16-02-2026 (Important News Clippings)
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Date: 16-02-26
Mission AImpossible
India has built an LLM, has good startups & upcoming data centres. But that’s not enough
TOI Editorials
Big things happen when people put their heads together. In Feb 1974, a handful of Taiwanese engineers and officials met for a breakfast meeting. Taiwan’s economy depended on labour-intensive factories at the time, but the breakfast group saw competition from neighbouring countries ahead. They decided it was time to go high-tech. Four years later, Taiwan was not only making semiconductors, but was also third in terms of digital watch exports. It’s Feb again, and world’s AI captains, along with armies of delegates, are gathered in Delhi. At India AI Impact Summit 202, there will be many opportunities to put heads together. But what does India want from these meetings?
There’s the official manifesto that says AI should develop keeping people, planet and progress first. A laudable aim, but far removed from reality at present. As to people, talk over the past few days has dwelt on the coming jobocalypse – annihilation of entryand middle-rung white-collar jobs. Regarding planet, AI’s water and energy demands are well-documented. Progress under these conditions is questionable. So India cannot realise its vision if all it brings to the table are high moral principles. What it needs is the underpinnings of AI: its own research, data centres, foundational models, and popular applications.
True, US seems to have an unassailable lead in AI today. But so was the case with semiconductors, and rare earths, at various points last century. It gets off the blocks fast with a combination of wealth, cutting-edge research, and first-mover advantage. That doesn’t mean the race is over. And AI, especially, is still in its infancy. While US firms hog headlines, India has quietly built BharatGen, its own LLM that supports 22 languages. States like Andhra have drawn multi-billion data centre commitments. IIT Madras has emerged as a cradle of startups, drawing over $2bn in VC investments. But it’s time to shift gears now.
As the accompanying article says, GOI and the private sector must invest more in R&D. It doesn’t cost as much as the infra buildout, or the long-term operational costs, but is the bedrock of true aspiration. Because AI infra requires tens of billions of dollars, we will need foreign capital, but good projects shouldn’t be held up because of funding gaps. Govt must play enabler, sitting down with researchers and industry to spot obstacles, and remove them. Taking care not to entangle them in red tape. We have a vision, let’s put heads together to execute it.
Give AI Investment The Big Come Hither
Diversify funds to hyperscale for infra
ET Editorial
AI Impact Summit starts in New Delhi today at a time when AI investments globally are now in uncharted territory, with the US, China, the EU and Asia-Pacific entering the hyperscaler range. The five biggest AI infra providers — Amazon, Alphabet, Microsoft, Meta and Oracle — are committing nearly $700 bn in investments in 2026, twice the amount they spent in 2025. Apart from this, the US’s Project Stargate has a $500 bn strategic investment plan involving OpenAI, SoftBank and Oracle. In China, Alibaba is committed to investing $53 bn over a 3-year period, ByteDance has $13 bn earmarked for AI infra in 2026 while Tencent has trimmed its investments.
China’s AI investments, although not on the US scale, are climbing as it pursues a less capital-intensive development model. The EU has unveiled a €240 bn (about $260 bn) action plan for AI infrastructure.
Japan has allocated 1 tn yen (about $6.5 bn) annually for AI and semiconductor development and South Korea has lined up 9.9 tn won ($6.8 bn) in its national AI budget. Besides these, a clutch of sovereign wealth funds in West Asia are investing huge amounts to kit out local AI infra. Economies that have hyperscaled their AI investments are reporting that capacity is being absorbed quickly. Energy requirements for AI data centres are emerging as a key constraint. This makes the case for investment diversification.
India has tweaked its tax regime to plug into the AI investment tsunami. The budget announced a 20-yr tax holiday for foreign cloud service providers operating through India-based data centre infra. Investments of $70 bn in Indian data centres are in various stages of implementation, and $90 bn more has been announced. The AI policy is meshed with other GoI initiatives to push semiconductor and electronics manufacturing. The country is positioning itself as a long-term destination for AI investments, from all sources. This holds the key to its emergence as an AI power.
