09-02-2026 (Important News Clippings)
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Date: 09-02-26
GM Crops, Take an Informed Look at It
Allow scientists, not politicians, to decide
TOI Editorials

The ‘framework for an interim agreement regarding reciprocal and mutually beneficial trade’ between India and the US released by the White House on Saturday has revived the issue of genetically modified crops because of their prevalence in American farming. This is not entirely an unwelcome development. It offers India an opportunity to work on its prejudices against Bt crops. India needs the tech for its food security, but has allowed politics to hijack scientific inquiry into the nutritional benefits and environmental costs of modern biotech. The country is falling back in adopting GM tech despite the developing world taking the lead from industrialised nations in growing crops whose genes have been altered. This is on account of a policy logjam that has hobbled its ability to test GM crops and decide on its own which ones should be allowed.
Three factors contribute to this impasse. One, the wrong categorisation of GM crops as being hazardous to the environment. Two, environmental ‘protection’ has been granted through an administrative order that has rendered India’s GM regulator dysfunctional. Three, regulation of GM crops is led by the Centre and resisted by states. India needs a regulatory mechanism that can restore undeservedly damaged public trust in a tech that’s sweeping global agriculture as we remain an unlikely holdout despite having an immense stake in this game. The indefinite moratorium on testing GM crops is progressively making Indian agriculture uncompetitive and exerting unsustainable pressure on resources like land and water.
The trade deal with the US provides a re-entry point to policy sanity. As a starting point we must allow scientists, not politicians, to decide on science. Biotech is too valuable to be left to the lobbyists. India’s scientific community and a section of its policy establishment have watched helplessly as political agendas have shaped the ‘debate’. It’s time biotech is backed by legislative intent so that Indians can make informed choices about how they want to feed themselves.
Messaging power
The data sharing policies of WhatsApp must be scrutinised thoroughly
Editorial
The Supreme Court of India, last week, sharply questioned Meta Platforms LLC and its messaging platform WhatsApp, in an appeal rooted in updates it made in 2021 around user data sharing with other Meta services such as Instagram and Facebook. The Court underscored the power that WhatsApp holds in India’s messaging ecosystem: it is practically impossible to reach everyone with a smartphone, coordinate groups, and undertake business communications without being on WhatsApp. The app’s “network effect” has captured nearly every smartphone in the country. The precise background of the litigation that reached the Court is an appeal against a ₹213.14 crore penalty issued by the Competition Commission of India (CCI) for abruptly amending its privacy policy, allowing the firm to share user data across its sister concerns, Facebook and Instagram. Users were prompted at that time to accept the terms or cease using the service. This ultimatum was problematic, and understandably drew pushback from civil society, the government, and the CCI.
Nobody argues that WhatsApp must not earn money for a service that has been transformative for communications in India. Owing to its parent’s massive scale of operations, WhatsApp has been able to offer messaging, multimedia sharing, telephony — services that were until 2016 prohibitively priced by telecom operators — for free, with only an Internet connection and a phone number as a pre-requisite. WhatsApp’s enthusiastic adoption of end-to-end encryption also furthered a societal expectation for secure communications as a norm, in a country where telecommunications has always been subjected to excessive executive-led surveillance. What is equally true is that WhatsApp is so deeply embedded in Indian society that its transition to an advertising model, where it would start making money here, deserves the highest scrutiny. Competition regulators, including in India, have frowned upon ubiquitous platforms that present users with ultimatums that they can scarcely refuse. There are free alternatives to WhatsApp that work just as well — Signal, Telegram and even Arattai from Zoho are serviceable — but they lack what makes the Meta product so valuable: the guarantee that virtually everyone one knows is on it. Allowing users to “opt out” of data sharing is an inappropriate remedy for services at WhatsApp’s scale, because the power of the default option at that scale leaves far too many with no real, informed choice in the matter. The Court’s thoughts on this matter are correct, but they need to be supported by a digital competition law, a draft of which was released in 2024, but has seen little progress since. As India approaches a billion Internet users, that law is needed to protect and foster a healthy digital marketplace.
