ई-कचरे से उपजे संकट का बढ़ता दायरा

Afeias
20 Dec 2025
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पर्यावरण पर वैश्विक निगरानी रखने वाली संस्था ‘बासेल एक्शन नेटवर्क’ (बीएएन) की ताजा रिपोर्ट में जानकारी दी गई है कि अमेरिका से अधिकांश दक्षिण पूर्व एशिया के विकासशील देशों में लाखों टन खराब इलेक्ट्रानिक सामग्री भेजी जा रही है। इसी रिपोर्ट के अनुसार यह ई-कचरे की अदृश्य सुनामी है, क्योंकि विकासशील और गरीब देश इस कचरे का पुनर्चक्रण करने में समर्थ नहीं हैं। फिर भी विकसित देशों द्वारा यह ई-कचरा भेजा जा रहा है। इसमें कंप्यूटर, लैपटाप, टैबलेट, मोबाइल तथा अन्य उपकरण शामिल हैं, इनमें सीसा, कैडमियम एवं पारा जैसी सामग्रीयां हैं, जो मूल्यवान होने के साथ-साथ विषाक्त भी हैं।

ई-कचरे से जुड़े कुछ आँकड़े –

  • पुनर्चक्रित नहीं होने वाला कचरा 5 गुना बढ़ता जा रहा है। 
  • संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ और अनुसंधान शाखा के अनुसार, वैश्विक स्तर पर वर्ष 2022 में 6.2 करोड़ मीट्रिक टन ई-कबाड़ पैदा किया गया। वर्ष 2030 तक इसकी मात्रा 8.2 करोड़ मीट्रिक टन हो जाने की संभावना है।
  • हर माह लगभग 33 हजार मीट्रिक टन कचरा अमेरिका से बाहर भेजा जाता है।

ई-कचरे से उत्पन्न समस्याएं –

  • पर्यावरणीय हानि का आकलन करने वाली संस्थाएँ भी यह अनुमान नहीं लगा पा रही हैं कि इस घातक कचरे से इनका वायुमंडल किस सीमा तक प्रभावित और प्रदूषित होगा और वहाँ के लोगों के स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
  • ई-कचरे को पुनर्चक्रण के बजाय उन देशों में भेजा जाता है, जहाँ गरीबी है और इसके पुनर्चक्रण की व्यवस्था बहुत कम है। इससे वहाँ पर्यावरणीय संकट पैदा होता है, जो जलवायु व पृथ्वी को प्रदूषित करता है। इससे घातक गैसों का उत्सर्जन होता है। इससे उत्पन्न होने वाला जहरीला रसायन जल और मिट्टी को भी दूषित करता है।
  • इस कचरे को आजीविका चलाने के लिए गरीब लोग कबाड़खाने तक पहुचाते हैं। बिना सुरक्षा उपकरण के मजदूर इसे पिघलाते हैं। इस प्रक्रिया में विषाक्त धुआँ निकलता है।
  • बीएएन की संधि के मुताबिक इस्तेमाल किए गए ई-कचरे को दूसरे देश भेजने की अनुमति केवल ऐसे कचरे के लिए है, जिसे पुनर्चक्रित कर फिर से प्रयोग किया जा सके तथा वह पर्यावरण प्रदूषण न करता हो। पर ऐसा हो नहीं रहा है।

ई-कचरे को नष्ट करने के उपाय –

ई-कचरा, जिसमें प्लास्टिक भी शामिल है को नष्ट करना दुनिया के लिए एक समस्या है।

  • जापान के क्योटो विश्वविद्यालय ने जैविक रूप से प्लास्टिक को नष्ट करने वाले जीवाणु के अनुसंधान का दावा किया है।
  • भारत में औद्योगिक और प्रौद्योगिक कचरे को नष्ट कराने का काम केंचुओं से कराया जाता है।
  • पुनर्चक्रण में धातुओं को अलग करने के लिए छंटाई, चुंबक द्वारा विलगीकरण, विद्युत-विच्छेदन, सेंट्रीफ्यूजन और आस्मोसिस जैसी तकनीक अपनाई जाती है। लेकिन इससे शरीर व पर्यावरण दोनों को हानि होती है।
  • पुनर्चक्रण के लिये बायो-हाइड्रो मेटलर्जिकल तकनीक को बेहतर माना जाता है। इसमें कचरे को पीसकर जीवाणुओं के साथ रखा जाता है। इसमें जीवाणु धातुओं को अलग कर देते है, जिसे ‘बैक्टीरियल लीचिंग प्रोसेस‘ कहा जाता है।
  • जीवाणुओं की बेसिलस प्रजातियों द्वारा फफूंद और जीवाणुओं का उपयोग करके प्रिंटेड सर्किट बोर्ड से सीसा, ताँबा और टिन अलग किया जाता है।
  • यदि ई-कचरे को पेड़ की ढाल की तरह ढीलन में बदलकर 5-10 gm/l की सांद्रता में घोलकर बैक्टीरिया योयोबेसिलस, थायोआक्सीडेस और थायो बेसिलस फेरोआक्सीडंस के साथ रखा जाए, तो 90% धातुएँ निकाली जा सकती हैं।
  • औसतन एक स्मार्टफोन में 30 मिलीग्राम सोना होता है। ऐसे लाखों मोबाइल, लैपटाप, कंप्यूटर का पुनर्चक्रण किया जाता है।

विकासशील देशों द्वारा तथा जो कंपनियाँ इस कचरे को यहाँ भेजती हैं, उनके द्वारा यदि पुनर्चक्रण संयंत्र लगाये जाएं, तो बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलेगा, इस समस्या का समाधान भी हो जाएगा दुनिया। ई कचरे के प्रदुषण से भी मुक्त हो सकेगी।

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