पॉक्सो एक्ट के मामले में न्यायालय ही कटघरे में

Afeias
17 Feb 2021
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Date:17-02-21

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हाल ही में मुंबई उच्च न्यायालय की नागपुर पीठ के एक फैसले ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। यह मामला 2016 के एक मामले से जुड़ा है, जिसमें बाल यौन अपराधों को रोकने से जुड़े पॉक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सैक्सुअल ऑफेन्स) एक्ट को एक तरह से पुर्नपरिभाषित करते हुए उसकी बहुत सीमित और प्रतिगामी व्याख्या की गई है। मामले के न्यायाधीश ने इसे ‘स्किन टू स्किन’ संपर्क न होने की वजह से अपराध की श्रेणी से मुक्त कर दिया। न्यायालय का यह निर्णय दो दृष्टियों से विवादास्पद की श्रेणी में रखा जा रहा है।

पहला तो यह कि इसने पॉक्सो एक्ट की सीमित समझ और इस कानून में अंतर्निहित भावना की घोर उपेक्षा की है। इस निर्णय ने समूची न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पॉक्सो की परिभाषा को इतने सीमित दायरे में देखना, खतरनाक और परेशान करने वाला है, क्योंकि यह बच्चों पर होने वाले यौन हमलों से संबंधित मामलों में निचली अदालतों के लिए भविष्य में एक उदाहरण बन सकता है। यह निर्णय पीड़ित के संरक्षण की जगह उत्पीड़क को संरक्षण प्रदान करता है।

ज्ञातव्य हो कि तमाम बाल अधिकार और महिला अधिकार संगठनों के लंबे संघर्ष और प्रयासों के परिणाम स्वरूप ही वर्ष 2012 में पॉक्सो एक्ट लागू किया गया था। यह कानून 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को यौन उत्पीडन से बचाने के लिए लाया गया था। इस कानून में बालकध्बालिका दोनों को ही संरक्षण देने का प्रावधान किया गया है। एक्ट के अनुभाग सात में इसके लिए पर्याप्त सख्ती की गई है। वर्ष 2018 में संशोधित इस कानून में 12 वर्ष से कम आयु के बच्चों के साथ दुष्कर्म के दोषी व्यक्ति के लिए मृत्युदंड का उपबंध जोड़ा गया।

उल्लेखनीय है कि उपरोक्त मामलें में दोषी को पॉक्सो एक्ट के अनुभाग आठ के तहत तीन साल कारावास का दंड दिया गया था। नागपुर पीठ की न्यायाधीश पुष्पा गनेडीवाला ने भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के अंतर्गत मात्र एक वर्ष के कारावास की सजा दी है। इस मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार ने अटार्नी जनरल वेणुगोपाल के माध्यम से हस्तक्षेप करके और उच्चतम न्यायालय में अपील दायर करते हुए इस प्रतिगामी निर्णय पर रोक लगाकर इसकी समीक्षा की मांग की है।

इस विवाद का दूसरा पहलू यह है कि जब भी महिलाओं के खिलाफ अपराध की बात आती है, तो क्या न्यायालय का रवैया पुरूषों के चश्में से देखने वाला हो जाता है ?

हमारा समाज पितृसत्तात्मक है, और न्यायाधीश भी इसी समाज का हिस्सा हैं। कानून का सबसे बड़ा मिथक निष्यक्षता है। कुछ न्यायाधीश इसके बीच में आदर्श परिवार, आदर्श नारी, आदर्श पीड़िता आदि को ले आते हैं। ऐसी प्रथाओं का पूरा एक पारिस्थितिकी तंत्र है।

पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण से महिलाओं के साथ होने वाला यौन उत्पीड़न केवल उनकी गरिमा को भंग करने तक सीमित है। उनकी नजर में बलात्कार के दोषी से पीड़िता का समझौता करवा देना भी उसकी गरिमा को लौटा देने के लिए पर्याप्त है। कुछ वर्ष पूर्व मद्रास उच्च न्यायालय ने ऐसे ही एक मामले में मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया था। बलात्कारी से पीड़िता का विवाह करा देने जैसे निर्णय भी दिए गए हैं। गत वर्ष मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने पीड़िता से कहा था कि वह आरोपित को राखी बांध दे।

कुछ वर्ष पहले आंध्र प्रदेश उच्च-न्यायालय ने एक विवाहिता के मंगलसूत्र न पहनने को लेकर उसे फटकार लगाई थी। गुवहाटी के एक मामले में पत्नी के सिंदूर न लगाने और शाखा न पहनने पर तलाक की स्वीकृति दे दी गई थी। जबकि पत्नी का अपने हिंदू पति से तलाक मांगे जाने को क्रूरता कह दिया जाता है।

बलात्कार और यौन उत्पीड़न के अधिकांश मामलों में महिला को लगातार ट्रायल पर रखा जाता है। उसके चाल-चलन, पहनावे को लेकर अनेक तरह की अपेक्षाएं रखी जाती हैं, जबकि पुरूषों के लिए ऐसा नहीं होता।

न्यायिक समुदाय में पितृसत्तात्मक मानसिकता इतने समय से चली आ रही है कि अब शायद उन्हें इसका आभास भी नहीं होता कि वे इससे आसक्त हैं।

न्यायालयों की अपनी एक गरिमा है। उन्हें न्याय का मंदिर इसलिए कहा जाता है कि वहां प्रत्येक व्यक्ति के साथ निष्पक्ष व्यवहार और निर्णय की अपेक्षा की जाती है। अपराध के लिए समुचित और समयबद्ध दंड का प्रावधान एक न्यायप्रिय और लाकतांत्रिक समाज का मूलभूत लक्षण है। जब यह प्राप्त नहीं होता, तो सामाजिक ढांचा चरमराने लगता है। न्यायिक सुधारों की आवश्यकता को देखते हुए ही राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग गठित करने की पहल की गई थी। फिलहाल कॉलेजियम ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया है। परंतु उम्मीद की जा सकती है कि इस दिशा में जल्द ही कोई ठोस कदम उठाया जा सकेगा।

समाचार पत्रों पर आधारित।

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