09-01-2026 (Important News Clippings)
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Date: 09-01-26
Unplug EV Subsidy
There are better uses for public money than subsidising electric cars for the rich. Govt should let market work freely
TOI Editorials

Last year, India bought 1.8L electric cars, 77% over 2024. But in terms of overall car sales this amounted to just 3.8%. Clearly, 10 years of govt incentives and subsidies haven’t convinced buyers of the advantages of going electric. Two reasons are obvious: range anxiety + inadequate charging infra, and high prices + limited choice at the lower end. Low sales, by global standards, aren’t allowing the Indian EV ecosystem to mature. Which explains Indian carmakers’ dread of cheap Chinese EVs slipping in via EU after an FTA. But there’s a counterview. Let EVs of every ilk come in freely and cheaply. Growing EV popularity will automatically spur growth of charging and servicing infra, which means more jobs. After all, countries that don’t make any cars at all, like Australia, also have well-developed fuelling and charging networks. This infra boost will serve domestic carmakers too if they raise their technology game with R&D, like China did.
But to go on pushing domestic EV sales with subsidies and mandates is pointless. For example, what will Telangana’s plan to make schools induct 25-50% EVs in their vehicle fleets lead to? Greater burden on parents. Electric buses cost far more than those running on diesel or gas, and because school buses run for only a couple of hours daily, gains on the air quality front will be minimal. Far better to focus on city bus fleets that run from morning to night.
EV subsidies, like Delhi’s ₹1L benefit for 27,000 electric cars priced up to ₹25L, are questionable on several counts. Who gains from them? The rich. Who’s hurt by the revenue loss? The poor. Those crores are better used to ensure potable water and sewage don’t mix, right? A Harvard Law School study found subsidies only encourage the rich to buy EVs as their non-primary vehicles, worsening urban congestion and pollution. Other studies have shown that when govt subsidises electric cars, manufacturers have no incentive to lower prices. Without subsidies, they would have to raise prices of their ICE cars to discount EVs themselves. Let the market work, and save public funds for the public.
टैरिफ के बावजूद अच्छी विकास दर सुखद है
संपादकीय
चालू वित्त वर्ष में जीडीपी विकास दर ( वास्तविक ) 7.4% रहने की संभावना एक उत्साह पैदा करती है कि ट्रम्प टैरिफ के बावजूद भारत आगे बढ़ रहा है। बजट के चंद दिनों पहले सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा जारी प्रथम एडवांस आकलन के अनुसार मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और सेवा क्षेत्र ने बेहतर परफॉर्मेंस किया। ये अलग बात है कि बजट सत्र के दौरान ही नए आधार वर्ष (2022-23 ) पर आधारित आंकड़े की सीरीज शुरू होगी। अभी तक 2011-12 को आधार- वर्ष मानकर आंकड़े जारी किए जाते थे। ताजा एडवांस आकलन के अनुसार नॉमिनल जीडीपी विकास दर पिछले पांच वर्षों में सबसे कम (8%) है। नॉमिनल जीडीपी में से इन्फ्लेशन को घटाकर वास्तविक जीडीपी निकाली जाती है। नॉमिनल जीडीपी के अन्य वर्षों से कम होने के पीछे मूल कारण महंगाई का कम होना भी है। बहरहाल, भारतीय इकॉनोमी में घरेलू उपभोग का अंश ज्यादा होने के कारण अर्थव्यवस्था में लचीलापन भी ज्यादा होता है। साथ ही लम्बे समय से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर दबा हुआ था, जिसमें अब कुछ गति आई है। फिर भी उम्मीद की किरण है सेवा क्षेत्र, खासकर टेक्नोलॉजी के मोर्चे पर नई बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारत के प्रति रुझान । इससे निवेश आएगा, उच्च गुणवत्ता वाले रोजगार बढ़ेंगे और जीडीपी विस्तार का चेन रिएक्शन शुरू हो सकेगा।