वैश्विक आकर्षण का केंद्र बनता भारत
डॉ. जयंतीलाल भंडारी, (लेखक अर्थशास्त्री हैं)
हाल में भारत और अमेरिका के बीच हुए अंतरिम व्यापार समझौते के फ्रेमवर्क के तहत अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर टैरिफ 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया। टैरिफ में यह बड़ी कमी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती है। इस समझौते से जहां कई क्षेत्रों में भारत से अमेरिका को निर्यात बढ़ेगा, वहीं भारत में अमेरिकी निवेश में भी वृद्धि होगी। साथ ही दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को नई दिशा मिलेगी। वैश्विक कंपनियां चीन के विकल्प के रूप में भारत में निवेश बढ़ाएंगी और भारत का निर्यात तेजी से बढ़ेगा। इससे भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिकी बनने की दिशा में और तेजी से बढ़ेगा। गत दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा भी कि अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ हुए व्यापार समझौते भारत की बढ़ती आर्थिक अहमियत के प्रतीक हैं।
नई वैश्विक व्यवस्था भारत की ओर झुकती दिखाई दे रही है। पहले कहा जाता था कि भारत अवसर गंवा देता है, लेकिन अब दुनिया का मानना है कि यदि वे तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था से नहीं जुड़े, तो महत्वपूर्ण अवसर खो देंगे। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि भारत का तेज आर्थिक विकास और महंगाई पर नियंत्रण एक दुर्लभ संयोजन है। मजबूत बुनियादी ढांचा, विशाल घरेलू बाजार, मध्यवर्ग की बढ़ती क्रयशक्ति, एमएसएमई की गति, ऊर्जा विकास, युवा शक्ति, डिजिटल प्रगति तथा मैन्यूफैक्चरिंग और सेवा क्षेत्र की ताकत ने भारत को दुनिया के लिए आकर्षक बना दिया है। इसी कारण विकसित देश भारत से द्विपक्षीय और मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) कर रहे हैं।
भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते के फ्रेमवर्क के अनुसार भारत मक्का, गेहूं, चावल, सोया, पोल्ट्री, दूध, पनीर, इथेनाल, तंबाकू, कुछ सब्जियों और मांस जैसे संवेदनशील कृषि एवं डेरी उत्पादों के मामले में पूरी तरह सुरक्षित है। यह समझौता भारत के टेक्सटाइल एवं परिधान, चमड़ा एवं फुटवियर, प्लास्टिक एवं रबर उत्पाद, आर्गेनिक केमिकल्स, होम डेकोर, हस्तशिल्प और चुनिंदा मशीनरी जैसे क्षेत्रों को अमेरिकी बाजार में बड़े अवसर देगा। इसके अलावा जेनेरिक दवाओं, रत्न-हीरे और एयरक्राफ्ट पार्ट्स सहित कई उत्पादों के निर्यात को गति मिलेगी।
विशेष रूप से एमएसएमई, किसानों और मछुआरों के लिए 30 ट्रिलियन डालर के अमेरिकी बाजार के द्वार खुलेंगे। निर्यात बढ़ने से महिलाओं और युवाओं के लिए रोजगार बढ़ेगे। इस समझौते के तहत भारत अमेरिकी औद्योगिक और कृषि उत्पादों की बड़ी शृंखला पर टैरिफ घटाएगा या समाप्त करेगा तथा अगले पांच वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डालर के ऊर्जा उत्पाद, एयरक्राफ्ट एवं पार्ट्स, कीमती धातुएं, टेक्नोलाजी उत्पाद और कोकिंग कोल खरीदने की दिशा में आगे बढ़ेगा।