एआई शिखर सम्मेलन
संपादकीय

नई दिल्ली में शुरू हो रहे एआई इंपैक्ट शिखर सम्मेलन की महत्ता केवल इसलिए नहीं है कि यह एक पांच दिवसीय वैश्विक आयोजन है। इसका महत्व इसलिए भी है, क्योंकि इसमें 15 से अधिक देशों के शासनाध्यक्षों के साथ 50 से ज्यादा देशों के प्रतिनिधिमंडल हिस्सा ले रहे हैं। विश्व भर के एआई विशेषज्ञ एवं उद्योग जगत के प्रतिनिधियों की हिस्सेदारी इस सम्मेलन के आकर्षण को और बढ़ा रही है।
इस आयोजन के प्रति दिलचस्पी को इससे समझा जा सकता है कि दो लाख से अधिक पंजीकरण हो चुके हैं। एक तरह से यह सम्मेलन जी 20 शिखर सम्मेलन से भी अधिक प्रभावशाली एवं विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचने वाला हो सकता है। चूंकि यह भविष्य पर केंद्रित एक व्यापक सम्मेलन है, इसलिए यह आशा की जाती है कि इसके जरिये एआई को एक जिम्मेदार, टिकाऊ और समावेशी तकनीक के रूप में विकसित एवं विस्तारित करने पर सहमति बनेगी।
ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि विश्व भर में एआई का प्रभाव और उसका बाजार तेजी से बढ़ रहा है। जीवन के हर क्षेत्र में एआई का प्रभाव बढ़ता हुआ दिख रहा है। यह सर्वथा उचित है कि इस सम्मेलन में एआई की चुनौतियों से निपटने पर भी विचार-विमर्श होगा, लेकिन बात तब बनेगी जब उससे निपटने के किसी प्रभावी तंत्र पर सहमति भी बनेगी।
यह सहमति इसलिए आवश्यक है, क्योंकि फिलहाल एआई पर चंद बड़े राष्ट्रों का ही वर्चस्व कायम है। यदि इस तकनीक का प्रसार अविकसित एवं निर्धन देशों तक नहीं पहुंचता तो इससे दुनिया में विषमता और अधिक बढ़ेगी ही। एआई का उपयोग समावेशी, नैतिक एवं लोकतांत्रिक तरीके से हो, इसके लिए मेजबान भारत के साथ-साथ सभी देशों को प्रयत्न करने होंगे।
तकनीक के संदर्भ में इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि प्रत्येक तकनीकी विकास अपने साथ कुछ विसंगतियां एवं खतरे भी लाता है। एआई के साथ तो ऐसा कुछ अधिक ही है। इसके दुरुपयोग के मामले बढ़ते चले जा रहे हैं। नि:संदेह एआई विभिन्न क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो रही है, लेकिन उसका दुरुपयोग जिस तरह बढ़ रहा है, उससे उपयोगकर्ताओं के बीच उसके प्रति विश्वसनीयता और भरोसे का संकट पैदा हो रहा है।
यह आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है कि एआई का दुरुपयोग रोकने की जिम्मेदारी संबंधित कंपनियों पर डाली जाए और इसके लिए उन्हें जवाबदेह भी बनाया जाए। एआई अपने साथ जो चुनौतियां लेकर आई है, उनमें एक यह भी है कि उसके कारण कई परंपरागत नौकरियां खत्म हो रही हैं।
नि:संदेह यह तकनीक परंपरागत नौकरियों को खत्म करने के साथ नई नौकरियां का सृजन भी कर रही है। एक तरह से एआई चुनौतियों के साथ अवसर भी है। भारत को इस अवसर को भुनाने के लिए अपने लोगों को एआई के उपयोग के प्रति सक्षम बनाने के लिए और अधिक सक्रियता दिखानी होगी।
Date: 16-02-26
व्यापार समझौतों से आगे की चुनौतियां
शिवकांत शर्मा, ( लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं )

दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जो व्यापार के बिना केवल आत्मनिर्भरता के बल पर आर्थिक महाशक्ति बना हो। आर्थिक इतिहासकार एंगस मैडिसन के अनुसार भारत भी व्यापार के बल पर आर्थिक महाशक्ति बना था। उसकी अर्थव्यवस्था विश्व की अर्थव्यवस्था के एक चौथाई से अधिक हो गई थी जिसके बल पर वह सोने की चिड़िया कहलाता था। आधुनिक युग में ब्रिटेन से लेकर अमेरिका तक हर देश व्यापार के बल पर ही आर्थिक महाशक्ति बना है और अब चीन भी उसी राह पर है।