Date: 09-01-26
लंबी बहसों और पेचीदा फैसलों से मुकदमों का बोझ बढ़ता है
विराग गुप्ता, ( सुप्रीम कोर्ट के वकील और ‘डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत’ के लेखक )

नए साल पर सुधारों का पहला ताकतवर संदेश सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने दिया। उन्होंने कहा कि जिस तरह मेडिकल इमरजेंसी से मरीजों को इलाज की सुविधा होती है, उसी तरह अदालतों के दरवाजे भी न्याय के लिए हमेशा खुले रहने चाहिए। ताकतवर लोग महंगे और बड़े वकीलों के दम पर प्रतिकूल मामलों में लंबी, जटिल बहस और अनुकूल मामलों में जल्द सुनवाई पर जोर देते हैं।
इस मर्ज को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट के नए आदेश में नियमित मामलों में वकीलों की बहस के लिए समय-सीमा तय करने की बात कही गई है। विधि आयोग ने 2009 में 230वीं रिपोर्ट में इस बारे में विस्तार से चर्चा की थी। उसके अनुसार देश में सरकारी कामकाज में गिरावट का असर न्यायपालिका में भी दिखने लगा है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज की अध्यक्षता वाले विधि आयोग ने कहा था कि जजों को पूरा समय न्यायिक कार्यों में ही लगाना चाहिए। लेकिन लम्बित मामलों के बढ़ते आंकड़े मर्ज के बदतर होने की गवाही दे रहे हैं। 2009 में 2.74 करोड़ मामले लम्बित थे, जिनकी संख्या अब दोगुनी है।
संसद और विधानसभा में हुल्लड़बाजी हो तो कानून निर्माण की प्रक्रिया कमजोर होती है। नौकरशाही का समय मीटिंग और रिपोर्ट में बीते तो प्रशासन शिथिल होता है। शिक्षकों की ड्यूटी वोटर लिस्ट दुरुस्त करने, मिड-डे मील बनाने और कुत्तों की गणना करने में लग जाए तो बच्चों के शैक्षणिक स्तर पर बुरा असर पड़ता है।
पुलिस का समय वीआईपी ड्यूटी, कोर्ट में हाजिरी और आरोप पत्र का पुलिंदा बनाने में नष्ट हो तो अपराध बढ़ने के साथ जांच में देरी होती है। इसी तरह वकीलों की बड़ी बहस और जजों के भारी-भरकम फैसलों से भी मुकदमों का बोझ बढ़ता है। विधि आयोग और प्रशासनिक सुधार आयोगों की धूल खाती रिपोर्टों पर अमल के बजाय सतही चिंतन और भाषणों के बढ़ते चलन से जनता का सिस्टम पर भरोसा डगमगाता है।
भारत में शिक्षा के साथ कानून निर्माण में भी मैकाले की बड़ी भूमिका थी, जिसकी साम्राज्यवादी विरासत को दुरुस्त करने की बात इन दिनों की जा रही है। विधि आयोग ने मैकाले के कथन को दोहराते हुए कहा था कि अनुशासित और सुनिश्चित परिणामों वाली न्यायिक व्यवस्था से सही और जल्द न्याय मिल सकता है।
अमेरिका में प्रत्येक पक्ष के वकील को अधिकतम 30 मिनट सुनवाई का मौका मिलता है। विधि आयोग ने भी बहस के लिए अधिकतम डेढ़ घंटा समय तय करने की अनुशंसा की थी। तीन साल पहले सुप्रीम कोर्ट के जज संजय किशन कौल ने कहा था कि दुनिया के किसी भी प्रगतिशील देश में वकीलों को असीमित बहस की इजाजत नहीं मिलती है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पहल के अनुसार भी नियमित मामलों की सुनवाई के पहले अधिकतम 5 पेज का संक्षिप्त नोट और बहस की समय-सीमा सूचित करना जरूरी है।
किंतु आवारा कुत्तों के मामले की सुनवाई के दौरान जब वकीलों ने बहस की समय-सीमा तय करने की बात की तो 3 जजों की पीठ ने उसे नकार दिया। संवैधानिक तौर पर सुप्रीम कोर्ट के सभी जज बराबर हैं लेकिन चीफ जस्टिस का दर्जा अग्रणी है। चीफ जस्टिस कॉलेजियम के साथ मास्टर ऑफ रोस्टर और सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक मुखिया भी माने जाते हैं। इसलिए सर्कुलर के अनुसार न सिर्फ सुप्रीम कोर्ट बल्कि बेहतर परंपरा के तौर पर हाईकोर्टों के सभी जजों को भी बहस के लिए समय-सीमा और फैसलों के सीमित पेज की प्रक्रिया पर व्यावहारिक अमल करना चाहिए।