अमेरिका भारत के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण बाजार है। वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच 131.84 अरब डालर का व्यापार हुआ, जिसमें भारत का निर्यात 86.51 अरब डालर और आयात 45.33 अरब डालर रहा। वित्त वर्ष 2025-26 में अप्रैल से दिसंबर के बीच भारत ने अमेरिका को 65.88 अरब डालर का निर्यात किया। 18 प्रतिशत टैरिफ भारत को चीन-प्लस-वन रणनीति के स्वाभाविक विकल्प के रूप में और मजबूत करता है। वर्तमान में अमेरिका ने ब्राजील पर 50 प्रतिशत, चीन पर 34 प्रतिशत, वियतनाम और बांग्लादेश पर 20 प्रतिशत तथा मलेशिया, इंडोनेशिया, पाकिस्तान और थाइलैंड पर 19 प्रतिशत टैरिफ लगाया हुआ है। ऐसे में भारत-अमेरिका समझौता वैश्विक बाजार में भारत की स्थिति को और मजबूत करेगा।
पिछले दिनों हुआ भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता दुनिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच तालमेल का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इससे दो अरब लोगों का साझा बाजार बनेगा, जो वैश्विक जीडीपी के लगभग एक चौथाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करेगा। बीते वर्ष ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ हुए एफटीए का इस साल कार्यान्वयन महत्वपूर्ण होगा। साथ ही मारीशस, यूएई, आस्ट्रेलिया और यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (आइसलैंड, स्विट्जरलैंड, नार्वे और लिकटेंस्टाइन) के साथ लागू एफटीए के लाभ भी बढ़ेंगे। इस वर्ष पेरू, चिली, आसियान, मेक्सिको, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, इजरायल और गल्फ कंट्रीज काउंसिल सहित अन्य देशों के साथ नए एफटीए हो सकते हैं।
इन समझौतों का पूरा लाभ उठाने के लिए भारत को आर्थिक सुधारों और घरेलू ढांचागत बदलावों की गति बढ़ानी होगी। नियमों और नियामक संस्थाओं के कामकाज में सुधार, कर सुधारों को गहराई देना और जीएसटी को अधिक प्रभावी बनाना आवश्यक है। घरेलू कंपनियों को गुणवत्ता, तकनीक और कुशल मानव संसाधन पर ध्यान देना होगा। साथ ही प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने, गैर-टैरिफ बाधाएं कम करने, सेवा क्षेत्र का लाभ उठाने, निर्यात विविधीकरण, कृषि सुरक्षा तथा पर्यावरण और श्रम मानकों के पालन पर विशेष ध्यान देना होगा।
उम्मीद है भारत-अमेरिका शीघ्र ही व्यापक द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) की दिशा में आगे बढ़ेंगे। इससे 2030 तक दोनों के बीच 500 अरब डालर के द्विपक्षीय व्यापार लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी। यह समझौता भारत के निर्यात और रोजगार सृजन में मील का पत्थर साबित हो सकता है तथा भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
Date: 09-02-26
व्यापार समझौते के बाद
संपादकीय
भारत और अमेरिका द्वारा जारी किया गया संयुक्त बयान जिसमें एक अंतरिम व्यापार समझौते की रूपरेखा पेश की गई है, वह दोनों देशों के बीच संबंधों में महत्त्वपूर्ण नरमी का संकेत हो सकता है। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि इसे कितनी तेजी से लागू किया जाएगा, लेकिन उम्मीद है कि उन निर्यातकों को कुछ राहत मिलेगी जो अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा कुछ महीने पहले लागू किए गए 50 फीसदी के शुल्क से प्रभावित हो रहे थे।
रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर लगाए गए 25 फीसदी के अतिरिक्त शुल्क के बारे में बयान में स्पष्ट जिक्र नहीं किया गया है लेकिन माना यही जा रहा है कि इसे समाप्त कर दिया जाएगा। ट्रंप ने अपनी एक पोस्ट में दावा किया था कि भारत ने ‘रूस से तेल खरीदना बंद करने तथा अमेरिका और संभावित तौर पर वेनेजुएला से अधिक तेल खरीदने पर सहमति जताई है।’