उसने अमेरिका और यूरोप की मंडियों में धाक जमाने के बाद संरक्षणवाद की दीवारें खड़ी होने से पहले ही व्यापार समझौतों के द्वारा अपने माल के लिए नई मंडियां खोलना शुरू कर दिया था। चार साल पहले हुआ आरसीईपी या व्यापक क्षेत्रीय आर्थिक साझेदारी समझौता उसकी ही एक कड़ी थी, जिसमें चीन और जापान से लेकर न्यूजीलैंड तक फैले 15 देश शामिल थे।
मुक्त व्यापार समझौते आपसी व्यापार को बढ़ाने और आर्थिक महाशक्ति बनने की राह खोलते हैं। भारत ने भी यूरोप के साथ समझौता करके और अमेरिका के साथ उसकी रूपरेखा तय करके ऐसी ही राह खोली है। अमेरिका और यूरोप से पहले वह आसियान, जापान, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, ओमान, मॉरीशस और यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के चार सदस्य देशों से व्यापार समझौते कर चुका है।
खाड़ी सहयोग परिषद के साथ व्यापार समझौते से जुड़ी वार्ताएं चल रही हैं। इन सबके पूरा होने पर दुनिया की 60 प्रतिशत से अधिक जीडीपी के बाजार भारत के लिए खुल जाएंगे। अर्थव्यवस्था को 40 वर्षों तक संरक्षणवाद की दीवारों में कैद कर दिवालिया कर लेने वाले देश के लिए यह परिवर्तन कायाकल्प से कम नहीं है।
यह भी सच है कि व्यापार समझौते और बड़ी-बड़ी मंडियों में प्रवेश पाने भर से भी कोई देश व्यापारिक और आर्थिक महाशक्ति नहीं बन सकता। उसके लिए आकर्षक दरों पर अच्छी गुणवत्ता वाला माल बनाना और बेचना पड़ता है। लाइसेंस राज और बाबूशाही के शिकंजे खोलकर उद्योग लगाना सुगम बनाना पड़ता है। सरकारी और निजी क्षेत्रों में शोध, विकास और नवाचार बढ़ाने के साथ-साथ उन क्षेत्रों को बढ़ावा देना होता है, जिनमें देश दूसरों से आगे हो।
पूंजी को सुलभ बनाना और बुनियादी सुविधाओं को सुधारना होता है। इन्हीं उपायों से चीन ने ट्रंप की टैरिफ जंग में भी अपना व्यापार बढ़ाकर भारत की जीडीपी से डेढ़ गुना कर लिया है। आज विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी मात्र 3.5 प्रतिशत है जबकि चीन की लगभग 14 प्रतिशत। अपने स्वर्णिम युग के दिनों में विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत के आसपास थी।
बीते दिनों ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीएर स्टार्मर की चीन यात्रा के दौरान एक ब्रिटिश साइकिल निर्माता से पूछा गया कि चीन और अमेरिका में कहां कारोबार करना अधिक सुगम है? उसने तपाक से जवाब दिया चीन में, जहां कुछ ही हफ्तों के भीतर कारोबार संभव है और व्यापार नीति को लेकर भी निश्चिंतता रहती है। भारत को भी बड़े पैमाने पर विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए कारोबारियों में इसी तरह का भरोसा पैदा करना होगा।
केंद्र के साथ राज्यों की सक्रिय और सकारात्मक भागीदारी के बिना यह संभव नहीं होगा, क्योंकि उद्योगों को पूंजी के अलावा जमीन, कर्मचारी, बिजली और बुनियादी ढांचे की जरूरत होती है, जो राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं जो निवेश आकर्षित करने लिए एक-दूसरे से होड़ करने के बजाय दिक्कतें खड़ी करने में लगे रहते हैं।
अन्यथा क्या कारण है कि तमिलनाडु का शहर तिरुपुर परिधान उद्योग का नया मैनचेस्टर बन सकता है, मगर कोलकाता और कानपुर वस्त्र उद्योग में अपने खोई चमक को फिर से हासिल नहीं कर पाते? बंगाल की आबादी वियतनाम के बराबर है, मगर जीडीपी उससे आधी है। बिहार की आबादी वियतनाम से सवा गुनी है और जीडीपी एक चौथाई है। विकास की दौड़ में यदि आप 20 साल लंबी लड़ाई से तबाह हुए देश की बराबरी भी नहीं कर सकते तो फिर क्या करेंगे?
