ी भाषा का प्रयोग किया गया। इसमें पहलगाम हमले और बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना पर हमलों की समान रूप से निंदा की गई।
- घोषणापत्र में सभी सदस्यों ने गाजा में मानवीय संकट और ईरान पर अमेरिकी-इजराइली हमलों की निंदा की है। हालांकि, भारत ने चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का समर्थन करने वाले अनुच्छेद का विरोध जारी रखा है।
चीन और भारत के बीच ऐसी सौहार्दपूर्ण मुलाकात एक साल पहले तक अकल्पनीय थी। इसके पीछे कहीं-न-कहीं भारत पर अमेरिकी टैरिफ और प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 09 सितंबर, 2025
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