जीवाश्म ईंधन में एथेनाल की अनिवार्यता व इसके संकट
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मोटर वाहनों के ईंधन में 20% एथेनाल मिश्रण के लक्ष्य को निर्धारित समय से पाँच वर्ष पहले ही हासिल कर लिया गया है। अब ई-20 को ई-27 अर्थात् जीवाश्म ईंधन में 27% एथेनाल मिश्रण का लक्ष्य तय किया गया है। यह निर्णय ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन तथा शहरों में प्रदूषण कम करने की दृष्टि से स्वागत योग्य है।
ईंधन में एथेनाल मिश्रण के लाभ –
- इससे 2070 तक शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने में मदद मिलेगी।
- आयातित कच्चे तेल पर देश की निर्भरता कम होगी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2014-15 से 2024-25 तक एथेनाल मिश्रण के कारण 2,45,000 टन कच्चा तेल कम खरीदना पड़ा, जिससे 1,44,087 करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बची।
- 30 करोड़ वृक्ष जितना कार्बनडाइआक्साइड सोकते, एथेनाल मिश्रण से उतना उत्सर्जन कम हुआ।
- मक्के व गन्ने से बने एथेनाल से पेट्रोल की तुलना में 65% व 50% कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन होता है।
- यह मिश्रण मक्का, धान व गन्ने की पराली के लिए स्थायी बाजार उपलब्ध कराता है।
- इस उपलब्धि के साथ भारत अब ब्राजील, अमेरिका और यूरोप जैसे पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण वाले विशिष्ट देशों में शामिल हो गया है।
हमें आगे क्या करना चाहिए?
- देश के 90,000 पेट्रोल पंपों पर एथेनाल मिश्रित ईंधन इकलौता विकल्प है। वाहनों की बनावट ई-10 के आधार पर की गई थी। इस बात पर संदेह है कि पहले के वाहन 20% एथेनाल मिश्रित ईंधन पर अच्छा प्रदर्शन करेंगे। इसीलिए भारत को यूरोप के जैसे ही ई-10, ई-15, ई-20 ईंधन का विकल्प उपलब्ध कराना चाहिए। 1 अप्रैल 2025 के बाद बने वाहन ई-20 के लिए बने हैं। पहले के उपभोक्ताओं को आश्वस्ति नहीं, विकल्प देने होंगे।
- इससे खाद्यान्न बनाम ईंधन की बहस तेज हो गई है। मोटा अनाज व तिलहन किसान कम उगा रहे हैं, क्योंकि मक्के को उगाने से उन्हें ज्यादा आय मिलती है। दो साल में मक्के की कीमत 1800 से 2500 रुपये हो गई है। मक्के के उत्पादन का 70% पशु उत्पाद में जाता है। इससे उस पर भी संकट आता दिख रहा है।
- चावल और गन्ने की खेती सबसे ज्यादा पानी की मांग करते हैं, इसीलिए इसका पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है। वर्षा न होने पर किसानों को प्रतिकूल प्रभावों का भी सामना करना पड़ता है। पंजाब, हरियाणा तथा महाराष्ट्र में इनका रकबा बढ़ने से जल सुरक्षा पर बुरा असर हुआ है। इसीलिए सरकार को इन प्रतिस्पर्धी मांगों में संतुलन लाना चाहिए तथा ऐसा प्रबंधन करना चाहिए कि पर्यावरण की हानि कम से कम हो।
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