शेष 25 फीसदी शुल्क को अब घटाकर 18 फीसदी कर दिया जाएगा। यह दर एशिया की कई अन्य अर्थव्यवस्थाओं के साथ प्रतिस्पर्धी है। इसके अलावा भारत ने यह सुनिश्चित किया है कृषि उत्पादों का एक खास हिस्सा सुरक्षित रहे। अमेरिका की कुछ कृषि जिंस मसलन फल, सोयाबीन तेल, नट्स आदि को भारतीय बाजारों में भेजने की इजाजत होगी। परंतु अहम घरेलू उत्पाद जिनमें चावल, गेहूं, पोल्ट्री और डेरी आदि शामिल हैं, वे सुरक्षित रहेंगे।
अहम औद्योगिक वस्तुओं पर लगने वाले शुल्कों में भारी कमी की जा रही है हालांकि यह देखना होगा कि किन चीजों पर शून्य शुल्क लगेगा और दूसरी वस्तुओं के लिए क्या रास्ता होगा। चाहे जो भी हो, यह भारतीय उपभोक्ताओं के लिए एक जीत है क्योंकि हाल ही में कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को यूरोपीय संघ और अमेरिका दोनों से व्यापार के लिए मुक्त कर दिया गया है। भारत ने अमेरिका से 500 अरब डॉलर मूल्य के सामान खरीदने का वादा भी किया है। बोइंग से विमान खरीदने की बड़ी प्रतिबद्धताएं इसका एक उचित हिस्सा होंगी।
यदि जीवाश्म ईंधनों की बढ़ी हुई खरीद वास्तव में होती है, तो वह भी मददगार होगी। ऑस्ट्रेलिया से कोकिंग कोयले के आयात की जगह लंबे समय से विविध स्रोतों से हासिल करने की कोशिश रही है, और अमेरिका एक संभावित विकल्प है। यदि हाल ही में केंद्रीय बजट में घोषित कर राहत से कुछ हद तक प्रोत्साहित होकर डेटा केंद्रों में बड़े निवेश साकार होते हैं तो ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स (जीपीयू) की खेपें, जो ऐसी स्थापनाओं की रीढ़ हैं, इस 500 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता का एक बड़ा हिस्सा बन सकती हैं।
पिछले कुछ सप्ताह भारत के लिए एक बड़े बदलाव का संकेत लेकर आए हैं। भारत 2014 से ही नए व्यापार समझौते को लेकर संकोच करता रहा है। पहले के मुक्त व्यापार समझौते राजनीतिक नाराजगी का शिकार हो गए क्योंकि भारत में कुछ लोगों का मानना था कि निर्यातकों को उनसे पर्याप्त लाभ नहीं मिला। यह सुनिश्चित करने के लिए कि इस बार स्थिति अलग हो, सरकार को आंतरिक सुधारों की गति तेज करनी होगी। इसका कुछ हिस्सा संयुक्त बयान के नियामक समन्वय वाले खंड में निहित है। लेकिन इससे अतिरिक्त कुछ करने की आवश्यकता होगी। विशेषकर बुनियादी कारक बाजार सुधारों के क्षेत्र में कुछ करने की आवश्यकता होगी।
सरकार को इस मानसिकता से भी बाहर निकलना होगा कि केवल बाजार तक पहुंच ही निर्यात वृद्धि का कारण बनेगी। यह अत्यंत आवश्यक है कि नए तंत्र बनाए जाएं जो छोटे और मध्यम उद्यमों को नई संभावनाओं को सही ढंग से समझने और उनका लाभ उठाने में सक्षम बनाएं, साथ ही इन निर्यात बाजारों में अपरिचित नियमों को भी समझने में मदद करें। लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना होगा और बिजली क्षेत्र में सुधारों को गहराई तक ले जाना होगा।
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि आधुनिक आपूर्ति श्रृंखलाएं केवल एक दिशा में काम नहीं करतीं। एशिया के अन्य हिस्सों से कच्चे माल को सस्ते और भरोसेमंद तरीके से उपलब्ध कराना होगा ताकि पश्चिम के लिए निर्यात बढ़ सके। व्यापक और प्रगतिशील प्रशांत पार समझौते जैसे व्यापार समझौतों में प्रवेश पर नए सिरे से विचार करना होगा।