व्यापार समझौते कर भारत ने अमेरिका, यूरोप, जापान और रूस जैसी विश्व की अमीर मंडियों के द्वार तो खुलवा लिए हैं, परंतु इनमें अपने माल की मांग बढ़ाने के लिए उसकी गुणवत्ता में निरंतर परिष्कार करना और उसे आकर्षक दामों पर बेचना होगा। उत्पादन का पैमाना बढ़ाए और शोध एवं विकास में निवेश किए बिना यह संभव नहीं हो सकेगा। चीन और वियतनाम शोध एवं विकास पर अपने बजट का 2.5 प्रतिशत से ऊपर खर्च करते हैं, जबकि भारत मात्र 0.65 प्रतिशत। ट्रंप की टैरिफ जंग से उठी संरक्षणवाद की लहर में रक्षा क्षेत्र की आत्मनिर्भरता सबसे अहम हो गई है, जो शोध एवं विकास में भारी निवेश के बिना संभव नहीं।
आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए अब व्यापार बढ़ाने से ही काम नहीं चलेगा। भारत को एआई और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी उभरती तकनीकों और इनके लिए आवश्यक ऊर्जा की तकनीक में भी आगे रहना होगा। पिछले कुछ महीनों में अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों ने भारत में एआई डाटा केंद्र बनाने के लिए लगभग 8,000 करोड़ डॉलर के निवेश का वादा किया है। इनमें एमेजोन, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और इंटेल जैसे नाम शामिल हैं। पिछले कुछ वर्षों से लगातार घटते विदेशी निवेश से जूझती भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यकीनन यह बहुत अच्छी खबर है। हालांकि इनके लिए जितनी बड़ी मात्रा में ऊर्जा चाहिए होगी, उसे पश्चिम के विकसित देश भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं।
डाटा केंद्रों और भारी ऊर्जा खपत वाले एआई मॉडल तैयार करने के लिए भारत को भी अपना ऊर्जा उत्पादन बढ़ाकर चीन के पैमाने पर लाना होगा जो इस समय अमेरिका से भी ढाई गुना बिजली पैदा कर रहा है। बड़े पैमाने पर ऊर्जा के लिए सौर, पवन और हाइड्रोजन जैसे स्वच्छ ऊर्जा के स्रोतों का विकास करना होगा, ताकि देश की हवा भी सांस लेने लायक बनी रहे। आज से दिल्ली में शुरू हुए एआई प्रभाव शिखर सम्मेलन में इस प्रश्न के साथ-साथ एआई को समावेशी, जन और जलवायु अनुकूल बनाने पर भी चर्चा होगी। इस सम्मेलन से भारत में एआई के विकास, प्रयोग और निवेश को गति मिलने की आशा है।
भारत के समक्ष अवसर
संपादकीय
नई दिल्ली में सप्ताह होने जा रही एआई इम्पेक्ट समिट एक ऐसे समय में आयोजित हो रही है जब अर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) को दुनिया भर में तेजी से अपनाया जा रहा है। सरकार की महत्त्वाकांक्षा एकदम स्पष्ट है भारत को वैश्विक एआई परिदृश्य की एक विश्वसनीय आवाज के रूप में स्थापित करना। अभी इस क्षेत्र में मोटे तौर पर अमेरिका और चीन का दबदबा है। इस समिट में 100 से अधिक देशा हिस्सा ले रहे हैं और इसका उद्देश्य है वैश्विक विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करना, पूंजी जुटाना और उन नियमों को आकार देना जो पश्चिमी प्राथमिकताओं को नहीं दशति हों या चीन के नेतृत्व वाले सरकारी मॉडल कर अनुकरण नहीं करते हो। इस संदर्भ में भारत के पास ऐसी मजबूती है जो इसे आगे बढ़ा सके। यह एआई टूल्स के क्षेत्र में दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ता बाजारों से एक है जिन्हें तमाम कंपनियां और परिवार तेजी से अपना रहे हैं। इस भारी मांग की वजह से आकर्षित होकर पहले ही वैश्विक प्रौद्योगिकी क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां भारत में अभूतपूर्व निवेश के बादे और ऐलान कर रही हैं। एमेजॉन ने वर्ष 2030 तक 35 अरब डॉलर से अधिक निवेश का वादा किया है, माइक्रोसॉफ्ट ने चार साल में 17.5 अरब डॉलर और गूगल ने 15 अरब डॉलर का निवेश करने की घोषणा की है। यह अमेरिका से बाहर गूगल का सबसे बड़ा एआई और डेटा सेंटर हच होगा। भारत की डिजिटल सार्वजनिक अधोसंरचना, कम लागत वाले डेटा और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम के बाद नियामक स्थिरता ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया है।
भारत की व्यापक रणनीति, सॉवरिन कंप्यूट और घरेलू लार्ज सैग्वेज मॉडल्स में निवेश के साथ, महंगे फ्रंटियर मॉडल विकास और क्षेत्रवार इस्तेमाल पर ध्यान केंद्रित करने के बीच संतुलन बनाने का लक्ष्य रखती है। इस संदर्भ में ताजा आर्थिक समीक्षा ने भी फ्रंटियर मॉडल विकास और ऐप्लीकेशन आधारित इस्तेमाल के बीच असमानता को रेखांकित किया है। यह उल्लेख करते हुए कि फ्रंटियर गैप को कम करने के प्रयास में ज्यादा खर्च आ सकता है। इसलिए या तो फ्रंटियर यानी अग्रणी स्तर के मॉडलों का अनुसरण किया जाए या सीमित संसाधनों को घरेलू प्राथमिकताओं के अनुरूप क्षेत्र विशिष्ट एआई प्रणालियों की ओर निर्देशित किया जाए।
संरचनात्मक स्तंभों में 38,000 ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (जीपीयू) के माध्यम से कंप्यूट तक पहुंच का विस्तार एआई कोश डेटासेट भंडार का निर्माण, एआई सुरक्षा संस्थान की स्थापना, और एआई इंसिडेंट का डेटाबेस बनाना शामिल हैं। ये महत्त्वपूर्ण संस्थागत कदम हैं। लेकिन लागू की जा सकने वाली जवाबदेही, मजबूत डेटा शासन और स्पष्ट निवारण तंत्र अत्यंत महत्वपूर्ण रहेंगे। यदि प्रोत्साहन कंपनियों को अपारदर्शिता की ओर धकेलते हैं तो स्वैच्छिक अनुपालन पर्याप्त नहीं होगा।
अन्य साधाएं भी है। भारत की डेटा सेंटर क्षमता अभी भी कुल वैश्चिक स्टार का एक छोटा हिस्सा है और देश में ऐसी घरेलू एआई कंपनियां नहीं हैं जिन्होंने सार्थक पैमाना हासिल किया हो। इसके अलावा, डाइपरस्केल अधोसंरचना धारी मांगों के साथ आती है, जिनमें निर्बाध बिजली, उन्नत शीतलन प्रणालियां, फाइबर कनेक्टिविटी और बड़े पैमाने पर जल उपयोग शामिल हैं। अभी किए गए डिजाइन विकल्प यह तय करेंगे कि भारत एआई कंप्यूट का विस्तार पर्यावरणीय तनाव को बढ़ाए बिना कर सकता है या नहीं। व्यापक स्तर पर देखें तो समिट की सफलता को केवल निवेश घोषणाओं से नहीं आंका जाना चाहिए। ध्यान देने की आवश्यकता है कि वह समिट तब हो रही है जब वैश्विक शासन परिदृश्य विभाजित है। वर्ष 2023 की ब्लेचली पार्क एआई सुरक्षा समिट में घोषणाएं और प्रतिबद्धताएं तो जताई गई, लेकिन दीर्घकालिक जोखिमों पर सहमति अभी भी दूर है। यहां तक कि वही प्रौद्योगिकी कंपनियों को विनियमित करना भी एआई के असंख्य देवलपर्स द्वारा किए जाने वाले तमाम दुरुपयोग को पूरी तरह रोक नहीं सकता। अंतरराष्ट्रीय प्रभाव मानकीकरण को कठिन बनाते हैं, फिर भी वैश्विक चर्चा आवश्यक है। यह पहले से ही साफ है कि एल्गोरिदमक टूल कैसे गलत तरीके से एक्सक्लूजन कर सकते हैं। फिर भी चुनौतियों के बावजूद यह उत्साहजनक है कि इन मुद्दों पर वैश्विक चर्चा आयोजित की जाएगी, और आशा है कि एआई के कुछ संभावित दुखभाव जल्द ही नियंत्रित किए जा सकेंगे। नौकरियों पर संभावित प्रभाव और बढ़ते चल को समाहित करने के लिए एआई- कौशल प्रशिक्षण के मुद्दे पर भी गंभीर बहस की आवश्यकता होगी। अन्य कई मुद्दे भी चर्चा के लिए मौजूद हैं। एआई तेजी से विकसित हो रही है और कई तरीकों से दुनिया को पुनः आकार देने की क्षमता रखती है, ऐसे में यह समिट दिशा और मानकों को परिभाषित करने के लिए एक अच्छा प्रारंभिक बिंदु हो सकती है।
