07-02-2026 (Important News Clippings)

Afeias
07 Feb 2026
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Date: 07-02-26

Arresting Thought

SC tells cops to think before acting – good advice

TOI Editorials

Supreme Court has once again read police the arrest act. Ask, it said in as many words, why arrest before making the arrest: “The police officer shall ask himself the question as to whether an arrest is a necessity or not, before undertaking said exercise.” It should be obvious, right? Just because the law allows police powers of arrest in no way means random arrests can be made on vague pretexts such as for questioning. Police powers of arrest, SC said, are: “mere statutory discretion”, “not a matter of routine…but an exception”, “shall not be undertaken unless absolutely warranted”, “power of arrest…to be exercised rather sparingly.”

Do police not know this? They do. Do police procedure trainings not stay updated? Maybe. Do cops misinterpret their powers as laid down in law? Unlikely. Then why have unwarranted arrests, even if law allows for it, as a widely practised norm? The more probable answer is institutional culture. Police make unnecessary arrests because the culture across police forces has become to punish, making process the punishment, riding roughshod over both constitutional rights of those facing arrest and with zero sensibilities to how damaging an arrest can be.

The ruling builds on an earlier order from Nov 2025, when SC held, in a case where appellants argued they weren’t informed of grounds of arrest in writing, that regardless which law is in application, it is constitutional mandate to inform “arrestee of the grounds of arrest” in writing and in a language. SC made this mandatory in all offences under all statutes. The arrest would be rendered “illegal” if there was non-compliance, and the person would be set free. Now, SC is telling cops to first justify in their own mind if an arrest is at all necessitated. Are cops listening?


Date: 07-02-26

Protect personality by ensuring consent

AI-generated or real, consumers must know

ET Editorials

In this age of deepfake and AI-engineered doppelgangering, there’s a beeline to courts for personality protection. Hardly a week goes by without a public figure securing a legal shield against his or her name, face, and voice against commercial exploitation. This week, Delhi High Court agreed to pass orders protecting actor Vivek Oberoi’s personality rights by restraining entities from using his name, image and identity without his consent. It comes a year after Scarlett Johansson made news, warning about the ‘misuse of AI’ after a deepfake video purported to show her sending a message of protest that she hadn’t sent.

AI-enabled ‘deep mimicry’ isn’t a horrible tool by itself. The tech can, indeed, be used to endorse something without the endorsers having to be physically ‘there’. For endorsers, too, this can open up two revenue streams: a higher one in which they ‘really’ are there to endorse a product; a lower one by which they ‘send’ their lookalike/soundalike emissary in the form of a copy. Today, it’s deepfake – yesterday’s stand-in. Tomorrow, it can be a sophisticated hologram marking the celebrity’s ‘presence’ at an event without him or her being there.

The issue really boils down to consent – with consumers of the creative/creation being aware of the difference between, say, SRK endorsing a brand, and an ‘AI SRK’ doing the same. The right to publicity is an evolving area of law, and standards vary across countries where claims can arise. The age of communication requires a special framework to address the issue, especially when content is being synthesised by AI. Specific laws that juxtapose privacy and publicity may become inevitable at some point. Common law will have to yield to civil law on the matter for the sake of harmonisation. Allowing judges to hand down protection to the personality of individual celebrities may not be the most efficient way of going about it. Public opinion may have to be sought to delineate personality. That will provide a basis for universal protection, instead of individual cases.