सहयोग के मोर्चे
संपादकीय
पिछले करीब एक वर्ष से गहन विचार-विमर्श के बाद भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते पर आखिरकार द्विपक्षीय सहमति बन गई है। दोनों देशों की ओर से शनिवार को इसका एलान किया गया। समझौते के नियम शर्तों के तहत अमेरिका, भारतीय वस्तुओं पर शुल्क को घटाकर अठारह फीसद करेगा। वहीं, भारत की ओर से अमेरिका की सभी औद्योगिक वस्तुओं और खाद्य एवं कृषि उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला पर आयात शुल्क समाप्त या कम किया जाएगा। निश्चित रूप से यह समझीता दोनों देशों के लिए फायदेमंद होगा, लेकिन नफा-नुकसान का पलड़ा किस ओर भारी रहेगा, इसको लेकर अलग-अलग विश्लेषण सामने आए हैं। ऐसे में कुछ आशंकाएं और सवाल भी उठ रहे हैं कि इस समझौते को आकार देने में अड़चन कहां थी और अब ऐसा क्या हुआ कि दोनों पक्ष इसके लिए राजी हो गए। हालांकि, इस मामले में भारतीय सत्तापक्ष की ओर से स्थिति स्पष्ट करने की कोशिश की गई है, लेकिन विपक्ष इससे सहमत नहीं है।
भारत और अमेरिका ने पिछले वर्ष फरवरी में प्रस्तावित व्यापार समझौते पर पहले चरण की बातचीत शुरू की थी। कई दौर की वार्ता के बाद भी दोनों पक्षों के बीच कुछ मसलों पर आम सहमति नहीं बन पाई, जिनमें भारतीय कृषि और डेयरी बाजार में अमेरिका की पहुंच को विस्तार देने का मुच भी शामिल था। दरअसल अमेरिका शुरू से वह मांग करता रहा है कि भारतीय कृषि एवं ठेवरी बाजार को उसके लिए पूरी तरह खोल दिया जाए। जबकि भारत इस मांग को खारिज करता रहा है। अब इस समझौते की जिस रूपरेखा पर सहमति बनी है उसके मुताबिक अमेरिकी खाद्य एवं कृषि उत्पादों पर भारत आयात शुल्क समाप्त या कम करेगा। इससे प्रथम दृष्ट्या वही प्रतीत होता है कि भारत ने इस मसले पर उदार रुख अपनाकर अपने कदम आगे बढ़ाए हैं। माना जा रहा है कि समझौते के लागू होने से भारतीय बाजार में अमेरिका के कृषि उत्पादों की आवक बढ़ेगी, जिसका असर देश के किसानों पर पढ़ सकता है। हालांकि सरकार का दावा है कि देश के किसानों के हित पूरी तरह सुरक्षित हैं और इस समझौते से उन्हें भी लाभ होगा।
व्यापार समझौते की शर्तों में यह बात भी शामिल है कि भारत अगले पांच वर्ष में 500 अरब डालर के अमेरिकी ऊर्जा उत्पाद, विमान एवं उसके कलपूर्जे कीमती धातु, प्रौद्योगिकी उत्पाद और कोयला खरीदेगा साथ ही रूप से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से तेल खरीद बंद करनी होगी। वानी समझौते का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत इन शर्तों को पूरा कर पाता है या नहीं इसमें दोराय नहीं कि भारतीय वस्तुओं का निर्यात, जो अमेरिकी शुल्क की वजह से प्रभावित हुआ था, वह फिर से पटरी लौट आएगा। सरकार का कहना है कि इससे तीस हजार अरब अमेरिकी डालर का बाजार खुलेगा, जो भारतीय निर्यात को नई दिशा देगा। सवाल है कि क्या अमेरिका से आयात और निर्यात के बीच संतुलन का ध्यान रखा गया है? विपक्ष का आरोप है कि इस समझौते से भारत के मुकाबले अमेरिका को ज्यादा फायदा होगा। वहीं सत्तापक्ष की दलील है कि अमेरिका के कुछ कृषि उत्पादों को कोटा-आधारित शुल्क रिवायत दी जाएगी, जिसका भारतीय किसानों की आजीविका पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बहरहाल समझौते के नफा-नुकसान का वास्तविक आकलन तभी हो पाएगा, जब कुछ दिनों में द्विपक्षीय कारोबार के आंकड़े सामने आएंगे।