Date: 16-02-26
न्याय की गरिमा
संपादकीय
न्यायपालिका लोकतंत्र का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्तंभ होता है, जो कानून के शासन को बनाए रखने और संविधान की मौलिकता के संरक्षण में अहम भूमिका निभाता है। भारत में न्यायपालिका को न्याय का मंदिर कहा जाता है, जहां विवादों का निस्तारण कर नागरिक अधिकारों की रक्षा की जाती है। किसी भी तरह की परेशानी या जटिल परिस्थिति में नागरिकों के लिए न्यायपालिका अंतिम आस होती है। ऐसे में अगर न्यायिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर ही सवाल उठने लगे, तो उस भरोसे का क्या होगा, जो न्याय की उम्मीद पर टिका होता है। वह चिंता सरकार के उन आंकड़ों से उपजी है, जिनमें कहा गया है कि देश के प्रधान न्यायाधीश के कार्यालय को वर्ष 2016 से अब तक मौजूदा न्यायाधीशों के खिलाफ 8,600 से अधिक शिकायतें मिली हैं। सरकार की ओर से शुक्रवार को लोकसभा में यह जानकारी दी गई, जिसके मुताबिक वर्ष 2024 में सबसे अधिक शिकायतें दर्ज की गई। यानी समय के साथ शिकायतों का यह सिलसिला बढ़ रहा है। दरअसल, लोकतंत्र में न्यायपालिका से उम्मीद की जाती है कि वह निष्पक्षता, पारदर्शिता, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ काम करेगी। नागरिक अधिकारों की रक्षा करना न्यायपालिका की सर्वोच्च प्राथमिकता होती है, इसलिए वह जनता के लिए साहस और आत्मविश्वास का स्रोत भी होती है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शक्ति संतुलन बनाए रखने में भी इसकी भूमिका अहम है। आम आदमी की न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक प्रणाली की शुचिता को बनाए रखना बेहद जरूरी है और यह तभी संभव हो पाता है, जब न्यायिक अधिकारियों का आचरण पूरी तरह पाक-साफ हो। इसमें दोराव नहीं कि विधायिका और कार्यपालिका की तुलना में आम नागरिक न्यायपालिका पर अधिक निर्भर रहते हैं, क्योंकि उन्हें न्याय प्रणाली पर पूरा भरोसा होता है न्यायिक प्रक्रिया भी तभी निष्पक्ष और निर्भीक हो सकती है, जब वह किसी भी तरह के अनुचित हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त हो।
नियमानुसार उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों का निपटारा न्यायपालिका द्वारा ‘आंतरिक तंत्र’ के माध्यम से किया जाता है। वर्ष 1997 में सर्वोच्च न्यायालय की ओर से दो प्रस्ताव पारित किए गए थे, जिनके तहत शीर्ष अदालत और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के अनुपालन के लिए कुछ मानक और सिद्धांत निर्धारित किए गए थे। इनका पालन न होने पर आंतरिक प्रक्रिया के तहत संबंधित न्यायिक अधिकारियों पर कार्रवाई की जाती है। मगर, न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतें बढ़ने का क्रम यह दर्शाता है कि आंतरिक जांच प्रक्रिया या तो धीमी है या फिर उसमें कोई बाधा उत्पन्न हो रही है। न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार के मामले यदाकदा सामने आते रहते हैं, लेकिन उनकी जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता और समय सीमा का अभाव नजर आता है। पिछले वर्ष मार्च में सामने आए एक न्यायाधीश के दिल्ली स्थित आवास पर जले हुए नोटों की गड्डी मिलने के मामले में अब तक कोई खास प्रगति न होने पर भी सवाल उठ रहे हैं। माना जा रहा है कि अगर यह मामला किसी प्रशासनिक अधिकारी या आम नागरिक से जुड़ा होता, तो जांच प्रक्रिया अब तक काफी आगे पहुंच गई होती। इस स्थिति के पीछे उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों के मामलों में जांच और कार्रवाई की प्रक्रिया का जटिल ढांचा भी एक बड़ा कारण है, जिसे सरल एवं स्पष्ट बनाए जाने की जरूरत है ताकि न्यायिक प्रक्रिया में नागरिकों का भरोसा कायम रहे।
नया अध्याय
संपादकीय
बांग्लादेश में हुए चुनावों के बाद जैसे नतीजे आए हैं, उससे साफ है कि अब वहां सत्ता और सियासत का एक नया अध्याय शुरू होने जा रहा है। खासतौर पर इसलिए भी कि वहां कुल 300 में से बीएनपी यानी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को अकेले 209 सीटें मिली हैं। इसके बरक्स जमात-ए-इस्लामी और उसके सहयोगियों को सत्तहत्तर सीटें मिली हैं। जबकि वर्ष 2024 में बांग्लादेश में हुई व्यापक उथल-पुथल के दौरान छात्र आंदोलनों से निकली एनसीपी यानी नेशनल सिटिजंस पार्टी को सिर्फ छह सीटें मिल सकीं। शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग ने चुनाव में हिस्सा नहीं लिया था। अब संभावना यही है कि पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे और बीएनपी के अध्यक्ष तारिक रहमान के हाथों में देश की कमान होगी। गौरतलब है कि बीएनपी ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत ‘बांग्लादेश सबसे पहले’ के नारे के साथ की थी।
अब जबकि बीएनपी को देश के मतदाताओं ने भारी बहुमत से जिताया है, तो उसके बाद यह देखने की बात होगी कि नई सरकार अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मोर्चे पर इस नारे को किस हद तक केंद्र में रख पाती है। खासतौर पर चीन ने जिस तरह बांग्लादेश में दीर्घकालिक हित के मद्देनजर लंबी अवधि के लिए भारी निवेश किया है, उसमें नई सरकार के लिए अपने देश के हित के सवालों पर ‘सबसे पहले’ की नीति सुनिश्चित करना संवेदनशील फैसला होगा। मगर बांग्लादेश की असली परीक्षा भारत के साथ अपने संबंधों की दिशा तय करने के संदर्भ में होगी। दरअसल, इस क्षेत्र की भौगोलिक हकीकत यह तय करती है कि बांग्लादेश के संबंध में भारत की भूमिका निर्णायक रहेगी। बांग्लादेश की करीब चौरानबे फीसद सीमा भारत के साथ लगी हुई है। यानी सुरक्षा और व्यापार के मामले में बांग्लादेश के लिए भारत की अनदेखी करना आसान नहीं होगा । बहुत कुछ इस पर निर्भर होगा कि मतभेद के कई बिंदुओं के बावजूद बांग्लादेश की नई सरकार भारत को लेकर क्या रुख अपनाती है। हाल के समय में बांग्लादेश में जिस तरह का तीव्र ध्रुवीकरण देखा गया, उसे संभालना और फिर से सहज माहौल बनाना वहां की नई सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती होगी।
Date: 16-02-26
भारत पर भरोसा
संपादकीय
