किसान और मुक्त व्यापार समझौते

Afeias
09 Mar 2026
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हमारे देश को विकास के लिए यूरोपियन यूनियन के साथ हुए समझौते जैसे कई अन्य समझौतों की जरूरत है। समस्या यह है कि हमारे देश की किसान-आबादी बहुत बडी है। उसके हितों की रक्षा के कारण सरकार के हाथ बंधे हुए हैं।

कुछ बिंदु –

  • स्वतंत्रता के 80 वर्ष बाद भी हमारी हजारों साल पुरानी खेती और डेयरी को विदेशी प्रतिस्पर्धा का सामना करने में नाकाम माना जाता है। इसलिए इसे टैरिफ संरक्षण की जरूरत है।
  • पिछले 12 महीनों में किए गए व्यापारिक समझौतों से यह स्पष्ट होता है। चाहे वह यू.के. के साथ सीईटीए हो या न्यजीलैण्ड के साथ किया गया मुक्त व्यापार समझौता हो, खेती और डेयरी मुश्किलें खड़ी करते हैं।
  • अमेरिका में रोजगार का केवल 1.2% खेती पर आश्रित है। यह उनके जीडीपी का 1% है। यूरोपीय संघ में यह 1.6% है। भारत के छोटे जीडीपी में खेती 16.3% भागीदार है। बहुत सारे किसान छोटे और अलाभकारी खेतों पर गुजारा कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास विकल्प नहीं है।
  • भारतीय अर्थव्यवस्था की तुलना में कृषि क्षेत्र 4.4% बनाम 7.4% की गति से बढ़ रहा है। हालांकि, आज लगभग सभी देश किसान-आबादी की रक्षा के लिए राजनीतिक दबावों से गुजर रहे हैं। फ्रांस में चार लाख से भी कम किसान हैं। फिर भी दक्षिण अमेरिका के मर्कोसुर ब्लॉक के साथ यूरोपीय संघ के व्यापार समझौते का कड़ा विरोध हुआ है। भारत का संरक्षणवादी रुख सही है, लेकिन कब तक?

‘द टाइम्स ऑफ इंडियामें प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 5 फरवरी, 2026