Date: 07-02-26

नई ट्रेड डील्स के बाद अब हमारे सामने बड़े अवसर हैं

संपादकीय

मात्र कुछ घंटों के अंतराल में ईयू और यूएस से नए ट्रेड-संबंध भारत को मैन्युफैक्चरिंग ही नहीं, बौद्धिक क्षमता और सामरिक सामर्थ्य के क्षेत्र भी असाधारण आयाम देने वाले हैं। साथ ही भारत जरूरत से ज्यादा पैदा होने वाले अपने गेहूं, चावल और चीनी को इन दोनों ट्रेड ब्लॉक्स को निर्यात कर सकता है। हां, मैन्युफैक्चरिंग में वही उत्साह दिखाना होगा, जो चीन ने 1990-2020 तक के तीन दशकों में दिखाया था। उधर आईटी (सेवा और मैन्युफैक्चरिंग) के क्षेत्र में भी तमाम यूरोपीय व अमेरिकी कंपनियां भारत में दिलचस्पी लेने लगी हैं क्योंकि युवा इंजीनियर्स का बड़ा वर्ग उद्योग सक्षम है और अपेक्षाकृत कम वेतन पर उपलब्ध है। लेकिन सेमी-कंडक्टर निर्माण के लिए बिजली और पानी की असाधारण जरूरत पूरी करनी होगी। इसके लिए एसएमआर (स्माल मॉड्यूलर रिएक्टर्स) लगाने के लिए कानून लाना अच्छी पहल है। यूएस से डील के बाद ऐसे रिएक्टर्स की जरूरत पूरी हो सकती है। सामरिक क्षेत्र में भी रूस के अलावा फ्रांस और जर्मनी नई हथियार प्रणाली (लड़ाकू विमान और पनडुब्बियों के रूप में) दे सकते हैं और वह भी भारत के टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के वादे के साथ। अगर रूस से तेल आयात कम भी करें तो हमारे रक्षा कवच निर्माण में उस देश की क्षमता अतुलनीय है। ऐसे अवसर किसी देश के विकास के इतिहास में कम ही आते हैं, जैसे आज हमारे समक्ष हैं।


Date: 07-02-26

वॉट्सएप की डेटा चोरी पर हम कब सख्त रवैया अपनाएंगे?

विराग गुप्ता, ( सुप्रीम कोर्ट के वकील )

सीजेआई सूर्यकांत ने वॉट्सएप को फटकार लगाते हुए कहा है कि डेटा चोरी से ग्राहकों को टारगेट करके विज्ञापन भेजे जा रहे हैं। तीन जजों की पीठ ने कहा कि लोगों के निजी डेटा के व्यावसायिक इस्तेमाल को रोकने का जब तक हलफनामा नहीं मिलेगा, तब तक वॉट्सएप की अपील पर सुनवाई नहीं होगी। वॉट्सएप मामले पर सुनवाई और फैसला डिजिटल भारत की तकदीर और तस्वीर दोनों बदल सकता है। इससे जुड़े 6 पहलुओं को समझना हमारे लिए जरूरी है।

1. भारत में मेटा की तीन कंपनियों फेसबुक के 58 करोड़, इंस्टाग्राम के 48 करोड़ और वॉट्सएप के लगभग 85 करोड़ ग्राहक हैं। देश में 92% कारोबारी और 89% स्मार्टफोन यूजर्स वॉट्सएप्प का इस्तेमाल कर रहे हैं। 2016 के बाद मेटा की तीनों कंपनियां करोड़ों ग्राहकों के डेटा को परस्पर साझा करने के साथ व्यावसायिक इस्तेमाल से खासा मुनाफा कमा रही हैं। भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) ने 2021-22 में दिल्ली हाईकोर्ट में हलफनामा दिया था कि वॉट्सएप मामले पर सुनवाई कॉम्पीटिशन कानून के अनुसार हो रही है, जिसका संविधान के अनुच्छेद 21 और निजता के अधिकार से कोई वास्ता नहीं है।

2. सीसीआई और केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि निःशुल्क सेवा देने वाले वॉट्सएप की कमाई विज्ञापन से होती है और यूजर्स ही उनका प्रोडक्ट हैं। अमेरिका में दायर क्लास एक्शन स्यूट मुकदमे के अनुसार वॉट्सएप में चैट और डेटा सुरक्षित नहीं होने की वजह से टारगेटेड विज्ञापन आते हैं। भारत का डेटा विदेश ले जाने की वजह से पब्जी और टिकटॉक जैसे कई चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगा था। अमेरिकी टेक कंपनियां हमारे डेटा को खुलेआम देश-विदेश में बेच रही हैं, उसके बावजूद केंद्र सरकार संसद से 2023 में पारित डेटा सुरक्षा कानून को लागू नहीं कर रही।