Date: 09-02-26
अच्छे समझौते की ओर
संपादकीय
एक लंबी और तल्ख कवायद के बाद भारत और अमेरिका ने अंतरिम व्यापार समझौते का खाका आधिकारिक रूप से संयुक्त बयान में पेश कर दिया है। यह एक उम्मीद भरी पहल है, जिसे अंतिम मुकाम पर पहुंचाने के लिए भारत को बहुत सतर्कता के साथ कदम बढ़ाने होंगे। फिलहाल समझौते का जो प्रारूप सामने आया है, वह तलवार की धार की तरह है, जिस पर अगर संतुलन साधकर न चला गया, तो नुकसान हो सकता है। व्यावहारिक रूप से देखें, तो अनेक उद्योग क्षेत्रों में खुशी है, मगर कृषि और डेयरी जैसे क्षेत्रों में चिंता का आलम है। बहरहाल, यह स्पष्ट है कि भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी शुल्क 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत हो गया है। साझा बयान के मुताबिक, दोनों देश चुनिंदा उत्पादों पर शून्य शुल्क, बाजार खोलने के उपाय और समग्र रूप से गहरे आर्थिक संबंधों के लिए प्रतिबद्ध हैं। भारत ने अगले पांच वर्षों में 500 अरब डॉलर के अमेरिकी सामान खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है, तो यह खरीद इस तरह होनी चाहिए कि भारत को भी लाभ हो । अंतरिम समझौते को अंतिम न माना जाए और भारतीय वातांकार आगे की व्यापार वार्ता में बहुत सतर्कता से भारतीय हितों का संरक्षण कर सकें, ऐसी उम्मीद हर भारतीय को होगी।
कोई दोराय नहीं कि इस समझौते से भारत के भविष्य पर असर पड़ेगा | इतिहास में लिखा जाएगा कि जो समझौता भारत ने किया, उससे देश के किसानों, दुग्ध उत्पादकों को क्या लाभ हुआ? यह भूलना नहीं चाहिए कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और हमारा व्यावसायिक ढांचा अमेरिका जैसा नहीं है। हमारी एक बड़ी आबादी गांवों में रहती है, जो अपनी जीविका के लिए कृषि और डेयरी पर निर्भर है। भारत सरकार के लिए असली चुनौती इन्हीं दो क्षेत्रों में होगी और सरकार के आलोचकों की निगाह भी इन्हीं दो क्षेत्रों पर टिकी रहेगी। यही वे दो क्षेत्र हैं, जिनकी वजह से भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौता हो नहीं पा रहा था और अमेरिका ने भारी टैरिफ भारत पर लाद रखा था। खैर, अन्य अनेक उद्योग हैं, जहां उद्यमी नियतक राहत की सांस ले रहे हैं। श्रम-प्रधान कई क्षेत्रों वस्त्र और परिधान, चमड़ा और जूते, प्लास्टिक और रबर पर लगने वाले कुल 50 प्रतिशत टैरिफ में 32 प्रतिशत अंकों की कमी आई है। मतलब, भारतीय निर्यातक फिर अन्य देशों से प्रतिस्पद्धों की स्थिति में आ गए हैं, इससे भारतीय निर्यात में निश्चित ही बढ़त दर्ज की जाएगी।
चिंताओं से परे अगर देखें, तो अनुमान है कि भारत के लगभग 44 अरब डॉलर के उत्पाद निर्यात को अमेरिकी बाजार में शून्य शुल्क की सुविधा मिलेगी। आश्चर्य नहीं, भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल इसे एक ऐतिहासिक व्यापार ढांचा और बेहद निष्पक्ष, न्यायसंगत व संतुलित समझौता बता रहे हैं। हालांकि, यह आश्वस्त भाव से नहीं कहा जा सकता कि भारत को इस समझौते से केवल लाभ ही होगा। यदि हम सावधान नहीं रहे, तो अमेरिकी निवांतक हमें सिर्फ बाजार बना देंगे । भारत के लिए आगे की राह आसान नहीं है, क्योंकि यह समझौता करते हुए शायद हम रूस से कुछ दूर जाते लग रहे हैं। रूस के साथ हमारा संतुलन बना रहे, यह बहुत जरूरी है, हालांकि इसके लिए रूस को भी हमारे प्रति ज्यादा संवेदनशील होना पड़ेगा। उसे ध्यान रखना होगा कि रूसी तेल की आयात की वजह से हमने 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ का जुर्माना भी झेला है। हमारी कूटनीतिक और रणनीतिक मजबूती ही संतुलित व न्यायसंगत व्यापार समझौतों को साकार करेगी।