भारत की ताकत पर संदेह करने वालों की संख्या भारत में भी कम नहीं हैं, मगर ऐसे तमाम लोगों को एक बार संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस की बातों पर जरूर गौर करना चाहिए। गुटेरस ने दोटूक कहा है कि भारत एक बेहद सफल उभरती अर्थव्यवस्था है, जिसका वैश्विक मामलों में प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। साथ ही, यह बात भी गौर करने की है कि भारतीयों की तकनीकी प्रतिभा पर स्वयं भारतीय ही नहीं, बल्कि विदेशी भी शंका करते हैं, ऐसे तमाम लोगों को जवाब देते हुए गुटेरस ने कहा है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता शिखर सम्मेलन की मेजबानी के लिए भारत बिल्कुल सही जगह है। वह भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखते हैं, जो अपनी वैज्ञानिक तरक्की का लाभ पूरी दुनिया को देता है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से सभी को लाभ मिलना चाहिए। एआई केवल विकसित देश या दो महाशक्तियों का विशेषाधिकार नहीं है। कोई दोराय नहीं कि भारत में अगर वैज्ञानिक तरक्की होगी, तो उसका लाभ पूरी दुनिया को होगा। एआई के लोकतांत्रिकरण के लिए भारत का आगे रहना जरूरी है। एआई की कमान अगर महाशक्ति देशों के हाथों में रहेगी, तो दुनिया ऐसे महत्वपूर्ण विकास से वंचित रह जाएगी ।
गुटरेस के इस कथन पर सबका ध्यान जाना चाहिए- कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव जाति के लाभ के लिए एक सार्वभौमिक साधन बन जाए। विश्व में बहुध्रुवीयता से ही सबको लाभ होगा। आश्चर्य नहीं, गुटेरस भारतीय नेताओं के साथ बहुध्रुवीय दुनिया में भारत की भूमिका पर चर्चा करने के लिए उत्सुक है। विगत दशक में बुरे तजुर्बे के बाद वह सच्ची बहुध्रुवीयता के समर्थक हो गए हैं। वह अब मानने लगे हैं कि उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका लगातार बढ़ती जानी चाहिए और उन्हें व्यापार, प्रौद्योगिकी और अंतरराष्ट्रीय चाहिए। यहां यह ध्यान रहे, गुटेरस ने सहयोग के मजबूत नेटवर्क बनाने चाहिए। यहां यह ध्यान रहे,गुटरेस ने अमेरिका के साथ हो रहे भारत के व्यापार समझौते का नहीं, बल्कि यूरोप के साथ हुए व्यापार समझौते को अच्छा उदाहरण बताया है। दुनिया एक नई व्यवस्था या नए नेटवर्क की स्थापना होनी चाहिए। एक ऐसा नेटवर्क बनना चाहिए, जिसमें केवल विकसित देश ही मजबूत न रहें। दुनिया जान गई है, चंद विकसित देश अगर मजबूत होंगे, तो वह कभी भी बहुध्रुवीयता को पसंद नहीं करेंगे। भारत उन देशों में शुमार है, जो बहुध्रुवीयता या गुटनिरपेक्षता का शुरू से ही झंडाबरदार रहा है। आज दुनिया के सामने यह प्रासद तथ्य बहुत उजागर है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद किसी भी संघर्ष को सुलझाने और शांति बनाए रखने में असमर्थ साबित हो रही है। मुट्ठी भर देश मजबूत हैं, जिनका लक्ष्य सार्वभौमिक शांति कतई नहीं है। ये देश मात्र अपना हित देख रहे हैं, जिसकी वजह से दुनिया में समस्याओं के समाधान को बल नहीं मिल रहा है।
आखिर आज दुनिया में समाधान की ओर जाने वाला रास्ता कहां है ? गुटेरस ने भारत की चर्चा करते हुए खुलकर स्वीकारा है कि सुरक्षा परिषद में मूलभूत सुधार की जरूरत है। एक ऐसी परिषद चाहिए, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की जरूरतों के मुताबिक नहीं, बल्कि आज की जरूरत के मुताबिक हो। सुधार के लिए नई अर्थव्यवस्था का आगे आना जरूरी है और भारत को एक ऐसी ही उभरती व्यवस्था के रूप में गुटेरस देख रहे हैं। इतना ही नहीं, यह सुखद तथ्य है कि वह वैश्विक नेटवर्क में भारत को एक केंद्रीय भूमिका में देखना चाहते हैं। अतः भारत को बहुत रणनीतिक ढंग से बन रहे नए अवसरों का लाभ उठाना होगा। अपनी शक्ति पर संदेह करना छोड़कर आगे बढ़ना होगा।