3. मेटा ने 2025 में दुनिया में 200 अरब डॉलर की आमदनी की थी। इसमें से लगभग 196 अरब डॉलर की आमदनी सिर्फ विज्ञापन से थी। मेटा की प्रति ग्राहक औसत आमदनी 57 डॉलर है। यूजर्स की संख्या के अनुसार वॉट्सएप को भारत से लगभग चार लाख करोड़ रु. की आमदनी होती है। लेकिन दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजार भारत में मेटा इंडिया ने पिछले साल सिर्फ 3792 करोड़ की आमदनी दिखाई। भारत में लगभग 44 लाख करोड़ की आमदनी टैक्स से होती है, जो जीडीपी की 11.2% है। जबकि विकसित देशों के संगठन ओईसीडी में जीडीपी का 34% टैक्स आमदनी से आता है। मेटा से डेटा कारोबार पर जीएसटी और अन्य टैक्सों की वसूली हो तो बजट घाटा कम होने के साथ स्वदेशी अर्थव्यवस्था का विकास होगा।

4. बेशुमार डेटा के दम पर मेटा व्यापार, डिजिटल विज्ञापन, यूपीआई, पेमेंट बैंकिंग और एआई के क्षेत्र में भी वर्चस्व स्थापित कर रही है। वॉट्सएप से 60 फीसदी से ज्यादा फ्री वॉइस कॉल की वजह से टेलीकॉम कंपनियों की माली हालत बिगड़ रही है। वॉट्सएप कॉल में केवाईसी नहीं होने से साइबर अपराध बढ़ रहे हैं। लेकिन मोबाइल कंपनियों की अनेक मांगों और संसदीय समिति की रिपोर्ट के बावजूद वॉट्सएप को टेलीकॉम कानून 2023 के दायरे में नहीं लाया गया।

5. मेटा की कंपनियों पर यूरोप में जीडीआर के सख्त डेटा सुरक्षा कानून के उल्लंघन पर 12000 करोड़, डिजिटल मार्केटिंग एक्ट के उल्लंघन पर 2000 करोड़ और नाबालिग बच्चों के डेटा के गलत इस्तेमाल पर 4000 करोड़ रु. का जुर्मानालगा था। अमेरिका में फेडरल ट्रेड कमीशन ने कैम्ब्रिज मामले में 2019 में मेटा पर 5 अरब डॉलर यानी 50 हजार करोड़ का जुर्माना लगाया था लेकिन भारत में सीसीआई ने मेटा पर 213 करोड़ का मामूली जुर्माना लगाया, जिसे वापस हासिल करने पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है।

6. जजों ने कहा है कि नियमों का पालन नहीं करने पर वॉट्सएप को भारत से चले जाना चाहिए। लेकिन मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भरता के दावों के बावजूद जनता, कारोबार, अदालतें और सरकार पूरी तरह से वॉट्सएप पर निर्भर हैं। डेटा चोरी रोकने और कारोबार पर पूरा टैक्स वसूलने के लिए सुप्रीम कोर्ट से सख्त आदेश पारित हों तो संविधान के शासन की शान बढ़ने के साथ साइबर अपराधों में भारी कमी आएगी।


Date: 07-02-26

जवाबदेही के दायरे में आएं टेक कंपनियां, बेरहम है डिजिटल दुनिया

राजीव शुक्ला, ( लेखक कांग्रेस के सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं )

सुबह की पहली किरण के साथ जब हम अपने स्मार्टफोन का स्क्रीन अनलॉक करते हैं, तो हम केवल एक उपकरण नहीं खोलते, बल्कि एक ऐसी दुनिया में प्रवेश करते हैं, जो कभी सोती नहीं है। यह डिजिटल दुनिया जितनी चमकदार है, उतनी ही बेरहम भी। आज हमारे जीवन का एक बड़ा हिस्सा डिजिटल मीडिया के गलियारों में बीत रहा है। हमारी पहचान, रिश्ते और समाज में प्रतिष्ठा अब हमारे पदचिह्नों यानी डिजिटल फुटप्रिंट्स से तय होती है, पर समस्या तब शुरू होती है जब ये पदचिह्न हमारी वर्तमान पहचान के लिए बोझ बन जाते हैं। कल्पना कीजिए एक ऐसे युवक की, जिस पर दस साल पहले एक छोटा आरोप लगा था। अदालत ने उसे ससम्मान बरी कर दिया, लेकिन आज जब कोई कंपनी उसे नौकरी देने के लिए उसका नाम गूगल करती है, तो सबसे ऊपर वही पुरानी गिरफ्तारी की खबर चमकती है। यही वह बिंदु है जहां राइट टू बी फॉरगाटेन यानी भुला दिए जाने का अधिकार विलासिता नहीं, बल्कि जीने के अधिकार का हिस्सा बन जाता है।