Date: 09-02-26
खेतिहर मजदूरों की संख्या क्यों बढ़ी
हिमांशु, ( एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू )

राष्ट्रीय आंकड़ों के मुताबिक, देश में अगर कोई एक क्षेत्र ऐसा है, जिसने हालिया वर्षों में अच्छा प्रदर्शन किया है, तो वह कृषि है। आर्थिक सर्वेक्षण में इस बात की पुष्टि की गई है। पिछले पांच वर्षों में पूरे कृषि क्षेत्र में सालाना 4.4 प्रतिशत और बीते 10 सालों में 3.9 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। ये आंकड़े भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाले कृषि क्षेत्र के लिए काफी प्रभावशाली हैं। कृषि क्षेत्र का यह प्रदर्शन पहले के प्रदर्शन से बेहतर हैं।
दूसरी तरफ, जमीनी स्तर से प्राप्त आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि कमाई के मामले में कृषि क्षेत्र अपने सबसे लंबे और गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। खेती-किसानी के क्षेत्र में यह विरोधाभास इसलिए है कि आकलन का एक हिस्सा डाटा इकट्ठा करने और उसे उपलब्ध कराने के तरीके पर आधारित होता है, जबकि विकास दर आमतौर पर कृषि और उससे जुड़े सभी क्षेत्रों को मिलाकर तय की जाती है। इसीलिए कृषि आय और उससे जुड़े रोजगार में विकास दर जैसी तेजी नहीं दिखाई देती है।
कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों में फसल उत्पादन, पशुपालन, वानिकी, लकड़ी काटना, मछली पालन जैसी गतिविधियां शामिल हैं। इनमें से फसल उत्पादन का हिस्सा 54 प्रतिशत, पशुपालन का 30 प्रतिशत, वानिकी का आठ प्रतिशत और बाकी मछली पालन का है। कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में जो विकास हुआ है, उसका एक बड़ा हिस्सा पशुपालन की वजह से आया है, जो सालाना सात प्रतिशत से भी ज्यादा की दर से बढ़ा है। पिछले दशक में मछली पालन आठ प्रतिशत से ज्यादा की दर से बढ़ा।
दूसरी ओर, कृषि कर्म के सबसे बड़े उप-क्षेत्र में सालाना दो प्रतिशत की वृद्धि ही देखी गई है। इनमें अनाज, तिलहन, दलहन, कपास और गन्ना जैसी मुख्य फसलों के साथ ही फल, सब्जियां व बागवानी शामिल हैं। पशुपालन के साथ यह खेतिहर मजदूरों को सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र भी रहा है। विडंबना यह है कि फसल उगाने वाले कृषि क्षेत्र में साल 2004 से 2014 के बीच सालाना 3.3 प्रतिशत की दर से विकास हुआ था, लेकिन इसके आगे के दशक में उसकी विकास दर वानिकी और पशुपालन से बहुत पीछे रह गई है।
हालांकि, पशुपालन, मछली पालन और वानिकी के बारे में जो बुनियादी आंकड़े फसलों की तुलना में कमजोर रहे हैं, मगर पिछले दशक में इन क्षेत्रों में सात प्रतिशत से ज्यादा की सालाना विकास दर बताई जा रही है, जो कुछ संदिग्ध लगता है। पिछले रुझानों से पता चलता है कि पशुपालन में विकास फसली खेती के बराबर या उससे थोड़ा ज्यादा हुआ था। इसका मूल कारण यह है कि हमारे देश में ज्यादातर किसान खेती के साथ-साथ मवेशी भी पालते हैं। यद्यपि राष्ट्रीय स्तर पर जारी आंकड़े बताते हैं कि पशुपालन में फसली खेती से कहीं तेज विकास हो रहा है, लेकिन स्थिति आकलन सर्वेक्षण, यानी एसएएस के आंकड़ों को देखें, तो उसमें पशुपालन में वृद्धि की रफ्तार कम दिखाई देती है। यही नहीं, ज्यादातर किसानों के मुख्य पेशे में शामिल फसली खेती में राष्ट्रीय स्तर पर अन्य क्षेत्रों की तुलना में विकास दर सुस्त है। भारतीय परिवार सर्वेक्षण के अप्रत्यक्ष आकलनों में भी इसी तरह की कमजोर विकास दर दिखती है।
