प्रतिद्वंदिता पर आधारित एक नई दुनिया
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“पुराना जमाना खत्म हो रहा है, और नया जमाना आने के लिए जूझ रहा है। अब राक्षसों का समय है।” इटली के दार्शनिक एटोनियो ग्राम्शी का यह उद्धरण आज की विश्व राजनीति के लिए भी सत्य है। आइये देखते हैं कि आज क्या बदल रहा है?
- यह दुनिया ताकतवर लोगों की दुनिया है। इसमे प्रत्येक राष्ट्र को अपने आर्थिक भविष्य के रास्ते खुद ही बनाने पड़ेंगे।
- चीन और अमेरिका के बीच श्रेष्ठता की होड़ नए तनावों को जन्म देगी; जैसा कि हम वेनेजुएला व ग्रीनलैंड के संदर्भ में देख रहे हैं। तकनीक के क्षेत्र में भी युद्ध जैसी स्थिति रहेगी।
- राष्ट्रों के बीच तीव्र प्रतिद्वंदिता के कारण वैश्विक सहयोग परास्त हो रहे हैं, जबकि जलवायु परिवर्तन और कच्चे माल की आपूर्ति श्रंखला (दुर्लभ खनिज, तेल, कोयला) के लिए यह सहयोग अत्यंत आवश्यक है।
- तेल या प्राकृतिक गैस पर निर्भर देशों और बिजली आधारित ऊर्जा पर निर्भर देशों के बीच का विभाजन स्पष्ट है। जलवायु परिवर्तन यहाँ एक संपार्श्विक क्षति के रूप में सामने आ रहा है।
- आज की भूराजनीति में आर्कटिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि वह चीन व रूस के लिए रणनीतिक महत्व रखता है। पीछे हटती बर्फ से वहाँ खनिजों के दोहन का रास्ता बनेगा। आर्कटिक; जो ‘पृथ्वी का रेफ्रिजरेटर’ कहलाता है, मौसमी प्रणालियों को नियंत्रित करता है। लेकिन अब दुनिया में हर चीज को धन कमाने के नजरिए से देखा जाता है, चाहे इससे व्यापक विनाश ही क्यों न हो।
- विद्युतीकरण, हरित प्रौद्योगिकी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण अगले दशक तक ताँबे की मांग दोगुनी हो जाएगी। इस कारण पेरू, चिली व कांगों गणराज्य तांबे के विशाल भंडार के कारण तथा चीन धातु प्रसंस्करण के कारण केंद्र में हैं। घने जंगलों और जैव विविधता से भरपूर क्षेत्रों में तांबे के स्मेल्टरों की आवश्यकता होगी, ताकि प्रदूषण नियंत्रण हो सके। यही स्थिति दुर्लभ खनिजों के लिए भी होगी।
- चीन न केवल इन आपूर्ति श्रंखलाओं में बढ़त रखता है, बल्कि ग्रीन टेक्नालॉजी में भी अग्रणी है। अन्य देश अब नई खदानें खोजने और समझौते करने की होड़ में हैं।
दो महत्वपूर्ण प्रश्न –
- जब देश वैश्विक व्यापार को ‘ऑन शोरिंग‘ के लिए पुनर्गठित करेंगे, अर्थात् आपूर्ति श्रंखलाओं को सुरक्षित करने और औद्योगीकरण को पुनर्जीवित करने के लिए घरेलु उत्पादन बढाएंगे, तो क्या समृद्ध देश, जिन्होंने पहले पर्यावरण और श्रम की ऊँची लागतों के कारण ‘ऑफ शोरिंग’ को प्राथमिकता दी थी, अब उन लागतों को घरेलू स्तर पर स्वीकार करेंगे? या वे सभी मानकों को पुनर्गठित करके दुनिया भर में उत्पादन लागत बढाएंगे, जैसा कि कार्बन सीमा समायोजन प्रणाली में किया जा रहा है।
घरेलू स्तर पर उत्पादित वस्तुओं में चीन का सामना कर पाना भी एक चुनौती है। वह हर चीज को उत्पादन और आपूर्ति अन्य देशों की अपेक्षा सस्ती दरों पर कर सकता है। हमें दुनिया के लोगों व पृथ्वी, दोनों को बचाने वाला उत्तर चाहिए।