डिजिटल मीडिया का दुरुपयोग आज एक महामारी की तरह फैल चुका है। फेक न्यूज, ट्रोलिंग और साइबरबुलिंग ने वर्चुअल स्पेस को एक युद्ध का मैदान बना दिया है। सबसे भयावह रूप तब सामने आता है, जब किसी की निजी जानकारी या तस्वीरें उसकी मर्जी के बिना सार्वजनिक कर दी जाती हैं। इसे डॉक्सिंग कहा जाता है। यह केवल तकनीक का गलत इस्तेमाल नहीं है, बल्कि यह एक इंसान की गरिमा पर सीधा हमला है। जब कोई अपमानजनक सामग्री एक बार वायरल हो जाती है, तो उसे पूरी तरह मिटाना लगभग असंभव हो जाता है। डिजिटल दुनिया में कुछ भी स्थायी रूप से मरता नहीं है, वह बस दबा रहता है और समय-समय पर बाहर आता रहता है।

यहीं पर राइट टू बी फॉरगाटेन की अवधारणा उम्मीद की किरण है। व्यक्ति को यह अधिकार होना चाहिए कि वह अपने पुराने, अप्रासंगिक या गलत डिजिटल रिकॉर्ड्स को हटवा सके। यूरोपीय संघ का एक कानून इस मामले में एक मिसाल है। वहां के एक चर्चित मामले में यह तय हुआ कि अगर कोई जानकारी अब जरूरी नहीं है, तो उसे सर्च रिजल्ट्स से हटाना होगा। भारत में भी इस अधिकार की सुगबुगाहट तेज हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने पुट्टास्वामी केस में निजता को मौलिक अधिकार तो माना, लेकिन राइट टू बी फॉरगाटेन अभी भी एक कानूनी धुंध में फंसा हुआ है। दिल्ली हाई कोर्ट ने हाल में माना कि एक व्यक्ति को अपनी पुरानी गलतियों या विवादों से आगे बढ़ने का हक है। क्या हमारे पास इसके लिए कोई ठोस कानून है?

भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डाटा संरक्षण अधिनियम, 2023 इस दिशा में एक कदम जरूर है। यह डाटा मिटाने का अधिकार देता है, लेकिन इसमें कई पेच हैं। जब कोई व्यक्ति अपना डाटा हटवाने की मांग करता है, तो उसके सामने अभिव्यक्ति की आजादी और न्यायिक पारदर्शिता की दीवार खड़ी हो जाती है। मिसाल के तौर पर, क्या एक भ्रष्ट नेता यह कह सकता है कि लोग उसके पुराने घोटाले भूल जाएं, क्योंकि अब वह सुधर गया है? निश्चित रूप से नहीं। जनता को जानने का अधिकार और सार्वजनिक हित हमेशा निजी निजता से ऊपर रहेगा, लेकिन एक सामान्य नागरिक, जो किसी झूठे मुकदमे या निजी विवाद का शिकार हुआ है, उसे अदालतों के चक्कर क्यों काटने पड़ें? हमारे वर्तमान कानून में एक ऐसी स्पष्ट प्रक्रिया की कमी है, जो टेक कंपनियों को जवाबदेह ठहरा सके।