खेती-किसानी से होने वाली आमदनी में कमी का ही परिणाम है कि किसान परिवारों के सदस्यों को मजदूरी करनी पड़ती है, लेकिन पिछले दशक में मजदूरी दर के लगभग स्थिर रहने के कारण मजदूरी भी उनकी आय बढ़ाने में अपर्याप्त साबित हुई है। नीति आयोग द्वारा निर्देशित राष्ट्रीय स्तर के अप्रत्यक्ष आय आकलन के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2023-24 के बीच किसानों की आय में सालाना 0.62 प्रतिशत की गिरावट आई है।
ये आंकड़े न केवल किसानों की आय दोगुनी करने के दावों के विपरीत हैं, बल्कि इससे कमाई और मुनाफे की दर में गिरावट का भी सहज अंदाजा हो जाता है। इसको इस तरह से समझा जा सकता है कि साल 2004-05 से 2011-12 के बीच किसानों की आय में प्रतिवर्ष 7.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी, लेकिन वित्तीय वर्ष 2004-05 से 2014-15 के पूरे दशक के आधार पर गणना करने पर किसानों की आय में वृद्धि छह प्रतिशत ही रही । मतलब साफ है कि बाद के तीन वर्षों में कृषि आय में भारी गिरावट आई।
खेती-किसानी से होने वाली कमाई में गिरावट ऐसे समय में हो रही है, जब इस पर आश्रितों की संख्या बढ़ रही है। गौर कीजिए, पिछले छह सालों में लगभग 6.6 करोड़ खेतिहर मजदूर बढ़े हैं। साल 2004-05 से 2017-18 के बीच उनकी संख्या में जो गिरावट आई थी, वह फिर से बराबर हो गई है। ऐसा इसलिए नहीं हुआ है कि खेती में बेहतर मजदूरी मिल रही है, बल्कि गैर कृषि क्षेत्र के संकट में होने के कारण मजदूर वहां से पलायन करके फिर खेती की ओर भाग रहे हैं। गैर- कृषि क्षेत्र के उद्योग-कारोबार रोजगार देने में नाकाम रहे हैं। मजदूरों का वापस खेती की ओर लौटना इस बात का सबूत है कि हम जिस संकट का सामना कर रहे हैं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था में वह बहुत गंभीर है। यह सब तब हो रहा है, जब हमारे किसान पैदावार बढ़ाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। इसलिए इस गिरावट के लिए कृषि संबंधी नीतिगत उदासीनता को जिम्मेदार माना जा सकता है।
देखा जाए, हाल के वर्षों में खेती में सरकारी निवेश कम हुआ है। सरकार की ओर से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) देने की व्यवस्था भी फसलों कीमतों को थामे रखने में मददगार नहीं साबित हो पा रही है। इस साल तो ज्यादातर फसलों की कीमतों में गिरावट खेत से उठाव के स्तर पर ही आई है। खाने- पीने की चीजों में महंगाई कम हुई है, तो किसानों को मिलने वाली कीमतें भी कम हो गई हैं।
साफ है, कृषि को फिर से जिंदा करने की जरूरत सिर्फ इसलिए नहीं है कि इसमें देश के श्रमबल का आधा हिस्सा लगा हुआ है, बल्कि खेती में सुधार से ही हमारी अर्थव्यवस्था में दीर्घकालिक सुधार लाने में मदद मिलेगी। निजी निवेश में तेजी नहीं आ रही, इसलिए अर्थव्यवस्था में विकास की गति को बनाए रखने के लिए हमें घरेलू मांग बढ़ाने की जरूरत है।