अमेरिका की सुप्रीम कोर्ट में छोटे और तर्कसंगत फैसले देने की परम्परा है। भारत में केशवानंद भारती मामले में 1973 में 700 पेज, 2018 में आधार कानून के मामले में 1448 पेज और 2019 में अयोध्या विवाद में 1045 पेज का फैसला आया था। आपातकाल के दौरान एडीएम जबलपुर मामले में असहमति का ऐतिहासिक फैसला देने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज एचआर खन्ना ने रिटायरमेंट के बाद कहा था कि जजों को साहित्यिक उपमाओं और लम्बे फैसलों से थीसिस लिखने के बजाय तर्क आधारित कानून सम्मत छोटे फैसले देने चाहिए। सभी अदालतों के जज और वकील, न्यायिक अनुशासन का कड़ाई से पालन करें तो लोगों को जल्द न्याय मिलेगा और मुकदमों के बोझ से देश को मुक्ति मिलेगी।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट में छोटे निर्णय देने की परम्परा है। जबकि भारत में केशवानंद भारती मामले में 1973 में 700 पेज, 2018 में आधार कानून के मामले में 1448 पेज और 2019 में अयोध्या विवाद में 1045 पेज का फैसला आया था ।
खतरे में विश्व व्यवस्था
संपादकीय
वेनेजुएला पर हमला करने और डेनमार्क के स्वायत्तशासी क्षेत्र ग्रीनलैंड पर बलपूर्वक कब्जा करने की धमकी देने के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अधिक बेलगाम हो गए हैं। अब उन्होंने एक ऐसे विधेयक को सहमति प्रदान की, जिसके तहत रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर अमेरिका 500 प्रतिशत टैरिफ थोपेगा।
चूंकि रूस से तेल खरीदने वाले प्रमुख देश चीन, भारत और ब्राजील हैं, इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि वे इस मनमानी मान्यता से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं कि रूस से तेल खरीदने वाले देश ही उसे यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने में सहायक हैं। ट्रंप ने भारत पर पहले से ही 50 प्रतिशत टैरिफ लगा रखा है। इसमें और अधिक वृद्धि का मतलब है आर्थिक प्रतिबंध लगाना।
ट्रंप किस तरह मनमानी पर उतर आए हैं, इसका एक प्रमाण उनकी ओर से 60 से अधिक अंतरराष्ट्रीय संगठनों से अमेरिका को अलग करना भी है। इनमें भारत के नेतृत्व वाला अंतरराष्ट्रीय सौर सहयोग संगठन भी है। अमेरिका ने जिन संगठनों से खुद को अलग करने की घोषणा की है, उनमें करीब 30 संयुक्त राष्ट्र के हैं। ट्रंप इसके पहले भी अनेक महत्वपूर्ण वैश्विक संस्थानों से अमेरिका को अलग कर चुके हैं। अब उन्होंने जिस तरह थोक में कई संगठनों से बाहर आने का फैसला किया, उससे यही स्पष्ट हो रहा है कि वे विश्व व्यवस्था को पूरी तौर पर छिन्न-भिन्न करना चाहते हैं।
ट्रंप अपने मनमानेपन से दुनिया को शीत युद्ध के दौर में ही नहीं, बल्कि उसके पहले के उस कालखंड में ले जा रहे हैं, जब विश्व व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं थी। यदि ट्रंप यह सोच रहे हैं कि दुनिया उनकी धमकियों और सनक भरे फैसलों के समक्ष झुक जाएगी तो ऐसा होने वाला नहीं है। ध्यान रहे कि अब यूरोप भी उनके खिलाफ आवाज उठाने को बाध्य है।
ट्रंप कितना ही गर्जन-तर्जन करें, आज अमेरिका की वैसी हैसियत नहीं, जैसी दो-तीन दशक पहले हुआ करती थी। अब डालर का वर्चस्व भी कम हो रहा है। ट्रंप को यह आभास होना चाहिए कि वे तमाम जोर लगाने के बावजूद यूक्रेन पर रूस के हमले रोक पाने में नाकाम हैं। चीन और ब्राजील पर भी उनका जोर नहीं चल पा रहा है और भारत का भी यही स्पष्ट संदेश है कि वह उनके दबाव में झुकने वाला नहीं।
इसी कारण ट्रंप की भारत के प्रति बौखलाहट बढ़ती जा रही है। आने वाले दिनों में भारत-अमेरिका संबंध और अधिक खराब हो सकते हैं। भारत को अब यह और अच्छे से स्पष्ट करना होगा कि वह ट्रंप की मनमानी सहन करने वाला नहीं। उसे अमेरिका को यह संदेश देने के साथ ही यह भी देखना होगा कि विश्व के प्रमुख राष्ट्रों से मिलकर कैसे ट्रंप की दादागीरी का सामना किया जाए, क्योंकि अब इसके अलावा और कोई उपाय नहीं रह गया है।