इस जटिल समीकरण में अब एआई ने प्रवेश किया है। एआई के दुरुपयोग का सबसे वीभत्स रूप डीपफेक है। आज किसी भी आम इंसान का चेहरा किसी अश्लील वीडियो या भड़काऊ भाषण के साथ जोड़ना बच्चों का खेल बन गया है। एआई एल्गोरिदम आज इतने शक्तिशाली हैं कि वे आपकी पसंद-नापसंद को भांप लेते हैं और आपको उसी दिशा में ले जाते हैं, जो वे चाहते हैं। नफरत भरे कंटेंट पर इंगेजमेंट ज्यादा आती है, इसलिए एल्गोरिदम उसे बढ़ावा देते हैं। यह एआई का वह चेहरा है, जो समाज को बांट रहा है। इसी एआई में समाधान भी छिपा है। अगर हम एआई को सही नीयत के साथ इस्तेमाल करें, तो यह एक डिजिटल रक्षक बन सकता है। जिस रफ्तार से डिजिटल मीडिया पर डाटा अपलोड होता है, उसे इंसान कभी मॉनिटर नहीं कर सकते। यहां एआई एक फिल्टर की तरह काम कर सकता है। यह आपत्तिजनक कंटेंट, डीपफेक और फेक न्यूज को उसके फैलने से पहले ही पहचान कर ब्लाक कर सकता है। राइट टू बी फॉरगाटेन को लागू करने में एआइ मददगार साबित हो सकता है। जरूरत एक ऐसी नीति की है, जो टेक कंपनियों को बाध्य करे कि वे अपने एआई माडल्स को सुरक्षा और निजता के अनुकूल बनाएं।

भारत को राइट टू बी फॉरगाटेन के लिए एक सशक्त ढांचा तैयार करना होगा। यह केवल कागजी अधिकार न हो, एक ऐसी व्यवस्था हो, जहां एक क्लिक पर पीड़ित की सुनवाई हो। हमें विशेष डिजिटल ट्रिब्यूनल्स की जरूरत है जहां तकनीकी विशेषज्ञ और कानूनी जानकार मिलकर त्वरित फैसले लें। डाटा प्रोटेक्शन बोर्ड को इतनी शक्ति मिलनी चाहिए कि वह उन प्लेटफॉर्म्स पर भारी जुर्माना लगा सके, जो आदेश मिलने के बाद भी डाटा नहीं हटाते। कानून में स्पष्ट करना होगा कि किन परिस्थितियों में डाटा हटाया जा सकता है और कहां सार्वजनिक हित सर्वोपरि होगा? एक और महत्वपूर्ण सुधार यह होना चाहिए कि टेक कंपनियों के लिए ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट अनिवार्य हो, ताकि पता चले कि उन्होंने कितने अनुरोध स्वीकार किए और कितने खारिज। हमें एक ऐसी डिजिटल संस्कृति विकसित करनी होगी, जहां हम दूसरों की निजता का सम्मान करें। कानून अपना काम करेगा, एआई अपना सुधार करेगा, लेकिन हमें यह समझना होगा कि हर व्यक्ति को एक दूसरा मौका मिलने का हक है। डिजिटल युग में विस्मृति का अधिकार मानवीय गरिमा बचाने की कोशिश है। जब तक हम तकनीक और कानून को मानवीय संवेदनाओं के साथ नहीं जोड़ेंगे, तब तक हम इस डिजिटल पिंजरे में कैद रहेंगे।


Date: 07-02-26

अरावली की दरारें बड़े खतरे का संकेत

प्रमोद भार्गव

अरावली की पहाड़ियों में उत्खनन से बढ़ रहे खतरे का संकेत पर्यावरण के संरक्षक यों ही नहीं दे रहे थे। इन अनुमानों का सत्य इस पर्वतमाला में पड़ी बारह दरारों से सामने आ गया है। इस कारण अरावली पर्वत शृंखलाएं न केवल लगातार कमजोर हुई हैं, बल्कि माना जा रहा है कि ये थार रेगिस्तान से पूर्व की ओर खिसकना शुरू हो गई हैं। इस कारण राजस्थान के जयपुर सहित हरियाणा और दिल्ली क्षेत्र तथा गंगा-यमुना के मैदानी इलाकों के पर्यावरण पर गंभीर एवं विपरीत असर पड़ने का खतरा बढ़ गया है। यह जानकारी वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की ओर से पिछले दिनों जारी एक रपट में दी गई है। इसमें वर्ष 1972-75, 1982-84, 1994-96 और विशेष रूप से 2005-2007 के कालखंड में किए गए क्रमिक उपग्रह आधारित अध्ययनों का हवाला दिया गया है।

इस रपट के अनुसार, अरावली पर्वतमाला पर बनी बारह बड़ी दरारों के माध्यम से रेगिस्तानी रेत पूर्व की ओर बढ़ रही है। वर्ष 2005-07 के बाद अरावली की रेगिस्तान को आगे बढ़ने से रोकने वाली क्षमता में तेजी से गिरावट दर्ज की गई है, क्योंकि इसी दौर में गुड़गांव समेत दिल्ली-आसपास के क्षेत्र में शहरीकरण के साथ औद्योगिक और प्रौद्योगिकी विस्तार के लिए वनों की कटाई के साथ व्यापक स्तर पर पत्थर उत्खनन हुआ है। इसके नतीजतन पर्वतमाला की बारह प्रमुख दरारें अजमेर की मगरा पहाड़ियों से निकलकर झुंझूनूं के खेतड़ी और माधोगढ़ होते हुए हरियाणा के महेंद्रगढ़ तक फैल गई हैं। इन्हीं कमजोर हिस्सों से थार रेगिस्तान की रेत पूर्व की ओर बढ़ रही है। राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय ने भी अपने अध्ययन से चेताया था कि आने वाले वर्षों में रेगिस्तान से उठने वाले रेत के तूफान दिल्ली और एनसीआर तक पहुंचकर इनके पर्यावरण को गंभीर रूप से बिगाड़ने का काम कर सकते हैं। मगर इन सर्वेक्षणों और अध्ययनों को संबंधित राज्यों एवं केंद्र सरकार ने शायद गंभीरता से नहीं लिया है।

अरावली की पहाड़ियां दुनिया की प्राचीनतम पर्वत शृंखलाओं में से एक हैं। लगभग 692 किलोमीटर के दायरे में फैली ये पहाड़ियां गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा होते हुए दिल्ली तक पसरी हैं। इन पहाड़ियों का मानव समुदाय के लिए गहरा प्राकृतिक महत्त्व है। इस क्षेत्र में रहने वाले जीव-जगत की सांसें इन पर्वतमालाओं से गुजरने वाली शुद्ध हवा पर निर्भर है। इन्हीं पहाड़ियों की ओट पश्चिमी रेगिस्तान को फैलने से रोके हुए है, अन्यथा हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश की जो उपजाऊ भूमि है, उसे रेगिस्तान में तब्दील होने में समय नहीं लगेगा। इन पहाड़ियों की हरियाली नष्ट होने से आसपास के क्षेत्र में शुष्कता का विस्तार हो रहा है और गर्मी बढ़ रही है। इसके परिणामस्वरूप भू-जल स्तर भी आशंका से कहीं ज्यादा नीचे जा रहा है। लोगों में सांस और दमा की बीमारियां बढ़ रही हैं।

रपट में कहा गया है कि अरावली पर्वत शृंखला सामान्य परिस्थितियों में तापमान को डेढ़ से ढाई डिग्री तक नियंत्रित रखने और भू-जल के पुनर्भरण में अहम भूमिका निभाती है। इनमें प्रति हेक्टेयर बीस लाख लीटर भू-जल पुनर्भरण की अद्वितीय क्षमता है। इन पहाड़ियों के लगातार क्षरण एवं मरुस्थलीकरण के खतरे से दिल्ली और आसपास के भू-भागों का तापमान बढ़ा है और धूल से भरी आंधियों की अवधि बढ़ने के साथ इनकी तीव्रता में भी तेजी आई है। पर्यावरण विशेषज्ञों का अनुमान है कि हरियाणा की 8.2 फीसद भूमि मरुस्थलीकरण के दायरे में है, क्योंकि वर्ष 2019 तक ही अरावली का लगभग 5.77 लाख हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र उत्खनन से तबाह हो चुका था। इससे स्पष्ट है कि विकास की प्रक्रिया में अवैज्ञानिक तरीकों की जानकारी होने के बावजूद अरावली संकट को नजरअंदाज किया गया है।

पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर अरावली पहाड़ियों को नए सिरे से परिभाषित किया गया। इस परिभाषा से संरचनात्मक विरोधाभास की स्थिति निर्मित हुई और लगा कि इससे अनियंत्रित खनन को बढ़ावा मिल सकता है। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने अपनी रपट में न्यायालय को बताया था कि सौ मीटर से ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली पर्वतमाला माना जाएगा। अर्थात निन्यानबे मीटर तक की ऊंची पहाड़ियां अरावली के हिस्से से बाहर हो जातीं। इससे अरावली के बड़े क्षेत्र में उत्खनन का रास्ता खुल जाता। इससे यह आशंका भी पैदा हुई कि आखिर सरकार इन पहाड़ियों को इस तरह से परिभाषित करके किसके हित साधना चाहती है? जबकि इन पहाड़ियों की ऊंचाई के कारण ही ये प्राकृतिक रूप से उड़ने वाली धूल को रोकने का काम करती हैं। इसके साथ ही सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि अरावली के कुल 1.44 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में से फिलहाल 0.19 फीसद भू-भाग में ही उत्खनन के पट्टे दिए जा रहे हैं। हालांकि बाद में तर्कों के आधार पर सर्वाेच्च न्यायालय ने अरावली की परिभाषा से संबंधित अपने निर्देशों पर रोक लगा दी।

अरावली पर्वतमाला पारिस्थितिकी रूप से बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। इसीलिए इसके व्यापक पुनर्स्थापन और ठोस संरक्षण की जरूरत है, न कि पहाड़ियों को पुनर्भाषित करके इनके दोहन को बढ़ावा देने की? ये पर्वतमाला मैदानी क्षेत्रों को रेगिस्तान में बदलने से तो रोकती ही है, इन्हीं पहाड़ियों में कई छोटी-बड़ी नदियों के उद्गम स्थल हैं। अनेक झील, झरने और तालाब इस पर्वतमाला के बीच में प्राकृतिक रूप से अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं, जो न केवल क्षेत्र के जीव-जगत को पानी उपलब्ध कराते हैं, बल्कि भूजल पुनर्भरण का काम भी करते हैं। यही नहीं, इन पहाड़ियों के गर्भ में इमारती पत्थर, संगमरमर, ग्रेनाइट और चूना बड़ी मात्रा में समाया हुआ है। साथ ही जस्ता, तांबा, लेड और टंगस्टन जैसे दुर्लभ खनिज भी इनकी कोख में मौजूद हैं। मगर इस खनिज संपदा के दोहन के लिए पहले यह सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि पर्यावरण को किसी तरह की क्षति न पहुंचे।

इसे वर्तमान विकास की विडंबना ही कहा जाएगा कि अधिकतम प्राकृतिक संपदाओं के दोहन को आधुनिक एवं आर्थिक विकास का नीतिगत आधार बना दिया गया है। इस बात पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है कि हमारे यहां जिस तरह से प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है, उस लिहाज से मौजूदा आर्थिक विकास की निरंतरता कैसे बनी रह सकती है। यह सवाल भी अनुत्तरित है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाकर विकास को आगे बढ़ाना कितना नुकसानदेह साबित हो सकता है। दीर्घकालिक दृष्टि से देखें, तो विकास की यह अवधारणा उस बहुसंख्यक आबादी के लिए जीने का भयावह संकट खड़ा कर सकती है, जिसकी रोजी-रोटी की निर्भरता प्रकृति पर ही अवलंबित है। हालांकि अरावली पर्वतमाला में पड़ी कई दरारों को लेकर उपग्रह सर्वेक्षणों के खुलासे और पर्यावरणविदों की राय के बाद शीर्ष न्यायालय ने इस मसले पर पुनर्विचार करने का निर्णय लिया है। इसलिए यह उम्मीद बंधी है कि अरावली संकट से जुड़े तमाम पहलुओं पर अब नए सिर से बहस होगी और पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी चिंता का समाधान औद्योगिक विकास एवं वाणिज्यिक लाभ-हानि के गुणा-भाग से परे जल, जंगल और जमीन के रख-रखाव के पैमाने पर होगा।