Date: 09-01-26
योजनाओं की समीक्षा
संपादकीय
वित्त मंत्रालय ने सभी सरकारी विभागों और मंत्रालयों से कहा है कि वे केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजनाओं और केंद्रीय योजनाओं को तर्कसंगत बनाएं। इसके पीछे इरादा यह है कि एक दूसरे का अतिक्रमण करने वाली योजनाओं का विलय किया जाए और क्रियान्वयन की दक्षता में सुधार किया जाए। सरकार 54 केंद्र प्रायोजित योजनाएं चलाती है जबकि केंद्रीय योजनाओं की संख्या 260 है। योजनाओं के लाभ पर जहां विवाद हो सकता है वहीं यह कहना उचित ही होगा कि केंद्र सरकार कुछ ज्याद ही संख्या में योजनाओं का संचालन करती है। जिससे शायद नतीजे प्रभावित होते हैं। ऐसे में योजनाओं को जारी रखने के लिए समय-समय पर समीक्षा आवश्यक है। वर्ष 2016 के बजट में की गई घोषणा के मुताबिक योजनाओं को वित्त आयोग के चक्र के साथ सुसंगत किया गया और इसलिए योजनाओं की समय-समय पर समीक्षा आवश्यक है। चूंकि यह अभ्यास अभी किया जा रहा है इसलिए सरकार, विशेषकर वित्त मंत्रालय, को प्रत्येक योजना की सावधानीपूर्वक जांच करने की सलाह दी जाएगी।
योजनाओं, खासकर केंद्र प्रायोजित योजनाओं की समीक्षा के पक्ष में कई तर्क हो सकते हैं। हालिया बदलावों की आलोचना में एक यह है कि विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 जो एक केंद्र प्रायोजित योजना है, उसके तहत दिए जाने वाले ग्रामीण रोजगार गांरटी कार्यक्रम में राज्यों पर अतिरिक्त राजकोषीय बोझ बढ़ गया है। अब राज्य सरकारों को योजना के व्यय में 40 फीसदी हिस्सेदारी करनी होगी। पुरानी योजना एक केंद्रीय योजना थी और उसे काफी हद तक केंद्र सरकार फंड करती थी। कई राज्य शायद इस हालत में ही न हों कि वे व्यय बढ़ा सकें। केंद्र प्रायोजित योजनाएं जहां केंद्र द्वारा बनाई जाती हैं, वहीं उन्हें आंशिक फंडिंग राज्य भी करते हैं। इससे राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता पर असर पड़ता है। शायद वे उन योजनाओं पर अधिक व्यय न कर सकें जिन पर करना चाहते हैं। इस बात को रिजर्व बैंक ने भी राज्यों के वित्त संबंधी अपने अध्ययन में जाहिर किया है। दिसंबर 2024 के रिजर्व बैंक के अध्ययन में कहा गया है, ‘बहुत ज्यादा केंद्रीय योजनाएं राज्य सरकारों के व्यय के लचीलेपन को समाप्त करती हैं और सहकारी राजकोषीय संघवाद की भावना को क्षति पहुंचाती हैं।’
इस प्रकार, केंद्र प्रायोजित योजनाओं को तर्कसंगत बनाना संघ और राज्य दोनों स्तरों पर वित्तीय गुंजाइश को संभावित रूप से सुधार सकता है, जिससे समग्र व्यय दक्षता बढ़ सकती है। इसके अलावा, भारतीय राज्य विकास के विभिन्न स्तरों पर हैं और उनकी आवश्यकताएं भी अलग-अलग हैं। उदाहरण के लिए, शिक्षा क्षेत्र में जो किया जाना चाहिए, वह उत्तर भारतीय राज्यों में दक्षिणी राज्यों की तुलना में बहुत भिन्न हो सकता है। राज्य सरकारें राज्य स्तरीय चुनौतियों से निपटने के लिए बेहतर रूप से सक्षम हैं। इसके अतिरिक्त, ऐसी योजनाओं में अक्सर श्रेय लेने के लिए अनावश्यक राजनीतिक खींचतान होती है। बेहतर परिणामों के लिए, अधिकांश विकासात्मक और सामाजिक क्षेत्र की योजनाएं राज्य सरकारों द्वारा ही तैयार और संचालित की जानी चाहिए क्योंकि वे ऐसा करने की बेहतर स्थिति में हैं।
इस प्रकार, राज्यों के लिए अधिक वित्तीय सशक्तीकरण का मामला बनता है। बदले में राज्य सरकारों को स्थानीय निकायों को सशक्त करना चाहिए। यह देखना दिलचस्प होगा कि सोलहवें वित्त आयोग ने इस मुद्दे को कैसे संबोधित किया है। व्यापक नीतिगत स्तर पर इस बात पर बहस हो सकती है कि क्या भारत को तेज वृद्धि और विकास हासिल करने के लिए राजकोषीय संसाधनों के आवंटन पर पुनर्विचार करना चाहिए। इस संदर्भ में यह चर्चा करनी भी आवश्यक है कि राज्य सरकारें अपने वित्त का प्रबंधन कैसे करें। कई राज्यों पर भारी कर्ज है लेकिन यह उन्हें लोकलुभावन योजनाएं शुरू करने से नहीं रोक रहा है।