Date: 07-02-26

जानलेवा भ्रष्टाचार

संपादकीय

मेघालय में एक अवैध कोयला खदान में हुए विस्फोट में अठारह मजदूरों की मौत हो गई, एक गंभीर रूप से जख्मी मजदूर अस्पताल में भर्ती है और अंदेशा है कि कुछ अन्य मजदूर अभी भी खदान में फंसे हों। यह ‘रैट होल’ खदान है, जिसमें इतनी संकरी सुरंगें बनाकर खनन किया जाता है, जिनसे मजदूर रेंगकर ही घुस या निकल सकते हैं। ये खदानें पर्यावरण के लिए भी बहुत घातक हैं। इनकी असुरक्षित व अमानवीय परिस्थिति की वजह से ही सुप्रीम कोर्ट और ग्रीन ट्रिब्यूनल ने इनको प्रतिबंधित किया हुआ है, लेकिन पूर्वोत्तर भारत में ऐसी खदानें धड़ल्ले से चल रही हैं। अनुमान है कि सिर्फ मेघालय में लगभग 25,000 ऐसी गैर-कानूनी खदानें चल रही हैं। जाहिर है, इतने बडे पैमाने पर यह अवैध काम बिना प्रशासनिक मिलीभगत और भ्रष्टाचार के संभव नहीं है। इसके पहले मेघालय में ही 2018 में बड़ी दुर्घटना हुई थी, जिसमें पंद्रह मजदूर मारे गए थे। बहुत संभव है कि और भी दुर्घटनाएं इन खदानों में होती हों, जिनकी खबर तक बाहर नहीं आ पाती हो।

ऐसा नहीं है कि प्रशासनिक नेकनीयती व सख्ती से ऐसे गैर-कानूनी और अमानवीय कारोबार पर रोक नहीं लगाई जा सकती, लेकिन प्रशासनिक तंत्र में भ्रष्टाचार का जाल इतना मजबूत है कि उसके आगे तमाम कानून और आदेश व्यर्थ हो जाते हैं। देश में कई बार भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हुए, कुछेक बार इन आंदोलनों की वजह से सरकारें भी बदलीं, लेकिन भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत ही होती गईं। ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल’ जैसी संस्थाओं की रिपोर्ट से तो यही जाहिर होता है। भ्रष्टाचार कम करने के लिए जरूरी है कि सरकारी तंत्र और प्रक्रियाओं में पारदर्शिता व सरलता लाई जाए, पर होता यह है कि भ्रष्टाचार रोकने के नाम पर प्रक्रियाओं को ज्यादा जटिल और अपारदर्शी बना दिया जाता है, जिससे अधिकारियों व संस्थानों की जवाबदेही और कम हो जाती है। ऐसे में, भ्रष्टाचार की गुंजाइश बढ़ जाती है। भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करने वाली संस्थाओं को स्वतंत्र व मजबूत बनाने के लिए जरूरी कदम उठाने की इच्छा हमारी राजनीतिक संस्कृति में नहीं है, इसलिए इसमें पकड़े जाने की गुंजाइश जितनी कम है, पकड़े जाने पर सजा मिलने की गुंजाइश उससे भी कम है।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि भारत के आम नागरिक की गरिमा, उसके अधिकार, उसकी जान की परवाह भी हमारे तंत्र में कम ही है, बल्कि यह परवाह हमारे समाज में ही नहीं है, जो इन आम नागरिकों से बना है। हमारे समाज के लोगों में ही दूसरे लोगों, खासकर अलग वर्ग, समुदाय या क्षेत्र के, यानी अपने से अलग लगने वाले लोगों के दुख-दर्द या समस्या के प्रति वैसी हमदर्दी नहीं देखने को मिलती, जैसी एक देश में अपेक्षित है और भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में तो हमेशा ही ज्यादातर लोग हमसे अलग ही होंगे। मेघालय की किसी खदान में मरने वाले गरीब मजदूरों की पीड़ा जब तक महानगरों के लोग महसूस नहीं करेंगे, तब तक हम सब अलग-अलग इस भ्रष्टाचार और लापरवाही के शिकार होते रहेंगे या सिर्फ शिकार नहीं होंगे, बल्कि जाने-अनजाने उसके जिम्मेदार भी होंगे। अभी एक खबर आई है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के नोएडा ट्विन टावर मामले में सरकारी जांच कमेटी ने 11 अफसरों को दोषी पाया है। इससे पता चलता है कि मेघालय की खदान में मरने वाले गरीब मजदूर और नोएडा के उच्च मध्यवर्गीय लोगों की लड़ाई दरअसल एक ही है, इसलिए जरूरी है कि वे आपस में हमदर्दी और भाईचारा महसूस करें, तभी वे इस साझा दुश्मन से लड़ पाएंगे।